अधिक मास ज्येष्ठ अमावस्या २०२६ : तिथि, समय एवं महत्त्व

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इस लेख में आप पढ़ेंगे :

  • अधिक ज्येष्ठ अमावस्या २०२६ की तिथि एवं समय

  • अधिक मास ज्येष्ठ अमावस्या का आध्यात्मिक महत्त्व

  • अधिक ज्येष्ठ अमावस्या के अनुष्ठान एवं साधनात्मक आचरण

  • गुरु गोचर, माँ तारा की कृपा तथा ज्येष्ठ अधिक अमावस्या

  • 'तंत्र साधना' ऐप पर माँ तारा की उपासना करें

अधिक ज्येष्ठ अमावस्या वह अवसर है जब २ अत्यन्त शक्तिशाली आध्यात्मिक कालखंड एक-दूसरे से मिलते हैं—ज्येष्ठ अमावस्या, जो लय तथा मूल स्रोत में पुनरागमन की रात्रि है, और अधिक मास, वह अतिरिक्त चन्द्र मास जो काल के सामान्य प्रवाह से परे स्थित माना जाता है।

शक्ति उपासकों को इस अमूल्य संयोग का पूर्ण लाभ प्राप्त कराने हेतु 'तंत्र साधना' ऐप में गुप्त शक्तिपीठ प्रकट होगा, जहाँ वे माँ तारा की उपासना कर सकेंगे।

अधिक ज्येष्ठ अमावस्या २०२६ की तिथि एवं समय

तिथि : १४–१५ जून (रविवार–सोमवार)

समय : अपराह्न १२:१९ बजे (रवि, १४ जून) से प्रातः ८:२३ बजे (सोम, १५ जून) तक

अधिक मास ज्येष्ठ अमावस्या का आध्यात्मिक महत्त्व

अधिक मास, ज्येष्ठ मास और अमावस्या का संयोग आध्यात्मिक उन्नति के लिए एक अत्यन्त शक्तिशाली कालखण्ड का निर्माण करता है। उन उत्सवों के विपरीत जो अभिव्यक्ति, समृद्धि और बाह्य विस्तार का उत्सव मनाते हैं, ज्येष्ठ अधिक अमावस्या साधक को भीतर की ओर ले जाती है—उस गर्भसदृश अन्धकार में, जहाँ से समस्त सृष्टि का उद्भव होता है।

सनातन धर्म में अधिक मास का महत्त्व

शास्त्रों में अधिक मास का वर्णन एक ऐसे पवित्र अन्तराल के रूप में किया गया है, जिसे सौर एवं चन्द्र चक्रों में सामंजस्य स्थापित करने के लिए चन्द्र पंचांग में जोड़ा जाता है। कालान्तर में इसे विशेष रूप से आध्यात्मिक अनुशासनों और साधनाओं के लिए उपयुक्त अवधि माना जाने लगा।

अधिक मास की महिमा का गुणगान पुरुषोत्तम माहात्म्य में किया गया है :

मासानां पुरुषोत्तमोऽस्मि |

"मासों में मैं पुरुषोत्तम हूँ।"

अधिक मास को प्रायः ऐसी अवधि के रूप में वर्णित किया जाता है, जिसमें सांसारिक प्रयत्नों को अस्थायी रूप से गौण कर दिया जाता है और आध्यात्मिक साधनाओं के फल अनेक गुना बढ़ जाते हैं।

तंत्र में अमावस्या का महत्त्व

तंत्र में अमावस्या को अन्धकार के कारण अशुभ नहीं माना जाता। अन्धकार को सृष्टि के आदिम गर्भ के रूप में देखा जाता है।

अमावस्या के समय वही गुह्य शक्ति बाह्य अभिव्यक्ति से निवृत्त होकर अन्तर्मुखी चिन्तन एवं साधना के माध्यम से अधिक सुलभ हो जाती है।

अमावस्या के चन्द्रमा को प्रार्थना करते हुए लोगों की छायाकृतियों को दर्शाता हुआ एक चित्रण।
अमावस्या | स्रोत : divinesansar.com

ज्येष्ठ के विषय में : आध्यात्मिक अग्नि का मास

ज्येष्ठ वर्ष के उस काल में आता है जब ग्रीष्म अपने चरम पर होता है और पृथ्वी तीव्र ऊष्मा से तप्त होती है।

तांत्रिक प्रतीकवाद इस ऊष्मा को तपस् के रूप में देखता है—आध्यात्मिक रूपान्तरण की वह अग्नि जो साधक को परिष्कृत करती है।

कुलार्णव तंत्र बारम्बार इस बात पर बल देता है कि आध्यात्मिक प्रयास द्वारा आन्तरिक शुद्धि अनिवार्य है :

न तपसा समं तीर्थं न तपसा समं बलम् ।

"तप के समान कोई तीर्थ नहीं है और तप के समान कोई बल नहीं है।"

ज्येष्ठ की दाहक ऊष्मा आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक आन्तरिक अग्नि का बाह्य प्रतिबिम्ब बन जाती है।

तंत्र में अधिक ज्येष्ठ अमावस्या को विशेष क्या बनाता है

तंत्र के अनुसार सृष्टि का आरम्भ मौन में होता है और उसका लय भी मौन में ही होता है।

ज्येष्ठ अधिक अमावस्या ज्येष्ठ मास में स्थित २ पवित्र शून्यों के दुर्लभ संगम का प्रतिनिधित्व करती है :

  • अधिक मास : मासों के चक्र में एक अन्तराल

  • अमावस्या : चन्द्रप्रकाश के चक्र में एक अन्तराल

ये दोनों मिलकर मूल स्रोत—जगन्माता—की ओर पुनरागमन का एक अत्यन्त शक्तिशाली प्रतीक निर्मित करते हैं।

साधक को अन्तर्मुख होने का निमन्त्रण दिया जाता है, जिससे वह परिवर्तित कर सके:

  • वाणी को मौन में

  • मन को सजगता में

  • सजगता को हृदय में

  • हृदय को जगन्माता में

अधिक ज्येष्ठ अमावस्या के अनुष्ठान एवं अभ्यास

पंच शून्य और ज्येष्ठ अमावस्या

विज्ञानभैरव तंत्र आन्तरिक शून्यों पर ध्यान की शिक्षा देता है :

शिखिपक्षैश्चित्ररूपैर्मण्डलैः शून्यपञ्चकम् ।
ध्यायतोऽनुत्तरे शून्ये प्रवेशो हृदये भवेत् ॥

"विविध वर्णों से दीप्तिमान वृत्तों के रूप में प्रकट होने वाले पंच शून्यों का ध्यान करने पर साधक हृदय के भीतर स्थित परम शून्य में प्रवेश प्राप्त करता है।"

— विज्ञानभैरव तंत्र, श्लोक ३२

यह उपदेश विशेष रूप से अमावस्या के लिए अत्यन्त प्रासंगिक है।

बाह्य चन्द्रमा अदृश्य हो जाता है। मन अधिक शांत होने लगता है। साधक चेतना के आन्तरिक आकाश की ओर उन्मुख होता है। लक्ष्य अन्धकार नहीं है, अपितु उस परम शून्य में प्रवेश है—उस महाशून्य में, जो पूर्णतः चेतनामय है।

पितृगण और कर्मऋण

सनातन परम्परा में अमावस्या का सम्बन्ध पितृगणों से माना गया है।

गरुड़ पुराण में कहा गया है :

तिलैर्दर्भैर्जलैः श्राद्धं पितॄणां तृप्तिकारकम् |

"तिल, दर्भ तथा जल के साथ किया गया श्राद्ध पितृगणों को तृप्ति प्रदान करता है।"

इस कारण अमावस्या की रात्रियों में तांत्रिक साधक प्रायः निम्न साधनाओं का समन्वय करते हैं :

  • पितृ तर्पण

  • पिण्ड दान

  • पितृ स्मरण

  • मंत्र जप

  • जगन्माता की उपासना

इन साधनाओं के माध्यम से वे केवल पितृगणों के प्रति कृतज्ञता ही व्यक्त नहीं करते, अपितु वंशानुगत संस्कारों, कर्मबन्धनों तथा सूक्ष्म ऋणों के परिशोधन का भी प्रयास करते हैं।

वट सावित्री व्रत एवं निर्जला व्रत

वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ अमावस्या के दिन विवाहित स्त्रियों द्वारा अपने पति की दीर्घायु के लिए किया जाने वाला व्रत है।

इस व्रत का नाम सावित्री—अपने साहस, प्रज्ञा और पतिव्रत-निष्ठा के लिए विख्यात पौराणिक नायिका—तथा वटवृक्ष (बरगद), जो दीर्घायु एवं स्थिरता का प्रतीक है—के नाम पर रखा गया है।

विवाहित स्त्रियाँ वटवृक्ष की पूजा करती हैं, उसके चारों ओर पवित्र सूत्र बाँधती हैं तथा अपने पति की दीर्घायु की कामना से सावित्री-सत्यवान की कथा का श्रवण अथवा पाठ करती हैं।

ज्येष्ठ अमावस्या को निर्जला अमावस्या भी कहा जाता है। इस अवसर पर निर्जला व्रत का पालन किया जाता है, जिसमें ग्रीष्म ऋतु के चरम काल में जल का भी त्याग कर उपवास रखा जाता है। तपस् (तपस्या) सनातन धर्म में आध्यात्मिक उन्नति के मूलभूत अनुशासनों में से एक है।

वर्ष के सर्वाधिक उष्ण काल में निर्जला व्रत (अर्थात् जलरहित उपवास) का पालन करना अत्यन्त गहन तपस्या का स्वरूप माना जाता है। इसे अपने शारीरिक सुख-सुविधाओं का दैवी सत्ता के प्रति समर्पण माना जाता है, और जितना अधिक त्याग होता है, उतना ही अधिक आध्यात्मिक पुण्य प्राप्त होने की मान्यता है।

गुरु गोचर, माँ तारा की कृपा और ज्येष्ठ अधिक अमावस्या

माँ तारा का अमावस्या से सम्बन्ध

यद्यपि अमावस्या बाह्य रूप से अन्धकारमयी प्रतीत होती है, माँ तारा यह शिक्षा देती हैं कि आन्तरिक प्रकाश कभी लुप्त नहीं होता।

उनके विषय में एक प्रसिद्ध वचन है :

तारिणी दुर्गतिसंसारसागरस्य ।

"वे जो जीवों को संसाररूपी दुस्तर सागर से पार उतारती हैं।"

— तारा तंत्र परम्पराएँ

इसी कारण अनेक साधक अमावस्या के अनुष्ठानों के साथ माँ तारा के मंत्र जप का भी समन्वय करते हैं, जिससे वे अनिश्चितता, संक्रमण और रूपान्तरण के कालों में दैवी मार्गदर्शन प्राप्त कर सकें।

तंत्र में माँ तारा केवल संरक्षण प्रदान करने वाली देवी नहीं हैं। वे स्वयंगुरु-शक्ति हैं—वह दिव्य शक्ति जो ध्वनि को प्रज्ञा में और प्रज्ञा को मोक्ष में रूपान्तरित करती है।

माँ तारा के मानक मूर्तिशास्त्रीय स्वरूप को दर्शाता हुआ एक चित्रण।
माँ तारा | स्रोत : en.wikipedia.org

इस दुर्लभ संयोग के समय माँ तारा की उपासना क्यों की जानी चाहिए

पारम्परिक तांत्रिक दृष्टिकोण से देखें तो ज्येष्ठ अधिक अमावस्या और गुरु (बृहस्पति) के हाल ही में कर्क राशि में हुए गोचर का संगम माँ तारा—द्वितीय महाविद्या—की उपासना के लिए अत्यन्त अनुकूल आध्यात्मिक वातावरण निर्मित करता है।

बृहस्पति ने २ जून २०२६ को अपनी उच्च राशि कर्क में प्रवेश किया। वैदिक ज्योतिष में यह स्थिति बृहस्पति की सर्वाधिक शक्तिशाली एवं अत्यन्त मंगलकारी अवस्थाओं में से एक मानी जाती है।

देवगुरु बृहस्पति के मूर्तिशास्त्रीय स्वरूप का एक चित्रण।
देवगुरु बृहस्पति | स्रोत : siddhapedia.com

नवग्रहों में प्रत्येक महाविद्या का सम्बन्ध किसी न किसी ग्रह से माना जाता है, और माँ तारा का स्वाभाविक सम्बन्ध गुरु से है।

अनेक तांत्रिक परम्पराओं में माँ तारा को निम्न रूपों में प्रतिष्ठित किया गया है :

  • मंत्रों की जननी

  • दिव्य वाणी का उद्घाटन करने वाली

  • गुरु के पीछे कार्यरत प्रज्ञा-शक्ति

  • संसार-सागर से पार उतारने वाली तारिणी

गुरु निम्न का प्रतिनिधित्व करता है :

  • ज्ञान

  • प्रज्ञा

  • आध्यात्मिक मार्गदर्शन

  • उच्चतर सत्य का उद्घाटन

अतः गुरु और माँ तारा एक ही सिद्धान्त के माध्यम से कार्य करते हैं :

वह जो आत्मा को अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाता है।

माँ तारा केवल बौद्धिक प्रज्ञा नहीं हैं।

वे हैं :

  • करुणामयी प्रज्ञा

  • उद्धार करने वाली प्रज्ञा

  • मातृवत् प्रज्ञा

अतः कर्क में गुरु का प्रवेश प्रतीकात्मक रूप से "प्रज्ञा का हृदय में प्रवेश" प्रतीत होता है।

और देवी तारा वही महाविद्या हैं जो ज्ञान को जीवित अनुभूति में रूपान्तरित करती हैं।

श्रीविद्या में अमावस्या के समय चन्द्रमा की कलाएँ क्रमशः बिन्दु में विलीन होने लगती हैं। पन्द्रहों कलाएँ अपने मूल स्रोत में लौट जाती हैं। गुरु दैवी ज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है। तारा दैवी नाद का प्रतिनिधित्व करती हैं।

जब अन्धकारमयी चन्द्ररात्रि में ज्ञान (गुरु) और नाद (माँ तारा) का संगम होता है, तब साधक को निम्न की ओर आमन्त्रित किया जाता है :

  • आन्तरिक मंत्र

  • मौन जप

  • शून्य का ध्यान

  • अनाहत नाद का श्रवण

अतः अधिक ज्येष्ठ अमावस्या केवल अनुष्ठानों की रात्रि नहीं रह जाती, अपितु अपने भीतर स्थित गुरु का श्रवण करने की रात्रि बन जाती है।

'तंत्र साधना' ऐप पर माँ तारा की उपासना करें

'तंत्र साधना' ऐप जगन्माता के सभी भक्तों को दशमहाविद्याओं (तंत्र की १० ज्ञानदेवियों) की कृपा प्राप्त करने का एक सुव्यवस्थित एवं सुलभ माध्यम प्रदान करती है।

हिमालयी संन्यासी ओम स्वामी द्वारा निर्मित यह ऐप पूर्णतः दिव्याचार की तांत्रिक परम्परा पर आधारित है, जिसमें किसी भी भौतिक सामग्री अथवा उपकरण का उपयोग नहीं किया जाता। समस्त अर्पण मानसिक रूप से किए जाते हैं, अथवा इस स्थिति में प्रक्रिया को अधिक सजीव बनाने के लिए अन्तःक्रियात्मक स्क्रीन पर थ्री-डी चित्रों के रूप में कल्पित किए जाते हैं।

प्रत्येक महाविद्या का आवाहन एक पृथक 'वर्चुअल' लोक में निर्धारित दिनों तक उनके तांत्रिक मंत्र जप, यज्ञ तथा साधना के माध्यम से किया जाता है, जिन सभी में ओम स्वामी ने ऐप की रचना से पूर्व सिद्धि प्राप्त की थी।

साधक उनके स्वर में सभी जागृत मंत्रों का श्रवण करते हैं तथा आरम्भ से अंत तक ऐप में कोड किए गए अनुष्ठानों का पालन करते हैं, इसलिए किसी व्यक्तिगत गुरु के मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं होती।

निःशुल्क एवं विज्ञापन-मुक्त होने के कारण यह ऐप उन सभी व्यक्तियों के लिए सुलभ है जिनके पास स्मार्टफ़ोन अथवा टैबलेट है और जो तंत्र का अन्वेषण करने में रुचि रखते हैं।

साधक किसी भी समय स्वेच्छा से दक्षिणा अर्पित कर सकते हैं।

माँ तारा का गुप्त शक्तिपीठ

गुप्त शक्तिपीठ ऐप के महाविद्या क्षेत्र में स्थित एक विशेष लोक है। दशमहाविद्याओं के १० लोकों के विपरीत, यह केवल विशेष अवसरों पर प्रकट होता है जो किसी महाविद्या से सम्बद्ध होते हैं, जैसे नवरात्रियाँ और उनकी जयन्तियाँ।

इस शक्तिपीठ का उद्देश्य सभी साधकों को उस दिन की महाविद्या की पालनकारी एवं शुद्धिकारिणी उपस्थिति का आवाहन करने का अवसर प्रदान करना है। इसके लिए उनके जागृत ध्यान-श्लोकों के पाठ जैसे सरल अनुष्ठान कराए जाते हैं (स्वामीजी के स्वर में)।

यह सभी उपयोगकर्ताओं के लिए सुलभ है, यहाँ तक कि उनके लिए भी जिन्होंने अभी तक ऐप में अपनी मुख्य साधना-यात्रा प्रारम्भ नहीं की है।

इस अधिक मास ज्येष्ठ अमावस्या पर माँ तारा का गुप्त शक्तिपीठ ऐप में प्रकट होगा, जो शक्ति उपासकों को उनके ध्यान श्लोक का जप करने तथा उनका तांत्रिक यज्ञ सम्पन्न करने का मार्गदर्शित अवसर प्रदान करेगा।

उपयोगकर्ता अपनी उपलब्धता के अनुसार आवृत्तियों की संख्या स्वयं निर्धारित कर सकते हैं, तथा वे पुनः शक्तिपीठ में लौटकर इन अनुष्ठानों को जितनी बार चाहें उतनी बार कर सकते हैं।

गुप्त शक्तिपीठ की तिथि एवं समय :

१४ जून (रविवार) प्रातः ७ बजे से १५ जून (सोमवार) प्रातः ११ बजे तक

माँ तारा के आशीर्वाद आपके आन्तरिक गुरु की वाणी को जागृत करें, जिससे आगे की आध्यात्मिक यात्रा में आपको सहज अन्तर्दृष्टि एवं मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।

तंत्र का आरंभ कहाँ से करें, यह समझ नहीं पा रहे हैं?
१५,०००+ साधकों के समुदाय से जुड़ें, जो निःशुल्क वर्कशॉप्स, निर्देशित साधनाओं तथा अन्य माध्यमों के द्वारा तंत्र का अन्वेषण कर रहे हैं।

Frequently Asked Questions

जून २०२६ की अमावस्या विशेष क्यों है?

जून २०२६ की अमावस्या विशेष है क्योंकि इसी समय अमावस्या, अधिक मास और हिन्दू पंचांग का ज्येष्ठ मास एक साथ संयोग करते हैं। इसके अतिरिक्त, गुरु/बृहस्पति अपनी उच्च राशि कर्क में प्रवेश करते हैं, जो उनकी उच्च स्थिति मानी जाती है।

अधिक अमावस्या प्रत्येक ३ वर्ष में एक बार क्यों आती है?

अधिक अमावस्या इसलिए आती है क्योंकि चन्द्रवर्ष (लगभग ३५४ दिन) सौरवर्ष (लगभग ३६५ दिन) से लगभग ११ दिन छोटा होता है। लगभग तीन वर्षों की अवधि में यह वार्षिक ११ दिनों का अन्तर बढ़ते-बढ़ते लगभग ३३ दिनों के एक पूर्ण अतिरिक्त मास के बराबर हो जाता है। इसी अतिरिक्त मास को सौर ऋतुओं के साथ हिन्दू पंचांग का पुनः सामंजस्य स्थापित करने के लिए पंचांग में जोड़ा जाता है।

क्या ज्येष्ठ अमावस्या अशुभ होती है?

ज्येष्ठ अमावस्या पितृकर्मों, कर्मजन्य बन्धनों के परिशोधन तथा आध्यात्मिक साधनाओं के लिए अत्यन्त शुभ मानी जाती है। किन्तु नवीन भौतिक उपक्रमों, सांसारिक प्रयत्नों तथा ऐश्वर्य अथवा समृद्धि को आकर्षित करने के कार्यों के लिए इसे शुभ नहीं माना जाता।