कामाख्या मन्दिर में अम्बुबाची मेला २०२६ : तिथियाँ एवं विवरण
इस लेख में आप पढ़ेंगे :
अम्बुबाची मेला २०२६ की तिथियाँ एवं समय
अम्बुबाची मेला का इतिहास एवं कथा
अम्बुबाची मेला का आध्यात्मिक महत्त्व : यह क्यों मनाया जाता है
भूवैज्ञानिक कारण : अम्बुबाची मेला के समय जल लाल क्यों हो जाता है
अम्बुबाची मेला के अनुष्ठान एवं परम्पराएँ
‘तंत्र साधना’ ऐप पर विशेष उपासना
अम्बुबाची मेला असम के गुवाहाटी स्थित कामाख्या मन्दिर में प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला सबसे बड़ा ४-दिवसीय उत्सव है। देवी कामाख्या के भक्त मन्दिर में एकत्रित होते हैं उनके वार्षिक रजस्वला काल का उत्सव मनाने हेतु, जो सृजनशक्ति तथा प्रजनन सामर्थ्य का प्रतीकत्व करता है।
देवी कामाख्या का तंत्र की दशमहाविद्याओं से अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है, तथा उनकी अभिज्ञा माँ त्रिपुर सुंदरी के रूप में की जाती है। अतः माँ त्रिपुर सुंदरी का गुप्त शक्तिपीठ अम्बुबाची मेला की अवधि में 'तंत्र साधना' ऐप के सभी उपयोक्ताओं को उनकी प्रत्यक्ष उपासना करने का अवसर प्रदान करता है।

अम्बुबाची मेला २०२६ की तिथियाँ एवं समय
२२ जून (सोमवार) से २६ जून (शुक्रवार), २०२६ तक
उत्सव का कार्यक्रम
२२ जून (सोमवार) : प्रातःकाल मन्दिर के पुरोहित प्रवृत्ति (आरम्भ) अनुष्ठान सम्पन्न करते हैं। इसके साथ ही उत्सव का प्रारम्भ होता है और मुख्य मन्दिर के द्वार 3 दिन एवं 3 रात्रियों के लिए बन्द कर दिए जाते हैं।
२३, २४, २५ जून (मंगलवार, बुधवार, गुरुवार) : मन्दिर के द्वार बन्द रहते हैं, क्योंकि इस अवधि में माँ कामाख्या के रजस्वला होने की मान्यता है।
२६ जून (शुक्रवार) : प्रातःकाल मन्दिर के पुरोहित निवृत्ति (समापन) अनुष्ठान सम्पन्न करते हैं। इसके पश्चात् मुख्य मन्दिर के द्वार भक्तों के दर्शन हेतु पुनः खोल दिए जाते हैं।
अम्बुबाची मेला का इतिहास एवं कथा
प्राचीन वार्षिक उत्सव अम्बुबाची मेला केवल असम के गुवाहाटी स्थित पवित्र नीलाचल पर्वत पर अवस्थित कामाख्या मन्दिर में मनाया जाता है। इस स्थल का भूगोल स्वयं गूढ़ आध्यात्मिक महत्त्व से परिपूर्ण है।
नीलाचल पर्वत का वर्णन शास्त्रीय तांत्रिक साहित्य तथा स्थानीय मौखिक परम्पराओं में काव्यमय शैली में विशिष्ट रक्तवर्ण अथवा सिन्दूर सदृश आभा युक्त बताया गया है।
यह दृश्य विशेषता रजस् (गतिशीलता एवं प्रवृत्ति के ब्रह्माण्डीय तत्त्व), प्रजनन सामर्थ्य तथा जगन्माता की सृजनात्मक प्राण-शक्ति से गहन रूप से सम्बद्ध मानी जाती है।
पीठ का अवतरण
शास्त्रीय परम्पराओं के अनुसार, कामाख्या देवी मन्दिर भारत के सर्वाधिक प्रतिष्ठित शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। इसकी शास्त्रीय उत्पत्ति राजा दक्ष के यज्ञ के विनाश से सम्बद्ध है, जब भगवान शिव के शोकमग्न ताण्डव के उपरान्त देवी सती का योनि पिण्ड पृथ्वी पर यहाँ आ गिरा।
देवी के इस विशिष्ट अंग के पतन से यह स्थान ब्रह्माण्डीय सृष्टि एवं प्रजनन शक्ति के प्रमुख केन्द्र के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
कालिका पुराण इस पवित्र भूगोल का स्पष्ट वर्णन करता है :
योनि स्तम्भं जगत सर्वं यस्यां उत्पत्तिहेतवः।
तस्यां पूज्यतमे देशे कामरूपे निवासिनी॥"योनि सम्पूर्ण विश्व को धारण करती है; वही समस्त उत्पत्ति का मूल स्रोत है। उसी परम पवित्र क्षेत्र में कामाख्या विराजमान हैं।"
व्युत्पत्ति एवं दार्शनिक आधार
"कामाख्या" शब्द की व्युत्पत्तिगत संरचना ३ मूल तत्त्वों से निर्मित मानी जाती है, जो उनके आद्य स्वरूप को प्रकट करते हैं :
का : स्त्री तत्त्व का द्योतक है, जो प्रकृति के परम मूल स्रोत का प्रतिनिधित्व करता है।
माई : सार्वभौम जगन्माता का सूचक है।
खा : सृजन, अभिव्यक्ति अथवा जन्म प्रदान करने की क्रिया का द्योतक है।
इस प्रकार, कामाख्या वह पवित्र स्थल है जहाँ देवी सम्पूर्ण सृष्टि की दिव्य जननी के रूप में प्रत्यक्ष रूप से विराजमान हैं। मन्दिर के गर्भगृह में किसी मानवाकार प्रतिमा अथवा पारम्परिक शिलामूर्ति की स्थापना नहीं है।
इसके स्थान पर सम्पूर्ण उपासना योनिपीठ पर केन्द्रित है, जो एक प्राकृतिक स्वयंभू शिला (स्वतः प्रकट हुई शिला-विदर) के रूप में एक अन्धकारमय, गुहा-सदृश भूमिगत संरचना में स्थित है।
यह पवित्र शिला-विदर एक निरन्तर प्रवाहित भूमिगत जलधारा द्वारा सिंचित होती रहती है, जिसके कारण इसमें सदैव आर्द्रता बनी रहती है। यह आर्द्रता देवी की अनन्त सृजनशक्ति एवं शाश्वत सृजन-स्पन्दन का प्रतीक मानी जाती है।
अम्बुबाची मेला का आध्यात्मिक महत्त्व : यह क्यों मनाया जाता है
अम्बुबाची मेला का अन्तर्निहित दर्शन सामान्य सामाजिक धारणाओं तथा प्रचलित लौकिक दृष्टिकोणों को चुनौती देता है। जहाँ इतिहास में अनेक संस्कृतियों ने रजस्वला अवस्था को वर्जना, पृथक्करण अथवा अशुद्धता की धारणाओं से जोड़ा है, वहीं शाक्त तंत्र परम्परा इस सम्पूर्ण दृष्टिकोण को पूर्णतः उलट देती है।

कामाख्या देवी मन्दिर में रजस्वला चक्र को ब्रह्माण्डीय पवित्रता, रूपान्तरण तथा देवी की सृजनात्मक शक्ति की परम अभिव्यक्ति के रूप में उत्सवपूर्वक मनाया जाता है।
सृष्टि के सिद्धान्तों की शास्त्रीय पुष्टि
प्रकृति को ब्रह्माण्डीय गर्भ तथा चेतना को बीजदाता मानने की मूल अवधारणा को भगवद्गीता में भी स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया है :
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ।।"हे कुन्तीपुत्र, समस्त योनियों में जितने भी देहधारी रूप उत्पन्न होते हैं, उनके लिए महद् ब्रह्म (प्रकृति) गर्भधारण करने वाली माता है और मैं बीज प्रदान करने वाला पिता हूँ।"
— भगवद्गीता (अध्याय १४, श्लोक ४)
यह शास्त्रीय उद्घोषणा अम्बुबाची मेला के मूल दर्शन के साथ प्रत्यक्ष रूप से सामंजस्य रखती है। प्रकृति सम्पूर्ण भौतिक सृष्टि को जन्म देने वाली जगन्माता हैं, जबकि पुरुष अथवा ईश्वर उस पवित्र गर्भ में चेतना का बीज स्थापित करते हैं।
मन्दिर ३ दिनों तक बन्द क्यों रहता है
इस अनुष्ठान का केन्द्रबिन्दु देवी कामाख्या की रजस्वला अवस्था है। प्रत्येक वर्ष वर्षा ऋतु की इस विशिष्ट अवधि में यह मान्यता है कि देवी अपने वार्षिक रजस्वला चक्र से गुजरती हैं।
अनुष्ठानों का स्थगन : पूर्ण ३ दिनों तक गर्भगृह के द्वार पूर्णतः बन्द रखे जाते हैं।
सार्वजनिक गतिविधियों का विराम : समस्त नियमित सार्वजनिक पूजा, प्रत्यक्ष दर्शन तथा बाह्य अर्पण स्थगित कर दिए जाते हैं।
विश्राम की अवधि : देवी पवित्र एकान्त एवं विश्राम की अवस्था में प्रवेश करती हैं। बन्द द्वारों के बाहर भी सामान्य बाह्य अनुष्ठानों का स्थान गहन आन्तरिक निस्तब्धता तथा विशुद्ध भक्ति के व्यापक वातावरण द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है।
पवित्र रक्तवस्त्र का महत्त्व
चतुर्थ दिवस जब मन्दिर अत्यन्त आध्यात्मिक उत्साह के मध्य पुनः खुलता है, तब विश्राम की अवस्था से सक्रिय अभिव्यक्ति की ओर संक्रमण पूर्ण हो चुका होता है। इस अवसर पर भक्त २ विशिष्ट एवं अत्यन्त वांछित प्रकार के प्रसाद प्राप्त करने हेतु एकत्रित होते हैं :
अंगोदक : योनिपीठ से प्रवाहित होने वाला पवित्र जल, जो इन दिनों की विशिष्ट शक्ति से अभिमन्त्रित माना जाता है तथा नीलाचल पर्वत के समीप ब्रह्मपुत्र नदी के जल की भाँति रक्तवर्ण धारण कर लेता है।
अंगवस्त्र (अथवा रक्तवस्त्र) : श्वेत वस्त्र का एक पवित्र खण्ड, जिसे मन्दिर के द्वार बन्द रहने वाले ३ दिनों के समय प्राकृतिक शिला-विदर पर स्थापित किया जाता है। जल के सम्पर्क में आने के कारण यह वस्त्र रक्तवर्ण हो जाता है।

तांत्रिक प्रतीकवाद में इस वस्त्र का रक्तवर्ण भी प्रत्यक्ष रूप से ब्रह्माण्डीय रजस् से सम्बद्ध माना जाता है—वह अग्निमय, सक्रिय, गतिशील तथा रूपान्तरणकारी प्रकृति तत्त्व जो सम्पूर्ण सृष्टि में कार्यरत है। यह जीवनशक्ति, ब्रह्माण्डीय अण्ड अथवा गर्भ (ब्रह्माण्ड), पूर्ण अभिव्यक्ति के सामर्थ्य तथा जैविक एवं ब्रह्माण्डीय जन्म के गहन रहस्य का प्रतिनिधित्व करता है।
कृषि एवं ऋतुचक्र सम्बन्धी महत्त्व
अम्बुबाची मेला का समय ब्रह्माण्डीय प्रकृति के चक्रों से गहन रूप से सम्बद्ध है।
वर्षा ऋतु के साथ सामंजस्य: यह उत्सव ठीक उसी समय आरम्भ होता है जब असम के आकाश में घने वर्षा-मेघ एकत्रित होते हैं और ब्रह्मपुत्र नदी वर्षाजल से परिपूर्ण होकर उफान पर आती है।
पृथ्वी का उर्वरत्व : असम की कृषि परम्पराओं में पृथ्वी को एक जीवित एवं स्पन्दनशील सत्ता के रूप में देखा जाता है, जो इन वर्षाओं के समय समानान्तर रूप से रजस्वला अवस्था तथा उन्नत उर्वरता के काल से होकर जाती है।
सामर्थ्य का पुनर्नवीकरण : तीन दिनों का यह विश्रामकाल पृथ्वी की सृजनात्मक एवं कृषियोग्य शक्ति के पूर्ण पुनर्नवीकरण से पूर्व का एक अत्यावश्यक विराम माना जाता है। इस अवधि में प्रकृति अपनी सर्वाधिक सृजनशील अवस्था में प्रवेश करती है, जिससे भूमि आगामी कृषि चक्रों का पोषण करने हेतु पर्याप्त रूप से उर्वर बनती है।
भूवैज्ञानिक कारण : अम्बुबाची मेला के समय जल लाल क्यों हो जाता है
इस अवधि में एक अत्यन्त रोचक घटना देखी जाती है—विशाल ब्रह्मपुत्र नदी का जल स्पष्ट रूप से गहरे लाल रंग का दिखाई देने लगता है। जहाँ गूढ़ आध्यात्मिक परम्पराएँ इसे देवी के जीवंत स्वरूप का प्रत्यक्ष प्रतिबिम्ब मानती हैं, वहीं इसके पीछे एक स्थापित भूवैज्ञानिक कारण भी माना जाता है :
खनिज संरचना : नीलाचल पर्वत शृंखला के भीतर कामिया सिन्दूर (प्राकृतिक सिन्नाबर) तथा फेरिक ऑक्साइड के अत्यन्त सघन भूमिगत भण्डार पाए जाते हैं।
रासायनिक संरचना : सिन्नाबर एक चमकीले सिन्दूरी वर्ण का खनिज अयस्क है, जो मुख्यतः मर्क्यूरिक सल्फाइड से निर्मित होता है।
वर्षाकालीन मन्थन : जब वर्षा ऋतु की प्रथम प्रबल वर्षाधाराएँ आरम्भ होती हैं, तब तीव्र वर्षाजल भूमिगत परतों में प्रवेश करता है। इस प्रक्रिया से अवसादित खनिज तीव्रता से विचलित होकर स्थानीय मृदा एवं जलधाराओं के साथ मिश्रित हो जाते हैं।
दृश्य परिणाम : इस मिश्रण से उत्पन्न प्रवाह अन्ततः ब्रह्मपुत्र नदी में पहुँचता है, जिसके कारण जल गहरे रक्तवर्ण का प्रतीत होता है, जो रजस्वला रक्त के समान दिखाई देता है।

अम्बुबाची मेला के अनुष्ठान एवं परम्पराएँ
अम्बुबाची मेला को ऐतिहासिक रूप से भारत में तांत्रिक साधकों के सबसे विशाल तथा सर्वाधिक प्रभावशाली समागम के रूप में मान्यता प्राप्त है। इस अवधि में सम्पूर्ण नीलाचल पर्वत एक विशाल आध्यात्मिक केन्द्र में परिवर्तित हो जाता है।
यह मेला विविध परम्पराओं के असंख्य संन्यासियों एवं साधकों को आकर्षित करता है, जो सामान्यतः वर्ष के शेष समय दूरस्थ वनों, गुहाओं अथवा हिमालय के उच्च प्रदेशों में पूर्ण एकान्तवास में साधना करते हैं।
आध्यात्मिक वातावरण
इन ४ दिनों के कालखंड में सम्पूर्ण पर्वत एक सघन, अत्यन्त शक्तिसम्पन्न एवं ऊर्जस्वित आध्यात्मिक क्षेत्र में परिवर्तित हो जाता है। इस वातावरण का दृश्य एवं श्रव्य पहचान कुछ विशिष्ट घटनाओं द्वारा निर्मित होती है :
अखण्ड धूनियाँ : सम्पूर्ण मन्दिर परिसर में पवित्र धूनियाँ रात्रिभर प्रज्वलित रहती हैं।
मंत्रों और वाद्यों की गूँज : उन्नत देवी मंत्रों, शंखध्वनि तथा विशाल पीतल निर्मित घंटियों की प्रचण्ड एवं परस्पर गुंथी हुई ध्वनियाँ सम्पूर्ण क्षेत्र में प्रतिध्वनित होती रहती हैं।
विविध साधक परम्पराओं का समागम : बाउल साधक, गृहस्थ जिज्ञासु, नागा संन्यासी, अघोरी तथा कौल परम्परा के साधक पर्वत के प्रत्येक भाग में एकत्रित दिखाई देते हैं।
तांत्रिक साधनाएँ एवं रसायनिक प्रतीकवाद
कामाख्या पीठ का स्थान अत्यन्त मूलभूत एवं सर्वोच्च माना जाता है, क्योंकि यह दशमहाविद्याओं (दस महान ब्रह्माण्डीय ज्ञानस्वरूपा देवियों) का परम आसन है। इस परम्परा में स्वयं माँ कामाख्या को त्रिपुर सुंदरी(जिन्हें षोडशी भी कहा जाता है) के रूप में अभिज्ञात किया जाता है।
श्रीविद्या उपासक तथा तांत्रिक दीक्षित साधक इस पीठ की तीर्थयात्रा को अपनी मुख्य एवं कठिन साधना-अवस्था के पूर्व अथवा पश्चात् अनिवार्य मानते हैं, जिससे उनकी आध्यात्मिक सिद्धियाँ पूर्णता एवं स्थिरता प्राप्त कर सकें।
तांत्रिक रसायनशास्त्र, अथवा रसशास्त्र, यहाँ सम्पन्न होने वाले अनुष्ठानों की एक अत्यन्त गूढ़ एवं बहुस्तरीय व्याख्या प्रस्तुत करता है। इस परम्परा में पदार्थों को केवल रासायनिक तत्त्वों के रूप में नहीं, अपितु आध्यात्मिक एवं तात्त्विक सिद्धान्तों के प्रतीक के रूप में देखा जाता है :
जैसा कि रसार्णव तंत्र में कहा गया है :
पारदः शिववीर्यं तु |
"पारद शिव का वीर्य है।"
अपने आप में पारद को पूर्णतः अस्थिर माना जाता है, जबकि गन्धक एक अनियन्त्रित शक्ति के रूप में देखा जाता है। इन दोनों का पूर्ण रासायनिक एवं प्रतीकात्मक संयोग शिव और शक्ति की उस ब्रह्माण्डीय परस्पर क्रिया का प्रतिबिम्ब है, जो मानव शरीर के भीतर आध्यात्मिक जागरण को उद्भूत करने के लिए अनिवार्य मानी जाती है।
साधकों द्वारा सम्पन्न की जाने वाली साधनाएँ
चूँकि यह माना जाता है कि रजस्वला अवस्था के समय इस क्षेत्र की आध्यात्मिक शक्ति अपनी सर्वोच्च तीव्रता तक पहुँच जाती है, अतः साधक कुछ विशिष्ट एवं अत्यन्त सघन साधनाओं में संलग्न होते हैं :
• आन्तरिक ध्यान : श्रीचक्र के अधोमुख त्रिकोण का गहन ध्यान, जिसे सृष्टि की ब्रह्माण्डीय योनि के रूप में जाना जाता है।
• मंत्र साधना : अत्यन्त गोपनीय पंचदशी एवं षोडशी मंत्रों का तीव्र जप अथवा पूर्ण पुरश्चरण सम्पन्न करना।
• गूढ़ पूजा : श्रीचक्र नवावरण पूजा का विधिपूर्वक अनुष्ठान, जिसके माध्यम से साधक अस्तित्व की विविध परतों का अनुसरण करते हुए उसके एकमात्र मूल स्रोत, अर्थात् बिन्दु, तक पहुँचने का प्रयास करता है।
• अहंकार का अतिक्रमण : अघोर एवं कौल परम्पराओं के साधक समीपवर्ती श्मशानों, एकान्त गुहाओं तथा वनों के प्रबल ऊर्जाक्षेत्र का उपयोग कर मध्यरात्रि साधनाएँ सम्पन्न करते हैं, जिनका उद्देश्य भय, देहासक्ति तथा ब्रह्माण्डीय माया का अतिक्रमण करना होता है।
अन्ततः प्रामाणिक आचार्य इस बात पर बल देते हैं कि अम्बुबाची मेला का बाह्य स्वरूप चाहे जितना तीव्र, रहस्यमय अथवा प्रभावशाली प्रतीत हो, तंत्र का परम लक्ष्य न तो कौतूहल उत्पन्न करना है और न ही बाह्य तत्त्वों के प्रति आकर्षण जगाना।
सत्यनिष्ठ साधक के लिए वास्तविक तीर्थयात्रा उसके अपने सूक्ष्म शरीर के भीतर ही सम्पन्न होती है।
भौतिक योनिपीठ एक ब्रह्माण्डीय दर्पण के समान कार्य करता है, जो साधक को स्मरण कराता है कि सृष्टि, भौतिक अस्तित्व तथा चेतना और शक्ति की द्वैत लीला, अपने मूल स्वरूप में दिव्य हैं।
‘तंत्र साधना’ ऐप पर विशेष उपासना
हिमालयी संन्यासी ओम स्वामी द्वारा निर्मित ‘तंत्र साधना’ ऐपविश्वभर में जगन्माता के उपासकों को दशमहाविद्याओं (तंत्र की 10 ज्ञानस्वरूपा देवियों) की उपासना का एक निःशुल्क, विज्ञापन-मुक्त तथा चित्ताकर्षक अनुभव प्रदान करती है। यह उपासना शास्त्रसम्मत दिव्याचार मार्ग के अनुसार सम्पन्न होती है, जिसमें समस्त अनुष्ठान मानसिक रूप से किए जाते हैं।
साधक माँ काली के लोक से आरम्भ करके माँ कमलात्मिका के लोक तक क्रमशः प्रत्येक महाविद्या की जागृति की आध्यात्मिक यात्रा पर अग्रसर होते हैं। यह जागृति प्रत्येक महाविद्या के लिए निर्धारित दिनों की अवधि में तांत्रिक मंत्र जप, यज्ञ तथा साधना के माध्यम से सम्पन्न की जाती है।
ऐप में सम्मिलित सभी अनुष्ठान एवं मंत्रस्वरूप जप स्वयं ओम स्वामी द्वारा सिद्ध एवं जागृत किए गए हैं, जिससे वे आध्यात्मिक रूपान्तरण के लिए अत्यन्त प्रभावशाली बन जाते हैं।
चूँकि सभी अनुष्ठान तथा स्वामीजी के मार्गदर्शक निर्देश ऐप में कोड किए गए हैं, इसलिए तंत्र के प्रारम्भिक साधक भी किसी व्यक्तिगत गुरु के मार्गदर्शन के बिना यह सम्पूर्ण साधना-यात्रा पूर्ण कर सकते हैं।
माँ त्रिपुर सुंदरी का गुप्त शक्तिपीठ
‘तंत्र साधना’ ऐप में स्थित गुप्त शक्तिपीठ एक विशेष ‘थ्री-डी’ लोक है, जो दशमहाविद्याओं के क्षेत्र में उन दिनों प्रकट होता है जो उनके लिए विशेष महत्त्व रखते हैं, जैसे नवरात्रियाँ तथा उनकी-उनकी जयन्तियाँ।
यह सभी उपयोक्ताओं को उस दिवस की महाविद्या का उनके ध्यान श्लोक तथा तांत्रिक मंत्र जप के माध्यम से आवाहन करने का अवसर प्रदान करता है, चाहे वे ऐप की मुख्य साधना-यात्रा में किसी भी स्तर पर हों।
कामाख्या देवी की उपासना मुख्यतः माँ त्रिपुर सुंदरी, अर्थात् तृतीय महाविद्या, के रूप में की जाती है। अतः अम्बुबाची मेला २०२६ के ४ दिनों के दौरान माँ त्रिपुर सुंदरी का गुप्त शक्तिपीठ ऐप में सभी उपयोक्ताओं के लिए उपलब्ध रहेगा, भले ही आपने अभी तक उनके लोक का अनावरण न किया हो।
गुप्त शक्तिपीठ में भक्त ओम स्वामी के स्वर में माँ के जागृत ध्यान श्लोक तथा प्रभावशाली पंचदशी मंत्र का श्रवण करते हुए उनका जप करके माँ की उपासना कर सकेंगे। जप संख्या का चयन साधक स्वयं कर सकते हैं।
गुप्त शक्तिपीठ की तिथियाँ एवं समय :
प्रारम्भ : २२ जून (सोमवार), अपराह्न ४ बजे
समापन : २६ जून (शुक्रवार), प्रातः ९ बजे
सम्पूर्ण विश्व को जन्म देने वाली आदिशक्ति के आशीर्वाद प्राप्त करके अम्बुबाची मेला 2026 के इस पवित्र उत्सव को एक गहन आध्यात्मिक रूपान्तरणकारी अनुभव बनाएँ।
Comments
Your comment has been submitted