चैत्र नवरात्रि : १४ लोकों की अधिष्ठात्री देवी का आवाहन

शक्ति का ब्रह्मांडीय विस्तार

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इस लेख में आप पढ़ेंगे :

  • तांत्रिक साधना में ‘रात्रि’ का आंतरिक अर्थ

  • वैदिक और शाक्त ग्रंथों में ‘रात्रि’

  • माँ भुवनेश्वरी और १४ लोक

  • माँ भुवनेश्वरी का नवदुर्गा, देवी कूष्मांडा के साथ संबंध

  • इस चैत्र नवरात्रि माँ भुवनेश्वरी की उपासना करें

चैत्र नवरात्रि शक्ति के आध्यात्मिक रूपांतरण के नौ चरणों के माध्यम से होने वाले क्रमिक जागरण का प्रतीक है।

प्रत्येक दिन जगन्माता के एक नए आयाम को प्रत्यक्ष करता है और साधक की आंतरिक चेतना में एक नया परिवर्तन लाता है।

चौथे दिन तक साधक की चेतना व्यक्तिगत परिवर्तन से आगे बढ़कर सम्पूर्ण ब्रह्मांड को ही जगन्माता की अभिव्यक्ति के रूप में पहचानने लगती है।

तांत्रिक साधना में ‘रात्रि’ का आंतरिक अर्थ

आध्यात्मिक परंपराओं में “रात्रि” शब्द का अर्थ केवल सूर्य के अभाव से अधिक गहरा है।

आध्यात्मिक दृष्टि से रात्रि का अर्थ हैबाहरी प्रकाश से निवृत्ति, जिससे आत्मा का आंतरिक प्रकाश दृश्य हो सके।

तांत्रिक दर्शन के अनुसार :

  • रात्रि देवी (शक्ति) की है

  • दि�� शिव का है

रात्रि अंतरमुखी चेतना और सूक्ष्म अनुभूति को सहारा देती है।

इसी कारण मंत्र जप को रात्रि में करना परंपरागत रूप से अनुशंसित माना गया है।

रात्रि साधना के दौरान :

  • बाहरी इंद्रिय उत्तेजना कम हो जाती है

  • मन अधिक शांत हो जाता है

  • अवचेतन के गहरे स्तर सुलभ हो जाते हैं

वैदिक और शाक्त ग्रंथों में ‘रात्रि’

कई पवित्र ग्रंथों में रात्रि को देवी का स्वरूप बताया गया है।

ऋग्वेद — रात्रि सूक्त (१०.१२७)

रात्रि व्यख्यदायती पुरुत्रा देव्यक्षभिः ।
विश्वा अधि श्रियो अधित ॥

अर्थ :
“रात्रि स्वयं को प्रकट करती हैं; देवी अपने तारों को नेत्र बनाकर सम्पूर्ण जगत को आच्छादित करते हुए सभी जीवों की रक्षा करती हैं।”

इस सूक्त में रात्रि को सीधे एक देवी के रूप में संबोधित किया गया है, जो जगत को आश्रय और सुरक्षा प्रदान करती हैं।

दुर्गा सूक्त — तैत्तिरीय आरण्यक

तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं
वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम् ।
दुर्गां देवीं शरणमहं प्रपद्ये
सुतरां तरसे नमः ॥

अर्थ :
“मैं अग्नि के समान तेजस्वी, तप से प्रज्वलित देवी दुर्गा की शरण लेता हूँ, जो हमें अंधकार से पार कराती हैं।”

देवी महात्म्य — योगनिद्रा

या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥

अर्थ :
“जो देवी सभी जीवों में निद्रा के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार।”

यहाँ देवी योगनिद्रा के रूप में प्रकट होती हैं — वह शक्ति जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड को विश्राम में ले जाती है।

देवी भागवत पुराण

सा देवी योगनिद्रा विष्णोः शक्तिरनुत्तमा ॥

अर्थ :
“वे देवी विष्णु की परम योगनिद्रा हैं।”

सृष्टि के विलय के समय केवल देवी ही आवरण स्वरूप अंधकार के रूप में विद्यमान रहती हैं।

कालिका पुराण

सा काली कालरात्रिश्च ।

अर्थ :
“वे काली हैं; वे काल की रात्रि हैं।”

यहाँ रात्रि समय और सृष्टि से परे स्थित शक्ति के पारलौकिक सामर्थ्य का प्रतीक है।

माँ भुवनेश्वरी और १४ लोक

तोडल तंत्र के अनुसार, माँ भुवनेश्वरी शक्ति के उस चरण का प्रतिनिधित्व करती हैं जहाँ चेतना सृष्टि के व्यापक क्षेत्र में विस्तारकरती है।

वे इनका प्रतिनिधित्व करती हैं :

  • ब्रह्मांडीय आकाश

  • अस्तित्व का आधार

  • वह क्षेत्र जिसमें जीवन प्रकट होता है

वे वे महाविद्या हैं जो अस्तित्व के १४ लोकों पर शासन करती हैं। इनमें सम्मिलित हैं ७ उच्च लोक और ७ अधोलोक।

७ उच्च लोक

  • सत्य लोक — ब्रह्मा और सत्य का लोक

  • तप लोक — तपस्वियों और ऋषियों का लोक

  • जन लोक — उच्च आध्यात्मिक जीवों का लोक

  • महर लोक — ब्रह्मज्ञानियों का लोक

  • स्वर लोक — इन्द्र का स्वर्ग

  • भुवर लोक — मध्य आकाशीय क्षेत्र

  • भूर लोक — पृथ्वी लोक

७ अधोलोक

  • अतल

  • वितल

  • सुतल

  • तलातल

  • महातल

  • रसातल

  • पाताल

ये सभी लोक कर्म के आधार पर साधक की विभिन्न अवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।

तांत्रिक ग्रंथ इस स्तर को जल तत्त्व से भी जोड़ते हैं — वह स्तर जहाँ जीवन के प्रथम रूप प्रकट होने लगते हैं।

मनोवैज्ञानिक रूप सेयह स्तर उस परिवर्तन को दर्शाता है जिससे साधक की चेतना व्यक्तिगत पहचान से आगे बढ़करसम्पूर्ण ब्रह्मांड की पवित्रता को अनुभव करने लगती है।

माँ भुवनेश्वरी का नवदुर्गा, देवी कूष्मांडा के साथ संबंध

नवरात्रि के चौथे दिन नवदुर्गा देवी कूष्मांडा की पूजा की जाती है। मान्यता है कि उन्होंने अपने दिव्य स्मित से ब्रह्मांड का सृजन किया।

देवी कुष्मांडा का मानक मूर्तिशास्त्रीय चित्रण।
स्रोत : sadhana.app

वे उस क्षण का प्रतिनिधित्व करती हैं जब सृष्टि आद्य शून्य से प्रकट होती है।

यह चरण माँ भुवनेश्वरी से संबंधित है, जो इनका प्रतिनिधित्व करती हैं :

  • सृष्टि का ब्रह्मांडीय आकाश

  • ब्रह्मांड का गर्भ

  • वह आधार जिसमें सभी लोक विद्यमान हैं

देवी भुवनेश्वरी का मानक मूर्तिशास्त्रीय चित्रण।
स्रोत : historified.in

दोनों रूप एक ही आध्यात्मिक सत्य प्रकट करते हैं : सम्पूर्ण ब्रह्मांड स्वयं जगन्माता का शरीर है।

माँ भुवनेश्वरी का बीज मंत्र

माँ भुवनेश्वरी का प्रमुख बीज मंत्र है :

ह्रीं

शारदातिलक तंत्र का एक श्लोक कहता है :

ह्रींकारः परमं बीजं भुवनेश्याः प्रकीर्तितम् ।

अर्थ :
“ह्रीं को भुवनेश्वरी का सर्वोच्च बीज मंत्र कहा गया है।”

माया बीज कहलाने वाला यह मंत्र इनका प्रतिनिधित्व करता है :

  • ब्रह्मांडीय सृष्टि की शक्ति

  • दिव्य अभिव्यक्ति का विस्तार

  • अस्तित्व की मूल संरचना

इस बीज मंत्र के माध्यम से साधक जगन्माता की सृजनात्मक और व्याप�� शक्ति का आवाहन करता है।

इस चैत्र नवरात्रि माँ भुवनेश्वरी की उपासना करें

माँ के नाम का शाब्दिक अर्थ है : समस्त लोकों की रानी।

माँ काली के शुद्धिकरण, माँ तारा के मार्गदर्शन और माँ त्रिपुर सुंदरी की समरसता के बाद साधक माँ भुवनेश्वरी की विराट ब्रह्मांडीय उपस्थिति का अनुभव करता है।

वे यह प्रत्यक्ष करती हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड दिव्य शक्ति की अभिव्यक्ति है, और स्वयं चेतना भी जगन्माता के अनंत आकाश में स्थित है।

इस चैत्र नवरात्रि में हिमालयी संन्यासी ओम स्वामी द्वारा निर्मित 'तंत्र साधना' ऐप शक्ति साधकों के लिए अपने गुप्त शक्तिपीठ के द्वार खोलता है।

नवरात्रि के प्रत्येक दिन यह शक्तिपीठ साधकों को किसी एक महाविद्या के ध्यान श्लोक और मूल बीज मंत्र का जप करने का अवसर देता ��ै। ये श्लोक और मंत्र, जिन्हें ओम स्वामी द्वारा जागृत तथा अभिषिक्त किया गया है, साधना को शक्तिशाली, सुरक्षित तथा शास्त्रसम्मत बनाते हैं।

१५ अप्रैल २०२७ को आपकी चैत्र नवरात्रि साधना पूर्ण होने के पश्चात् आप दशमहाविद्याओं की उपासना भी आरम्भ कर सकते हैं, जिसमें प्रत्येक महाविद्या को उनके तांत्रिक बीज मंत्र और गूढ़ साधना के माध्यम से एक-एक करके जागृत किया जाता है — माँ काली से लेकर माँ कमलात्मिका तक।

यह ऐप पूर्णतः निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है, जिसमें दक्षिणा पूर्णतः वैकल्पिक है।

दशमहाविद्याओं की चैत्र नवरात्रि आरम्भ होती है ६ अप्रैल २०२७ की अमावस्या से।

गुप्त शक्तिपीठ में प्रवेश करके माँ भुवनेश्वरी की उपासना उनके ध्यान श्लोक तथा बीज मंत्र के साथ करें।

दशमहाविद्याओं की कृपा से यह चैत्र नवरात्रि आपके जीवन में रूपान्तरणकारी काल सिद्ध हो।

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