तिब्बती तंत्र और हिन्दू तंत्र के मध्य भेद

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इस लेख में आप पढ़ेंगे :

  • हिन्दू तंत्र तथा तिब्बती तंत्र की प्राचीन उत्पत्तियाँ

  • दोनों परम्पराओं में तंत्र साधना का स्वरूप

  • बौद्ध तंत्र तथा हिन्दू तंत्र के प्रमुख दार्शनिक भेद

  • क्यों हिन्दू तंत्र एक पूर्ण एवं स्वावलम्बी आध्यात्मिक मार्ग है

तंत्र एक ही पवित्र शब्द है, किन्तु इतिहास में यह विभिन्न रूपों में प्रवाहित हुआ है। तिब्बती तंत्र और हिन्दू तंत्र, दोनों एक ही प्राचीन ज्ञानधारा से उद्भूत हैं, किन्तु भिन्न-भिन्न प्रदेशों तथा दर्शनों से होकर प्रवाहित होने के कारण उन्होंने भिन्न स्वरूप धारण किए।

तिब्बती तंत्र और हिन्दू तंत्र के मध्य भेद को समझने से साधक तंत्र साधना को भ्रम के स्थान पर स्पष्टता, श्रद्धा तथा सम्यक् बोध के साथ अपनाने में समर्थ होता है।

हिमालय की एक कथा

हिमालय की ऊँचाइयों में एक बार एक युवा साधक ने एक वृद्ध योगी से पूछा, “गुरुदेव, लोग तिब्बती तंत्र और हिन्दू तंत्र की ऐसी चर्चा करते हैं मानो दोनों एक ही हों। क्या वे वास्तव में एक ही हैं?”

योगी मुस्कराए, उन्होंने मुट्ठी भर हिम उठाई और बोले, “जब हिम पिघलती है, तब वह जल बन जाती है। जब जल जमता है, तब वह हिम बन जाता है। तत्त्व एक ही है, किन्तु उसकी गति ही उसका स्वरूप निर्धारित करती है।”

तंत्र भी ऐसा ही है।

हिन्दू तंत्र : सम्पूर्ण विश्व एक सजीव देवी के रूप में

शिव और शक्ति के ऐक्य को दर्शाता हुआ एक चित्र।
शिव और शक्ति का संयोग | चित्र श्रेयांकन : exoticindiaart.com

हिन्दू तंत्र का उद्भव और विकास भारतभूमि में हुआ। इसका पोषण वेदों, आगमों तथा रुद्रयामल तंत्र, कुलार्णव तंत्र, महानिर्वाण तंत्र और विज्ञानभैरव तंत्र जैसे प्राचीन तांत्रिक ग्रन्थों द्वारा हुआ। इसकी दृष्टि निर्भय तथा आत्मीय है।

हिन्दू तंत्र साधक को जीवन का त्याग करने के लिए नहीं कहता। वह साधक से जीवन के भीतर ही दिव्यता का साक्षात्कार करने के लिए कहता है।

हिन्दू तंत्र में यह विश्व त्याग देने योग्य माया नहीं है। यह स्वयं शक्ति है, जो रूप, प्राण तथा चैतन्य के रूप में स्पन्दित हो रही है।

कुलार्णव तंत्र में कहा गया है :

यद् भावं तद् भवति।

“जैसी किसी की अन्तर्दृष्टि होती है, वैसा ही वह बन जाता है।”

यहाँ तंत्र साधना मंत्र, श्वास की सजगता, आन्तरिक उपासना तथा भक्ति के माध्यम से क्रमशः संपन्न होती है। शरीर कोई बाधा नहीं है। वह एक पवित्र पात्र है, जिसमें चैतन्य स्वाभाविक रूप से जागृत होता है।

इसी कारण हिन्दू तंत्र शिव और शक्ति, चैतन्य और ऊर्जा, निश्चलता और गति की स्पष्ट व्याख्या करता है।

मुक्ति इनमें से किसी एक को चुनने से नहीं मिलती, बल्कि इस सत्य के साक्षात्कार से प्राप्त होती है कि दोनों कभी भी पृथक् थे ही नहीं।

तिब्बती तंत्र : बौद्ध दर्शन से प्रभावित एक मार्ग

जब भारतीय तांत्रिक शिक्षाएँ भारत से बाहर पहुँचीं, तब वे भारत में तांत्रिक साधनाओं के केन्द्र प्राग्ज्योतिषपुर अथवा कामाख्या के समीप स्थित होने के कारण पद्मसम्भव तथा अतीश जैसे आचार्यों के माध्यम से तिब्बत पहुँचीं।

वहाँ तंत्र का महायान बौद्ध धर्म के साथ समन्वय हुआ, और उसका विकास उस स्वरूप में हुआ जिसे आज तिब्बती तंत्र के नाम से जाना जाता है।

बौद्ध तंत्र और हिन्दू तंत्र की तुलना करने पर उनका दार्शनिक आधार ही दोनों के मध्य सबसे प्रमुख भेद बन जाता है।

तिब्बती तंत्र मुख्यतः मन के स्वरूप पर केन्द्रित है। उसके अनुसार दुःख का कारण अविद्या है, और शून्यता के साक्षात्कार से मुक्ति प्राप्त होती है।

तिब्बती तंत्र में प्रयुक्त क्रमबद्ध दृश्यीकरण साधनाओं का प्रतिनिधित्व करता हुआ एक पारम्परिक वज्रयान मण्डल।
तिब्बती तंत्र में प्रयुक्त क्रमबद्ध दृश्यीकरण साधनाओं का प्रतिनिधित्व करता हुआ एक पारम्परिक वज्रयान मण्डल | चित्र श्रेयांकन : taramandala.org

हेवज्र तंत्र में कहा गया है :

“मन ही बुद्ध है,
आसक्ति से मुक्त होने पर।”

तिब्बती तंत्र में देवताओं की उपासना शाश्वत ब्रह्माण्डीय तत्त्वों के रूप में नहीं, बल्कि प्रबुद्ध चैतन्य की अवस्थाओं के रूप में की जाती है। इसमें दृश्यकल्पना, मण्डल तथा अनुशासित चिन्तन को अनुष्ठानों की परम्परागत निरन्तरता की अपेक्षा अधिक महत्त्व दिया जाता है।

तंत्रों की किसी भी स्पष्ट तुलना में यह भेद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

विश्वदृष्टि में एक सूक्ष्म भेद

हिन्दू तंत्र एक सरल किन्तु अत्यन्त गम्भीर प्रश्न पूछता है : यदि सब कुछ शून्य है, तो मुक्ति का अनुभव कौन करता है?

और उसका उत्तर भी उतना ही सरल किन्तु गम्भीर है : वह परम चैतन्य जो समस्त रूपों में प्रकाशित होता है।

विज्ञानभैरव तंत्र घोषित करता है :

यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र शिवः।

“जहाँ-जहाँ चैतन्य पूर्णतः विश्रान्त होता है, वहाँ-वहाँ शिव हैं।”

यहीं तिब्बती तंत्र और हिन्दू तंत्र के मध्य एक सूक्ष्म किन्तु निर्णायक भेद स्थित है।

हिन्दू तंत्र एक ऐसे शाश्वत, स्वप्रकाश चैतन्य को स्वीकार करता है, जो स्वयं को समस्त विश्व के रूप में अभिव्यक्त करता है। तिब्बती तंत्र किसी स्थिर सत्ता की स्वीकृति से विरत रहता है और उसके स्थान पर अनासक्ति के माध्यम से मुक्ति की ओर संकेत करता है।

दोनों का लक्ष्य मुक्ति है, किन्तु वे भिन्न मार्गों पर चलते हैं।

अनुष्ठान, प्रतीक तथा तंत्र साधना

हिन्दू तंत्र में अनुष्ठान केवल यंत्रवत् सम्पन्न की जाने वाली क्रिया नहीं है। मंत्र और यंत्र केवल पवित्र ध्वनि तथा ज्यामितीय रचना मात्र नहीं, बल्कि ध्वनि तथा ज्यामितीय स्वरूप में स्वयं देवता हैं। वे ब्रह्माण्डीय सत्ता के सजीव स्वरूप हैं।

अनुष्ठान हमारे लोक और इन महान ब्रह्माण्डीय दिव्य सत्ताओं के लोक के मध्य सार्थक संवाद का एक माध्यम है।

श्री चक्र स्वयं जगन्माता हैं। अतः कोई भक्त यंत्र को “वह” कहकर सम्बोधित नहीं करता। यंत्र "वे" हैं—जगज्जननी।

तिब्बती तंत्र में मण्डलों का निर्माण किया जाता है और फिर उनका विसर्जन किया जाता है, जिससे मन को अनित्यता का अभ्यास कराया जा सके। वहाँ दृश्यकल्पना का प्रयोग भक्ति की निरन्तरता के स्थान पर आन्तरिक अनुशासन के साधन के रूप में किया जाता है।

हिन्दू तंत्र ईश्वर के साथ एक सजीव सम्बन्ध का अनुभव कराता है, जबकि तिब्बती तंत्र मुख्यतः दार्शनिक अन्वेषण की एक पद्धति के रूप में कार्य करता है।

बौद्ध तंत्र तथा हिन्दू तंत्र में शरीर का स्थान

हिन्दू तंत्र शरीर को शक्ति का मन्दिर मानता है। श्वास, संवेदना तथा यहाँ तक कि इच्छा का भी परिष्कार करके उन्हें चैतन्य में रूपान्तरित किया जाता है।

महानिर्वाण तंत्र सिखाता है :

भोगेन मोक्षं गच्छन्ति।

“सजग अनुभव के माध्यम से मुक्ति प्राप्त हो सकती है।”

तिब्बती तंत्र भी शरीर के साथ कार्य करता है, किन्तु मुख्यतः मन के प्रशिक्षण के साधन के रूप में। नाड़ियों, श्वास तथा आन्तरिक उष्णता की साधनाओं का प्रयोग ब्रह्माण्डीय पुरुषत्व की पुष्टि के लिए नहीं, बल्कि अविद्या के विलयन के लिए किया जाता है।

मुक्ति : दो भाषाएँ, एक मौन

हिन्दू तंत्र मोक्ष की बात करता है—अपने वास्तविक स्वरूप को शिव अथवा आत्मा के रूप में पहचानकर प्राप्त होने वाली मुक्ति।

आत्मैव देवता प्रोक्ता, साधनम् आत्मबोधनम्।

“आत्मा ही देवता है, और साधना आत्मबोध के लिए है।”

तिब्बती तंत्र बुद्धत्व की बात करता है—समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए दुःख से पूर्ण जागृति और मुक्ति।

शब्द भिन्न हैं। वे जिस मौन की ओर संकेत करते हैं, वह एक ही है।

भगवान शिव, बुद्ध तथा भारत को प्रदर्शित करता हुआ एक चित्र।
चित्र श्रेयांकन : hinduwebsite.com

‘तंत्र साधना’ ऐप

‘तंत्र साधना’ ऐप के संस्थापक, ओम स्वामी, कहते हैं कि तंत्र का उद्देश्य शक्ति प्राप्त करना नहीं, बल्कि उस साधक का विलय करना है जो शक्ति की कामना करता है। यह पूर्णता को प्राप्त करने का विज्ञान है, जहाँ जीवन स्वयं साधना बन जाता है।

हिमालय के एक सिद्धपुरुष के रूप में उन्होंने स्वयं इस मार्ग का अनुसरण किया है और सभी प्रमुख तांत्रिक मंत्रों को जागृत किया है।

आधुनिक जीवन की सीमाओं को समझते हुए उन्होंने शास्त्रों के अनुरूप प्रामाणिक हिन्दू तंत्र को ‘तंत्र साधना’ ऐप के माध्यम से सुलभ बनाया है, जिससे उसकी पवित्रता तथा गाम्भीर्य अक्षुण्ण बने रहें।

यहाँ साधक सहजता, सुरक्षा तथा सत्यनिष्ठा के साथ आरम्भ करते हैं, जिससे तंत्र साधना दैनिक जीवन के भीतर स्वाभाविक रूप से प्रकट होती है।

यह ऐप सम्पूर्ण रूप से दशमहाविद्याओं (तंत्र की १० प्रज्ञा देवियों) की उपासना पर आधारित है तथा दिव्याचार की तांत्रिक परम्परा के विधान का पालन करता है, जिसमें समस्त उपासना बाह्य सामग्री के उपयोग के स्थान पर मानसिक रूप से सम्पन्न की जाती है।

यदि एक आध्यात्मिक साधक के रूप में तंत्र का मार्ग आपकी जिज्ञासा जागृत करता है, तो यह आपके अपने घर में रहते हुए प्रामाणिक हिन्दू तंत्र का अभ्यास आरम्भ करने का प्रवेशद्वार बन सकता है।

माँ की कृपा को जागृत करें। परमात्मा के प्रेम में निमग्न हो जाएँ।
माँ केवल उन्हीं को बुलाती हैं जो उनकी उपासना के लिए तैयार होते हैं। यदि आप यहाँ हैं, तो आप तैयार हैं। दशमहाविद्याओं को जागृत करें। और भक्ति में आरोह करें।

संदर्भ :

  1. विज्ञानभैरव तंत्र – स्वामी लक्ष्मण जू तथा जयदेव सिंह द्वारा अनुवाद

  2. कुलार्णव तंत्र – कौल तंत्र का ग्रन्थ (विज़डमलिब संस्करण)

  3. महानिर्वाण तंत्र – सर जॉन वुड्रॉफ (आर्थर एवलॉन), द ग्रेट लिबरेशन

  4. रुद्रयामल तंत्र – प्रारम्भिक शैव–शाक्त तांत्रिक स्रोत

  5. शैव तथा शाक्त आगम – हिन्दू तंत्र की सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि

  6. हेवज्र तंत्र – डेविड स्नेलग्रोव (वज्रयान बौद्ध परम्परा)

  7. पद्मसम्भव तथा अतीश की परम्पराएँ – भारतीय तंत्र का तिब्बत में प्रसारण

  8. माध्यमक दर्शन (नागार्जुन) – बौद्ध तंत्र का वैचारिक आधार

Frequently Asked Questions

क्या हिन्दू तंत्र तिब्बती तंत्र से अधिक प्राचीन है?

हाँ। हिन्दू तंत्र तिब्बती तंत्र से कई शताब्दियों अधिक प्राचीन है। इसकी जड़ें वेदों, आगमों, तथा रुद्रयामल और कुलार्णव तंत्र जैसे प्राचीन तांत्रिक ग्रन्थों में निहित हैं। तिब्बती तंत्र का उदय बाद में हुआ, जब ये शिक्षाएँ तिब्बत में बौद्ध दार्शनिक परम्परा के अन्तर्गत विकसित हुईं।

क्या तंत्र साधना का अभ्यास सामान्य पारिवारिक जीवन के साथ किया जा सकता है?

हाँ। हिन्दू तंत्र केवल संन्यासियों तक सीमित नहीं था। इसकी रचना गृहस्थों के लिए भी हुई, जिससे वे संसार में पूर्ण रूप से जीवन व्यतीत करते हुए आध्यात्मिक उन्नति कर सकें। तंत्र साधना जीवन से निवृत्त होने की अपेक्षा दैनिक कर्मों, सम्बन्धों तथा उत्तरदायित्वों में सजगता का समावेश करती है।

हिन्दू तांत्रिक ग्रन्थ शक्ति पर इतना अधिक बल क्यों देते हैं?

हिन्दू तंत्र शक्ति को समस्त सृष्टि के पीछे स्थित सक्रिय सामर्थ्य मानता है। शक्ति के बिना शिव केवल अचल चैतन्य बने रहते हैं। इसीलिए शक्ति पर यह विशेष बल दिया जाता है, जिससे अध्यात्म नीरस अथवा पलायनवादी न बनकर सजीव, मूर्त तथा रूपान्तरकारी बना रहे और भक्ति तथा चैतन्य के प्रत्यक्ष अनुभव—दोनों का समान रूप से सम्मान हो।

क्या तंत्र केवल अनुष्ठानों और मंत्रों तक ही सीमित है?

नहीं। अनुष्ठान और मंत्र साध्य तक पहुँचने के साधन हैं, स्वयं साध्य नहीं। हिन्दू तंत्र में वे साधक के शरीर और मन को अधिक ग्रहणशील तथा अधिक शुद्ध बनाते हैं, ताकि निरन्तर साधना करते-करते वह एक दिन अपने भीतर विद्यमान परम शुद्ध सत्ता का साक्षात्कार कर सके। वास्तविक तंत्र साधना अन्ततः सहज उपस्थिति में परिपक्व होती है, जहाँ जीवन स्वयं साधना बन जाता है और सजगता अविच्छिन्न बनी रहती है।

क्या बौद्ध तंत्र और हिन्दू तंत्र भावनाओं को भिन्न दृष्टि से देखते हैं?

हाँ। बौद्ध तंत्र प्रायः भावनाओं की शून्य प्रकृति का बोध कराकर उनका विलयन करना चाहता है। इसके विपरीत, हिन्दू तंत्र भावनाओं को शक्ति की अभिव्यक्ति मानकर उनका परिष्कार करता है। दमन या निषेध के स्थान पर जागरुक सहभागिता के माध्यम से भावनाओं का रूपान्तरण सजगता, भक्ति तथा अन्तर्दृष्टि में किया जाता है।