गुरु पुष्य योग : २१ मई २०२६ को

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इस लेख में आप पढ़ेंगे :

  • अधिक मास २०२६ में गुरु पुष्य योग की तिथि एवं समय

  • गुरु पुष्य योग क्या है?

  • अधिक ज्येष्ठ पुरुषोत्तम मास में गुरु पुष्य योग का महत्त्व

  • ‘तंत्र साधना’ ऐप में अपनी यात्रा आरम्भ करने हेतु एक पवित्र दिवस

वैदिक ज्योतिष में गुरु पुष्य योग — जिसे गुरु पुष्य अमृत योग, गुरुपुष्यामृत योग अथवा गुरु पुष्य नक्षत्र योग भी कहा जाता है — अत्यन्त शुभ एवं आध्यात्मिक शक्ति से युक्त संयोगों में से एक माना जाता है। यह नवीन आरम्भों एवं प्रयत्नों के लिए एक महान अवसर होता है।

२०२६ के अधिक ज्येष्ठ पुरुषोत्तम मास में इसका घटित होना 'तंत्र साधना' ऐप में अपनी दशमहाविद्या साधना आरम्भ करने हेतु एक अत्यन्त शुभ कालखंड का निर्माण करता है।

अधिक मास २०२६ में गुरु पुष्य योग की तिथि एवं समय

तिथि : २१-२२ मई (गुरु-शुक्र)

समय : प्रातः ५:५३ (गुरु, २१ मई) से रात्रि २:४९ (शुक्र, २२ मई) तक

गुरु पुष्य योग क्या है?

गुरु पुष्य योग तब घटित होता है जब :

  • चन्द्रमा पुष्य नक्षत्र में संचरण करता है, जो वैदिक ज्योतिष के सर्वाधिक शुभ नक्षत्रों में से एक माना जाता है

  • और वार गुरुवार होता है, जो गुरु (बृहस्पति) का दिवस है

चूँकि गुरुवार का अधिपत्य गुरु के पास है तथा पुष्य नक्षत्र भी गुरु द्वारा अधिष्ठित है, अतः यह दिवस गुरु की शक्ति से द्विगुणित रूप से आवेशित हो जाता है।

गुरु एवं पुष्य नक्षत्र के विषय में

देवगुरु बृहस्पति के सामान्य मूर्तिशास्त्रीय स्वरूप का एक चित्रण।
देवगुरु बृहस्पति का मूर्तिशास्त्रीय स्वरूप | स्रोत : drikpanchang.com

गुरु प्रज्ञा, विस्तार, दिव्य कृपा, नीति, धर्म, पवित्र ज्ञान, कल्याणभाव तथा आध्यात्मिक उत्थान का प्रतीक है। वैदिक चिन्तन में गुरु वह शक्ति है जो अंधकार का निवारण कर उच्चतर सत्य का उद्घाटन करती है।

पुष्य नक्षत्र संस्कृत धातु ‘पुष्’ से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है — पोषण करना, सुदृढ़ करना अथवा विकसित करना।

इसका प्रतीक गौ का स्तन माना गया है, जो पोषण, प्रचुरता, पवित्र पालन एवं आध्यात्मिक समर्थन का प्रतिनिधित्व करता है।

पारम्परिक मुहूर्त शास्त्र में इसे पवित्र एवं कल्याणकारी कार्यों के आरम्भ हेतु सर्वाधिक शुभ नक्षत्रों में से एक बताया गया है। बृहत्संहिता, मुहूर्त चिन्तामणि, धर्मसिन्धु एवं कालप्रकाशिका जैसे प्राचीन ज्योतिष ग्रन्थ पुष्य को स्थिर एवं समृद्धिदायक कार्यों के लिए अत्यन्त अनुकूल मानते हैं।

यह नक्षत्र पोषण, आध्यात्मिक अनुशासन, संरक्षण एवं दिव्य कृपा से संबद्ध माना जाता है।

गुरु पुष्य योग का प्रभाव

देवगुरु बृहस्पति ‘देवताओं के गुरु’ हैं — परम दिव्य परामर्शदाता एवं पवित्र ज्ञान के आचार्य, जो देवताओं को ब्रह्माण्डीय व्यवस्था बनाए रखने हेतु आवश्यक धार्मिक मार्गदर्शन एवं आध्यात्मिक दिशा प्रदान करते हैं।

चूँकि पुष्य नक्षत्र देवगुरु बृहस्पति द्वारा अधिष्ठित है, अतः गुरु पुष्य योग इसकी प्रज्ञा एवं पवित्र विकास से संबंधित शक्ति को और अधिक प्रबल कर देता है।

इस प्रकार, गुरु पुष्य योग निम्नलिखित तत्त्वों का संगम बन जाता है :

  • पोषण एवं प्रज्ञा

  • समृद्धि एवं धर्म

  • विस्तार एवं संरक्षण

  • भौतिक सफलता एवं आध्यात्मिक सामंजस्य

मूलतः, गुरु पुष्य योग प्रज्ञा एवं शुभ सौभाग्य का पवित्र संगम है। अतः इस प्रभाव में आरम्भ किए गए कार्यों को विकास एवं मार्गदर्शन, दोनों की प्राप्ति होती है।

शताब्दियों से गृहस्थ, आध्यात्मिक साधक, ज्योतिषी, व्यापारी, राजा एवं जिज्ञासु गुरु पुष्य योग को ऐसे कार्यों के आरम्भ हेतु पवित्र काल मानते आए हैं, जिनका उद्देश्य स्थिर विकास एवं दीर्घकालिक संरक्षण प्राप्त करना होता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि यह व्यक्ति के कर्मों के फलों को पोषित एवं स्थिर करता है।

इसी कारण लोग परम्परागत रूप से गुरु पुष्य योग का चयन इन कार्यों के लिए करते हैं :

  • स्वर्ण अथवा संपत्ति क्रय

  • व्यवसाय आरम्भ करना

  • आर्थिक खातों का उद्घाटन

  • आध्यात्मिक दीक्षा ग्रहण करना

  • मंत्र साधना का आरम्भ

  • दीर्घकालिक लक्ष्यों में निवेश

  • शास्त्र अध्ययन का आरम्भ

पारम्परिक विधियाँ एवं अभ्यास

गुरु पूर्णिमा की भाँति, गुरु पुष्य भी अपने गुरु का सम्मान करने तथा गुरु तत्त्व को धारण करने वाले देवताओं, जैसे भगवान दक्षिणामूर्ति, श्रीकृष्ण एवं भगवान दत्तात्रेय की उपासना के लिए एक विशेष दिवस माना जाता है।

तांत्रिक एवं मंत्र परम्पराओं में, गुरु पुष्य योग निम्नलिखित कार्यों हेतु अत्यन्त अनुकूल माना जाता है :

  • मंत्र सिद्धि का आरम्भ

  • यंत्र एवं विग्रह प्रतिष्ठा

  • गुरु दीक्षा

  • व्रत अथवा अनुष्ठान का आरम्भ

  • आध्यात्मिक वस्तुओं का ऊर्जाकरण

यह गुरु मंत्र अथवा बृहस्पति मंत्र के विस्तारित जप के लिए भी आदर्श काल माना जाता है।

अधिक ज्येष्ठ पुरुषोत्तम मास में गुरु पुष्य योग का महत्त्व

अधिक मास : दिव्य कृपा का अतिरिक्त मास

अधिक मास (जिसे पुरुषोत्तम मास अथवा मलमास भी कहा जाता है) हिन्दू चन्द्र पंचांग में लगभग प्रत्येक ३२.५ मास के पश्चात जोड़ा जाने वाला एक अतिरिक्त मास है, जिससे उसका समन्वय ३६५.२५ दिवसीय सौर वर्ष के साथ स्थापित हो सके।

‘पुरुषोत्तम मास माहात्म्य’ नामक ग्रन्थ का आवरण पृष्ठ।
स्रोत : amazon.in

शास्त्रीय परम्परा के अनुसार, भगवान विष्णु ने इस मास को अपना ही नाम — पुरुषोत्तम — प्रदान किया, जिससे यह पूर्णतः अध्यात्म को समर्पित काल बन गया। ऐसा माना जाता है कि इस अवधि में सम्पन्न किए गए पुण्य कर्म परमात्मा की प्रत्यक्ष अधिष्ठिति के कारण अनेक गुना अधिक फल प्रदान करते हैं।

अधिक ज्येष्ठ पुरुषोत्तम मास : सौर शक्ति का चरम काल

अधिक ज्येष्ठ पुरुषोत्तम मास तब घटित होता है जब अतिरिक्त चन्द्र मास ज्येष्ठ के सौर मास के साथ संयोग करता है — ऐसा काल जो सूर्य की अधिकतम तीव्रता एवं ग्रीष्म ऋतु के चरम में प्रवेश द्वारा परिभाषित होता है।

‘ज्येष्ठ’ नाम का अर्थ है — “सर्वश्रेष्ठ” अथवा “ज्येष्ठतम”, जो विशेषतः इन्द्रियों पर वरिष्ठता एवं अधिकार का प्रतीक है।

जब यह मास पुरुषोत्तम मास के रूप में पवित्र होता है, तब यह अनुशासन एवं तपस्या की “अग्नि” द्वारा अहंकारजन्य अशुद्धियों को दग्ध करने हेतु एक दुर्लभ ऊर्जात्मक कालखंड का निर्माण करता है।

अधिक ज्येष्ठ में गुरु पुष्य योग : परम संयोग

अधिक ज्येष्ठ के समय गुरु पुष्य योग का घटित होना एक अत्यन्त विलक्षण ज्योतिषीय घटना है, जो भगवान विष्णु को समर्पित मास के भीतर गुरु (बृहस्पति) के विस्तारकारी प्रभाव को पुष्य नक्षत्र की पोषणकारी शक्ति के साथ एकीकृत करती है।

यह ‘स्वयंसिद्ध मुहूर्त’ सामान्य ज्योतिषीय सीमाओं का अतिक्रमण करता है, जिससे यह आध्यात्मिक दीक्षा तथा दीर्घकालिक साधनाओं के आरम्भ के लिए सर्वोत्तम काल बन जाता है।

यह काल समय के ऐसे दुर्लभ समन्वय का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ गुरु की प्रज्ञा एवं नक्षत्रों का पोषणकारी प्रभाव एकत्र होकर व्यक्ति की कर्मजन्य प्रगति को स्थिर करते हैं तथा धर्ममय प्रयत्नों की सफलता सुनिश्चित करते हैं।

'तंत्र साधना' ऐप में अपनी यात्रा आरम्भ करने हेतु एक पवित्र दिवस

हिमालयी संन्यासी ओम स्वामी द्वारा निर्मित 'तंत्र साधना' ऐप तंत्र में रुचि रखने वाले आध्यात्मिक साधकों को दशमहाविद्याओं (तंत्र की १० ज्ञानस्वरूपा देवियों) की क्रमबद्ध उपासना हेतु एक व्यवस्थित माध्यम प्रदान करती है — माँ काली से लेकर माँ कमलात्मिका तक।

ऐप की यात्रा पूर्ण करने के लिए आपके मोबाइल अथवा टैबलेट के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि यह दिव्याचार के पथ का अनुसरण करती है, जहाँ सम्पूर्ण उपासना मानसिक रूप से सम्पन्न की जाती है।

यह आधुनिक युग के लिए सरल रूप में प्रस्तुत तंत्र है। समस्त मंत्र एवं विधियाँ शास्त्रों के अनुसार यथावत संरक्षित रखी गई हैं।

चूँकि समस्त विधियाँ ओम स्वामी द्वारा विन्यस्त हैं तथा ऐप में संहित की गई हैं, साथ ही जागृत मंत्र उनके स्वयं के स्वर में रिकॉर्ड किए गए हैं, अतः साधना में त्रुटि होने की संभावना नहीं रहती। इसलिए इस यात्रा को पूर्ण करने के लिए किसी व्यक्तिगत गुरु की भी आवश्यकता नहीं होती।

यह ऐप पूर्णतः निःशुल्क एवं विज्ञापन रहित है, साथ ही साधकों के लिए स्वेच्छा से ऑनलाइन दक्षिणा अर्पित करने की व्यवस्था भी उपलब्ध करती है। ये सभी तत्त्व ऐप एवं जगन्माता की तांत्रिक उपासना को सभी साधकों — आरम्भिकों से लेकर निपुण तक — के लिए सुलभ बनाते हैं।

२१ मई २०२६ (गुरुवार) को अधिक ज्येष्ठ मास में स्थित गुरु पुष्य योग ऐप में अपना जीवन परिवर्तित कर देने वाली आध्यात्मिक यात्रा आरम्भ करने हेतु एक अत्यन्त शुभ काल प्रदान करता है।

अपनी उपासना का आरम्भ दशमहाविद्याओं में प्रथम माँ काली से करें। उनके जागृत तांत्रिक मन्त्र एवं तांत्रिक यज्ञ में दीक्षित हों, उनकी शव साधना सम्पन्न करें, तथा केवल ३३ दिनों में अपने जीवन में उनकी शक्ति को जागृत करें।

इसके पश्चात आप द्वितीय महाविद्या माँ तारा के लोक को उद्घाटित करेंगे।

इस गुरु पुष्य योग पर तंत्र के पथ पर अग्रसर होकर अपनी आध्यात्मिक यात्रा को अधिक प्रबल बनाएँ।

तंत्र का आरंभ कहाँ से करें, यह समझ नहीं पा रहे हैं?
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Frequently Asked Questions

गुरुपुष्यामृत योग २०२६ में कितनी बार घटित होगा?

गुरुपुष्यामृत योग २०२६ में कुल ३ बार घटित होगा — २३ अप्रैल, २१ मई एवं १८ जून को।

गुरु पुष्य योग का महत्व क्या है?

गुरु पुष्य योग का महत्व इस तथ्य में निहित है कि इसे नवीन कार्यों के आरम्भ, आर्थिक निवेश, अथवा स्वर्ण एवं संपत्ति क्रय के लिए अत्यन्त शुभ काल माना जाता है।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार, यह योग तब घटित होता है जब पुष्य नक्षत्र गुरुवार को पड़ता है, जिससे एक अत्यन्त शक्तिशाली संयोग निर्मित होता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि यह संयोग दीर्घकालिक सफलता तथा स्थायी समृद्धि की स्थापना सुनिश्चित करता है।

गुरु पुष्य योग के दौरान क्या टालना चाहिए?

गुरु की शक्ति धर्म का समर्थन करती है। अतः अधर्मी कार्यों से बचना चाहिए, जैसे लोभ पर आधारित आचरण, छलपूर्ण व्यावसायिक व्यवहार, हानिकारक अथवा अनैतिक कर्म, अथवा बड़े विवादों का आरम्भ करना।