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भगवान हयग्रीव : श्रीविद्या के गुरु

भगवान हयग्रीव, महर्षि अगस्त्य और माँ त्रिपुर सुंदरी का एक चित्र।

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इस लेख में आप पढ़ेंगे :

  • भगवान हयग्रीव कौन हैं

  • भगवान हयग्रीव और असुर हयग्रीव में अन्तर

  • भगवान हयग्रीव की पौराणिक उत्पत्ति कथाएँ

  • माँ त्रिपुर सुंदरी और श्रीविद्या से उनका सम्बन्ध

  • हयग्रीव जयन्ती २०२६ : ‘तंत्र साधना’ ऐप पर विशेष उपासना

भगवान हयग्रीव श्रीविद्या से गहराई से सम्बद्ध हैं, जो माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी की उपासना पर केन्द्रित शाक्त तांत्रिक परम्परा है।

‘तंत्र साधना’ ऐप इस दिन माँ त्रिपुर सुंदरी का गुप्त शक्तिपीठ खोलती है जो उनके प्रथम प्राकट्य (जयन्ती) का दिवस है, और उस अत्यन्त शक्तिशाली अनुष्ठान की सुविधा देती है जो उस अत्यन्त गुप्त और गहन स्तोत्र से लिया गया है, जिसे भगवान हयग्रीव ने महर्षि अगस्त्य और सम्पूर्ण विश्व के समक्ष प्रकट किया था।

जानने के लिए आगे पढ़ें कि क्यों…

भगवान हयग्रीव कौन हैं?

भगवान हयग्रीव भगवान विष्णु के अपेक्षाकृत कम प्रसिद्ध अवतारों में से एक हैं। उनका शरीर भगवान विष्णु का है और उनका तेजस्वी मस्तक अश्व का है, जो उन्हें विष्णु के परिचित अवतारों से तुरन्त विशिष्ट करता है। हयग्रीव नाम का स्वयं अर्थ है “वे जिनकी ग्रीवा या मस्तक अश्व की है।”

एक वृक्ष के नीचे बैठे भगवान हयग्रीव का चित्रण।
स्रोत : gomangala.com

उनका स्वरूप वर्णन ब्रह्माण्ड पुराण जैसे ग्रन्थों में मिलता है :

हयग्रीवां तनुं कृत्वा साक्षाच्चिन्मात्रविग्रहम् ।
शङ्खचक्राक्षवलयपुस्तकोज्ज्वलबाहुकाम् ॥९॥

पूरयित्रीं जगत्कृत्स्नं प्रभया देहजातया ।
प्रादुर्बभूव पुरतो मुनेरमिततेजसा ॥१०॥

"हयग्रीव का स्वरूप धारण करके, जिनका सम्पूर्ण शरीर शुद्ध चैतन्यस्वरूप था, वे मुनि के समक्ष प्रकट हुए, उनकी तेजस्वी भुजाएँ शंख, चक्र, अक्षमाला और पुस्तक धारण किए हुए थीं।

उनके देह से उत्पन्न प्रभा ने सम्पूर्ण जगत् को भर दिया, जब वे अपरिमित तेज के साथ मुनि के समक्ष प्रकट हुए।"

— ब्रह्माण्ड पुराण, उत्तरभाग ५.९–१०

पुस्तक पवित्र ज्ञान का प्रतीक है; अक्षमाला अनुशासित आध्यात्मिक साधना, पुनरावृत्ति और चिन्तन का प्रतीक है; शंख और चक्र भगवान विष्णु के रूप में उनकी पहचान को स्थापित रखते हैं।

इस प्रकार, भगवान हयग्रीव विष्णु तत्त्व, विद्या, मंत्र और चैतन्य को एकीकृत करते हैं।

भगवान हयग्रीव और असुर हयग्रीव में अन्तर

दिव्य भगवान हयग्रीव को हयग्रीव नामक असुर समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।

असुर हयग्रीव का सर्वाधिक विस्तृत शाक्त वर्णन देवी भागवत पुराण में मिलता है। वहाँ वह घोर तपस्या करता है और देवी से ऐसा वरदान माँगता है कि उसकी मृत्यु केवल उसी के हाथों हो सके, जो अश्वमुख वाला हो।

यही वरदान अन्ततः उसके विनाश का साधन बन जाता है। देवी की शक्ति भगवान विष्णु को अश्वमुख स्वरूप धारण करने और उस असुर का वध करने में समर्थ बनाती है।

देवी भागवत पुराण के प्रथम स्कन्ध के पाँचवें अध्याय में असुर के वरदान और उसके पश्चात् भगवान विष्णु के भगवान हयग्रीव के रूप में रूपान्तरण का स्पष्ट वर्णन मिलता है। अतः असुर हयग्रीव दिव्य हयग्रीव के एक विलक्षण विपरीत रूप का प्रतिनिधित्व करता है।

इन दोनों की दार्शनिक व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है :

असुर हयग्रीव के पास ज्ञान की शक्ति है, किन्तु प्रज्ञा नहीं।

दिव्य भगवान हयग्रीव के पास भी ज्ञान शक्ति है, किन्तु वह आत्मज्ञान की प्रज्ञा से प्रकाशित है।

भगवान हयग्रीव की पौराणिक उत्पत्ति की कथाएँ

भगवान हयग्रीव ने वेदों को कैसे पुनः प्राप्त किया

महाभारत और उससे सम्बद्ध पौराणिक परम्पराएँ भगवान हयग्रीव को वेदों की पुनःप्राप्ति और वैदिक ज्ञान की पुनर्स्थापना से सम्बद्ध करती हैं।

दो दुर्जेय असुरों, मधु और कैटभ, ने भगवान ब्रह्मा की ध्यानावस्था का लाभ उठाकर वैदिक ग्रन्थों को चुरा लिया। आदिकालीन शास्त्रों को ब्रह्माण्डीय जल की अगाध गहराइयों में ले जाकर उन असुरों ने सृष्टि को आध्यात्मिक अन्धकार और अज्ञान में डाल दिया, जिससे भगवान ब्रह्मा असहाय हो गए।

जब भगवान ब्रह्मा ने दैवी हस्तक्षेप के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना की, तब भगवान विष्णु ने भगवान हयग्रीव का तेजस्वी स्वरूप धारण किया, जो पूर्ण बुद्धि और परम शक्ति के मूर्त स्वरूप थे। ब्रह्माण्डीय अतल में सीधे प्रवेश करके भगवान हयग्रीव ने मधु और कैटभ का सामना किया और पवित्र ज्ञान को पुनः प्राप्त करने के लिए हुए एक महायुद्ध में दोनों असुरों का वध कर दिया।

भगवान हयग्रीव द्वारा वेदों को पुनः प्राप्त करने की कथा का दृश्यात्मक चित्रण।
स्रोत : chinnajeeyar.org

भगवान हयग्रीव महर्षि अगस्त्य के समक्ष कैसे प्रकट हुए

भगवान हयग्रीव की शिक्षाओं का महत्त्व तब अधिक स्पष्ट होता है जब हम महर्षि अगस्त्य के जीवन को देखते हैं। ब्रह्माण्ड पुराण कहता है :

अगस्त्यो नाम देवर्षिर्वेदवेदाङ्गपारगः ।
सर्वसिद्धान्तसारज्ञो ब्रह्मानन्दरसात्मकः ॥

"अगस्त्य नामक देवर्षि वेदों और वेदांगों के पारंगत थे, समस्त दार्शनिक सिद्धान्तों के सार के ज्ञाता थे और उनका स्वरूप ब्रह्मानन्द के रस से परिपूर्ण था।"

फिर भी, यह अत्यन्त सिद्ध महर्षि तब व्याकुल हो उठते हैं जब वे जीवों को अज्ञान और इन्द्रिय विषयों की तृष्णा में निमग्न देखते हैं।

ग्रन्थ कहता है :

तेषु तेष्वखिलाञ्जन्तूनज्ञानतिमिरावृतान् ।
शिश्नोदरपरान्दृष्ट्वा चिन्तयामास तान्प्रति ॥

"सर्वत्र जीवों को अज्ञान के अन्धकार से आवृत और केवल देह तथा उदर की तृप्ति में लगे हुए देखकर उन्होंने उनकी स्थिति के विषय में चिन्तन करना आरम्भ किया।"

महर्षि अगस्त्य यह नहीं पूछते कि उन्हें कौन सा शास्त्र पढ़ना चाहिए। वे पूछते हैं, "जीव किस प्रकार मुक्त हो सकते हैं?" उनका प्रश्न बौद्धिक जिज्ञासा से नहीं, बल्कि करुणा से उत्पन्न होता है।

अन्ततः वे अपनी पत्नी लोपामुद्रा के परामर्श से महाविष्णु साधना पूर्ण करते हैं, जो स्वयं जगन्माता ललिता त्रिपुर सुंदरी की उपासिका थीं। उनकी तपस्या और करुणा के फलस्वरूप भगवान विष्णु भगवान हयग्रीव के रूप में प्रकट होते हैं।

इससे हमें एक शक्तिशाली धार्मिक समानता दिखाई देती है। वैष्णव आख्यान में वेद लुप्त हो जाते हैं और हयग्रीव उन्हें पुनः प्राप्त करते हैं। ललितोपाख्यान में महर्षि अगस्त्य मानवता के लिए मुक्ति प्रदान करने वाले ज्ञान की कामना करते हैं और भगवान हयग्रीव श्रीविद्या को प्रकट करते हैं।

जब ज्ञान को पुनः प्राप्त करना या प्रकट करना होता है, तब भगवान हयग्रीव प्रकट होते हैं।

माँ त्रिपुर सुंदरी और श्रीविद्या से उनका सम्बन्ध

ब्रह्माण्ड पुराण के ललितोपाख्यान खण्ड में भगवान हयग्रीव महर्षि अगस्त्य के समक्ष माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी, श्रीचक्र और श्रीविद्या के रहस्यों को प्रकट करने वाली सत्ता के रूप में प्रकट होते हैं।

माँ त्रिपुर सुंदरी के मानक मूर्तिशास्त्रीय स्वरूप का एक चित्रण।
स्रोत : rudraksha-ratna.com

ललिता सहस्रनाम का प्राकट्य

ललितोपाख्यान ही ललिता सहस्रनाम का शास्त्रीय आधार है।

यह परम्परा महर्षि अगस्त्य और भगवान हयग्रीव के मध्य हुए उस प्रसिद्ध संवाद को सुरक्षित रखती है, जिसमें माँ ललिता के १००० दिव्य नामों का उपदेश दिया जाता है।

ग्रन्थ की परम्परा सहस्रनाम को हयग्रीव-अगस्त्य ज्ञान-संप्रेषण के अन्तर्गत मानती है।

ललिता त्रिशती का प्राकट्य

ललिता त्रिशती की परम्परा में यह सम्बन्ध और भी अधिक अन्तरंग हो जाता है। सहस्रनाम और श्रीचक्र की शिक्षाएँ प्राप्त करने के पश्चात् भी महर्षि अगस्त्य सन्तुष्ट नहीं होते और माँ ललिता के गहनतर ज्ञान की इच्छा रखते हैं।

परम्परागत वर्णन के अनुसार, भगवान हयग्रीव प्रारम्भ में त्रिशती को उसके गोपनीय स्वरूप के कारण प्रस्तुत करने से रोकते हैं। तब स्वयं माँ ललिता प्रकट होकर भगवान हयग्रीव को उसे महर्षि अगस्त्य के समक्ष प्रस्तुत करने की आज्ञा देती हैं।

ललिता त्रिशती की संस्कृत परम्परा इसे स्पष्ट रूप से भगवान हयग्रीव और महर्षि अगस्त्य के मध्य हुए एक अन्य संवाद के रूप में प्रस्तुत करती है। सहस्रनाम माँ ललिता का १००० नामों के माध्यम से निरूपण करता है। त्रिशती श्रीविद्या की मंत्र-संरचना में और अधिक गहराई तक जाती है।

३०० दिव्य नामों को परम्परागत रूप से पंचदशी मंत्र के १५ अक्षरों के आधार पर व्यवस्थित किया गया है—प्रत्येक अक्षर के लिए २० नाम।

हयग्रीव जयन्ती २०२६ : ‘तंत्र साधना’ ऐप पर विशेष उपासना

‘तंत्र साधना’ ऐप

हिमालयी संन्यासी ओम स्वामी द्वारा निर्मित पूर्णतः निःशुल्क और विज्ञापन-रहित ‘तंत्र साधना’ ऐप एक सुरक्षित और सुलभ मंच है, जो दशमहाविद्याओं (तंत्र की 10 ज्ञानस्वरूपा देवियों) की रूपान्तरणकारी पूजा को उन सभी आध्यात्मिक साधकों की प्रत्यक्ष पहुँच में लाती है जो तंत्र और जगन्माता के मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं।

दिव्याचार की तांत्रिक साधना-पद्धति पर आधारित इस ऐप में उपासना का प्रत्येक कार्य पूर्णतः मानसिक है, जिससे भौतिक अर्पणों की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। ओम स्वामी ने इस मार्ग के माध्यम से प्रत्येक अनुष्ठान में कठोर साधना द्वारा सिद्धि प्राप्त की और सभी जागृत मंत्रों को अपने स्वर में रिकार्ड किया।

ऐप में साधक १० परस्पर संवादात्मक थ्री-डी लोकों के माध्यम से एक विस्तृत, अनुशासित यात्रा तय करते हैं, जो १० महाविद्याओं को समर्पित हैं और माँ काली से माँ कमलात्मिका तक आगे बढ़ते हैं। प्रत्येक लोक में लगभग १-२ महीने बिताते हुए, साधक तांत्रिक मंत्र जप, यज्ञ और गूढ़ साधना के निर्धारित चरणों को पूर्ण करके सम्बन्धित महाविद्याओं को जागृत करते हैं।

चूँकि प्रत्येक साधना को सूक्ष्मता से ‘कोड’ किया गया है और प्रत्येक चरण पर ओम स्वामी के निर्देशों द्वारा मार्गदर्शन दिया गया है, इसलिए व्यक्तिगत गुरु के अभाव वाले पूर्णतः नवसाधक भी बिना किसी त्रुटि के इस यात्रा को पूर्ण कर सकते हैं।

हयग्रीव जयन्ती २०२६ की तिथि और समय : २७-२८ अगस्त (गुरुवार-शुक्रवार)

हयग्रीव जयन्ती २०२६ मुहूर्त : २७ अगस्त (गुरुवार) को ४:१४ अपराह्न से ६:४८ अपराह्न तक

पूर्णिमा तिथि : २७ अगस्त को ९:०८ पूर्वाह्न से २८ अगस्त को ९:४८ पूर्वाह्न तक

२०२६ में हयग्रीव जयन्तीश्रावण पूर्णिमा, रक्षाबन्धन और चन्द्र ग्रहण के साथ पड़ रही है, जिससे यह आध्यात्मिक साधना के लिए विशेष रूप से शुभ हो जाती है।

माँ त्रिपुर सुंदरी की विशेष उपासना

‘तंत्र साधना’ ऐप में स्थित गुप्त शक्तिपीठ एक अद्वितीय लोक है, जो केवल उन दिनों प्रकट होता है जो महाविद्या उपासना हेतु विशेष रूप से शक्तिशाली होते हैं, जैसे नवरात्रियाँ।

हयग्रीव जयन्ती २०२६ के शुभ पर्व पर गुप्त शक्तिपीठ आपको माँ त्रिपुर सुंदरी के ध्यान श्लोक के जप और ललिता त्रिशती यज्ञ के माध्यम से माँ की कृपा प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता है।

गुप्त शक्तिपीठ की तिथियाँ और समय :
२७ अगस्त (गुरुवार) को १२ मध्यरात्रि से २८ अगस्त (शुक्रवार) को ३ अपराह्न तक

यह शुभ दिवस भगवान हयग्रीव के गुरु-तत्त्व और माँ की कृपामयी उपस्थिति को आपके मन और हृदय में जागृत करे।

तंत्र की सर्वाधिक गुह्य पद्धतियों से माँ का आवाहन करें
जागृत मंत्रों का जप करें, तांत्रिक यज्ञों को संपन्न करें और उन गूढ़ साधनाओं को पूर्ण करें, जिन्हें सहस्रों वर्षों तक गुरु से शिष्य को गुप्त रूप से प्रदान किया गया था। अब ये सुलभ हैं। माँ को उनके १० तांत्रिक स्वरूपों में जागृत करें। परमात्मा के प्रेम में लीन हो जाएँ। और भक्ति में उन्नत हों।

Frequently Asked Questions

हयग्रीव का वध किसने किया?

दिव्य विष्णु अवतार भगवान हयग्रीव का कभी वध नहीं हुआ, क्योंकि वे भगवान विष्णु के अमर अवतार हैं। तथापि, हयग्रीव नामक असुर ने ऐसा वरदान प्राप्त किया था कि उसका वध केवल कोई अश्वमुखी प्राणी ही कर सकता था। भगवान विष्णु ने अपने अश्वमुखी हयग्रीव रूप में उस असुर का वध किया।

भगवान हयग्रीव किसके देवता हैं?

भगवान हयग्रीव को हिन्दू धर्म में ज्ञान, प्रज्ञा, बुद्धि और विद्या के देवता के रूप में पूजा जाता है। वे पवित्र वेदों के रक्षक एवं पुनर्स्थापक तथा श्रीविद्या के ज्ञान के प्रदाता के रूप में भी पूजित हैं।

क्या घर में हयग्रीव की मूर्ति रख सकते हैं?

हाँ, घर में भगवान हयग्रीव की छोटी मूर्ति या चित्र रखना अत्यन्त शुभ माना जाता है, विशेष रूप से विद्यार्थियों, शिक्षकों और आध्यात्मिक साधकों के लिए। इसे पूजा कक्ष में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके रखना उत्तम माना जाता है, बशर्ते इसे स्वच्छ रखा जाए और प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक पूजा की जाए।

हयग्रीव की पत्नी कौन हैं?

हिन्दू परम्परा में भगवान हयग्रीव की दिव्य पत्नी देवी लक्ष्मी हैं, जिनकी इस स्वरूप में विशेष रूप से उनके साथ लक्ष्मी हयग्रीव या देवी मरीचावती के रूप में पूजा की जाती है। वे उस परम ज्ञान और समृद्धि (विद्या और सिद्धि) का स्वरूप हैं, जो भगवान हयग्रीव की दिव्य बुद्धि की पूरक हैं।