# श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम्
Published: 2026-01-19
Category: Hindi
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Meta Title: श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम्
Meta Description: श्री ललिता सहस्रनाम — माँ त्रिपुर सुंदरी के १००० नामों का व्याख्यान, पाठ के लाभ, तथा तांत्रिक उपासना की विधियाँ।
Tags: Hindi, Tantra Hindi, Tantra Sadhana Hindi, Ma Tripura Sundari Hindi
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### इस लेख में आप पढ़ेंगे :​

- ​ललिता सहस्रनाम क्या है?

- ललिता सहस्रनाम की उत्पत्ति कथा

- ललिता सहस्रनाम का पाठ करने के लाभ

- श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्र

- श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्र के अर्थ सहित गीत-पद

- 'तंत्र साधना' ऐप पर माँ त्रिपुर सुंदरी की उपासना​


देवी ललिता त्रिपुर सुंदरी परम, सर्वव्यापक चेतना के रूप में और देवी के सर्वाधिक सुंदर स्वरूप के रूप में पूजित हैं, जो तीनों लोकों (त्रिपुर), अनुभव की तीन अवस्थाओं (स्थूल, सूक्ष्म, कारण) तथा चेतना की तीन अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) पर अधिष्ठित हैं।

वे माँ आदि पराशक्ति का परम स्वरूप हैं—आद्य ब्रह्मांडीय ऊर्जा और संपूर्ण सृष्टि की जननी।

- **ललिता –** जो क्रीड़ा करती हैं; सृष्टि, पालन और लय को उनकी दैवी लीला के रूप में देखा जाता है।

- **त्रिपुर –** जो तीनों लोकों (स्थूल, सूक्ष्म, कारण) और चेतना की तीनों अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) में अधिष्ठित अथवा सौंदर्य से युक्त हैं।

- **सुंदरी –** सर्वाधिक सुंदर।


![चार भुजाओं वाली माँ त्रिपुरसुंदरी की मूर्तिशास्त्रीय आकृति का चित्रण, जिसमे उनके चरणों के नीचे श्री चक्र स्थित है।](https://prod.superblogcdn.com/site_cuid_cmcefnv6x0009hoe0r2qjyjo4/images/untitled-design-1768817318554-compressed.png)देवी ललिता त्रिपुर सुंदरी का मूर्तिशास्त्रीय चित्रण

## ललिता सहस्रनाम क्या है?

**श्री ललिता सहस्रनाम** [**देवी ललिता त्रिपुर सुंदरी**](https://tantrasadhana.app/blog/ma-tripura-sundari-sadhana-a-guide-to-her-worship-hindi) **के १००० दिव्य नामों का पवित्र स्तोत्र है, जो ब्रह्माण्ड पुराण में भगवान विष्णु के अवतार हयग्रीव और महर्षि अगस्त्य के मध्य संवाद के रूप में वर्णित है।**

यह देवी के ब्रह्माण्डीय स्वरूप, उनके गुणों तथा सृष्टि, चैतन्य और शिव के साथ एकीकृत शक्ति के सूक्ष्म तत्त्वों का निरूपण करता है, जिससे सृष्टि के रहस्य तथा श्रीविद्या साधना की गूढ़ गहराइयाँ प्रत्यक्ष होती हैं।

इसे समझना और नियमित रूप से इसका पाठ करना भक्ति, सकारात्मक आन्तरिक परिवर्तन तथा लौकिक और आध्यात्मिक, दोनों प्रकार की सिद्धियों की प्राप्ति हेतु अत्यन्त प्रभावशाली साधना माना जाता है।

## ललिता सहस्रनाम की उत्पत्ति कथा

माँ त्रिपुर सुंदरी का प्रथम प्राकट्य देवताओं के चित्त के पवित्र अग्निकुण्ड, अर्थात् चिदग्निकुण्ड से हुआ, जिसके पश्चात् देवताओं ने अपनी अज्ञानता स्वीकार की और माँ को प्रसन्न करके उनका स्वागत किस प्रकार किया जाए, इस विषय में उनसे मार्गदर्शन की याचना की।

तब माता ने अपनी आठ सहचारी शक्तियों, वाग्देवियों, का आवाहन किया कि वे उनकी महिमा का गान करें, जिन्होंने इन एक हजार नामों द्वारा उनकी स्तुति की, जो कुण्डलिनी और चक्रों का शास्त्रों में प्रथम उल्लेख माना जाता है।

प्रत्येक नाम शुद्ध प्रेम और भक्ति का एक उच्चारण है, माँ का वर्णन, ध्यान और आवाहन करने की एक अद्वितीय विधि है।

भगवान हयग्रीव ने महर्षि अगस्त्य को निर्देश दिया कि वे इन नामों का ध्यान करें, प्रत्येक नाम के लिए एक अयन अर्थात छह मास समर्पित करें, और इस प्रकार पाँच सौ वर्षों के पश्चात भगवान शिव देवी की सम्पूर्ण साधना को प्रकट करेंगे।

श्री ललिता सहस्रनाम का पाठ श्रीविद्या और शाक्त परंपराओं में एक केंद्रीय साधना है। यह प्रेमपूर्ण भक्ति के भाव से भी किया जाता है और साधना के रूप में भी।

यह पावन स्तोत्र हमारी चेतना को शुद्ध करता है और धीरे-धीरे अंतःकरण के तमस, भ्रम और नकारात्मकता को दूर करता है। यह स्पष्टता, प्रज्ञा और संतुलन प्रदान करता है, साथ ही सांसारिक जीवन में कल्याण का आशीर्वाद देता है और मुक्ति की ओर हमारा मार्गदर्शन करता है।

परंपरागत रूप से यह माना जाता है कि नामों का उनके अर्थ के साथ जप करने से उनकी शक्ति अधिक गहन हो जाती है, क्योंकि प्रत्येक नाम चेतना की एक सूक्ष्म परत को स्पर्श करता है और जगन्माता की ऊर्जा के एक विशिष्ट पक्ष को जागृत करता है।

## ललिता सहस्रनाम का पाठ करने के लाभ

श्री ललिता सहस्रनाम का प्रत्येक नाम माँ ललिता के असीम गुणों की स्तुति करता है—उनका सौंदर्य, ऊर्जा, बल, महिमा, करुणा, यहाँ तक कि उनका निवास और उनका निर्गुण स्वरूप भी—और इस प्रकार साधक को देवी की एक सजीव, स्पष्ट प्रतिमा गढ़ने में सहायता करता है तथा उन्हें उनकी दैवी उपस्थिति का प्रत्यक्ष अनुभव कराता है।

संक्षेप में, यह आत्मसाक्षात्कार का एक मार्गदर्शक ग्रंथ है।

प्रत्येक नाम स्वयं में एक शक्तिशाली मंत्र के रूप में कार्य करता है, जिसमें अनेक गुप्त बीजाक्षर अंतर्निहित होते हैं। नियमित अभ्यास मन को शुद्ध करता है, कुण्डलिनी को जागृत करता है, और तीव्र, मार्गदर्शित साधना के माध्यम से आत्मसाक्षात्कार हेतु चक्रों (ऊर्जा-केंद्रों) को सक्रिय करता है।

केवल भक्ति के दृष्टिकोण से ही नहीं, अपितु शास्त्रीय दृष्टि से भी, सहस्रनाम अनेक अन्य वरदान प्रदान करता है।

महर्षि अगस्त्य को सहस्रनाम का उपदेश देने के पश्चात् स्वयं भगवान हयग्रीव यह उद्घोष करते हैं :

> **अनेन सदृशं स्तोत्रं न भूतं न भविष्यति ।**
>
> **सर्वरोगप्रशमनं सर्वसम्पत्प्रवर्धनम् ।।**
>
> अनुवाद :
>
> _इसके समान कोई भी स्तोत्र का निर्माण न तो कभी हुआ है और न ही कभी होगा।_

वे बताते हैं कि यह स्तोत्र विभिन्न स्तरों पर साधक को किस प्रकार अनुग्रह प्रदान करता है, समस्त रोगों का शमन और समृद्धि की वर्षा करते हुए :

### स्वास्थ्य एवं दीर्घायु

माँ ललिता का सहस्रनाम जब प्रेम और भक्ति के साथ पाठ किया जाता है, तब वह समस्त रोगों, ज्वर और दुःखों का लय कर देता है। यह हमें दीर्घ और स्वस्थ जीवन का वरदान देता है, माँ के अनुग्रह से प्रत्येक व्याधि का शमन करता है, और अकाल अथवा आकस्मिक मृत्यु से हमारी रक्षा करता है। जीवन में एक बार भी इसका श्रवण पुण्य के महासागर की वर्षा करता है और माँ की नित्य संरक्षण-शक्ति आकर्षित करता है।

### समृद्धि एवं पूर्ति

जगन्माता के नाम असीम समृद्धि की वर्षा करते हैं तथा हमारे जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—मानव जीवन के चारों पुरुषार्थों—की सिद्धि कराते हैं। उनके नाम भक्त को स्थिर धन, काव्यात्मक प्रज्ञा तथा कीर्ति प्रदान करते हैं और कामनायुक्त दम्पतियों को संतान का आशीर्वाद देते हैं।

उनके नामों के जप से उत्पन्न पुण्य काशी में करोड़ों शिवलिंगों की स्थापना, एक करोड़ अश्वमेध यज्ञों के अनुष्ठान, निर्जन मरुभूमियों में जीवनदायी कूपों के निर्माण, असंख्य जन्मों में गंगा तथा समस्त पावन तीर्थों में स्नान, अथवा करोड़ों निर्धनों को भोजन कराने के पुण्य के तुल्य कहा गया है।

### आध्यात्मिक मुक्ति

इस कलियुग में \- जहाँ अधर्म का प्राबल्य है \- कहा गया है कि केवल ईश्वर के नामों के जप से ही साधक सहज रूप से मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

**किन्तु ये समस्त लाभ एक सावधानी के साथ आते हैं। माँ के प्रति प्रेमपूर्ण ��क्ति के बिना जप करना, भाव के अभाव में उनके नामों का शीघ्रता से उच्चारण देना, अथवा नित्य शुचिता और भक्ति की उपेक्षा करना प्रशंसित नहीं है। ऐसा करने से साधक के जीवन में कोई ठोस परिवर्तन भी उत्पन्न नहीं होता।**

भौतिक कामनाएँ अनंत प्रतीत हो सकती हैं और हमें आकर्षित करती रहती हैं, परन्तु वास्तविक फल—वह मूल कामना, जिसके कारण महर्षि अगस्त्य को भगवान हयग्रीव से इस सहस्रनाम का वरदान प्राप्त हुआ—माँ का अंतःविजय का उपहार है : भीतर स्थित दैत्यों पर देवताओं की विजय।

अर्थात्, प्रत्येक अवसर पर अधर्म पर धर्म की विजय।

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## श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्र

### ॥ न्यासः ॥

> अस्य श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रमालामन्त्रस्य ।
>
> वशिन्यादिवाग्देवता ऋषयः ।
>
> अनुष्टुप्छन्दः ।
>
> श्रीललितापरमेश्वरी देवता ।
>
> श्रीमद्वाग्भवकूटेति बीजम् ।
>
> मध्यकूटेति शक्तिः ।
>
> शक्तिकूटेति कीलकम् ।
>
> श्रीललितामहात्रिपुरसुन्दरी-प्रसादसिद्धिद्वारा
>
> चिन्तितफलावाप्त्यर्थे जपे विनियोगः ।

### ॥ ध्यानम् ॥

> सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्
>
> तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
>
> पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
>
> सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥
>
> अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं
>
> धृतपाशाङ्कुशपुष्पबाणचापाम् ।
>
> अणिमादिभिरावृतां मयुखैः
>
> अहमित्येव विभावये भवानीम् ॥
>
> ध्यायेत्पद्मासनस्थां विकसितवदनां पद्मपत्रायताक्षीं
>
> हेमाभां पीतवस्त्रां करकलितलसद्धेमपद्मां वराङ्गीम् ।
>
> स��्वालङ्कारयुक्तां सततमभयदां भक्तनम्रां भवानीं
>
> श्रीविद्यां शान्तमूर्तिं सकलसुरनुतां सर्वसम्पत्प्रदात्रीम् ॥
>
> सकुङ्कुमविलेपनामलिकचुम्बिकस्तूरिकां
>
> समन्दहसितेक्षणां सशरचापपाशाङ्कुशाम् ।
>
> अशेषजनमोहिनीमरुणमाल्यभूषाम्बरां
>
> जपाकुसुमभासुरां जपविधौ स्म��ेदम्बिकाम् ॥

### ॥ अथ श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रम् ॥

> ॐ श्रीमाता श्रीमहाराज्ञी श्रीमत्-सिंहासनेश्वरी ।
>
> चिदग्नि-कुण्ड-सम्भूता देवकार्य-समुद्यता ॥१॥
>
> उद्यद्भानु-सहस्राभा चतुर्बाहु-समन्विता ।
>
> रागस्वरूप-पाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला ॥२॥
>
> मनोरूपेक्षु-कोदण्डा पञ्चतन्मात्र-सायका ।
>
> निजारुण-प्रभापूर-मज्जद्ब्रह्माण्ड-मण्डला ॥३॥
>
> चम्पकाशोक-पुन्नाग-सौगन्धिक-लसत्कचा ।
>
> कुरुविन्दमणि-श्रेणी-कनत्कोटीर-मण्डिता ॥४॥
>
> अष्टमीचन्द्र-विभ्राज-दलिकस्थल-शोभिता ।
>
> मुखचन्द्र-कलङ्काभ-मृगनाभि-विशेषका ॥५॥
>
> वदनस्मर-माङ्गल्य-गृहतोरण-चिल्लिका ।
>
> वक्त्रलक्ष्मी-परीवाह-चलन्मीनाभ-लोचना ॥६॥
>
> नवचम्पक-पुष्पाभ-नासादण्ड-विराजिता ।
>
> ताराकान्ति-तिरस्कारि-नासाभरण-भासुरा ॥७॥
>
> कदम्बमञ्जरी-कॢप्त-कर्णपूर-मनोहरा ।
>
> ताटङ्क-युगली-भूत-तपनोडुप-मण्डला ॥८॥
>
> पद्मराग-शिलादर्श-परिभावि-कपोलभूः ।
>
> नवविद्रुम-बिम्बश्री-न्यक्कारि-रदनच्छदा ॥९॥
>
> शुद्ध-विद्याङ्कुराकार-द्विजपङ्क्ति-द्वयोज्ज्वला ।
>
> कर्पूर-वीटिकामोद-समाकर्षि-दिगन्तरा ॥१०॥
>
> निज-सल्लाप-माधुर्य-विनिर्भर्त्सित-कच्छपी ।
>
> मन्दस्मित-प्रभापूर-मज्जत्कामेश-मानसा ॥११॥
>
> अनाकलित-सादृश्य-चिबुकश्री-विराजिता ।
>
> कामेश-बद्ध-माङ्गल्य-सूत्र-शोभित-कन्धरा ॥१२॥
>
> कनकाङ्गद-केयूर-कमनीय-भुजान्विता ।
>
> रत्नग्रैवेय-चिन्ताक-लोल-मुक्ता-फलान्विता ॥१३॥
>
> कामेश्वर-प्रेमरत्न-मणि-प्रतिपण-स्तनी ।
>
> नाभ्यालवाल-रोमालि-लता-फल-कुचद्वयी ॥१४॥
>
> लक्ष्यरोम-लताधारता-समुन्नेय-मध्यमा ।
>
> स्तनभार-दलन्मध्य-पट्टबन्ध-वलित्रया ॥१५॥
>
> अरुणारुण-कौसुम्भ-वस्त्र-भास्वत्-कटीतटी ।
>
> रत्न-किङ्किणिका-रम्य-रशना-दाम-भूषिता ॥१६॥
>
> कामेश-ज्ञात-सौभाग्य-मार्दवोरु-द्वयान्विता ।
>
> माणिक्य-मुकुटाकार-जानुद्वय-विराजिता ॥१७॥
>
> इन्द्रगोप-परिक्षिप्त-स्मरतूणाभ-जङ्घिका ।
>
> गूढगुल्फा कूर्मपृष्ठ-जयिष्णु-प्रपदान्विता ॥१८॥
>
> नख-दीधिति-संछन्न-नमज्जन-तमोगुणा ।
>
> पदद्वय-प्रभाजाल-पराकृत-सरोरुहा ॥१९॥
>
> शिञ्जान-मणिमञ्जीर-मण्डित-श्री-पदाम्बुजा ।
>
> मराली-मन्दगमना महालावण्य-शेवधिः ॥२०॥
>
> सर्वारुणाऽनवद्याङ्गी सर्वाभरण-भूषिता ।
>
> शिव-कामेश्वराङ्कस्था शिवा स्वाधीन-वल्लभा ॥२१॥
>
> सुमेरु-मध्य-श‍ृङ्गस्था श्रीमन्नगर-नायिका ।
>
> चिन्तामणि-गृहान्तस्था पञ्च-ब्रह्मासन-स्थिता ॥२२॥
>
> महापद्माटवी-संस्था कदम्बवन-वासिनी ।
>
> सुधासागर-मध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी ॥२३॥
>
> देवर्षि-गण-संघात-स्तूयमानात्म-वैभवा ।
>
> भण्डासुर-वधोद्युक्त-शक्तिसेना-समन्विता ॥२४॥
>
> सम्पत्करी-समारूढ-सिन्धुर-व्रज-सेविता ।
>
> अश्वारूढाधिष्ठिताश्व-कोटि-कोटिभिरावृता ॥२५॥
>
> चक्रराज-रथारूढ-सर्वायुध-परिष्कृता ।
>
> गेयचक्र-रथारूढ-मन्त्रिणी-परिसेविता ॥२६॥
>
> किरिचक्र-रथारूढ-दण्डनाथा-पुरस्कृता ।
>
> ज्वाला-मालिनिकाक्षिप्त-वह्निप्राकार-मध्यगा ॥२७॥
>
> भण्डसैन्य-वधोद्युक्त-शक्ति-विक्रम-हर्षिता ।
>
> नित्या-पराक्रमाटोप-निरीक्षण-समुत्सुका ॥२८॥
>
> भण्डपुत्र-वधोद्युक्त-बाला-विक्रम-नन्दिता ।
>
> मन्त्रिण्यम्बा-विरचित-विषङ्ग-वध-तोषिता ॥२९॥
>
> विशुक्र-प्राणहरण-वाराही-वीर्य-नन्दिता ।
>
> कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरा ॥३०॥
>
> महागणेश-निर्भिन्न-विघ्नयन्त्र-प्रहर्षिता ।
>
> भण्डासुरेन्द्र-निर्मुक्त-शस्त्र-प्रत्यस्त्र-वर्षिणी ॥३१॥
>
> कराङ्गुलि-नखोत्पन्न-नारायण-दशाकृतिः ।
>
> महा-पाशुपतास्त्राग्नि-निर्दग्धासुर-सैनिका ॥३२॥
>
> कामेश्वरास्त्र-निर्दग्ध-सभण्डासुर-शून्यका ।
>
> ब्रह्मोपेन्द्र-महेन्द्रादि-देव-संस्तुत-वैभवा ॥३३॥
>
> हर-नेत्राग्नि-संदग्ध-काम-सञ्जीवनौषधिः ।
>
> श्रीमद्वाग्भव-कूटैक-स्वरूप-मुख-पङ्कजा ॥३४॥
>
> कण्ठाधः-कटि-पर्यन्त-मध्यकूट-स्वरूपिणी ।
>
> शक्ति-कूटैकतापन्न-कट्यधोभाग-धारिणी ॥३५॥
>
> मूल-मन्त्रात्मिका मूलकूटत्रय-कलेवरा ।
>
> कुलामृतैक-रसिका कुलसंकेत-पालिनी ॥३६॥
>
> कुलाङ्गना कुलान्तस्था कौलिनी कुलयोगिनी ।
>
> अकुला समयान्तस्था समयाचार-तत्परा ॥३७॥
>
> मूलाधारैक-निलया ब्रह्मग्रन्थि-विभेदिनी ।
>
> मणि-पूरान्तरुदिता विष्णुग्रन्थि-विभेदिनी ॥३८॥
>
> आज्ञा-चक्रान्तरालस्था रुद्रग्रन्थि-विभेदिनी ।
>
> सहस्राराम्बुजारूढा सुधा-साराभिवर्षिणी ॥३९॥
>
> तडिल्लता-समरुचिः षट्चक्रोपरि-संस्थिता ।
>
> महासक्तिः कुण्���लिनी बिसतन्तु-तनीयसी ॥४०॥
>
> भवानी भावनागम्या भवारण्य-कुठारिका ।
>
> भद्रप्रिया भद्रमूर्तिर्भक्त-सौभाग्यदायिनी ॥४१॥
>
> भक्तिप्रिया भक्तिगम्या भक्तिवश्या भयापहा ।
>
> शाम्भवी शारदाराध्या शर्वाणी शर्मदायिनी ॥४२॥
>
> शाङ्करी श्रीकरी साध्वी शरच्चन्द्र-निभानना ।
>
> शातोदरी शान्तिमती निराधारा निरञ्जना ॥४३॥
>
> निर्लेपा निर्मला नित्या निराकारा निराकुला ।
>
> निर्गुणा निष्कला शान्ता निष्कामा निरुपप्लवा ॥४४॥
>
> नित्यमुक्ता निर्विकारा निष्प्रपञ्चा निराश्रया ।
>
> नित्यशुद्धा नित्यबुद्धा निरवद्या निरन्तरा ॥४५॥
>
> निष्कारणा निष्कलङ्का निरुपाधिर्निरीश्वरा ।
>
> नीरागा रागमथनी निर्मदा मदनाशिनी ॥४६॥
>
> निश्चिन्ता निरहंकारा निर्मोहा मोहनाशिनी ।
>
> निर्ममा ममताहन्त्री निष्पापा पापनाशिनी ॥४७॥
>
> निष्क्रोधा क्रोधशमनी निर्लोभा लोभनाशिनी ।
>
> निःसंशया संशयघ्नी निर्भवा भवनाशिनी ॥४८॥
>
> निर्विकल्पा निराबाधा निर्भेदा भेदनाशिनी ।
>
> निर्नाशा मृत्युमथनी निष्क्रिया निष्परिग्रहा ॥४९॥
>
> निस्तुला नीलचिकुरा निरपाया निरत्यया ।
>
> दुर्लभा दुर्गमा दुर्गा दुःखहन्त्री सुखप्रदा ॥५०॥
>
> दुष्टदूरा दुराचार-शमनी दोषवर्जिता ।
>
> सर्वज्ञा सान्द्रकरुणा समानाधिक-वर्जिता ॥५१॥
>
> सर्वशक्तिमयी सर्व-मङ्गला सद्गतिप्रदा ।
>
> सर्वेश्वरी सर्वमयी सर्वमन्त्र-स्वरूपिणी ॥५२॥
>
> सर्व-यन्त्रात्मिका सर्व-तन्त्ररूपा मनोन्मनी ।
>
> माहेश्वरी महादेवी महालक्ष्मीर्मृडप्रिया ॥५३॥
>
> महारूपा महापूज्या महापातक-नाशिनी ।
>
> महामाया महासत्त्वा महाशक्तिर्महारतिः ॥५४॥
>
> महाभोगा महैश्वर्या महावीर्या महाबला ।
>
> महाबुद्धिर्महासिद्धिर्महायोगेश्वरेश्वरी ॥५५॥
>
> महातन्त्रा महामन्त्रा महायन्त्रा महासना ।
>
> महायाग-क्रमाराध्या महाभैरव-पूजिता ॥५६॥
>
> महेश्वर-महाकल्प-महाताण्डव-साक्षिणी ।
>
> महाकामेश-महिषी महात्रिपुर-सुन्दरी ॥५७॥
>
> चतुःषष्ट्युपचाराढ्या चतुःषष्टिकलामयी ।
>
> महाचतुः-षष्टिकोटि-योगिनी-गणसेविता ॥५८॥
>
> मनुविद्या चन्द्रविद्या चन्द्रमण्डल-मध्यगा ।
>
> चारुरूपा चारुहासा चारुचन्द्र-कलाधरा ॥५९॥
>
> चराचर-जगन्नाथा चक्रराज-निकेतना ।
>
> पार्वती पद्मनयना पद्मराग-समप्रभा ॥६०॥
>
> पञ्च-प्रेतासनासीना पञ्चब्रह्म-स्वरूपिणी ।
>
> चिन्मयी परमानन्दा विज्ञान-घनरूपिणी ॥६१॥
>
> ध्यान-ध्यातृ-ध्येयरूपा धर्माधर्म-विवर्जिता ।
>
> विश्वरूपा जागरिणी स्वपन्ती तैजसात्मिका ॥६२॥
>
> सुप्ता प्राज्ञात्मिका तुर्या सर्वावस्था-विवर्जिता ।
>
> सृष्टिकर्त्री ब्रह्मरूपा गोप्त्री गोविन्दरूपिणी ॥६३॥
>
> संहारिणी रुद्ररूपा तिरोधान-करीश्वरी ।
>
> सदाशिवाऽनुग्रहदा पञ्चकृत्य-परायणा ॥६४॥
>
> भानुमण्डल-मध्यस्था भैरवी भगमालिनी ।
>
> पद्मासना भगवती पद्मनाभ-सहोदरी ॥६५॥
>
> उन्मेष-निमिषोत्पन्न-विपन्न-भुवनावली ।
>
> सहस्र-शीर्षवदना सहस्राक्षी सहस्रपात् ॥६६॥
>
> आब्रह्म-कीट-जननी वर्णाश्रम-विधायिनी ।
>
> निजाज्ञारूप-निगमा पुण्यापुण्य-फलप्रदा ॥६७॥
>
> श्रुति-सीमन्त-सिन्दूरी-कृत-पादाब्ज-धूलिका ।
>
> सकलागम-सन्दोह-शुक्ति-सम्पुट-मौक्तिका ॥६८॥
>
> पुरुषार्थप्रदा पूर्णा भोगिनी भुवनेश्वरी ।
>
> अम्बिकाऽनादि-निधना हरिब्रह्मेन्द्र-सेविता ॥६९॥
>
> नारायणी नादरूपा नामरूप-विवर्जिता ।
>
> ह्रींकारी ह्रीमती हृद्या हेयोपादेय-वर्जिता ॥७०॥
>
> राजराजार्चिता राज्ञी रम्या राजीवलोचना ।
>
> रञ्जनी रमणी रस्या रणत्किङ्किणि-मेखला ॥७१॥
>
> रमा राकेन्दुवदना रतिरूपा रतिप्रिया ।
>
> रक्षाकरी राक्षसघ्नी रामा रमणलम्पटा ॥७२॥
>
> काम्या कामकलारूपा कदम्ब-कुसुम-प्रिया ।
>
> कल्याणी जगतीकन्दा करुणा-रस-सागरा ॥७३॥
>
> कलावती कलालापा कान्ता कादम्बरीप्रिया ।
>
> वरदा वामनयना वारुणी-मद-विह्वला ॥७४॥
>
> विश्वाधिका वेदवेद्या विन्ध्याचल-निवासिनी ।
>
> विधात्री वेदजननी विष्णुमाया विलासिनी ॥७५॥
>
> क्षेत्रस्वरूपा क्षेत्रेशी क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-पालिनी ।
>
> क्षयवृद्धि-विनिर्मुक्ता क्षेत्रपाल-समर्चिता ॥७६॥
>
> विजया विमला वन्द्या वन्दारु-जन-वत्सला ।
>
> वाग्वादिनी वामकेशी वह्निमण्डल-वासिनी ॥७७॥
>
> भक्तिमत्-कल्पलतिका पशुपाश-विमोचिनी ।
>
> संहृताशेष-पाषण्डा सदाचार-प्रवर्तिका ॥७८॥
>
> तापत्रयाग्नि-सन्तप्त-समाह्लादन-चन्द्रिका ।
>
> तरुणी तापसाराध्या तनुमध्या तमोऽपहा ॥७९॥
>
> चितिस्तत्पद-लक्ष्यार्था चिदेकरस-रूपिणी ।
>
> स्वात्मानन्द-लवीभूत-ब्रह्माद्यानन्द-सन्ततिः ॥८०॥
>
> परा प्रत्यक्चितीरूपा पश्यन्ती परदेवता ।
>
> मध्यमा वैखरीरूपा भक्त-मानस-हंसिका ॥८१॥
>
> कामेश्वर-प्राणनाडी कृतज्ञा कामपूजिता ।
>
> श‍ृङ्गार-रस-सम्पूर्णा जया जालन्धर-स्थिता ॥८२॥
>
> ओड्याणपीठ-निलया बिन्दु-मण्डलवासिनी ।
>
> रहोयाग-क्रमाराध्या रहस्तर्पण-तर्पिता ॥८३॥
>
> सद्यःप्रसादिनी विश्व-साक्षिणी साक्षिवर्जिता ।
>
> षडङ्गदेवता-युक्ता षाड्गुण्य-परिपूरिता ॥८४॥
>
> नित्यक्लिन्ना निरुपमा निर्वाण-सुख-दायिनी ।
>
> नित्या-षोडशिका-रूपा श्रीकण्ठार्ध-शरीरिणी ॥८५॥
>
> प्रभावती प्रभारूपा प्रसिद्धा परमेश्वरी ।
>
> मूलप्रकृतिरव्यक्ता व्यक्ताव्यक्त-स्वरूपिणी ॥८६॥
>
> व्यापिनी विविधाकारा विद्याविद्या-स्वरूपिणी ।
>
> महाकामेश-नयन-कुमुदाह्लाद-कौमुदी ॥८७॥
>
> भक्त-हार्द-तमोभेद-भानुमद्भानु-सन्ततिः ।
>
> शिवदूती शिवाराध्या शिवमूर्तिः शिवङ्करी ॥८८॥
>
> शिवप्रिया शिवपरा शिष्टेष्टा शिष्टपूजिता ।
>
> अप्रमेया स्वप्रकाशा मनोवाचामगोचरा ॥८९॥
>
> चिच्छक्तिश् चेतनारूपा जडशक्तिर्जडात्मिका ।
>
> गायत्री व्याहृतिः सन्ध्या द्विजवृन्द-निषेविता ॥९०॥
>
> तत्त्वासना तत्त्वमयी पञ्च-कोशान्तर-स्थिता ।
>
> निःसीम-महिमा नित्य-यौवना मदशालिनी ॥९१॥
>
> मदघूर्णित-रक्ताक्षी मदपाटल-गण्डभूः ।
>
> चन्दन-द्रव-दिग्धाङ्गी चाम्पेय-कुसुम-प्रिया ॥९२॥
>
> कुशला कोमलाकारा कुरुकुल्ला कुलेश्वरी ।
>
> कुलकुण्डालया कौल-मार्ग-तत्पर-सेविता ॥९३॥
>
> कुमार-गणनाथाम्बा तुष्टिः पुष्टिर्मतिर्धृतिः ।
>
> शान्तिः स्वस्तिमती कान्तिर्नन्दिनी विघ्ननाशिनी ॥९४॥
>
> तेजोवती त्रिनयना लोलाक्षी-कामरूपिणी ।
>
> मालिनी हंसिनी माता मलयाचल-वासिनी ॥९५॥
>
> सुमुखी नलिनी सुभ्रूः शोभना सुरनायिका ।
>
> कालकण्ठी कान्तिमती क्षोभिणी सूक्ष्मरूपिणी ॥९६॥
>
> वज्रेश्वरी वामदेवी वयोऽवस्था-विवर्जिता ।
>
> सिद्धेश्वरी सिद्धविद्या सिद्धमाता यशस्विनी ॥९७॥
>
> विशुद्धिचक्र-निलयाऽऽरक्तवर्णा त्रिलोचना ।
>
> खट्वाङ्गादि-प्रहरणा वदनैक-समन्विता ॥९८॥
>
> पायसान्नप्रिया त्वक्स्था पशुलोक-भयङ्करी ।
>
> अमृतादि-महाशक्ति-संवृता डाकिनीश्वरी ॥९९॥
>
> अनाहताब्ज-निलया श्यामाभा वदनद्वया ।
>
> दंष्ट्रोज्ज्वलाऽक्ष-मालादि-धरा रुधिरसंस्थिता ॥१००॥
>
> कालरात्र्यादि-शक्त्यौघ-वृता स्निग्धौदनप्रिया ।
>
> महावीरेन्द्र-वरदा राकिण्यम्बा-स्वरूपिणी ॥१०१॥
>
> मणिपूराब्ज-निलया वदनत्रय-संयुता ।
>
> वज्रादिकायुधोपेता डामर्यादिभिरावृता ॥१०२॥
>
> रक्तवर्णा मांसनिष्ठा गुडान्न-प्रीत-मानसा ।
>
> समस्तभक्त-सुखदा लाकिन्यम्बा-स्वरूपिणी ॥१०३॥
>
> स्वाधिष्ठानाम्बुज-गता चतुर्वक्त्र-मनोहरा ।
>
> शूलाद्यायुध-सम्पन्ना पीतवर्णाऽतिगर्विता ॥१०४॥
>
> मेदोनिष्ठा मधुप्रीता बन्धिन्यादि-समन्विता ।
>
> दध्यन्नासक्त-हृदया काकिनी-रूप-धारिणी ॥१०५॥
>
> मूलाधाराम्बुजारूढा पञ्च-वक्त्राऽस्थि-संस्थिता ।
>
> अङ्कुशादि-प्रहरणा वरदादि-निषेविता ॥१०६॥
>
> मुद्गौदनासक्त-चित्ता साकिन्यम्बा-स्वरूपिणी ।
>
> आज्ञा-चक्राब्ज-निलया शुक्लवर्णा षडानना ॥१०७॥
>
> मज्जासंस्था हंसवती-मुख्य-शक्ति-समन्विता ।
>
> हरिद्रान्नैक-रसिका हाकिनी-रूप-धारिणी ॥१०८॥
>
> सहस्रदल-पद्मस्था सर्व-वर्णोप-शोभिता ।
>
> सर्वायुधधरा शुक्ल-संस्थिता सर्वतोमुखी ॥१०९॥
>
> सर्वौदन-प्रीतचित्ता याकिन्यम्बा-स्वरूपिणी ।
>
> स्वाहा स्वधाऽमतिर्मेधा श्रुतिः स्मृतिरनुत्तमा ॥११०॥
>
> पुण्यकीर्तिः पुण्यलभ्या पुण्यश्रवण-कीर्तना ।
>
> पुलोमजार्चिता बन्ध-मोचनी बन्धुरालका ॥१११॥
>
> विमर्शरूपिणी विद्या वियदादि-जगत्प्रसूः ।
>
> सर्वव्याधि-प्रशमनी सर्वमृत्यु-निवारिणी ॥११२॥
>
> अग्रगण्याऽचिन्त्यरूपा कलिकल्मष-नाशिनी ।
>
> कात्यायनी कालहन्त्री कमलाक्ष-निषेविता ॥११३॥
>
> ताम्बूल-पूरित-मुखी दाडिमी-कुसुम-प्रभा ।
>
> मृगाक्षी मोहिनी मुख्या मृडानी मित्ररूपिणी ॥११४॥
>
> नित्यतृप्ता भक्तनिधिर्नियन्त्री निखिलेश्वरी ।
>
> मैत्र्यादि-वासनालभ्या महाप्रलय-साक्षिणी ॥११५॥
>
> परा शक्तिः परा निष्ठा प्रज्ञानघन-रूपिणी ।
>
> माध्वीपानालसा मत्ता मातृका-वर्ण-रूपिणी ॥११६॥
>
> महाकैलास-निलया मृणाल-मृदु-दोर्लता ।
>
> महनीया दयामूर्तिर्महासाम्राज्य-शालिनी ॥११७॥
>
> आत्मविद्या महाविद्या श्रीविद्या कामसेविता ।
>
> श्री-षोडशाक्षरी-विद्या त्रिकूटा कामकोटिका ॥११८॥
>
> कटाक्ष-किङ्करी-भूत-कमला-कोटि-सेविता ।
>
> शिरःस्थिता चन्द्रनिभा भालस्थेन्द्र-धनुःप्रभा ॥११९॥
>
> हृदयस्था रविप्रख्या त्रिकोणान्तर-दीपिका ।
>
> दाक्षायणी दैत्यहन्त्री दक्षयज्ञ-विनाशिनी ॥१२०॥
>
> दरान्दोलित-दीर्घाक्षी दर-हासोज्ज्वलन्-मुखी ।
>
> गुरुमूर्तिर्गुणनिधिर्गोमाता गुहजन्मभूः ॥१२१॥
>
> देवेशी दण्डनीतिस्था दहराकाश-रूपिणी ।
>
> प्रतिपन्मुख्य-राकान्त-तिथि-मण्डल-पूजिता ॥१२२॥
>
> कलात्मिका कलानाथा काव्यालाप-विनोदिनी ।
>
> सचामर-रमा-वाणी-सव्य-दक्षिण-सेविता ॥१२३॥
>
> आदिशक्तिरमेयाऽऽत्मा परमा पावनाकृतिः ।
>
> अनेककोटि-ब्रह्माण्ड-जननी दिव्यविग्रहा ॥१२४॥
>
> क्लींकारी केवला गुह्या कैवल्य-पददायिनी ।
>
> त्रिपुरा त्रिजगद्वन्द्या त्रिमूर्तिस्त्रिदशेश्वरी ॥१२५॥
>
> त्र्यक्षरी दिव्य-गन्धाढ्या सिन्दूर-तिलकाञ्चिता ।
>
> उमा शैलेन्द्रतनया गौरी गन्धर्व-सेविता ॥१२६॥
>
> विश्वगर्भा स्वर्णगर्भाऽवरदा वागधीश्वरी ।
>
> ध्यानगम्याऽपरिच्छेद्या ज्ञानदा ज्ञानविग्रहा ॥१२७॥
>
> सर्ववेदान्त-संवेद्या सत्यानन्द-स्वरूपिणी ।
>
> लोपामुद्रार्चिता लीला-कॢप्त-ब्रह्माण्ड-मण्डला ॥१२८॥
>
> अदृश्या दृश्यरहिता विज्ञात्री वेद्यवर्जिता ।
>
> योगिनी योगदा योग्या योगानन्दा युगन्धरा ॥१२९॥
>
> इच्छाशक्ति-ज्ञानशक्ति-क्रियाशक्ति-स्वरूपिणी ।
>
> सर्वाधारा सुप्रतिष्ठा सदसद्रूप-धारिणी ॥१३०॥
>
> अष्टमूर्तिरजाजैत्री लोकयात्रा-विधायिनी ।
>
> एकाकिनी भूमरूपा निर्द्वैता द्वैतवर्जिता ॥१३१॥
>
> अन्नदा वसुदा वृद्धा ब्रह्मात्मैक्य-स्वरूपिणी ।
>
> बृहती ब्राह्मणी ब्राह्मी ब्रह्मानन्दा बलिप्रिया ॥१३२॥
>
> भाषारूपा बृहत्सेना भावाभाव-विवर्जिता ।
>
> सुखाराध्या शुभकरी शोभना सुलभा गतिः ॥१३३॥
>
> राज-राजेश्वरी राज्य-दायिनी राज्य-वल्लभा ।
>
> राजत्कृपा राजपीठ-निवेशित-निजाश्रिता ॥१३४॥
>
> राज्यलक्ष्मीः कोशनाथा चतुरङ्ग-बलेश्वरी ।
>
> साम्राज्य-दायिनी सत्यसन्धा सागरमेखला ॥१३५॥
>
> दीक्षिता दैत्यशमनी सर्वलोक-वशङ्करी ।
>
> सर्वार्थदात्री सावित्री सच्चिदानन्द-रूपिणी ॥१३६॥
>
> देश-कालापरिच्छिन्ना सर्वगा सर्वमोहिनी ।
>
> सरस्वती शास्त्रमयी गुहाम्बा गुह्यरूपिणी ॥१३७॥
>
> सर्वोपाधि-विनिर्मुक्ता सदाशिव-पतिव्रता ।
>
> सम्प्रदायेश्वरी साध्वी गुरुमण्डल-रूपिणी ॥१३८॥
>
> कुलोत्तीर्णा भगाराध्या माया मधुमती मही ।
>
> गणाम्बा गुह्यकाराध्या कोमलाङ्गी गुरुप्रिया ॥१३९॥
>
> स्वतन्त्रा सर्वतन्त्रेशी दक्षिणामूर्ति-रूपिणी ।
>
> सनकादि-समाराध्या शिवज्ञान-प्रदायिनी ॥१४०॥
>
> चित्कलाऽऽनन्द-कलिका प्रेमरूपा प्रियङ्करी ।
>
> नामपारायण-प्रीता नन्दिविद्या नटेश्वरी ॥१४१॥
>
> मिथ्या-जगदधिष्ठाना मुक्तिदा मुक्तिरूपिणी ।
>
> लास्यप्रिया लयकरी लज्जा रम्भादिवन्दिता ॥१४२॥
>
> भवदाव-सुधावृष्टिः पापारण्य-दवानला ।
>
> दौर्भाग्य-तूलवातूला जराध्वान्त-रविप्रभा ॥१४३॥
>
> भाग्याब्धि-चन्द्रिका भक्त-चित्तकेकि-घनाघना ।
>
> रोगपर्वत-दम्भोलिर्मृत्युदारु-कुठारिका ॥१४४॥
>
> महेश्वरी महकाली महाग्रासा महाशना ।
>
> अपर्णा चण्डिका चण्डमुण्डासुर-निषूदिनी ॥१४५॥
>
> क्षराक्षरात्मिका सर्व-लोकेशी विश्वधारिणी ।
>
> त्रिवर्गदात्री सुभगा त्र्यम्बका त्रिगुणात्मिका ॥१४६॥
>
> स्वर्गापवर्गदा शुद्धा जपापुष्प-निभाकृतिः ।
>
> ओजोवती द्युतिधरा यज्ञरूपा प्रियव्रता ॥१४७॥
>
> दुराराध्या दुराधर्षा पाटली-कुसुम-प्रिया ।
>
> महती मेरुनिलया मन्दार-कुसुम-प्रिया ॥१४८॥
>
> वीराराध्या विराड्रूपा विरजा विश्वतोमुखी ।
>
> प्रत्यग्रूपा पराकाशा प्राणदा प्राणरूपिणी ॥१४९॥
>
> मार्ताण्ड-भैरवाराध्या मन्त्रिणीन्यस्त-राज्यधूः ।
>
> त्रिपुरेशी जयत्सेना निस्त्रैगुण्या परापरा ॥१५०॥
>
> सत्य-ज्ञानानन्द-रूपा सामरस्य-परायणा ।
>
> कपर्दिनी कलामाला कामधुक् कामरूपिणी ॥१५१॥
>
> कलानिधिः काव्यकला रसज्ञा रसशेवधिः ।
>
> पुष्टा पुरातना पूज्या पुष्करा पुष्करेक्षणा ॥१५२॥
>
> परंज्योतिः परंधाम परमाणुः परात्परा ।
>
> पाशहस्ता पाशहन्त्री परमन्त्र-विभेदिनी ॥१५३॥
>
> मूर्ताऽमूर्ताऽनित्यतृप्ता मुनिमानस-हंसिका ।
>
> सत्यव्रता सत्यरूपा सर्वान्तर्यामिनी सती ॥१५४॥
>
> ब्रह्माणी ब्रह्मजननी बहुरूपा बुधार्चिता ।
>
> प्रसवित्री प्रचण्डाऽऽज्ञा प्रतिष्ठा प्रकटाकृतिः ॥१५५॥
>
> प्राणेश्वरी प्राणदात्री पञ्चाशत्पीठ-रूपिणी ।
>
> विश‍ृङ्खला विविक्तस्था वीरमाता वियत्प्रसूः ॥१५६॥
>
> मुकुन्दा मुक्तिनिलया मूलविग्रह-रूपिणी ।
>
> भावज्ञा भवरोगघ्नी भवचक्र-प्रवर्तिनी ॥१५७॥
>
> छन्दःसारा शास्त्रसारा मन्त्रसारा तलोदरी ।
>
> उदारकीर्तिरुद्दामवैभवा वर्णरूपिणी ॥१५८॥
>
> जन्ममृत्यु-जरातप्त-जनविश्रान्ति-दायिनी ।
>
> सर्वोपनिष-दुद्-घुष्टा शान्त्यतीत-कलात्मिका ॥१५९॥
>
> गम्भीरा गगनान्तस्था गर्विता गानलोलुपा ।
>
> कल्पना-रहिता काष्ठाऽकान्ता कान्तार्ध-विग्रहा ॥१६०॥
>
> कार्यकारण-निर्मुक्ता कामकेलि-तरङ्गिता ।
>
> कनत्कनक-ताटङ्का लीला-विग्रह-धारिणी ॥१६१॥
>
> अजा क्षयविनिर्मुक्ता मुग्धा क्षिप्र-प्रसादिनी ।
>
> अन्तर्मुख-समाराध्या बहिर्मुख-सुदुर्लभा ॥१६२॥
>
> त्रयी त्रिवर्गनिलया त्रिस्था त्रिपुरमालिनी ।
>
> निरामया निरालम्बा स्वात्मारामा सुधासृतिः ॥१६३॥
>
> संसारपङ्क-निर्मग्न-समुद्धरण-पण्डिता ।
>
> यज्ञप्रिया यज्ञकर्त्री यजमान-स्वरूपिणी ॥१६४॥
>
> धर्माधारा धनाध्यक्षा धनधान्य-विवर्धिनी ।
>
> विप्रप्रिया विप्ररूपा विश्वभ्रमण-कारिणी ॥१६५��
>
> विश्वग्रासा विद्रुमाभा वैष्णवी विष्णुरूपिणी ।
>
> अयोनिर्योनिनिलया कूटस्था कुलरूपिणी ॥१६६॥
>
> वीरगोष्ठीप्रिया वीरा नैष्कर्म्या नादरूपिणी ।
>
> विज्ञानकलना कल्या विदग्धा बैन्दवासना ॥१६७॥
>
> तत्त्वाधिका तत्त्वमयी तत्त्वमर्थ-स्वरूपिणी ।
>
> सामगानप्रिया सौम्या सदाशिव-कुटुम्बिनी ॥१६८॥
>
> सव्यापसव्य-मार्गस्था सर्वापद्विनिवारिणी ।
>
> स्वस्था स्वभावमधुरा धीरा धीरसमर्चिता ॥१६९॥
>
> चैतन्यार्घ्य-समाराध्या चैतन्य-कुसुमप्रिया ।
>
> सदोदिता सदातुष्टा तरुणादित्य-पाटला ॥१७०॥
>
> दक्षिणा-दक्षिणाराध्या दरस्मेर-मुखाम्बुजा ।
>
> कौलिनी-केवलाऽनर्घ्य-कैवल्य-पददायिनी ॥१७१॥
>
> स्तोत्रप्रिया स्तुतिमती श्रुति-संस्तुत-वैभवा ।
>
> मनस्विनी मानवती महेशी मङ्गलाकृतिः ॥१७२॥
>
> विश्वमाता जगद्धात्री विशालाक्षी विरागिणी ।
>
> प्रगल्भा परमोदारा परामोदा मनोमयी ॥१७३॥
>
> व्योमकेशी विमानस्था वज्रिणी वामकेश्वरी ।
>
> पञ्चयज्ञ-प्रिया पञ्च-प्रेत-मञ्चाधिशायिनी ॥१७४॥
>
> पञ्चमी पञ्चभूतेशी पञ्च-संख्योपचारिणी ।
>
> शाश्वती शाश्वतैश्वर्या शर्मदा शम्भुमोहिनी ॥१७५॥
>
> धराधरसुता धन्या धर्मिणी धर्मवर्धिनी ।
>
> लोकातीता गुणातीता सर्वातीता शमात्मिका ॥१७६॥
>
> बन्धूक-कुसुमप्रख्या बाला लीलाविनोदिनी ।
>
> सुमङ्गली सुखकरी सुवेषाढ्या सुवासिनी ॥१७७॥
>
> सुवासिन्यर्चन-प्रीताऽऽशोभना शुद्धमानसा ।
>
> बिन्दु-तर्पण-सन्तुष्टा पूर्वजा त्रिपुराम्बिका ॥१७८॥
>
> दशमुद्रा-समाराध्या त्रिपुराश्री-वशङ्करी ।
>
> ज्ञानमुद्रा ज्ञानगम्या ज्ञानज्ञेय-स्वरूपिणी ॥१७९॥
>
> योनिमुद्रा त्रिखण्डेशी त्रिगुणाम्बा त्रिकोणगा ।
>
> अनघाऽद्भुत-चारित्रा वाञ्छितार्थ-प्रदायिनी ॥१८०॥
>
> अभ्यासातिशय-ज्ञाता षडध्वातीत-रूपिणी ।
>
> अव्याज-करुणा-मूर्तिरज्ञान-ध्वान्त-दीपिका ॥१८१॥
>
> आबाल-गोप-विदिता सर्वानुल्लङ्घ्य-शासना ।
>
> श्रीचक्रराज-निलया श्रीमत्-त्रिपुरसुन्दरी ॥१८२॥
>
> श्रीशिवा शिव-शक्त्यैक्य-रूपिणी ललिताम्बिका ।
>
> एवं श्रीललिता देव्या नाम्नां साहस्रकं जगुः ॥१८३॥
>
> **॥ इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे उत्तरखण्डे श्रीहयग्रीवा��स्त्यसंवादे**
>
> **श्रीललिता सहस्रनाम स्तोत्र कथनं सम्पूर्णम् ॥**

तंत्र साधना का आरंभ करें

## श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्र के अर्थ सहित गीत-पद

### ॥ न्यासः ॥

> **अस्य श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रमालामन्त्रस्य ।**

इस श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्र माला मन्त्र का ।

> **वशिन्यादिवाग्देवता ऋषयः ।**

ऋषि वाणी के देवता हैं, जिनका नेतृत्व वासिनी करती हैं।

> **अनुष्टुप्छन्दः ।**

छन्द अनुष्टुप है।

> **श्रीललितापरमेश्वरी देवता ।**

अधिष्ठात्री देवता परम देवी, श्री ललिता परमेश्वरी हैं।

> **श्रीमद्वाग्भवकूटेति बीजम् ।**

बीज गौरवमय वाग्भव-कूट है।

> **मध्यकूटेति शक्तिः ।**

शक्ति मध्य-कूट है।

> **शक्तिकूटेति कीलकम् ।**

कीलक शक्ति-कूट है।

> **श्रीललितामहात्रिपुरसुन्दरी-प्रसादसिद्धिद्वारा**
>
> **चिन्तितफलावाप्त्यर्थे जपे विनियोगः ।**

यह साधना श्री ललिता महात्रिपुरसुन्दरी की कृपा से अभिष्ट फल की प्राप्ति हेतु जप के लिए विनियुक्त है।

### **॥ ध्यानम् ॥**

> **सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत्**

हम माँ का ध्यान करते हैं, जो सिन्दूर-रक्तवर्ण शरीर से दीप्त हैं, त्रिनेत्री हैं, माणिक्य-जटित मुकुट धारण की हुई हैं, हमें अपने सर्वस्मित मुख का दर्शन कराती हुईं।

> **तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।**

उनके मुकुट के शिखर पर अर्धचन्द्र सुशोभित है। उनके पूर्ण स्तन समस्त सृष्टि का पोषण करते हैं।

> **पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं**

वे एक हाथ में मदिरा से परिपूर्ण रत्न-पात्र धारण की हुई हैं, और दूसरे हाथ में रक्तवर्ण कमल को मृदुता से घुमाती हैं।

> **सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥**

उनका अत्यंत सौम्य स्वरूप सौंदर्य सौंदर्य की साक्षात् मूर्ति है। वे अपने अरुण चरणों को रत्ननिर्मित घट पर स्थापित करके विराजमान हैं।

> **अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं**

प्रभात के समान अरुण-वर्ण वाली, उनके नेत्र करुणा की तरंगों से परिपूर्ण हैं।

> **धृतपाशाङ्कुशपुष्पबाणचापाम् ।**

वे पाश, अंकुश, पुष्पों के बाण तथा इक्षु-धनुष धारण करती हैं।

> **अणिमादिभिरावृतां मयुखैः**

वे प्रकाश-किरणों से परिवेष्टिता हैं—जो अणिमा आदि शक्तियों के साकार रूप हैं।

> **अहमित्येव विभावये भवानीम् ॥**

हम उस देवी भवानी का ध्यान करते हैं, उन्हें अपनी ही आत्मा के रूप में साक्षात् अनुभव करते हुए।

> **ध्यायेत्पद्मासनस्थां विकसितवदनां पद्मपत्रायताक्षीं**

हम उनका ध्यान करते हैं, जो पद्मासन में विराजमान हैं, जिनका मुख प्रस्फुटित है और जिनकी आँखें कमल-पंखुड़ियों के समान दीर्घ हैं।

> **हेमाभां पीतवस्त्रां करकलितलसद्धेमपद्मां वराङ्गीम् ।**

स्वर्ण-वर्ण वाली, पीत-वस्त्र धारण की हुई, उनका सुन्दर रूप अपने कर में चमकता हुआ स्वर्ण कमल धारण किया हुआ है।

> **सर्वालङ्कारयुक्तां सततमभयदां भक्तनम्रां भवानीं**

सर्व आभूषणों से अलंकृत, वे शाश्वत रूप से अभय प्रदान करने वाली हैं, अपने भक्तों की ओर नम्रतापूर्वक झुकी हुई हैं।

> **श्रीविद्यां शान्तमूर्तिं सकलसुरनुतां सर्वसम्पत्प्रदात्रीम् ॥**

श्रीविद्या की साकार अभिव्यक्ति, शान्त स्वरूप वाली, समस्त देवताओं द्वारा स्तुत, तथा समस्त समृद्धि की दात्री।

**सकुङ्कुमविलेपनामलिकचुम्बिकस्तूरिकां**

सिन्दूर से अभिषिक्त, उनका ललाट कस्तूरी की सुगन्ध से सुवासित है।

**समन्दहसितेक्षणां सशरचापपाशाङ्कुशाम् ।**

उनकी दृष्टि कोमल मुस्कान से सुशोभित है, और वे बाण, धनुष, पाश तथा अंकुश धारण करती हैं।

**अशेषजनमोहिनीमरुणमाल्यभूषाम्बरां**

वे समस्त जनों को मोहित करने वाली हैं, अरुण मालाओं, आभूषणों तथा वस्त्रों से अलंकृत हैं।

**जपाकुसुमभासुरां जपविधौ स्मरेदम्बिकाम् ॥**

जपा पुष्प के समान दीप्तिमान, हम उस जगन्माता का जप के अनुष्ठान में ध्यान करते हैं।

### ॥ अथ श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रम् ॥

> **ॐ श्रीमाता श्रीमहाराज्ञी श्रीमत्-सिंहासनेश्वरी ।**

माँ समस्त सृष्टि की जननी हैं और महासम्राज्ञी के रूप में उस पर अधिष्ठित हैं। वे महान सिंहासन पर विराजमान होकर शासन करती हैं।

> **चिदग्नि-कुण्ड-सम्भूता देवकार्य-समुद्यता ॥१॥**

वे चेतना के पावन अग्निकुण्ड से प्रकट होती हैं और दैवी कार्य का संवर्धन करती हैं।

> **उद्यद्भानु-सहस्राभा चतुर्बाहु-समन्विता ।**

वे सहस्र उदित सूर्यों के समान रक्तवर्ण और दीप्तिमान होकर शोभित हैं, अपनी चार भुजाओं सहित।

> **रागस्वरूप-पाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला ॥२॥**

इनमें से एक कर में वे हमारी कामना अथवा इच्छा का पाश धारण करती हैं। यह प्रेम का प्रतीक है तथा भक्तों को पुनः मार्ग पर आकृष्ट करने की उनकी शक्ति को दर्शाता है। अगले कर में वे क्रोध के अंकुश को धारण करती हैं, जो मार्गदर्शन का प्रतीक है और अज्ञान को दूर करने की शक्ति का बोध कराता है।

> **मनोरूपेक्षु-कोदण्डा पञ्चतन्मात्र-सायका ।**

तृतीय कर में वे ईक्षु-धनुष धारण करती हैं, जो हमारे मन का प्रतीक है। चतुर्थ कर में वे ५ बाण धारण करती हैं, जो ५ तन्मात्राओं, ५ इन्द्रियों और ५ महाभूतों का बोध कराते हैं।

> **निजारुण-प्रभापूर-मज्जद्ब्रह्माण्ड-मण्डला ॥३॥**

उनकी अरुण आभा में समस्त ब्रह्माण्ड स्नात हो जाता है।

_(ये चारों प्रतीक यह दर्शाते हैं कि वे मन और इन्द्रियों पर अधिपत्य रखती हैं तथा जीवात्मा को मोहित करने और मुक्त करने—दोनों का सामर्थ्य रखती हैं)_

> **चम्पकाशोक-पुन्नाग-सौगन्धिक-लसत्कचा ।**

चम्पक, अशोक, पुन्नाग और सौगन्धिक जैसे विविध पुष्प उनकी केशरचना को अलंकृत करते हैं।

> **कुरुविन्दमणि-श्रेणी-कनत्कोटीर-मण्डिता ॥४॥**

उनका मुकुट कुरुविन्द रत्न की पंक्तियों से विभूषित है।

_(निम्न श्लोकों में माँ के शरीर का वर्णन विश्व-विग्रह के रूप में किया गया है, जहाँ समस्त सृष्टि ही उनका शरीर है।)_

> **अष्टमीचन्द्र-विभ्राज-दलिकस्थल-शोभिता ।**

उनका ललाट अष्टमी तिथि की चंद्रकला के समान दीप्तिमान है।

> **मुखचन्द्र-कलङ्काभ-मृगनाभि-विशेषका ॥५॥**

उनके उज्ज्वल ललाट पर स्थित कस्तूरी-तिलक चंद्रमा के कलंक के समान शोभायमान है।

> **वदनस्मर-माङ्गल्य-गृहतोरण-चिल्लिका ।**

उनका मुख कामदेव—प्रेम के देवता—का निवास है, और उनकी भ्रूभंगियाँ काम के आवास की तोरण-सी प्रतीत होती हैं।

> **वक्त्रलक्ष्मी-परीवाह-चलन्मीनाभ-लोचना ॥६॥**

उनके नेत्र कोमल जल में विचरण करती हुई मछलियों के समान हैं।

> **नवचम्पक-पुष्पाभ-नासादण्ड-विराजिता ।**

उनकी सुसंरचित नासिका नवप्रस्फुटित चम्पक-कली के समान है।

> **ताराकान्ति-तिरस्कारि-नासाभरण-भासुरा ॥७॥**

उनकी नासिका-भूषण की दीप्ति आकाश के तारागणों की कान्ति से भी अधिक प्रकाशमान है।

> **कदम्बमञ्जरी-कॢप्त-कर्णपूर-मनोहरा ।**

वे अपने कर्णों पर कदम्ब पुष्पों के गुच्छ धारण करती हैं।

> **ताटङ्क-युगली-भूत-तपनोडुप-मण्डला ॥८॥**

वे सू��्य और चंद्रमा को अपने कर्णाभूषण के रूप में धारण करती हैं।

> **पद्मराग-शिलादर्श-परिभावि-कपोलभूः ।**

उनके कपोलों की अरुणाभ-रक्ताभ दीप्ति पद्मराग मणि की कान्ति से भी श्रेष्ठ है।

> **नवविद्रुम-बिम्बश्री-न्यक्कारि-रदनच्छदा ॥९॥**

उनके अधर नवछिन्न विद्रुम और बिम्ब-फल की लालिमा को भी अतिशय रूप से पराजित करते हैं।

> **शुद्ध-विद्याङ्कुराकार-द्विजपङ्क्ति-द्वयोज्ज्वला ।**

माँ की दीप्तिमान दन्त-पंक्तियाँ शुद्ध ज्ञान के अंकुर हैं।

> **कर्पूर-वीटिकामोद-समाकर्षि-दिगन्तरा ॥१०॥**

वे कर्पूर-संयुक्त ताम्बूल का चर्वण करती हैं, जिसका सुवास सर्वदिक् में प्रसारित होकर उसे आकर्षित करता है।

> **निज-सल्लाप-माधुर्य-विनिर्भर्त्सित-कच्छपी ।**

उनकी वाणी की मधुरता सरस्वती माँ की वीणा—कच्छपी—के स्वर की मधुरता को भी अतिशय कर देती है।

> **मन्दस्मित-प्रभापूर-मज्जत्कामेश-मानसा ॥११॥**

उनके स्मित की दीप्ति कामेश—कामदेव पर शासन करने वाले उनके स्वामी—के चित्त को पूर्णतः आप्लावित कर देती है।

> **अनाकलित-सादृश्य-चिबुकश्री-विराजिता ।**

उनकी चिबुक की शोभा अतुलनीय है।

> **कामेश-बद्ध-माङ्गल्य-सूत्र-शोभित-कन्धरा ॥१२॥**

उनकी ग्रीवा भगवान कामेश के साथ उनके विवाह के द्योतक पावन मंगलसूत्र से अलंकृत है।

> **कनकाङ्गद-केयूर-कमनीय-भुजान्विता ।**

उनकी सुंदर भुजाएँ स्वर्णमय केयूर और कंकणों से विभूषित ���ैं।

> **रत्नग्रैवेय-चिन्ताक-लोल-मुक्ता-फलान्विता ॥१३॥**

वे रत्नों का हार धारण करती हैं, जिसमें लटकता हुआ मोती जड़ा हुआ है।

> **कामेश्वर-प्रेमरत्न-मणि-प्रतिपण-स्तनी ।**

भगवान कामेश्वर के प्रेम के प्रत्युत्तर में वे अपने स्तनों का अर्पण करती हैं (जो समस्त सृष्टि का पोषण करते हैं)।

> **नाभ्यालवाल-रोमालि-लता-फल-कुचद्वयी ॥१४॥**

उनके स्तन उनकी नाभि से उद्भूत सूक्ष्म रोमावलि-लता पर विकसित फलों के समान हैं।

_(शास्त्रों के अनुसार, यह रोमावलि सुषुम्ना नाड़ी का संकेत है, जो सूक्ष्म देह की केन्द्रीय ऊर्जा-नाड़ी है।)_

> **लक्ष्यरोम-लताधारता-समुन्नेय-मध्यमा ।**

उनकी कटि इतनी सुकुमार है कि उसे केवल उनकी नाभि से ऊपर की ओर उद्भूत सूक्ष्म रोमावलि-लता के द्वारा ही अनुमानित किया जा सकता है।

> **स्तनभार-दलन्मध्य-पट्टबन्ध-वलित्रया ॥१५॥**

उनके स्तनों के भार के कारण उनकी सूक्ष्म कटि पर त्वचा की त्रिवलि से युक्त मेखला प्रकट होती है।

> **अरुणारुण-कौसुम्भ-वस्त्र-भास्वत्-कटीतटी ।**

वे अपने कटि-प्रदेश में कुसुम्भ पुष्पों से रंजित गहन रक्तवर्ण वस्त्र धारण करती हैं।

> **रत्न-किङ्किणिका-रम्य-रशना-दाम-भूषिता ॥१६॥**

उनकी मेखला अनेक रत्न-जटित घंटिकाओं से विभूषित है।

> **कामेश-ज्ञात-सौभाग्य-मार्दवोरु-द्वयान्विता ।**

केवल सौभाग्यशाली भगवान कामेश्वर ही माँ की सुकुमार ऊरुओं को जानते हैं (पंचदशी का तृतीय कूट)।

> **माणिक्य-मुकुटाकार-जानुद्वय-विराजिता ॥१७॥**

उनके दोनों जानु माणिक्य-निर्मित मुकुटों के समान शोभायमान हैं।

> **इन्द्रगोप-परिक्षिप्त-स्मरतूणाभ-जङ्घिका ।**

उनकी जंघाएँ कामदेव के रत्न-जटित तूणीर के समान दीप्तिमान हैं।

> **गूढगुल्फा कूर्मपृष्ठ-जयिष्णु-प्रपदान्विता ॥१८॥**

उनके गुल्फ सुसंवृत होने के कारण दृष्टिगोचर नहीं होते। उनके चरणों में कच्छप-पृष्ठ के सदृश धनुषाकार वक्रता है।

_(उनके चरणों में शरण ग्रहण करने पर हम कच्छप की भाँति अपनी इन्द्रियों का संकोच करने की क्षमता का विकास करते हैं।)_

> **नख-दीधिति-संछन्न-नमज्जन-तमोगुणा ।**

उनके पाद-नखों की दीप्ति उनके चरणों में प्रणाम करने वाले सभी के तमस्—अंधकार—का निवारण कर देती है।

> **पदद्वय-प्रभाजाल-पराकृत-सरोरुहा ॥१९॥**

उनके दोनों चरण कमल की शोभा को भी अतिशय कर देते हैं।

> **शिञ्जान-मणिमञ्जीर-मण्डित-श्री-पदाम्बुजा ।**

उनके कमल-चरण रत्न-जटित नूपुरों से अलंकृत हैं, जिनकी मधुर झंकार गूँजती रहती है।

> **मराली-मन्दगमना महालावण्य-शेवधिः ॥२०॥**

उनकी गति हंस-गति के समान सौम्य है। वे दैवी सौंदर्य की निधि हैं।

> **सर्वारुणाऽनवद्याङ्गी सर्वाभरण-भूषिता ।**

उनके निर्दोष, पूर्णांगों से अरुण आभा प्रवाहित होती है। वे दिव्य आभूषणों से अलंकृत हैं।

> **शिव-कामेश्वराङ्कस्था शिवा स्वाधीन-वल्लभा ॥२१॥**

वे कामदेव-विजयी भगवान कामेश्वर की गोद में विराजमान हैं। वे स्वयं शुभता हैं—भगवान शिव की स्त्री-स्वरूपा, गतिशील शक्ति—और भगवान शिव पर भी विजय प्राप्त करती हैं।

> **सुमेरु-मध्य-श‍ृङ्गस्था श्रीमन्नगर-नायिका ।**

इस प्रकार, भगवान शिव के साथ संयुक्त होकर वे मेरु पर्वत के मध्य में निवास करती हैं और शुभ नगरी श्रीनगर सेपर शासन करती हैं।

> **चिन्तामणि-गृहान्तस्था पञ्च-ब्रह्मासन-स्थिता ॥२२॥**

वे अपने चिन्तामणि गृह नामक प्रासाद में विराजमान होकर, अपनी सृष्टि पर शासन करती है�� (चिन्तामणि कामनापूरक रत्न भी है)। वे ५ ब्रह्माओं—ब्रह्मा, विष्णु, शिव, ईशान और सदाशिव—से निर्मित सिंहासन पर आसीन हैं और सृष्टि, पालन, संहार, संवृति तथा रहस्योद्घाटन—इन पाँच दैवी कृत्यों का संचालन करती हैं।

> **महापद्माटवी-संस्था कदम्बवन-वासिनी ।**

उनका प्रासाद कमल-वाटिका के मध्य स्थित है। _(सहस्रदल सहस्रार चक्र को पद्माटवी भी कहा जाता है, क्योंकि वह समस्त अन्य चक्रों का परिपाक है, जिन्हें कमलों के रूप में निरूपित किया गया है।)_ यह कमल-वाटिका आगे कदम्ब-वृक्षों के विशाल उपवन के भीतर स्थित है।

> **सुधासागर-मध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी ॥२३॥**

यह महावन अमृत-सागर अथवा सुधासागर के मध्य स्थित एक द्वीप पर विराजमान है।

माँ की दृष्टि प्रेम और कृपा से परिपूर्ण है, और जो उनके शरणागत होते हैं, उनकी सच्ची कामनाओं को वे स्‍वभावतः सदा पूर्ण करती हैं।

(‘सुधासागर-मध्यस्था’ नाम के संदर्भ में ग्रंथ साधना-संबद्ध पक्ष का वर्णन इस प्रकार करते हैं : जब कुण्डलिनी सहस्रार चक्र में पहुँचने ही वाली होती है, तब नवीन तंत्रिका-हॉर्मोनल मार्ग प्रकट होते हैं और कण्ठ से होकर एक मधुर द्रव का स्रवण होता है, जिसे अमृत अथवा सुधा कहा जाता है, जो हमें परिवर्तित करता है। माँ उसी अमृत-सागर के मध्य निवास करती हैं।)

> **देवर्षि-गण-संघात-स्तूयमानात्म-वैभवा ।**

देवी माँ की स्तुति ऋषियों और दिव्य जीवों के समुदायों द्वारा की जाती है।

> **भण्डासुर-वधोद्युक्त-शक्तिसेना-समन्विता ॥२४॥**

वे उन शक्तियों की सेना से सम्पन्न हैं, जो सदा भण्डासुर के वध में तत्पर रहती हैं। भक्त के आवाहन पर देवी माँ अपनी सम्पूर्ण शक्ति-सेना के साथ उपस्थित होती हैं।

_(भण्डासुर कामदेव—अर्थात् कामना—का विकृत रूप है।)_

> **सम्पत्करी-समारूढ-सिन्धुर-व्रज-सेविता ।**

माँ सम्पत्करी देवी के नेतृत्व में युद्धगजों की सेना से अनुगमित हैं।

> **अश्वारूढाधिष्ठिताश्व-कोटि-कोटिभिरावृता ॥२५॥**

माँ अश्वारूढ़ा देवी के अधीन अनेक कोटि युद्धाश्वों से अनुगमित हैं।

_(यह अंतःपरिवर्तन का प्रतीक है—जब अश्वारूढ़ा देवी इन्द्रियों का संचालन करती हैं, तब आंतरिक और बाह्य लोकों में विद्यमान अव्यवस्था और भ्रम कोमलता से शांत होने लगते हैं।)_

> **चक्रराज-रथारूढ-सर्वायुध-परिष्कृता ।**

माँ स्वयं समस्त आयुधों से सुसज्जित चक्रराज—अर्थात् चक्रों के राजा _(श्री चक्र)_—नामक रथ पर आरूढ़ हैं।

> **गेयचक्र-रथारूढ-मन्त्रिणी-परिसेविता ॥२६॥**

उनकी सेवा में उनकी प्रधान मन्त्री—मन्त्रिणी देवी—उपस्थित रहती हैं, जिन्हें मन्त्रिणी अथवा श्यामला देवी भी कहा जाता है, और जो गेयरचक्र नामक रथ पर विराजमान हैं।

> **किरिचक्र-रथारूढ-दण्डनाथा-पुरस्कृता ।**

देवी माँ के साथ दण्डनाथा देवी भी अनुगमित रहती हैं, जिन्हें वाराही देवी के नाम से भी जाना जाता है, और जो किरिचक्र नामक रथ पर आरूढ़ हैं।

> **ज्वाला-मालिनिकाक्षिप्त-वह्निप्राकार-मध्यगा ॥२७॥**

देवी ज्वालामालिनी द्वारा निर्मित अग्नि-दुर्ग के मध्य से माँ त्रिपुर सुंदरी की सेना अग्रसर होती है।

_(श्री चक्र में ५ शक्ति-त्रिकोण और ४ शिव-त्रिकोण मिलकर एक महान अग्नि-प्राचीर का निर्माण करते हैं, जिसके केंद्र में बिन्दु के भीतर माँ निवास करती हैं।)_

> **भण्डसैन्य-वधोद्युक्त-शक्ति-विक्रम-हर्षिता ।**

माँ भण्डासुर की सेना का विनाश करने हेतु तत्पर शक्तियों के पराक्रम से हर्षित होती हैं।

> **नित्या-पराक्रमाटोप-निरीक्षण-समुत्सुका ॥२८॥**

नित्य देवियों द्वारा भण्ड की सेना पर किए गए प्रहार में उनकी उग्रता को देखकर माँ आनन्दित होती हैं।

_(यह युद्ध हमारी अपनी चेतना के भीतर घटित होता है। भण्डासुर की सेना मिथ्या धारणाओं और कल्पनाओं से निर्मित है। जब नित्य देवियाँ इन सीमाओं को क्रमशः खंडित कर देती हैं, तब यह माँ को प्रसन्न करता है।)_

> **भण्डपुत्र-वधोद्युक्त-बाला-विक्रम-नन्दिता ।**

बाला त्रिपुर सुंदरी देवी माँ का बालिका-स्वरूप हैं। भण्डासुर के पुत्रों का वध करने हेतु युद्धभूमि में अवतरित होने की उनकी उत्सुकता श्री ललिता त्रिपुर सुंदरी को अत्यन्त हर्ष प्रदान करती हैं।

> **मन्त्रिण्यम्बा-विरचित-विषङ्ग-वध-तोषिता ॥२९॥**

माँ मन्त्रिणी देवी द्वारा भण्ड के भ्राता विशंग—जो इन्द्रियों के प्रति आसक्त मोह का प्रतीक है—के वध को देखकर संतुष्टि का अनुभव करती हैं।

_(श्रीविद्या साधना में बाला मंत्र ही सर्वप्रथम हमें सिद्ध करता है और आगे की साधना हेतु प्रारम्भिक आधार को स्थिर करता है।)_

> **विशुक्र-प्राणहरण-वाराही-वीर्य-नन्दिता ।**

माँ देवी वाराही द्वारा विषुक्र के विजय पर उल्लसित होती हैं, जो उन गूढ़, गहन कर्म-सम्बंधित संस्कारों का प्रतीक है, जो बाला और मन्त्रिणी देवी द्वारा बाह्य आवरणों के हट जाने के पश्चात् प्रकट होते हैं।

> **कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरा ॥३०॥**

देवी अपने पति भगवान कामेश्वर की ओर एक दृष्टि डालकर श्री गणेश्वर को उत्पन्न करती हैं।

_(शास्त्रों के अनुसार, जब भण्डासुर की सेना ने माया और मायिक विद्या का आश्रय लिया, तब पीड़ा और भ्रम देवी की अपनी शक्तियों में भी फैल गया। वाराही देवी और मन्त्रिणी देवी को छोड़कर शेष सभी शक्तियाँ उस मोह में पड़कर युद्धभूमि से पीछे हट गईं। जब इन घटनाओं का समाचार दिया गया, तब श्री त्रिपुर सुंदरी ने केवल मन्द स्मित किया और अपने सहचर भगवान कामेश्वर पर दृष्टि डाली। उस दिव्य दृष्टि-संयोग से उनकी संयुक्त ब्रह्माण्डीय शक्ति शुभ गणेश के रूप में प्रकट हुई, जो समस्त विघ्नों के निवारक हैं।)_

> **महागणेश-निर्भिन्न-विघ्नयन्त्र-प्रहर्षिता ।**

माँ ललिता तब हर्षित होती हैं, जब गणेश द्वारा मायिक और चमत्कारी उपायों से उत्पन्न विघ्न क्रमशः नष्ट किए जाते हैं।

_(ये मायिक उपकरण हमारे मानसिक और मनोवैज्ञानिक प्रवाहों, हमारी प्रतिक्रियाओं तथा हमारी कल्पित पहचान का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो यथार्थ के दर्शन में बाधक होते हैं।)_

> **भण्डासुरेन्द्र-निर्मुक्त-शस्त्र-प्रत्यस्त्र-वर्षिणी ॥३१॥**

माँ भण्डासुर की क्षेपणास्त्र-वर्षा का प्रत्युत्तर अपने आक्रमणों की वर्षा से देती हैं।

> **कराङ्गुलि-नखोत्पन्न-नारायण-दशाकृतिः ।**

भण्डासुर ने ऐसे असुरों की सृष्टि की, जो विभिन्न युगों में विद्यमान रहे थे और जिन्हें पूर्वकाल म���ं भगवान विष्णु के अवतारों द्वारा संहारित किया गया था। उन असुरों के विनाश हेतु माँ की पाद-नखों से भगवान नारायण के दस अवतार प्रकट होते हैं।

> **महा-पाशुपतास्त्राग्नि-निर्दग्धासुर-सैनिका ॥३२॥**

भगवान सदाशिव का आवाहन करने वाले महापाशुपत अस्त्र के द्वारा माँ त्रिपुर सुंदरी असुर-सेनाओं को भस्म कर देती हैं।

> **कामेश्वरास्त्र-निर्दग्ध-सभण्डासुर-शून्यका ।**

कामेश्वर अस्त्र की ज्वालाओं से वे भण्डासुर की राजधानी शून्यक को दग्ध कर देती हैं।

_(भण्डासुर जीवन-रस के अभाव का प्रतीक है, और उसकी राजधानी शून्यक भी उसी रिक्तता अथवा शून्यता का द्योतक है, जिसे कभी पूर्ण नहीं किया जा सकता।)_

> **ब्रह्मोपेन्द्र-महेन्द्रादि-देव-संस्तुत-वैभवा ॥३३॥**

अंततः भण्डासुर के संताप से मुक्त होकर देव और देवता उनके पराक्रम की स्तुति करते हैं।

> **हर-नेत्राग्नि-संदग्ध-काम-सञ्जीवनौषधिः ।**

भण्डासुर (विकृत कामना) का स्थायी संहार करने के स्थान पर, माँ जीवनदायिनी औषधि बनकर उसे उसके मूल स्वरूप—पावन सृजनात्मक ऊर्जा—के रूप में पुनर्जीवित करती हैं, अर्थात् कामदेव के रूप में, जिन्हें पूर्व में भगवान शिव के तृतीय नेत्र द्वारा भस्म कर दिया गया था।

> **श्रीमद्वाग्भव-कूटैक-स्वरूप-मुख-पङ्कजा ॥३४॥**

पंचदशी मंत्र का प्रथम भाग, जिसे वाग्भव कूट भी कहा जाता है, माँ के कमलमुख का निर्माण करता है। यह वाणी पर अधिपत्य के माध्यम से मंगलमय प्रज्ञा प्रदान करता है।

> **कण्ठाधः-कटि-पर्यन्त-मध्यकूट-स्वरूपिणी ।**

पंचदशी मंत्र का मध्य भाग माँ के कलेवर (ग्रीवा से कटि तक) का निर्माण करता है।

> **शक्ति-कूटैकतापन्न-कट्यधोभाग-धारिणी ॥३५॥**

मंत्र का अंतिम भाग, जिसे शक्ति-कूट भी कहा जाता है, कटि के अधोभाग में स्थित माँ के सूक्ष्म शरीर का निर्माण करता है।

> **मूल-मन्त्रात्मिका मूलकूटत्रय-कलेवरा ।**

इस प्रकार माँ स्वयं मूलमंत्र—पंचदशी मंत्र—हैं, और पंचदशाक्षरी मंत्र के तीनों कूटों से ही माँ का शरीर विन्यस्त है।

> **कुलामृतैक-रसिका कुलसंकेत-पालिनी ॥३६॥**

कुण्डलिनी के रूप में वे पावन परम्परा के दैवी अमृत में क्रीड़ा करती हैं, और जब तक साधक पूर्णतः योग्य न हो जाए, तब तक उसके पवित्र आन्तरिक रहस्यों की सावधानीपूर्वक रक्षा करती हैं।

> **कुलाङ्गना कुलान्तस्था कौलिनी कुलयोगिनी ।**

कुण्डलिनी के रूप में वे पावन परम्परा की सजीव स्त्री-स्वरूपा हैं, उसके अंतःतम केन्द्र—कौल शक्ति—में निवास करती हैं, जो कौल उपासना-पद्धति का मूलतत्त्व है और स्वयं देवी का ही स्वरूप है।

> **अकुला समयान्तस्था समयाचार-तत्परा ॥३७॥**

तथापि, वे समस्त परम्पराओं से परे हैं। वे सामय परम्परा की आन्तरिक उपासना का भी केन्द्र हैं। सामय उपासना उन्हें अत्यंत प्रिय है।

> **मूलाधारैक-निलया ब्रह्मग्रन्थि-विभेदिनी ।**

वे अपने सुप्त स्वरूप में कुण्डलिनी के रूप में मूलाधार में निवास करती हैं। वहीं से ऊर्ध्वगमन करते हुए वे ब्रह्मग्रन्थि _(सृष्टि-ग्रन्थि)_ का भेदन करती हैं।

> **मणि-पूरान्तरुदिता विष्णुग्रन्थि-विभेदिनी ॥३८॥**

फिर वे मणिपूर चक्र में प्रकट होकर विष्णुग्रन्थि _(पालन-ग्रन्थि)_ का छेदन करती हैं।

_(यह देवी की जागृति का मानचित्र है।)_

> **आज्ञा-चक्रान्तरालस्था रुद्रग्रन्थि-विभेदिनी ।**

तत्पश्चात् वे आज्ञा चक्र में स्थित होकर रुद्रग्रन्थि _(संहार-ग्रन्थि)_ का विलयन करती हैं।

> **सहस्राराम्बुजारूढा सुधा-साराभिवर्षिणी ॥३९॥**

और अंततः वे सहस्रदल कमल—सहस्रार—में आरोहण करती हैं। इसके फलस्वरूप वे सुधा _(अमृत)_ की धाराओं का वर्षण करती हैं, क्योंकि पूर्व में अप्रकट नाड़ियाँ खुल जाती हैं और तंत्रिका-रासायनिक मार्ग सक्रिय हो जाते हैं।

> **तडिल्लता-समरुचिः षट्चक्रोपरि-संस्थिता ।**

वे छहों चक्रों के ऊपर प्रतिष्ठित होकर स्थिर विद्युत्-प्रभा के समान दीप्तिमान होती हैं। इस प्रकार अपने परम गन्तव्य में वे सर्वथा शिव के साथ ऐक्य को प्राप्त होती हैं।

> **महासक्तिः कुण्डलिनी बिसतन्तु-तनीयसी ॥४०॥**

कुण्डलिनी भी कोमल कमल-नाल के समान अज्ञानरूपी तमस के कीचड़ से आरम्भ होकर शनैः-शनैः ऊर्ध्वगमन करती है और शिखर पर पूर्ण प्रज्ञा के रूप में विकसित हो जाती है।

> **भवानी भावनागम्या भवारण्य-कुठारिका ।**

माँ भगवान शिव के भव रूप की भार्या हैं और भक्ति-युक्त ध्यान द्वारा उनका आवाहन किया जाता है। वे ही एकमात्र परशु हैं, जो संसार-वन का छेदन करती हैं।

> **भद्रप्रिया भद्रमूर्तिर्भक्त-सौभाग्यदायिनी ॥४१॥**

शुभता का साक्षात् स्वरूप होने के कारण उन्हें समस्त शुभ वस्तुएँ प्रिय हैं। माँ अपने भक्तों को सौभाग्य से अनुग्रहित करती हैं।

> **भक्तिप्रिया भक्तिगम्या भक्तिवश्या भयापहा ।**

वे भक्ति से प्रसन्न होती हैं, जो साधना का ईंधन है। वे केवल प्रेम और भक्ति के माध्यम से ही प्राप्त एवं प्रसन्न की जाती हैं। उनके प्रति प्रेम करने की यह प्रक्रिया भक्तों के चैतन्य से भय को दूर कर देती है।

> **शाम्भवी शारदाराध्या शर्वाणी शर्मदायिनी ॥४२॥**

वे शम्भु रूप में भगवान शिव की भार्या हैं। उनकी उपासना देवी शारदा द्वारा की जाती है, जो भगवान ब्रह्मा की भार्या हैं। वे भगवान शिव के शर्व-स्वरूप की भार्या हैं। अपने जनों को सुख प्रदान करने के कारण उन्हें शर्मदायिनी नाम प्राप्त हुआ है।

> **शाङ्करी श्रीकरी साध्वी शरच्चन्द्र-निभानना ।**

वे शुभता और ऐश्वर्य प्रदान करती हैं। वे साध्वी हैं—अत्यन्त शुद्ध और सदा भगवान शिव के प्रति समर्पित। उनका मुख शरद्-पूर्णिमा के पूर्णचन्द्र के समान है।

> **शातोदरी शान्तिमती निराधारा निरञ्जना ॥४३॥**

कुण्डलिनी के रूप में माँ तनु-कटि हैं और पूर्णतः शान्ति से परिपूर्ण हैं। वे समस्त सृष्टि का आधार हैं, किन्तु स्वयं किसी आधार पर आश्रित नहीं हैं। वे नित्य निरंजन हैं।

> **निर्लेपा निर्मला नित्या निराकारा निराकुला ।**

वे समस्त मलिनताओं से रहित, निष्कलंक हैं। वे स्वयं काल की आधारशिला हैं, और फिर भी स्वयं कालातीत तथा नित्य हैं। वे निराकार होते हुए भी किसी भी रूप में प्रकट होने में समर्थ हैं। वे क्षोभ से परे हैं।

> **निर्गुणा निष्कला शान्ता निष्कामा निरुपप्लवा ॥४४॥**

माँ समस्त गुणों की आदिस्रोत हैं, तथापि स्वयं गुणातीत हैं। वे अविभाज्य, नित्य शान्त और कामनारहित हैं। वे अविनाशी हैं।

> **नित्यमुक्ता निर्विकारा निष्प्रपञ्चा निराश्रया ।**

वे सदा पूर्ण स्वातन्त्र्य में स्थित हैं और परिवर्तन से परे हैं। वे सर्वस्व हैं, अतः उन्हें किसी विस्तार की आवश्यकता नहीं है। माँ पूर्णतः स्वाधीन हैं।

> **नित्यशुद्धा नित्यबुद्धा निरवद्या निरन्तरा ॥४५॥**

माँ नित्य पवित्र, प्रज्ञावान और निष्कलंक हैं। माँ अखण्ड रूप से निरन्तर हैं, उनमें कहीं भी विच्छेद नहीं है।

> **निष्कारणा निष्कलङ्का निरुपाधिर्निरीश्वरा ।**

माँ किसी भी अन्य कारण से प्रभावित नहीं हो सकतीं। माँ समस्त दोषों से रहित हैं। उनमें कोई सीमा नहीं है। उनसे श्रेष्ठ कोई नहीं है।

> **नीरागा रागमथनी निर्मदा मदनाशिनी ॥४६॥**

स्वयं रागरहित होकर वे राग का नाश करती हैं। स्वयं अहंकार से रहित होकर वे हमारे भीतर के अहंकार का भी निरसन करती हैं।

> **निश्चिन्ता निरहंकारा निर्मोहा मोहनाशिनी ।**

वे चिन्ता और व्याकुलता से रहित हैं तथा पूर्णतः निरहंकार हैं। स्वयं मोह से रहित होकर वे हमारे भीतर के मोह का भी नाश करती हैं। उनमें कोई स्वार्थ नहीं है, क्योंकि उनसे भिन्न कुछ भी नहीं है।

> **निर्ममा ममताहन्त्री निष्पापा पापनाशिनी ॥४७॥**

इसी कारण वे हमारे भीतर की आत्मकेन्द्रित वृत्ति को भी दूर करती हैं। वे निष्पाप हैं और अपने भक्तों के पापों का, उनके मूल सहित, विनाश करती हैं।

> **निष्क्रोधा क्रोधशमनी निर्लोभा लोभनाशिनी ।**

वे क्रोध से रहित हैं और इसी कारण हमारे भीतर उत्पन्न होने वाली क्रोध-वृत्तियों का भी उच्छेद करती हैं। स्वयं लोभ से परे होकर वे हमें लोभ ��े संरक्षण प्रदान करती हैं।

> **निःसंशया संशयघ्नी निर्भवा भवनाशिनी ॥४८॥**

वे निश्चयस्वरूपा हैं, संशयरहित हैं, और अपने भक्तों की चेतना में स्थित समस्त संशयों का संहार करती हैं। संसार में वे जन्म-मरण के चक्र से असंपृक्त हैं, और इसलिए वे ही एकमात्र हैं जो हमें इस चक्र से मुक्ति प्रदान करती हैं।

> **निर्विकल्पा निराबाधा निर्भेदा भेदनाशिनी ।**

वे अविकारी, अक्षुब्ध और समदर्शिनी हैं, और हमारे भीतर भेदबुद्धि का नाश करती हैं।

> **निर्नाशा मृत्युमथनी निष्क्रिया निष्परिग्रहा ॥४९॥**

वे नित्य और अविनाशी हैं; वे मृत्यु का विनाश करती हैं। वे स्वयं कर्म में लिप्त नहीं हैं, तथापि समस्त क्रियाएँ उन्हीं के द्वारा सम्पन्न होती हैं। सब कुछ उन्हीं का होते हुए भी वे सर्वथा निरपेक्ष और अपरिग्रहिणी हैं।

> **निस्तुला नीलचिकुरा निरपाया निरत्यया ।**

माँ अनुपमेया हैं; समस्त ब्रह्माण्ड के शून्य का तमस् उनके कृष्ण केशों का रूप धारण करता है। वे अविनाशी हैं। निरत्यया स्वरूपा होने के कारण जगन्माता का अपमान नहीं किया जा सकता; वे हमारी त्रुटियों का लेखा नहीं रखतीं और न ही उनके लिए हमें दण्ड देती हैं।

> **दुर्लभा दुर्गमा दुर्गा दुःखहन्त्री सुखप्रदा ॥५०॥**

निर्गुण होने के कारण माँ को प्राप्त करना और उनके निकट पहुँचना अत्यन्त दुष्कर हो सकता है। वे ही एकमात्र हैं जो हमें कठिन काल से पार कराती हैं, शोक का निवारण करती हैं और शाश्वत आनन्द प्रदान करती हैं।

> **दुष्टदूरा दुराचार-शमनी दोषवर्जिता ।**

अज्ञान में बाँधने वाले मार्गों से माँ दूर और अप्राप्य बनी रहती हैं। जिस क्षण हम उनके प्रति समर्पण करते हैं, उसी क्षण वे उनसे हमारी पृथकता-बुद्धि का लय कर देती हैं। वे सदा दोषरहित हैं।

> **सर्वज्ञा सान्द्रकरुणा समानाधिक-वर्जिता ॥५१॥**

वे सर्वज्ञ हैं। उनकी करुणा गहन, पूर्ण और निरपेक्ष है। उनसे ऊपर कोई नहीं है, और न ही उनके समकक्ष कोई है।

> **सर्वशक्तिमयी सर्व-मङ्गला सद्गतिप्रदा ।**

वे समस्त शक्तियों का आदिस्रोत हैं और सर्वथा मंगलमयी हैं। माँ अपने सन्तानों को मोक्ष का परम और सत्य मार्ग प्रदान करती हैं।

> **सर्वेश्वरी सर्वमयी सर्वमन्त्र-स्वरूपिणी ॥५२॥**

माँ सृष्टि पर अधिष्ठित हैं, और वे ही साक्षात् सृष्टि भी हैं। वे समस्त मंत्रों का हृदय हैं।

> **सर्व-यन्त्रात्मिका सर्व-तन्त्ररूपा मनोन्मनी ।**

वे समस्त यंत्रों और तंत्रों की आन्तरिक तत्त्वसत्ता हैं। वे चेतना को मन से परे उठाकर अपने ही अवस्थारहित स्वरूप में प्रतिष्ठित करती हैं।

> **माहेश्वरी महादेवी महालक्ष्मीर्मृडप्रिया ॥५३॥**

वे महादेव, महेश्वर और मृड की प्रियतमा हैं। वे ही महालक्ष्मी हैं।

> **महारूपा महापूज्या महापातक-नाशिनी ।**

अपने सर्वमहोदय स्वरूप के साथ वे ही एकमात्र पूज्या हैं और निरन्तर पूजित हैं; वे महापापों के भी समस्त प्रभावों का नाश करती हैं।

> **महामाया महासत्त्वा महाशक्तिर्महारतिः ॥५४॥**

वे स्वयं महाविद्या भी हैं, जो हमें उन्हें ही एकमात्र यथार्थ के रूप में देखने से आच्छादित करती हैं। वे महाशक्ति हैं; वे अनन्त आनन्द हैं।

> **महाभोगा महैश्वर्या महावीर्या महाबला ।**

वे सदा अपने ही स्वरूप में क्रीड़ा करती हुई आनन्दित रहती हैं। वे परम ऐश्वर्यस्वरूपा हैं। पराक्रम, बल में वे अनुपमेय हैं।

> **महाबुद्धिर्महासिद्धिर्महायोगेश्वरेश्वरी ॥५५॥**

प्रज्ञा में भी वे अनुपमेय हैं। वे परम सिद्धियों की आदिस्रोत हैं। वे महायोगियों द्वारा उपासित उपास्यस्वरूपा हैं।

> **महातन्त्रा महामन्त्रा महायन्त्रा महासना ।**

वे स्वयं महातंत्र हैं, महामंत्र _(श्रीविद्या)_ हैं, महायंत्र _(श्री यंत्र)_ हैं, तथा समस्त तत्त्वों के परम आसन पर विराजमान हैं।

> **महायाग-क्रमाराध्या महाभैरव-पूजिता ॥५६॥**

वे महायाग की गूढ़ अनुक्रमणा के अनुसार उपासित होती हैं _(जो अपने ही शरीर के भीतर श्री चक्र के देवताओं का आवाहन करने की आन्तरिक साधना है)_। उनकी उपासना स्वयं भगवान महाभैरव द्वारा की जाती है।

> **महेश्वर-महाकल्प-महाताण्डव-साक्षिणी ।**

सृष्टि-चक्र के अंत में भगवान महेश माँ के लिए अपना महाताण्डव करते हैं।

> **महाकामेश-महिषी महात्रिपुर-सुन्दरी ॥५७॥**

अपने प्रियतम की एकमात्र साक्षी, परम सौंदर्यस्वरूपा माँ महात्रिपुरसुंदरी, भगवान महाकामेश की भार्या हैं।

> **चतुःषष्ट्युपचाराढ्या चतुःषष्टिकलामयी ।**

वे ६४ प्रकारों के उपचारों द्वारा उपासित होती हैं तथा ६४ कलाओं का साक्षात् स्वरूप हैं।

> **महाचतुः-षष्टिकोटि-योगिनी-गणसेविता ॥५८॥**

वे ६४ कोटि योगिनियों द्वारा सेवित हैं।

> **मनुविद्या चन्द्रविद्या चन्द्रमण्डल-मध्यगा ।**

माँ पंचदशी मंत्र के समस्त स्वरूपों की सजीव तत्त्वसत्ता हैं, जिनमें मनु और चन्द्र द्वारा प्रकट किए गए स्वरूप भी सम्मिलित हैं। वे ही उन सबका परम लक्ष्य हैं और चन्द्रसदृश सहस्रार के मध्य में निवास करती हैं।

> **चारुरूपा चारुहासा चारुचन्द्र-कलाधरा ॥५९॥**

उनका अनुपम सौंदर्य न कभी बढ़ता है, न कभी क्षीण होता है, और उनके द्वारा धारण की गई कोमल चन्द्रकला के समान उनका मृदु स्मित निरन्तर दीप्तिमान रहता है।

> **चराचर-जगन्नाथा चक्रराज-निकेतना ।**

जगन्माता जंगम और स्थावर—उभय ब्रह्माण्डों की अधीश्वरी हैं और श्री चक्र के परम केन्द्र बिन्दु से शासन करती हैं।

> **पार्वती पद्मनयना पद्मराग-समप्रभा ॥६०॥**

सम्पूर्ण विश्व की परम अधिष्ठात्री होते हुए भी वे प्रेमपूर्वक हिमालय-कन्या पार्वती के रूप में प्रकट होती हैं—कमलनयना और माणिक्य के समान दीप्तिमान।

> **पञ्च-प्रेतासनासीना पञ्चब्रह्म-स्वरूपिणी ।**

वे ५ शव-सदृश तत्त्वों द्वारा धारित सिंहासन पर विराजमान हैं। वे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईशान और सदाशिव हैं, जो देवी की शक्ति के अभाव में निर्जीव के समान हैं। माँ स्वयं ही पाँचों ब्रह्मा बन जाती हैं।

> **चिन्मयी परमानन्दा विज्ञान-घनरूपिणी ॥६१॥**

उनकी चेतना से अभिसिक्त होने पर वही ५ शव नहीं रहते, अपितु उनकी शक्ति से पूर्णतः संजीवित दिव्य तत्त्व बन जाते हैं। वे परमानन्दस्वरूपा हैं और सघन, परिपूर्ण प्रज्ञा हैं।

> **ध्यान-ध्यातृ-ध्येयरूपा धर्माधर्म-विवर्जिता ।**

वे स्वयं ध्यान हैं, ध्यान करने वाली भी वे ही हैं, और ध्यान का विषय भी हैं। माँ पुण्य और पाप जैसी नैतिक द्वैतताओं से परे हैं।

> **विश्वरूपा जागरिणी स्वपन्ती तैजसात्मिका ॥६२॥**

द्वैत से परे होकर वे जो कुछ भी विद्यमान है, उसी के रूप में प्रकट होती हैं—समस्त ब्रह्माण्ड के रूप में।

जाग्रत अवस्था में वे स्थूल भौतिक जगत और उसके विषयों के रूप में प्रकट होती हैं। स्वप्न अवस्था में वे सूक्ष्म अन्तर्जगत और उसके रूपों में परिणत होती हैं। तैजस रूप में वे स्वप्न-अनुभवों की पृष्ठभूमि में स्थित सूक्ष्म चेतना के रूप में दीप्त होती हैं।

> **सुप्ता प्राज्ञात्मिका तुर्या सर्वावस्था-विवर्जिता ।**

माता सुषुप्ति अवस्था के रूप में तथा समस्त अस्तित्व की सामूहिक आधारभूमि के रूप में अनुभूत ह���ती हैं। वे तुर्य हैं—वह चेतना जो समस्त चेतन अवस्थाओं में व्याप्त रहते हुए भी उनसे परे है।

> **सृष्टिकर्त्री ब्रह्मरूपा गोप्त्री गोविन्दरूपिणी ॥६३॥**

वे ब्रह्मा के रूप में समस्त सृष्टि की कारण हैं। वे गोविन्द के रूप में पालन और संरक्षण करती हैं।

> **संहारिणी रुद्ररूपा तिरोधान-करीश्वरी ।**

वे रुद्र के रूप में सृष्टि का लय करती हैं, संकोच और रूपान्तरण की शक्ति के रूप में। तिरोधान की अधीश्वरी शक्ति होकर वे माया के माध्यम से स्वयं को आच्छादित करती हैं और ईशान की शक्ति के रूप में प्रकट होती हैं।

> **सदाशिवाऽनुग्रहदा पञ्चकृत्य-परायणा ॥६४॥**

सदाशिव के रूप में वे अनुग्रह प्रदान करती हैं—वह अनुग्रह जो मुक्ति की ओर ले जाता है। इस प्रकार वे सदा ५ दैवी कृत्यों में प्रवृत्त रहती हैं—सृष्टि, पालन, संहार, संवृति और अनुग्रह।

> **भानुमण्डल-मध्यस्था भैरवी भगमालिनी ।**

माँ भैरव की भार्या के रूप में सूर्य-मण्डल के मध्य स्थित होकर उपर्युक्त पाँचों कृत्यों का निरन्तर निर्वहन करती हैं।

> **पद्मासना भगवती पद्मनाभ-सहोदरी ॥६५॥**

वे कोटि-सूर्यों की माला धारण किए, कमल पर विराजमान होकर समस्त सृष्टि की शरणस्थली हैं। वे भगवान महाविष्णु की भगिनी भी हैं।

> **उन्मेष-निमिषोत्पन्न-विपन्न-भुवनावली ।**

उनके नेत्रों के खुलने से लोकों की उत्पत्ति होती है; और उनके निमीलन से लोकों का लय हो जाता है।

> **सहस्र-शीर्षवदना सहस्राक्षी सहस्रपात् ॥६६॥**

यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उनका ही शरीर बनकर प्रकट होता है—उनके असंख्य शिरों और मुखों, असंख्य नेत्रों और असंख्य चरणों के रूप में।

> **आब्रह्म-कीट-जननी वर्णाश्रम-विधायिनी ।**

वे महाब्रह्मा से लेकर सूक्ष्मतम कीट तक समस्त प्राणियों की जननी हैं। वे वर्ण और आश्रमों की व्यवस्था को स्थापित करती हैं।

> **निजाज्ञारूप-निगमा पुण्यापुण्य-फलप्रदा ॥६७॥**

अपने ही आदेश से प्रकट होकर वेद उनसे उद्भूत होते हैं, और कर्म-नियम के रूप में वे पुण्य तथा अपुण्य—उभय कर्मों के फल प्रदान करती हैं।

> **श्रुति-सीमन्त-सिन्दूरी-कृत-पादाब्ज-धूलिका ।**

वेद स्वयं उन्हें नमन करते हैं और उनके कमल-चरणों की धूल को अपनी माँग में सिन्दूर के रूप में धारण करते हैं।

> **सकलागम-सन्दोह-शुक्ति-सम्पुट-मौक्तिका ॥६८॥**

समस्त शास्त्र मिलकर मानो एक शुक्ति के समान हैं, और उसके भीतर स्थित दीप्तिमान मुक्ताफल के रूप में माँ ही उनकी परम विद्या और चरम लक्ष्य हैं।

> **पुरुषार्थप्रदा पूर्णा भोगिनी भुवनेश्वरी ।**

वे चारों पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—प्रदान करने वाली हैं। सर्वसमावेशक पूर्णता होने के कारण उनके मार्ग में कुछ भी वर्जित नहीं है। [भुवनेश्वरी](https://tantrasadhana.app/blog/ma-bhuvaneshwari-knowing-worshipping-queen-of-universe-hindi)—समस्त लोकों की अधीश्वरी—के रूप में वे ही समस्त सिद्धियों का उपभोग करती हैं।

> **अम्बिकाऽनादि-निधना हरिब्रह्मेन्द्र-सेविता ॥६९॥**

अम्बिका—समस्त की जननी—के रूप में वे अनादि और अनन्त हैं, और विष्णु, ब्रह्मा तथा इन्द्र द्वारा सेवित हैं।

> **नारायणी नादरूपा नामरूप-विवर्जिता ।**

माँ नारायणी हैं—भगवान नारायण की शक्ति—जो अस्तित्व की निरन्तरता का पालन करती हैं। वे नाद-स्वरूपा हैं, किन्तु नाम और रूप की समस्त सीमाओं से परे भी हैं।

> **ह्रींकारी ह्रीमती हृद्या हेयोपादेय-वर्जिता ॥७०॥**

वे पावन बीजाक्षर 'ह्रीं'—शक्ति-प्रणव—की सजीव उपस्थिति हैं। इस बीज को धारण करके जगन्माता हमारे हृदय में निवास करती हैं। वे सर्वथा ग्रहण और त्याग—दोनों से परे हैं।

> **राजराजार्चिता राज्ञी रम्या राजीवलोचना ।**

वे स्वयं राजाधिराज भगवान शिव द्वारा उपासित हैं और परम अधीश्वरी के रूप में विराजमान हैं। वे समस्त सौंदर्य की आदिस्रोत हैं और कमल-सदृश करुणामय नेत्रों से अपने भक्तों पर अनुग्रहपूर्ण दृष्टि डालती हैं।

> **रञ्जनी रमणी रस्या रणत्किङ्किणि-मेखला ॥७१॥**

आनन्ददायिनी और मोहनस्वरूपा होकर वे हर्ष और परमानन्द प्रदान करती हैं। वे अपनी मे���ला में कोमल झंकार करती हुई घंटिकाएँ धारण करती हैं।

> **रमा राकेन्दुवदना रतिरूपा रतिप्रिया ।**

वे माँ लक्ष्मी के रूप में ऐश्वर्यस्वरूपा हैं; उनका मुख पूर्णचन्द्र के समान दीप्तिमान है। वे आनन्द की साक्षात् मूर्ति हैं और आनन्द में ही रमण करती हैं।

> **रक्षाकरी राक्षसघ्नी रामा रमणलम्पटा ॥७२॥**

अपने भक्तों की सदा रक्षक होकर वे अज्ञानरूपी समस्त दैत्यों का विनाश करती हैं। वे स्वयं आनन्द हैं और भगवान शिव के प्रति अचल भक्ति से युक्त हैं।

> **काम्या कामकलारूपा कदम्ब-कुसुम-प्रिया ।**

माँ ही वह परम आकांक्षा हैं, जिसकी कामना की जा सकती है। वे कामकला हैं—कामेश्वर और कामेश्वरी का संयुक्त प्राकट्यस्वरूप। उन्हें कदम्ब पुष्प अत्यन्त प्रिय हैं।

> **कल्याणी जगतीकन्दा करुणा-रस-सागरा ॥७३॥**

वे समस्त जगत् की मूलाधार होकर हमें सौभाग्य से अनुग्रहित करती हैं। वे सबके लिए करुणा का महासागर हैं।

> **कलावती कलालापा कान्ता कादम्बरीप्रिया ।**

समस्त कलाओं की साक्षात् स्वरूपा होकर उनकी वाणी ही ललित कलाओं का निर्माण करती है। अत्यन्त मनोहर स्वरूपवती होकर वे स्वयं भी आनन्द में मत्त रहती हैं।

> **वरदा वामनयना वारुणी-मद-विह्वला ॥७४॥**

आध्यात्मिक आनन्द-रस की मदिरा से उन्मत्त होकर वे करुणापूर्ण नेत्रों द्वारा हमें समस्त वर प्रदान करती हैं।

> **विश्वाधिका वेदवेद्या विन्ध्याचल-निवासिनी ।**

यह उन्मत्त आनन्द इस कारण उत्पन्न होता है कि माँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से परे स्थित हैं। वे वेदों द्वारा जानी जाती हैं और विन्ध्याचल में निवास करती हैं।

> **विधात्री वेदजननी विष्णुमाया विलासिनी ॥७५॥**

उन्होंने ही सृष्टि और वेदों की रचना की है, और वे भगवान विष्णु की माया हैं। यह सब वे अपनी लीला के रूप में सम्पन्न करती हैं।

> **क्षेत्रस्वरूपा क्षेत्रेशी क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-पालिनी ।**

वे समस्त पदार्थों के रूप में प्रकट होती हैं और जो कुछ भी है, उसकी अधीश्वरी भी वही हैं। देवी माँ ही हमारी आत्मा हैं और वे ही वह चेतना हैं जो क्षेत्र—अर्थात् हमारे शरीर, विचार, भावनाएँ और इन्द्रिय-बोध—को जानती है। वे क्षेत्र और हमारी आत्मा—दोनों का रक्षण करती हैं।

> **क्षयवृद्धि-विनिर्मुक्ता क्षेत्रपाल-समर्चिता ॥७६॥**

यद्यपि क्षेत्र की प्रक्रियाएँ निरन्तर वृद्धि और क्षय से गुज़रती रहती हैं, तथापि वे साक्षी-स्वरूप में स्वयं अविकारी बनी रहती हैं। वे क्षेत्र के विविध अधिष्ठाताओं की भी अधिदेवता हैं।

> **विजया विमला वन्द्या वन्दारु-जन-वत्सला ।**

आदि चेतन तत्त्व के रूप में वे सदा विजयी हैं और मलिनता से सर्वथा अस्पृष्ट हैं। वे समस्त उपासना और वन्दना के योग्य हैं। विशेषतः वे उन साधकों पर अत्यन्त स्नेह रखती हैं, जो क्षेत्र (देह-मन) से चेतना को हटाकर क्षेत्रज्ञ (ज्ञाता) की ओर आन्तरिक रूप से उन्मुख होकर उनकी उपासना करते हैं।

> **वाग्वादिनी वामकेशी वह्निमण्डल-वासिनी ॥७७॥**

वे समस्त अभिव्यक्ति का स्���रूप हैं, और उनके कृष्ण, प्रवाहमान केश उस अदृश्य आधार का संकेत देते हैं, जिससे अभिव्यक्त शक्ति का उद्भव होता है। वे अग्नि-वृत्त के भीतर निवास करती हैं, जो समस्त प्रकार के रूपान्तरण का द्योतक है।

> **भक्तिमत्-कल्पलतिका पशुपाश-विमोचिनी ।**

वे उनका आवाहन करने वाले अपने भक्तों के लिए कामनापूरक लता हैं। वे देह-मन के संकुचित तादात्म्य के बन्धनों से उन्हें मुक्त करती हैं।

> **संहृताशेष-पाषण्डा सदाचार-प्रवर्तिका ॥७८॥**

अज्ञान से उत्पन्न इस आन्तरिक मिथ्या-दृष्टि का नाश करके वे भीतर स्थित ज्ञाता के रूप में अपने ही स्वरूप के बोध को जागृत करती हैं और इस प्रकार सम्यक् आचरण की प्रेरणा प्रदान करती हैं।

> **तापत्रयाग्नि-सन्तप्त-समाह्लादन-चन्द्रिका ।**

जब प्राणी त्रिविध तापों—आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक—की ज्वालाओं से दग्ध होते हैं, तब देवी माँ शीतल चन्द्र-किरण के समान होकर समस्त क्लेशों को शान्त और शमित करती हैं।

> **तरुणी तापसाराध्या तनुमध्या तमोऽपहा ॥७९॥**

निराकार चेतना के रूप में सदा नवयौवना वे तपस्—अविरत साधना की एकाग्र ऊष्मा—के द्वारा अन्वेषित की जाती हैं।

इसी अन्तःअग्नि के माध्यम से तनु-कटि कुण्डलिनी के रूप में ऊर्ध्वगमन करती हुई वे जड़ता और तमस् का निवारण करती हैं, तमोगुण का लय कर देती हैं और हमारे क्लेशों की प्रज्वलित ज्वालाओं को शान्त कर देती हैं।

> **चितिस्तत्पद-लक्ष्यार्था चिदेकरस-रूपिणी ।**

माँ स्वयं शुद्ध चैतन्य हैं—परम साक्षात्कार द्वारा संकेतित होने वाला वही वास्तविक अर्थ। वे बोध और आनन्द की एकमात्र, अविभक्त तत्त्वसत्ता के रूप में विद्यमान हैं।

> **स्वात्मानन्द-लवीभूत-ब्रह्माद्यानन्द-सन्ततिः ॥८०॥**

ब्रह्मा और समस्त देवताओं का संयुक्त आनन्द भी उनके अपने अनन्त आनन्द की केवल एक क्षुद्र बूँद मात्र है।

> **परा प्रत्यक्चितीरूपा पश्यन्ती परदेवता ।**

परम सत्ता होकर वे सृष्टि के भीतर भी हैं और उससे परे भी—परा—समस्त अस्तित्व के हृदय में स्थित यथार्थ। जब वे स्वयं को अभिव्यक्त करना आरम्भ करती हैं, तब वे पश्यन्ती बनती हैं।

> **मध्यमा वैखरीरूपा भक्त-मानस-हंसिका ॥८१॥**

तत्पश्चात् वे मध्यमा और वैखरी के रूप में प्रस्फुटित होती हैं—अभिव्यक्ति के सूक्ष्म और उच्चरित स्वरूपों के रूप में। अभिव्यक्ति की इन चारों अवस्थाओं के रूप में वे विवेक-हंस के समान अपने भक्तों के हृदय में आनन्दपूर्वक निवास करती हैं और निरन्तर उनकी आन्तरिक चेतना को जागृत करती रहती हैं।

> **कामेश्वर-प्राणनाडी कृतज्ञा कामपूजिता ।**

देवी माँ कामेश्वर की प्राणधारा स्वयं हैं। वे समस्त कर्मों और विचारों की साक्षी-ज्ञाता हैं। उनकी उपासना स्वयं कामदेव द्वारा की जाती है। अन्य शब्दों में, वे वही शक्ति हैं जिसके माध्यम से समस्त कामनाओं की सिद्धि की खोज की जाती है।

> **श‍ृङ्गार-रस-सम्पूर्णा जया जालन्धर-स्थिता ॥८२॥**

प्रेम और सौंदर्य के सार _(श्रृंगार-रस)_ से परिपूर्ण होकर वे सदा विजयी हैं। जालन्धर केन्द्र में स्थित होकर वे चेतना के ऊर्ध्वगमन को धारण करती हैं और उसका संचालन करती हैं।

> **ओड्याणपीठ-निलया बिन्दु-मण्डलवासिनी ।**

माता पावन ओड्याण पीठ में निवास करती हैं और बिन्दु-मण्डल में प्रतिष्ठित हैं, जो हम सभी के भीतर स्थित चेतना का अंतःतम केन्द्र है।

> **रहोयाग-क्रमाराध्या रहस्तर्पण-तर्पिता ॥८३॥**

वे आन्तरिक योग की सूक्ष्म और गुप्त अवस्थाओं के माध्यम से उपासित होती हैं और गहन ध्यान में अर्पित किए गए शान्त, अन्तर्मुख उपचारों से प्रसन्न होती हैं।

> **सद्यःप्रसादिनी विश्व-साक्षिणी साक्षिवर्जिता ।**

माँ क्षणमात्र में कृपा प्रदान करती हैं। वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की साक्षी हैं, और फिर भी स्वयं समस्त साक्षित्व से परे स्थित हैं।

> **षडङ्गदेवता-युक्ता षाड्गुण्य-परिपूरिता ॥८४॥**

वे मंत्र-साधना के षडंग देवताओं से अनुगमित हैं _(षडंग न्यास में हृदय, ललाट, शिरोभाग, भुजाओं, नेत्रों और रक्षक कवच में देवताओं का आवाहन किया जाता है)_ और वे छहों दैवी गुणों _(सर्वज्ञता, आनन्द, प्रज्ञा, स्वातन्त्र्य, शक्ति और नित्यत्व)_ में पूर्णतः परिपूर्ण हैं।

> **नित्यक्लिन्ना निरुपमा निर्वाण-सुख-दायिनी ।**

माँ सदा कोमल और करुणामयी हैं, सर्वथा अतुलनीय। वे स्वयं मुक्ति के आनन्द का दान करती हैं।

> **नित्या-षोडशिका-रूपा श्रीकण्ठार्ध-शरीरिणी ॥८५॥**

वे षोडश नित्याओं के रूप में प्रकट होती हैं और श्रीकण्ठ (भगवान शिव) की अर्धांग-स्वरूपा होकर उनसे अविभाज्य ऐक्य में स्थित हैं।

> **प्रभावती प्रभारूपा प्रसिद्धा परमेश्वरी ।**

माँ दैवी शक्ति से दीप्त हैं और स्वयं शुद्ध प्रकाश के रूप में प्रकाशित होती हैं। वे सर्वत्र परम अधीश्वरी के रूप में विख्यात हैं।

> **मूलप्रकृतिरव्यक्ता व्यक्ताव्यक्त-स्वरूपिणी ॥८६॥**

प्रकृति की अव्यक्त मूलाधार होकर वे अभिव्यक्ति से परे स्थित रहती हैं, तथापि अव्यक्त और व्यक्त—दोनों रूपों में अस्तित्व के रूप में प्रकट होती हैं।

> **व्यापिनी विविधाकारा विद्याविद्या-स्वरूपिणी ।**

वे सर्वत्र व्याप्त होकर असंख्य रूपों में प्रकट होती हैं। वे ज्ञान और अज्ञान—दोनों का स्वरूप हैं, और दोनों के पीछे स्थित शक्ति भी वे ही हैं।

> **महाकामेश-नयन-कुमुदाह्लाद-कौमुदी ॥८७॥**

शीतल चन्द्रकिरणों के समान वे महाकामेश के कमल-सदृश नेत्रों को आनन्दित करती हैं और समस्त सृष्टि को मृदु आनन्द से परिपूर्ण कर देती हैं।

> **भक्त-हार्द-तमोभेद-भानुमद्भानु-सन्ततिः ।**

वे प्रज्वलित सूर्य-समूह के समान दीप्त होकर अपने भक्तों के हृदयों में स्थित गहनतम तमस् का लय कर देती हैं।

> **शिवदूती शिवाराध्या शिवमूर्तिः शिवङ्करी ॥८८॥**

अपने अनन्त प्रेम से उन्होंने भगवान शिव को अपना दूत बनाया; और प्रत्युत्तर में भगवान स्वयं उनकी उपासना करते हैं, क्योंकि वे उनका ही आत्मस्वरूप हैं।

वे मंगलमय चैतन्य की साक्षात् मूर्ति हैं और शुद्ध, कल्याणकारी बोध प्रदान करने वाली हैं।

> **शिवप्रिया शिवपरा शिष्टेष्टा शिष्टपूजिता ।**

वे भगवान शिव की प्रियतमा हैं और समस्त रूपों तथा गुणों की जननी होने के कारण स्वयं भगवान से भी परे स्थित हैं। वे विवेकी और धर्मनिष्ठ जनों द्वारा सदा आदरपूर्वक पूजित और उन्हें प्रिय हैं।

> **अप्रमेया स्वप्रकाशा मनोवाचामगोचरा ॥८९॥**

अनन्त और अपरिमेय होकर वे अपने ही अन्तःप्रकाश से दीप्त होती हैं और नित्य मन की पकड़ तथा वाणी के सामर्थ्य से परे बनी रहती हैं।

> **चिच्छक्तिश् चेतनारूपा जडशक्तिर्जडात्मिका ।**

वे शुद्ध चैतन्य की शक्ति और स्वरूप हैं, और वही शक्ति माया के रूप में पदार्थ तथा प्रतीत होने वाली जड़ता के रूप में भी प्रकट होती है।

> **गायत्री व्याहृतिः सन्ध्या द्विजवृन्द-निषेविता ॥९०॥**

गायत्री के रूप में वे समस्त मंत्रों की जननी हैं और उन्हीं की पावन उच्चारणा भी हैं। वे मंत्र, उसके उच्चारण और उसकी कृपा—इन तीनों की पवित्र संधि _(संध्या)_ हैं।

> **तत्त्वासना तत्त्वमयी पञ्च-कोशान्तर-स्थिता ।**

वे अस्तित्व के मूल तत्त्वों—षट्त्रिंशत् तत्त्वों—पर प्रतिष्ठित हैं। समस्त की जननी (अयी) होकर वे स्वयं उन्हीं का सारतत्त्व हैं। जीव के पाँचों कोशों में निवास करती हैं।

> **निःसीम-महिमा नित्य-यौवना मदशालिनी ॥९१॥**

उनकी महिमा अपरिमित है। सदा नवयौवना, अजर, अक्षण्ण और अक्षीण होकर वे दैवी पूर्णता और आनन्दमयी प्रभा से दीप्त रहती हैं।

> **मदघूर्णित-रक्ताक्षी मदपाटल-गण्डभूः ।**

उनके रक्तवर्ण नेत्र दिव्य उन्माद से लोलायमान हैं, आनन्दमग्न तन्मयता में मृदु रूप से विचरते हुए। उनके कपोल दैवी परमानन्द से उत्पन्न अरुण आभा से दीप्त हैं।

> **चन्दन-द्रव-दिग्धाङ्गी चाम्पेय-कुसुम-प्रिया ॥९२॥**

उनके अंग शीतल चन्दन-लेप से लिप्त हैं, और वे चम्पक पुष्पों के सुवास तथा अर्पण में आनन्द का अनुभव करती हैं।

> **कुशला कोमलाकारा कुरुकुल्ला कुलेश्वरी ।**

वे परम निपुण और निर्दोष रूप से सिद्ध हैं, तथापि अत्यन्त कोमल और सुकुमार स्वरूपा हैं। वे आकर्षण और जाग्रत कामना की अरुण देवी कुरुकुल्ला हैं और कौल परम्परा की परम अधीश्वरी हैं।

> **कुलकुण्डालया कौल-मार्ग-तत्पर-सेविता ॥९३॥**

देह के अन्तःतम पावन केन्द्र—कुलकुण्ड—में निवास करती हुई, जहाँ कुण्डलिनी स्थित है, वे कौल मार्ग के प्रति पूर्णतः समर्पित साधकों द्वारा प्रेमपूर्वक उपासित होती हैं।

> **कुमार-गणनाथाम्बा तुष्टिः पुष्टिर्मतिर्धृतिः ।**

वे दिव्य जननी हैं कुमार और गणनाथ—दोनों की, जो उन विविध गणों के अधिष्ठाता हैं, जिनके प्रभाव हमें संसार से बाँधे रखते हैं। हमारे भीतर अपनी सजीव उपस्थिति के रूप में वे संतोष और पोषण, प्रज्ञा की स्पष्टता और दृढ़ संकल्प के रूप में प्रकट होती हैं।

> **शान्तिः स्वस्तिमती कान्तिर्नन्दिनी विघ्ननाशिनी ॥९४॥**

वे शान्ति और मंगलमय कल्याण, दीप्ति और आनन्द के रूप में निवास करती हैं, और वही अनुग्रहशील शक्ति हैं जो मार्ग में आने वाले समस्त विघ्नों का निवारण करती हैं।

> **तेजोवती त्रिनयना लोलाक्षी-कामरूपिणी ।**

देवी माँ दिव्य प्रभा से दीप्त हैं और अपने त्रिविध दर्शन से—सूर्य, चन्द्र और अग्नि को अपने तीन नेत्रों के रूप में धारण करके—समस्त को देखती हैं। अपनी क्रीड़ामय और अभिव्यक्त दृष्टि के द्वारा वे कामस्वरूप धारण करती हैं।

> **मालिनी हंसिनी माता मलयाचल-वासिनी ॥९५॥**

वे मातृका के इक्यावन वर्णों का प्रतिनिधित्व करने वाली माला से अलंकृत होकर मालिनी के रूप में शोभित हैं, और हंसिनी के रूप में—अन्तःस्थित विवेक-बुद्धि तथा 'हं-स' मंत्र के रूप में—विचरण करती हैं। विश्वजननी के रूप में वे पावन मलय पर्वत में निवास करती हैं, जो पोषण और आध्यात्मिक सुवास का सूक्ष्म स्रोत है, जिससे समस्त जगत् का पालन होता है।

> **सुमुखी नलिनी सुभ्रूः शोभना सुरनायिका ।**

माता का मुख कोमलता और पवित्रता में कमल-सदृश है, उनकी भ्रूभंगियाँ अत्यन्त रमणीय हैं, और उनके अंग-प्रत्यंग दिव्य शोभा से दीप्त हैं। वे देवताओं की तेजस्विनी अग्रणी हैं।

> **कालकण्ठी कान्तिमती क्षोभिणी सूक्ष्मरूपिणी ॥९६॥**

भगवान शिव के साथ ऐक्य में स्थित होकर वे अपने कण्ठ पर विष और काल से अतीत होने का चिह्न धारण करती हैं। यह ऐक्य उन्हें परम दीप्तिमान बनाता है। अपनी इच्छा-मात्र से वे ब्रह्माण्ड को गति प्रदान करती हैं, किन्तु अपने तत्त्वस्वरूप में वे परम सूक्ष्म हैं—समस्त दृश्य रूपों से परे।

> **वज्रेश्वरी वामदेवी वयोऽवस्था-विवर्जिता ।**

वे सर्वसाधारण दृष्टि में छिपे हुए हीरे के समान हैं। वे भगवान शिव का अविभाज्य वामांग हैं। आयु और काल की समस्त सीमाओं से अस्पृष्ट होकर...

> **सिद्धेश्वरी सिद्धविद्या सिद्धमाता यशस्विनी ॥९७॥**

वे समस्त आध्यात्मिक सिद्धियों की अधीश्वरी हैं, साक्षात्कार प्रदान करने वाली स्वयं विद्या—श्रीविद्या—हैं, और समस्त सिद्ध पुरुषों की जननी हैं।

उनकी महिमा स्वाभाविक रूप से प्रकाशित होती है; उसे किसी उद्घोष की आवश्यकता नहीं है।

> **विशुद्धिचक्र-निलयाऽऽरक्तवर्णा त्रिलोचना ।**

माँ विशुद्धि चक्र में निवास करती हैं, कोमल अरुण प्रभा से दीप्त होकर अपने ३ नेत्रों से समस्त आयामों का दर्शन करती है��।

> **खट्वाङ्गादि-प्रहरणा वदनैक-समन्विता ॥९८॥**

वे गदा तथा अन्य आयुधों से सुसज्जित हैं और एकमुखी हैं।

> **पायसान्नप्रिया त्वक्स्था पशुलोक-भयङ्करी ।**

वे पावन पायस में अनुरक्त हैं और त्वक्-धातु में निवास करती हैं। पशुवत् अज्ञान में बँधे हुए जीवों के लिए उनकी उपस्थिति भयावह प्रतीत होती है।

> **अमृतादि-महाशक्ति-संवृता डाकिनीश्वरी ॥९९॥**

अमृता आदि शक्तियों से परिवृत होकर वे डाकिनीश्वरी हैं।

> **अनाहताब्ज-निलया श्यामाभा वदनद्वया ।**

माँ की ही एक विभूति राकिणी के रूप में वे अनाहत चक्र—हृदय-कमल—में निवास करती हैं। वे कृष्णप्रभा से दीप्त हैं और द्विमुखी स्वरूप में प्रकट होती हैं।

> **दंष्ट्रोज्ज्वलाऽक्ष-मालादि-धरा रुधिरसंस्थिता ॥१००॥**

उनकी उग्र दंष्ट्राएँ अज्ञान का नाश करती हैं, जबकि उनके करों में स्थित जपमाला निरन्तर स्मरण का प्रतीक है। वे रक्त-धातु में प्रतिष्ठित हैं।

> **कालरात्र्यादि-शक्त्यौघ-वृता स्निग्धौदनप्रिया ।**

कालरात्रि आदि प्रचण्ड शक्तियों से परिवृत होकर माँ तैल अथवा घृत में पचित आहुतियों में आनन्द लेती हैं।

> **महावीरेन्द्र-वरदा राकिण्यम्बा-स्वरूपिणी ॥१०१॥**

वीर और निर्भीक साधकों को वर प्रदान करती हुई वे राकिणी के रूप में प्रकट होती हैं।

> **मणिपूराब्ज-निलया वदनत्रय-संयुता ।**

मणिपूर चक्र में वे त्रिमुखी देवता के रूप में प्रकट होती हैं...

> **वज्रादिकायुधोपेता डामर्यादिभिरावृता ॥१०२॥**

वज्र तथा अन्य पावन आयुधों को धारण की हुईं, और वे डामरी तथा अपनी अन्य सहचारी शक्तियों से परिवृत रहती हैं।

> **रक्तवर्णा मांसनिष्ठा गुडान्न-प्रीत-मानसा ।**

वे अरुण वर्ण से दीप्त हैं और शरीर के मांस-धातु पर अधिष्ठान करती हैं। गुड़ से निर्मित मधुर अन्न में अनुरक्त होकर...

> **समस्तभक्त-सुखदा लाकिन्यम्बा-स्वरूपिणी ॥१०३॥**

वे साधक को गहन संतोष प्रदान करती हैं और लाकिनी के रूप में पूजित हैं।

> **स्वाधिष्ठानाम्बुज-गता चतुर्वक्त्र-मनोहरा ।**

स्वाधिष्ठान चक्र में वे सुंदर चतुर्मुखी देवी काकिनी के रूप में प्रकट होती हैं।

> **शूलाद्यायुध-सम्पन्ना पीतवर्णाऽतिगर्विता ॥१०४॥**

वे त्रिशूल तथा अन्य प्रतीकात्मक आयुध धारण करती हैं, जो स्वर्ण-पीत आभा से दीप्त हैं और गौरव से प्रकाशित होते हैं।

> **मेदोनिष्ठा मधुप्रीता बन्धिन्यादि-समन्विता ।**

वे शरीर के मेद तत्त्व पर अधिपत्य रखती हैं, मधुर पेय में आनंद लेती हैं, तथा बंधिनी और अपनी सहचरी शक्तियों से परिवेष्टित रहती हैं।

> **दध्यन्नासक्त-हृदया काकिनी-रूप-धारिणी ॥१०५॥**

दधि से किए गए अर्पण से वे विशेष रूप से प्रसन्न होती हैं, और इसी रूप में वे काकिनी के रूप में प्रकट होती हैं।

> **मूलाधाराम्बुजारूढा पञ्च-वक्त्राऽस्थि-संस्थिता ।**

मूलाधार चक्र में माँ ५ मुखों के साथ प्रकट होती हैं और शरीर के अस्थि-ढाँचे का शासन करती हैं।

> **अङ्कुशादि-प्रहरणा वरदादि-निषेव���ता ॥१०६॥**

अंकुश तथा अन्य आयुध धारण की हुईं, वे वरदा तथा अन्य सेवक शक्तियों से संयुक्त रहती हैं।

> **मुद्गौदनासक्त-चित्ता साकिन्यम्बा-स्वरूपिणी ।**

वे विशेष रूप से मुद्ग के अर्पण से प्रसन्न होती हैं और यहाँ शाकिनी के रूप में प्रकट होती हैं।

> **आज्ञा-चक्राब्ज-निलया शुक्लवर्णा षडानना ॥१०७॥**

अपनी अगली प्रकट अभिव्यक्ति, साकिनी के रूप में, वे आज्ञा चक्र में निवास करती हैं, जहाँ वे दीप्त श्वेत वर्ण और ६ मुखों के साथ प्रकट होती हैं।

> **मज्जासंस्था हंसवती-मुख्य-शक्ति-समन्विता ।**

वे अस्थि-मज्जा का अधिपत्य रखती हैं और हंसावती द्वारा सेवित रहती हैं।

> **हरिद्रान्नैक-रसिका हाकिनी-रूप-धारिणी ॥१०८॥**

हल्दी से निर्मित अन्न में आनंद लेती हुई, वहाँ वे हाकिनी के नाम से जानी जाती हैं।

> **सहस्रदल-पद्मस्था सर्व-वर्णोप-शोभिता ।**

सहस्रदल सहस्रार में वे दीप्तिमान, बहुवर्णी प्रभा के साथ प्रकाशमान होती हैं।

> **सर्वायुधधरा शुक्ल-संस्थिता सर्वतोमुखी ॥१०९॥**

समस्त प्रकार के असंख्य आयुधों से सुसज्जित होकर वे जनन तत्त्व पर अधिपत्य रखती हैं और एक-साथ सभी दिशाओं की ओर मुख किए रहती हैं।

> **सर्वौदन-प्रीतचित्ता याकिन्यम्बा-स्वरूपिणी ।**

वे समस्त प्रकार के अर्पणों को समान कृपा से स्वीकार करती हैं और इस लोक में याकिनी के नाम से जानी जाती हैं।

> **स्वाहा स्वधाऽमतिर्मेधा श्रुतिः स्मृतिरनुत्तमा ॥११०॥**

पवित्र यज्ञ में स्वाहा और स्वधा के उच्चारण के माध्यम से तप की ऊष्मा के रूप में उन्हीं का आवाहन किया जाता है, ताकि हमारी समस्त सीमाओं का दाह हो सके। सहस्रार चक्र में माँ अज्ञान और ज्ञान—दोनों रूपों में प्रकट होती हैं। वेदों और स्मृतियों के रूप में अभिव्यक्त होकर वे सर्वथा अनुपम रूप में प्रतिष्ठित रहती हैं।

> **पुण्यकीर्तिः पुण्यलभ्या पुण्यश्रवण-कीर्तना ।**

मंगल का स्रोत होने के कारण, केवल उनकी कृपा से ही हम उन्हीं तक पहुँच पाते हैं। वही कृपा हमारे मन को उनकी ओर उन्मुख करती है, उनके प्रति अभिलाषा को जागृत करती है, और हमें साधना की ओर आकृष्ट करती है। उसी कृपा से हमें उनके विषय में श्रवण का अवसर मिलता है, उनकी स्तुति करने की प्रेरणा जागती है।

> **पुलोमजार्चिता बन्ध-मोचनी बन्धुरालका ॥१११॥**

उसी कृपा से हमें भक्ति की ओर अंतःप्रेरणा उत्पन्न होती है, जैसे कभी इंद्र की पत्नी पुलोमजा के साथ हुआ था। वे हमें बंधन से मुक्त करती हैं, और साथ ही संसार में पूर्णतः उपस्थित रहकर जीवन का समग्र अनुभव करने की अनुमति भी देती हैं। प्रत्याहार और बाह्य संन्यास के मार्गों से भिन्न, यह स्वीकृतिपूर्ण पथ उनकी प्रचुर, प्रवाहित केशराशि द्वारा प्रतीकित है।

> **विमर्शरूपिणी विद्या वियदादि-जगत्प्रसूः ।**

सहस्रार में माँ विमर्श के रूप में स्थित रहती हैं—प्रकाश और ज्ञान की आत्मपरावर्तक शक्ति के रूप में।

> **सर्वव्याधि-प्रशमनी सर्वमृत्यु-निवारिणी ॥११२॥**

आकाश से आरंभ होने वाले पंचमहाभूतों से निर्मित विश्व की माता के रूप में, समस्त क्लेशों का निवारण करने और मृत्यु के बंधन से हमें मुक्त करने का सामर्थ्य केवल उन्हीं में निहित है।

> **अग्रगण्याऽचिन्त्यरूपा कलिकल्मष-नाशिनी ।**

वे आद्य तत्त्व हैं। मन के क्षेत्र का अतिक्रमण करते हुए, वे कलियुग में सर्वाधिक प्रबल रूप से व्याप्त अज्ञान-पाप का विनाश करती हैं। समस्त देवताओं की तेजस्वी प्रभा के रूप में वे प्रत्यक्ष अनुभूति में साक्षात् अनुभूत होती हैं।

> **कात्यायनी कालहन्त्री कमलाक्ष-निषेविता ॥११३॥**

वे उस शक्ति के रूप में प्रकट होती हैं जो स्वयं काल का लय कर देती है। निरंतरता और व्यवस्था के आभास को धारण करने वाले भगवान विष्णु भी माँ के भीतर ही शरण प्राप्त करते हैं।

> **ताम्बूल-पूरित-मुखी दाडिमी-कुसुम-प्रभा ।**

उनके ताम्बूल-पर्णों का सूक्ष्म सुवास वह गंध है जो समस्त सृष्टि को उनकी ओर आकृष्ट कर लेती है, अनार के पुष्प की अरुण कुसुम की भाँति दीप्तिमान। उनके कोमल, हरिणी-सदृश नेत्रों के माध्यम से हमारी यथार्थ-दृष्टि रूपांतरित हो जाती है।

> **मृगाक्षी मोहिनी मुख्या मृडानी मित्ररूपिणी ॥११४॥**

उनकी करुणामयी, मृग-समान दृष्टि और सौंदर्य हमें हमारे एकमात्र लक्ष्य का स्मरण कराते हैं—उन्हें आद्य और सनातन सत्य के रूप में जानना, शिव (मृड) की प्रिया भार्या के रूप में, जीवनदायिनी सूर्य के समान तेजस्वी रूप से प्रकाशमान।

> **नित्यतृप्ता भक्तनिधिर्नियन्त्री निखिलेश्वरी ।**

वे हमारे भीतर ही उस स्वरूप में स्थित हैं जो सदा संतुष्ट है और वही परम निधि हैं, जिसकी खोज हम आरंभ से करते आए हैं। हमारी सम्पूर्ण यात्रा के समय वे मौन रूप से हमारा मार्गदर्शन करती हैं और जीवन के प्रत्येक पक्ष पर अधिपत्य रखती हैं, साधना हेतु आवश्यक जीवन-स्थितियों की व्यवस्था करती हुई।

> **मैत्र्यादि-वासनालभ्या महाप्रलय-साक्षिणी ॥११५॥**

जगन्माता स्नेहपूर्ण मैत्री तथा करुणा, आनंद और समता जैसे अन्य गुणों के साथ अनुभूत होती हैं। वे महाप्रलय की मौन साक्षिणी हैं।

> **परा शक्तिः परा निष्ठा प्रज्ञानघन-रूपिणी ।**

माँ परम शक्ति हैं और साक्षात्कार की सर्वोच्च अवस्था हैं—संसार के चक्रों का अंतिम लक्ष्य। उनका स्वभाव ही शुद्ध चैतन्य का संकेन्द्रित विस्तार है।

> **माध्वीपानालसा मत्ता मातृका-वर्ण-रूपिणी ॥११६॥**

वे सहज आनंद में स्थित रहती हैं, दिव्य अमृत से उन्मत्त तथा अपने ही पूर्णत्व में निमग्न। समस्त वर्णों और नादों की अधिष्ठात्री के रूप में वे मंत्र, भाषा और स्वयं अभिव्यक्ति का स्रोत बनती हैं।

> **महाकैलास-निलया मृणाल-मृदु-दोर्लता ।**

वे चेतना की सर्वोच्च अवस्था—कैलास—में निवास करती हैं। वे हमारा अपने उन बाहुओं में आलिंगन करती हैं जो कमल-तंतु के समान कोमल और मृदुल हैं।

> **महनीया दयामूर्तिर्महासाम्राज्य-शालिनी ॥११७॥**

वे आराधना के लिए परम योग्या हैं। वे करुणा का साक्षात् स्वरूप हैं और अस्तित्व के महान आध्यात्मिक साम्राज्य पर सहज भाव से शासन करती हैं।

> **आत्मविद्या महाविद्या श्रीविद्या कामसेविता ।**

देवी माँ वह ज्ञान हैं जो आत्मा का प्रकाशन करता है और वह परम प्रज्ञा हैं जो मुक्ति प्रदान करती है। श्रीविद्या के रूप में वे भगवान कामेश्वर द्वारा आराधित हैं।

> **श्री-षोडशाक्षरी-विद्या त्रिकूटा कामकोटिका ॥११८॥**

वे षोडशाक्षरी मंत्र तथा पंचदशी मंत्र के त्रिकूट स्वरूप की साक्षात् अभिव्यक्ति हैं। वे शिव-स्वरूपा हैं।

> **कटाक्ष-किङ्करी-भूत-कमला-कोटि-सेविता ।**

माँ की एक मात्र दृष्टि असंख्य समृद्धि-देवताओं को आदेशित कर देती है।

> **शिरःस्थिता चन्द्रनिभा भालस्थेन्द्र-धनुःप्रभा ॥११९॥**

वे चेतना के शिखर पर चंद्रमा के समान दीप्त होती हैं और भ्रूमध्य _(आज्ञा चक्र)_ में इंद्रधनुष की भाँति प्रकाशमान होती हैं।

> **हृदयस्था रविप्रख्या त्रिकोणान्तर-दीपिका ।**

अपने भक्तों के हृदय _(अनाहत)_ में ध्यान हेतु निवास करती हुई, आद्यशक्ति मूलाधार के पवित्र त्रिकोण के भीतर अंत��प्रकाश के रूप में सूर्य-सदृश तेज से प्रकाशमान होती ह��ं।

> **दाक्षायणी दैत्यहन्त्री दक्षयज्ञ-विनाशिनी ॥१२०॥**

सती अथवा दक्षायणी के रूप में वे आसुरी प्रवृत्तियों का विनाश और कुपथगामी यज्ञों का लय करती हैं _(अर्थात् हमारी अपनी आदतजन्य वृत्तियों का, जो इंद्रियों के माध्यम से जीवन-शक्ति को बहिर्मुख करके क्षीण कर देती हैं_)।

> **दरान्दोलित-दीर्घाक्षी दर-हासोज्ज्वलन्-मुखी ।**

उनके विशाल, सर्वदर्शी नेत्र करुणा से कंपित रहते हैं। उनका मुख दीप्त स्मित से युक्त रहता है।

> **गुरुमूर्तिर्गुणनिधिर्गोमाता गुहजन्मभूः ॥१२१॥**

वे गुरु के रूप में प्रकट होती हैं, कृपा को सद्गुणों के भंडार के रूप में प्रदान करती हुई, जो कामधेनु की भाँति समस्त इच्छाओं की पूर्ति करता है। माया के रूप में वे हमारे सत्य स्वरूप को अज्ञान से आच्छादित भी करती हैं, उचित समय आने तक उसे गुप्त रहने देती हुई।

> **देवेशी दण्डनीतिस्था दहराकाश-रूपिणी ।**

समस्त दिव्यता की अधिष्ठात्री के रूप में, माँ न्याय के सिंहासन पर विराजमान होती हैं और आसुरी तथा दैवी गुणों के निरंतर संघर्ष में संतुलन और न्याय सुनिश्चित करती हैं। वे हमारे हृदय के सूक्ष्म आकाश में निवास करने वाली उपस्थिति हैं।

> **प्रतिपन्मुख्य-राकान्त-तिथि-मण्डल-पूजिता ॥१२२॥**

वे काल के रूप में स्वयं को आच्छादित भी करती हैं, चंद्रमा की परिवर्तित कलाओं में प्रकट होती हुई, और वे चंद्र पक्ष के समय विभिन्न नित्य देवियों के रूप में पूजित होती हैं।

> **कलात्मिका कलानाथा काव्यालाप-विनोदिनी ।**

माँ समस्त कलाओं—कलाओं एवं चंद्र-कलाओं—की अधिष्ठात्री और सार हैं। जब हमारी भाषा सुसंस्कृत, परिष्कृत और काव्यमयी हो जाती है, तब माँ प्रसन्न होती हैं।

> **सचामर-रमा-वाणी-सव्य-दक्षिण-सेविता ॥१२३॥**

जब हम उन्हें अपने ही हृदय में खोज लेते हैं, तब केवल धन या सूचना की खोज समाप्त हो जाती है। तब हमें स्पष्ट दिखता है कि रमा _(लक्ष्मी)_ और वाणी _(सरस्वती)_—दोनों उनकी सेवा में स्थित हैं।

> **आदिशक्तिरमेयाऽऽत्मा परमा पावनाकृतिः ।**

वे समस्त में व्याप्त आद्य शक्ति हैं—माप से परे और वर्णन से अतीत। स्वरूप से शुद्ध और परम, वे वही जगन्माता हैं जो...

> **अनेककोटि-ब्रह्माण्ड-जननी दिव्यविग्रहा ॥१२४॥**

अपने ही दिव्य शरीर के रूप में अनेक करोड़ों ब्रह्मांडों को जन्म देती हैं।

> **क्लींकारी केवला गुह्या कैवल्य-पददायिनी ।**

वे 'क्लीं' बीज की पवित्र शक्ति हैं। वे पूर्ण, सूक्ष्म और निर्गुण हैं। वे परम मोक्ष-पद प्रदान करती हैं।

> **त्रिपुरा त्रिजगद्वन्द्या त्रिमूर्तिस्त्रिदशेश्वरी ॥१२५॥**

त्रिपुरा के रूप में वे तीनों लोकों अथवा चेतना-अवस्थाओं में पूजित हैं और त्रिविध दिव्य कार्यों के सार-स्वरूप में उन पर अधिष्ठान करती हुई प्रकाशमान हैं।

> **त्र्यक्षरी दिव्य-गन्धाढ्या सिन्दूर-तिलकाञ्चिता ।**

वे पंचदशी के त्रिकूट रूप में पवित्र हैं और दिव्य सुवास तथा मंगलसूचक सिंदूर-तिलक से विभूषित हैं।

> **उमा शैलेन्द्रतनया गौरी गन्धर्व-सेविता ॥१२६॥**

पर्वतराज की पुत्री उमा के रूप में वे गौरवर्णी एवं दीप्तिमान गौरी स्वरूप में प्रकाशमान होती हैं, और दिव्य गायक-गण प्रेमपूर्वक उनकी सेवा करते हैं।

> **विश्वगर्भा स्वर्णगर्भाऽवरदा वागधीश्वरी ।**

वे सम्पूर्ण ब्रह्मांड का गर्भ हैं; उनके गर्भ का स्वर्णिम प्रकाश हमें धारण किए रहता है। वे हमारे भीतर की अधम आसुरी प्रवृत्तियों का दमन करती हैं। वे वाणी पर अधिपत्य रखती हैं।

> **ध्यानगम्याऽपरिच्छेद्या ज्ञानदा ज्ञानविग्रहा ॥१२७॥**

वे केवल ध्यान के माध्यम से अनंत रूपों में जानी जाती हैं। वे स्वयं ज्ञान के रूप में प्रकट होकर यथार्थ बोध प्रदान करती हैं।

> **सर्ववेदान्त-संवेद्या सत्यानन्द-स्वरूपिणी ।**

समस्त उपनिषदों की प्रज्ञा के रूप में वे सत्य और आनंद स्वरूपिणी के रूप में प्रकट की गई हैं।

> **लोपामुद्रार्चिता लीला-कॢप्त-ब्रह्माण्ड-मण्डला ॥१२८॥**

लोपामुद्रा द्वारा पूजित होकर वे क्रीडापूर्वक संपूर्ण ब्रह्मांडों की सृष्टि करती हैं।

> **अदृश्या दृश्यरहिता विज्ञात्री वेद्यवर्जिता ।**

वे हमारी इंद्रियों के द्वारा दृष्टिगोचर नहीं होतीं और समस्त रूपों से परे हैं। वे सब कुछ जानती हैं, किंतु स्वयं जानी नहीं जा सकतीं।

> **योगिनी योगदा योग्या योगानन्दा युगन्धरा ॥१२९॥**

योग के स्रोत शिव के साथ नित्य एकात्म होकर वे योग की शक्ति हैं, योग की दात्री हैं, और स्वयं योग की अवस्था हैं। योगानंद के रूप में स्थित रहकर वे काल के युगों को धारण और वहन करती हैं।

> **इच्छाशक्ति-ज्ञानशक्ति-क्रियाशक्ति-स्वरूपिणी ।**

माँ इच्छा, ज्ञान और क्रिया का साक्षात् स्वरूप हैं।

> **सर्वाधारा सुप्रतिष्ठा सदसद्रूप-धारिणी ॥१३०॥**

वे समस्त अस्तित्व का आधार हैं, व्यक्त और अव्यक्त—दोनों रूपों में सर्वत्र दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित।

> **अष्टमूर्तिरजाजैत्री लोकयात्रा-विधायिनी ।**

माँ अष्ट मातृकाओं के रूप में ८ स्वरूपों में प्रकट होती हैं। हमारे भीतर के अज्ञान का विनाश करते हुए वे हमारी यात्रा को मुक्ति की ओर ले जाती हैं।

> **एकाकिनी भूमरूपा निर्द्वैता द्वैतवर्जिता ॥१३१॥**

वे ही एकमात्र सत्ता हैं, यद्यपि हमारे चारों ओर विद्यमान विविधता के कारण ऐसा प्रतीत नहीं होता। तथापि वही समस्त विविधताओं में निहित अनंतता भी हैं। उनके भीतर या उनके विषय में कोई द्वैत नहीं है, और वे हमें समस्त द्वैत से परे ले जाने वाली हैं।

> **अन्नदा वसुदा वृद्धा ब्रह्मात्मैक्य-स्वरूपिणी ।**

वे समस्त पोषण, पालन और समृद्धि का स्रोत हैं। वे अत्यंत प्राचीन हैं, और ब्रह्म _(शाश्वत सत्य)_ तथा जीवात्मा की एकत्वता का प्रतिनिधित्व करती हैं। वे विराट हैं; वे शाश्वत ब्रह्म-ज्ञान हैं, और नित्य ब्रह्म से अभिन्न रूप से संबद्ध हैं।

> **बृहती ब्राह्मणी ब्राह्मी ब्रह्मानन्दा बलिप्रिया ॥१३२॥**

माँ सदा ब्रह्मानंद में निमग्न रहती हैं। वे अपने भक्तों के बलिदानात्मक अर्पणों से प्रेम करती हैं _(यहाँ बलिदान से आशय हमारी सीमाओं और नकारात्मक प्रवृत्तियों के समर्पण से है)_।

> **भाषारूपा बृहत्सेना भावाभाव-विवर्जिता ।**

वे भाषा, अभिव्यक्ति और संप्रेषण के प्रत्येक रूप में विद्यमान हैं। दिव्य शक्तियों और तत्त्वों की उनकी अलौकिक सेना अत्यंत विशाल है। वे अस्तित्व और अनस्तित्व के द्वैत से परे हैं।

> **सुखाराध्या शुभकरी शोभना सुलभा गतिः ॥१३३॥**

अपनी संतानों के लिए उनकी उपासना अत्यंत सरल है। वे केवल शुभता और अंतःसौंदर्य प्रदान करती हैं, और उन्हें प्राप्त करना सर्वाधिक सहज मार्ग है।

> **राज-राजेश्वरी राज्य-दायिनी राज्य-वल्लभा ।**

वे समस्त सम्राटों की परम सम्राज्ञी हैं, इस सृष्टि के प्रत्येक तत्त्व का शासन करती हुई। वही अकेली उन्हें उनके राज्य प्रदान करती हैं (यहाँ राज्य से आशय हमारे अपने जीवन सहित समस्त क्षेत्र हैं)। वे इन राज्यों—हमारे अंतर्जगतों—पर शासन करने में आनंद लेती हैं।

> **राजत्कृपा राजपीठ-निवेशित-निजाश्रिता ॥१३४॥**

उनकी असीम करुणा राजसी निधि के समान दीप्त होती है, और जोउनकी शरण ग्रहण करते हैं, वे उनकी कृपा के सिंहासन पर दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित हो जाते हैं।

> **राज्यलक्ष्मीः कोशनाथा चतुरङ्ग-बलेश्वरी ।**

वे राज्यलक्ष्मी हैं—समस्त राज्यों की समृद्धि और कल्याण—अर्थात् पंचकोशों में निहित हमारी सीमाओं से मुक्ति का स्वरूप। वे हमारे पाँचों कोशों (अन्नमय से आनंदमय कोश तक) की रक्षिका देवी हैं और इंद्रियों, मन, बुद्धि तथा अहंकार को विजित करने हेतु आवश्यक ४ सेनाओं की सेनापति हैं।

> **साम्राज्य-दायिनी सत्यसन्धा सागरमेखला ॥१३५॥**

साधना में हमारे निरंतर प्रयत्नों के साथ वे हमें अपने आधिपत्य का आशीर्वाद प्रदान करती हैं, जहाँ वे सत्य से परिणीत हैं। जिन उद्वेगों की उठती और गिरती तरंगों से हम गुजरते हैं, वे ही उनकी मेखला का रूप धारण करती हैं।

> **दीक्षिता दैत्यशमनी सर्वलोक-वशङ्करी ।**

वे समस्त दीक्षाओं की अधिष्ठात्री हैं, जो हमारे अंतःस्थित आसुरी प्रवृत्तियों का नाश करती हैं। परम अधिष्ठात्री के रूप में वे दैवी कृपा द्वारा समस्त लोकों का संचालन करती हैं।

> **सर्वार्थदात्री सावित्री सच्चिदानन्द-रूपिणी ॥१३६॥**

वे अपनी संतानों की समस्त कामनाओं की पूर्ति करती हैं _(उनकी भक्ति से स्वयं कामनाएँ भी शुद्ध हो जाती हैं)_। वे ब्रह्मांड की स्रष्ट्री हैं और शुद्ध सत्, चित् तथा आनंद—इन तीनों का साक्षात् स्वरूप हैं।

> **देश-कालापरिच्छिन्ना सर्वगा सर्वमोहिनी ।**

वे काल और देश की समस्त सीमाओं से परे हैं, अतः सर्वत्र विद्यमान हैं। उनकी कृपा का मायामय प्रभाव समस्त प्राणियों को मोहित कर लेता है।

> **सरस्वती शास्त्रमयी गुहाम्बा गुह्यरूपिणी ॥१३७॥**

वे प्रज्ञा की देवी तथा समस्त पवित्र ज्ञान एवं शास्त्रों का सार-स्वरूप हैं। वे हृदय-गुहा में निवास करने वाली अंतःस्थ सत्ता हैं, वहाँ अत्यंत गुप्त रूप से स्थित, सर्वथा अगोचर।

> **सर्वोपाधि-विनिर्मुक्ता सदाशिव-पतिव्रता ।**

वे समस्त सीमाओं, पहचानों और अवस्थाओं से मुक्त हैं और भगवान सदाशिव की नित्य निष्ठ भार्या हैं।

> **सम्प्रदायेश्वरी साध्वी गुरुमण्डल-रूपिणी ॥१३८॥**

वे समस्त आध्यात्मिक परंपराओं और पावन कुलों की संरक्षिका हैं। वे साक्षात् शुभ-स्वरूपा हैं। वे शक्ति प्रणव ‘ईं’ भी हैं, जो शक्ति और शिव के ऐक्य का प्रतिनिधित्व करती है। वे प्रत्येक परंपरा में समस्त गुरु-मंडल के पीछे कार्य करने वाली शक्ति हैं।

> **कुलोत्तीर्णा भगाराध्या माया मधुमती मही ।**

वे समस्त बंधनों से परे हैं—हर परंपरा और प्रत्येक विधि से अतीत। वे दीप्तिमान सूर्य में, समस्त लोकों के अंतःप्रकाश के रूप में निवास करती हैं और वहीं आराधित होती हैं। वे अपनी ही मायाशक्ति हैं, पर उनकी माधुर्यपूर्ण, अमृतमयी स्वरूपता के कारण हम उनकी माया में अनायास ही बँध जाते हैं। पृथ्वी के समान, वे समस्त का समान आधार हैं।

> **गणाम्बा गुह्यकाराध्या कोमलाङ्गी गुरुप्रिया ॥१३९॥**

वे दिव्य गणों की जननी हैं—वे गण जो हमारे जीवन पर कार्य करने वाले विविध प्रभावों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी उपासना सूक्ष्म और रहस्यमय विधियों से गुप्त रूप में की जाती है। उनका स्वरूप कोमल और करुणा से परिपूर्ण है, और वे समस्त सिद्धों को अत्यंत प्रिय हैं।

> **स्वतन्त्रा सर्वतन्त्रेशी दक्षिणामूर्ति-रूपिणी ।**

वे पूर्णतः स्वाधीन हैं, किसी भी नियम या सीमा से न बंधी हुईं; वे समस्त पवित्र शास्त्रों और आध्यात्मिक विद्याओं की साक्षात् मूर्ति और अधिष्ठात्री देवी हैं।

> **सनकादि-समाराध्या शिवज्ञान-प्रदायिनी ॥१४०॥**

वे मौन और निराकार दक्षिणामूर्ति हैं, जिनकी प्राचीन ऋषि सनक तथा उनके भ्राता गहन भक्ति से उपासना करते हैं। वे शिव-तत्त्व का परम ज्ञान प्रदान करती हैं—वह प्रज्ञा जो सीधे मुक्ति की ओर ले जाती है।

> **चित्कलाऽऽनन्द-कलिका प्रेमरूपा प्रियङ्करी ।**

माँ हमारी सीमित चेतना में निहित शाश्वत चैतन्य की वही चिनगारी हैं, जिसके भीतर वे दिव्य आनंद के कली-स्वरूप में निवास करती हैं। वे निःस्वार्थ प्रेम का साक्षात् स्वरूप हैं। अपने प्रेम से ही वे हमारे जीवन में वह सब प्रकट करती हैं जो हमें प्रिय है।

> **नामपारायण-प्रीता नन्दिविद्या नटेश्वरी ॥१४१॥**

वे अपने पवित्र नामों के निष्कपट जप और मनन में आनंद लेती हैं। वे नंदी विद्या की अधिष्ठात्री देवी हैं, जो पंचदशी मंत्र का एक भेद रूप है। वे परम नर्तक भगवान नटराज की शक्ति के रूप में ललित भाव से नृत्य करती हैं।

> **मिथ्या-जगदधिष्ठाना मुक्तिदा मुक्तिरूपिणी ।**

वे निरंतर परिवर्तित होती मायामय सृष्टि को धारण करने वाली गुप्त आधारशिला हैं। वे मोक्ष प्रदान करने वाली हैं और स्वयं मोक्ष स्वरूपा हैं।

> **लास्यप्रिया लयकरी लज्जा रम्भादिवन्दिता ॥१४२॥**

वे माया के आनंदपूर्ण, ललित नृत्य से प्रेम करती हैं, और जब सृष्टि का लय होता है, तब समस्त को पुनः अपने भीतर समाहित कर लेती हैं। वे माया के आवरण में लज्जाभाव से स्वयं को आच्छादित रखती हैं। वे रंभा आदि दिव्य अप्सराओं तथा स्वर्गीय कन्याओं की अधिष्ठात्री देवी हैं, जो उनकी अनुपम कृपा के कारण पूजित हैं।

> **भवदाव-सुधावृष्टिः पापारण्य-दवानला ।**

वे अमृतमयी शीतल वर्षा हैं जो जीवन की दावानल को शान्त करती हैं। वे वही प्रचण्ड अग्नि भी हैं जो हमारे अज्ञान-वन को भस्म कर देती हैं।

> **दौर्भाग्य-तूलवातूला जराध्वान्त-रविप्रभा ॥१४३॥**

वे वह प्रबल पवन हैं जो दुर्भाग्य की ग्रन्थियों को उड़ा देता है, और वे सूर्य के समान प्रकाशमान होकर हमारे क्षय के मायामय अंधकार का नाश करती हैं।

> **भाग्याब्धि-चन्द्रिका भक्त-चित्तकेकि-घनाघना ।**

वे पूर्णिमा का चंद्र हैं, जो महान सौभाग्य की तरंगों को उद्वेलित करता है। वे गहन वर्षा-मेघ हैं, जो हमारे मयूर-सदृश हृदयों को आनंद से भर देते हैं।

> **रोगपर्वत-दम्भोलिर्मृत्युदारु-कुठारिका ॥१४४॥**

वे वह महावज्र हैं जो रोगों के पर्वत को विचलित करके ढहा देता है। वे वह परशु हैं जो मृत्यु-वृक्ष का छेदन कर देता हैं।

> **महेश्वरी महकाली महाग्रासा महाशना ।**

वे महेश्वरी हैं—समस्त की महान, परम अधिष्ठात्री और भगवान शिव की भार्या। वे महाकाली हैं—महान देवी, जो स्वयं काल हैं, और महाग्रास के रूप में सब कुछ निगल लेने वाली हैं। वे काल और देश—दोनों का भक्षण कर लेती हैं।

> **अपर्णा चण्डिका चण्डमुण्डासुर-निषूदिनी ॥१४५॥**

वे अपर्णा हैं, जो घोर तपस्या में स्थित रहते हुए भी लोकों का धारण-पोषण करती हैं _(माँ पार्वती ने भगवान महादेव को प्राप्त करने हेतु अपनी तपश्चर्या में एक पत्ते का भी सेवन त्याग दिया था)_।

अपर्णा वे ही हैं जो ऋण रूप कर्म-बंधन का शमन करती हैं। वे उग्र चण्डिका हैं—चण्ड और मुण्ड नामक दैत्यों का संहार करने वाली प्रचण्ड शक्ति।

> **क्षराक्षरात्मिका सर्व-लोकेशी विश्वधारिणी ।**

देवी माँ क्षर एवं अक्षर—दोनों ही हैं, क्योंकि समस्त जीव उन्हीं की अभिव्यक्तियाँ हैं। वे समस्त लोकों की अधिष्ठात्री एवं ब्रह्मांड की धारिका हैं।

> **त्रिवर्गदात्री सुभगा त्र्यम्बका त्रिगुणात्मिका ॥१४६॥**

वे जीवन के त्र���विध पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ और काम—प्रदान करती हैं, जब ह��� उनकी इच्छा के अनुरूप स्थित होते हैं _(जो स्वाभाविक रूप से हमें चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्ष की ओर ले जाता है)_।

वे समृद्धि की देवी हैं। उनके ३ नेत्र—सूर्य, चंद्र और अग्नि—उन्हें त्र्यम्बका नाम प्रदान करते हैं। वे तीनों गुणों—सत्त्व, रजस और तमस—का स्रोत हैं।

> **स्वर्गापवर्गदा शुद्धा जपापुष्प-निभाकृतिः ।**

माँ स्वर्ग—संतोष की अवस्था—तथा अपवर्ग—संसार के चक्रों से मुक्ति—प्रदान करती हैं। वे शुद्ध हैं, और उनका स्वरूप उज्ज्वल रक्तवर्ण जपा-पुष्पों के समान दीप्तिमान है।

> **ओजोवती द्युतिधरा यज्ञरूपा प्रियव्रता ॥१४७॥**

वे ओजस _(जीवन-रस)_ का साक्षात् स्वरूप हैं। वे तेजस्विता से सम्पन्न हैं। देवी स्वयं बलिदान, अर्थात् त्याग, का स्वरूप हैं। वे धर्मपथ पर स्थित रहने हेतु हमारी साधना में किए गए पवित्र व्रतों से अत्यंत प्रसन्न होती हैं।

> **दुराराध्या दुराधर्षा पाटली-कुसुम-प्रिया ।**

वे समझने या उपासना करने में अत्यंत कठिन हैं, और उन पर अधिकार पाना सर्वथा असंभव है। लाल पाटल पुष्पों से की गई उनकी पूजा में वे विशेष आनंद लेती हैं।

> **महती मेरुनिलया मन्दार-कुसुम-प्रिया ॥१४८॥**

आद्य तत्त्व _(महत्)_ होने के कारण वे राजसी हैं तथा मेरु पर्वत पर निवास करती हैं। वे मन्दार पुष्पों _(स्वर्गीय पारिजात वृक्ष के पुष्पों)_ से की गई उपासना को भी प्रिय मानती हैं।

> **वीराराध्या विराड्रूपा विरजा विश्वतोमुखी ।**

वे वीर साधकों द्वारा पूजी जाती हैं। उनका स्वरूप विराट और विश्वात्मक है, समस्त मलिनताओं से मुक्त, और सभी दिशाओं की ओर मुख किया हुआ।

> **प्रत्यग्रूपा पराकाशा प्राणदा प्राणरूपिणी ॥१४९॥**

वे हमारे भीतर का आत्मतत्त्व हैं, आकाश में व्याप्त असीम अवकाश हैं, जीवन को प्रदान करने वाली और स्वयं जीवन का सार-स्वरूप हैं।

> **मार्ताण्ड-भैरवाराध्या मन्त्रिणीन्यस्त-राज्यधूः ।**

वे मार्तण्ड भैरव (शिव के सूर्य\-स्वरूप) द्वारा पूजित हैं। उन्होंने समस्त अधिपत्यों का शासन अपनी मंत्री \- मन्त्रिणी \- को सौंपा है।

> **त्रिपुरेशी जयत्सेना निस्त्रैगुण्या परापरा ॥१५०॥**

मन्त्रिणी के मार्गदर्शन से हम श्री चक्र के सर्वाशापरिपूरक आवरण में त्रिपुरेशी रूप में माँ की कृपा प्राप्त करते हैं। देवी की सदा विजयी सेना हमें त्रिगुणों की सीमाओं से मुक्त होने में आधार देती है। माँ उच्च और निम्न, अथवा सापेक्ष और निरपेक्ष—इन सभी भेदों से परे हैं।

> **सत्य-ज्ञानानन्द-रूपा सामरस्य-परायणा ।**

माँ सत्य, ज्ञान और आनंद स्वरूपा हैं। वे समता, एकत्व, सामंजस्य और संतुलन के समान-रस से युक्त हैं, समस्त विविधताओं के मध्य।

> **कपर्दिनी कलामाला कामधुक् कामरूपिणी ॥१५१॥**

वे कपर्दिनी हैं—अपने सहचर भगवान कपर्द, अर्थात् जटाधारी शिव के समान जटाओं से अलंकृत। वे समस्त ६४ कलाओं की माला से विभूषित हैं। कामना-पूर्ति करने वाली माता के रूप में वे दिव्य गौ कामधेनु हैं। और साथ ही वे हमारी कामनाओं एवं आकांक्षाओं का भी सार-स्वरूप हैं।

> **कलानिधिः काव्यकला रसज्ञा रसशेवधिः ।**

माता समस्त कौशलों और काव्य की निधि हैं। वे जीवन के समस्त रसों को—जैसे हम उन्हें जीते हैं—भलीभाँति जानने वाली हैं।

> **पुष्टा पुरातना पूज्या पुष्करा पुष्करेक्षणा ॥१५२॥**

इन समस्त रसों, अर्थात् जीवनानुभवों की महासागर होकर वे आदिकाल से हमें पोषित करने वाली एकमात्र सत्ता हैं। वही एकमात्र उपासना-योग्य हैं। वे पूर्ण विकसित कमल के समान हैं, जिनके मनोहर नेत्र कमल-पत्रों के सदृश हैं।

> **परंज्योतिः परंधाम परमाणुः परात्परा ।**

वे परम ज्योति हैं, जो समस्त ब्रह्मांड को प्रकाशित करती हैं; वे परम धाम हैं; वे अणु से भी सूक्ष्म और महानतमों में भी परम हैं।

> **पाशहस्ता पाशहन्त्री परमन्त्र-विभेदिनी ॥१५३॥**

वे वह पाश धारण करती हैं जो हमें संसार से बाँधता है, और वे ही उसकी विनाशिका भी हैं। वे इस भ्रांति को भंग करती हैं कि दूसरों के कर्म _(पर-मंत्र)_ ही हमारे दुःख का कारण होते हैं।

> **मूर्ताऽमूर्ताऽनित्यतृप्ता मुनिमानस-हंसिका ।**

वे साकार और निराकार—दोनों हैं, और हमारे भीतर जो कुछ भी नश्वर है उसके अर्पण से प्रसन्न होती हैं। वे विवेक की हंसी हैं, जो ज्ञानीजनों के मन में विचरती हैं।

> **सत्यव्रता सत्यरूपा सर्वान्तर्यामिनी सती ॥१५४॥**

वे सत्य का व्रत हैं, वे स्वयं सत्य हैं। वे प्रत्येक के अंतःकरण में निवास करने वाली अधिष्ठात्री हैं।

> **ब्रह्माणी ब्रह्मजननी बहुरूपा बुधार्चिता ।**

वे ब्राह्मणी हैं—ब्रह्मा की शक्ति—और वे स्वयं ब्रह्म हैं। वे वही माता हैं जो असंख्य रूपों में अपनी ही सृष्टि बन जाती हैं। सृष्टि को जन्म देने के कारण वे विवेकशील ज्ञानीजनों द्वारा पूजित हैं।

> **प्रसवित्री प्रचण्डाऽऽज्ञा प्रतिष्ठा प्रकटाकृतिः ॥१५५॥**

उनका उग्र आदेश ही ब्रह्मांड को सुव्यवस्थित रखता है। वे समस्त का आधार हैं, क्योंकि सभी गुण उन्हीं के रूप में प्रकट होते हैं।

> **प्राणेश्वरी प्राणदात्री पञ्चाशत्पीठ-रूपिणी ।**

वे हमारे प्राण—अर्थात् जीवन-शक्ति—पर अधिपत्य रखती हैं, और वे ही अकेली हमें प्राण-शक्ति की कृपा प्रदान करती हैं तथा उसका पोषण करती हैं। वे वाणी के ५० मूल नादों—संस्कृत वर्णमाला के ५० अक्षरों—में निवास करती हैं। उनके ५० पावन उपासना-केन्द्र भी हैं (शक्तिपीठ)।

> **विश‍ृङ्खला विविक्तस्था वीरमाता वियत्प्रसूः ॥१५६॥**

वे किसी भी बंधन से आबद्ध नहीं हैं और एकांत में स्थित पवित्र, निर्जन स्थानों में तथा अपने भक्तों के शुद्ध हृदयों में निवास करती हैं। वे वीरों की जननी हैं। वे स्वयं अनंत आकाश की उद्गम-शक्ति हैं और इस प्रकार स्वतंत्रता का साक्षात् स्वरूप हैं।

> **मुकुन्दा मुक्तिनिलया मूलविग्रह-रूपिणी ।**

मुकुंदा के नाम से विख्यात, वे परम मोक्ष की प्रदात्री और स्वयं उसका धाम हैं। वे समस्त अन्य शक्तियों की आधारशिला हैं, और सब कुछ उन्हीं से उद्भूत होता है।

> **भावज्ञा भवरोगघ्नी भवचक्र-प्रवर्तिनी ॥१५७॥**

उन्हें अपने भक्तों के हृदय का गहन अंतर्बोध है, इसलिए वे संसार-रोगों का उन्मूलन करके हमें मुक्त करती हैं। तथापि, वे ही संसार में उत्क्रांति के चक्र को भी प्रवर्तित करती हैं।

> **छन्दःसारा शास्त्रसारा मन्त्रसारा तलोदरी ।**

वे समस्त छन्दों, वेदों—समस्त शास्त्रों और ग्रंथों—तथा सभी मंत्रों का हृदय हैं। तथापि वे अपनी सूक्ष्मता में अपनी सुकुमार कटि के समान गुप्त रूप से स्थित रहती हैं।

> **उदारकीर्तिरुद्दामवैभवा वर्णरूपिणी ॥१५८॥**

शास्त्रों के रूप में उनकी कीर्ति असीम है, उनकी महिमा समस्त सीमाओं का अतिक्रमण करती है, और वे स्वयं वर्णमाला के अक्षरों के रूप में प्रकट होती हैं।

> **जन्ममृत्यु-जरातप्त-जनविश्रान्ति-दायिनी ।**

वे जन्म, जरण एवं मृत्यु के निरंतर चक्रों से विराम प्रदान करती हैं।

> **सर्वोपनिष-दुद्-घुष्टा शान्त्यतीत-कलात्मिका ॥१५९॥**

उपनिषदों में उनकी सर्वव्यापक यथार्थ के रूप में स्तुति की गई है। वे शांति से भी परे हैं।

> **गम्भीरा गगनान्तस्था गर्विता गानलोलुपा ।**

वे अगम्य हैं, आकाश के पर��� विस्तार तक व्याप्त, राजसी गौरव से दीप्त, और अपनी ही सृष्टि के नाद-संगीत में आनंद लेने वाली हैं।

> **कल्पना-रहिता काष्ठाऽकान्ता कान्तार्ध-विग्रहा ॥१६०॥**

समस्त कल्पना से परे, माँ ही परम लक्ष्य हैं। वे अज्ञान से उत्पन्न हमारे समस्त पापों का अंत करती हैं। वे अपने पति भगवान शिव के अर्धांग स्वरूप का साक्षात् अवतार हैं।

> **कार्यकारण-निर्मुक्ता कामकेलि-तरङ्गिता ।**

कारण एवं परिणाम के चक्र से मुक्त रहकर वे क्रीडामय आनंद और दिव्य कामना से परिपूर्ण रहती हैं।

> **कनत्कनक-ताटङ्का लीला-विग्रह-धारिणी ॥१६१॥**

स्वर्णकुण्डलों से अलंकृत होकर, अपने आनंद अथवा लीला से वे सुकुमार भाव से अस्थायी रूपों को धारण करती हैं।

> **अजा क्षयविनिर्मुक्ता मुग्धा क्षिप्र-प्रसादिनी ।**

अजन्मा, क्षय और विनाश से परे, वे अपने मोहक सौंदर्य से आकर्षित करती हैं। वे सहज ही प्रसन्न हो जाती हैं और शीघ्र अपनी कृपा प्रदान करती हैं।

> **अन्तर्मुख-समाराध्या बहिर्मुख-सुदुर्लभा ॥१६२॥**

अंतःपूजन द्वारा वे अत्यंत सुलभ हैं, किंतु बाह्य ध्यान से उन्हें प्राप्त करना दुर्लभ है।

> **त्रयी त्रिवर्गनिलया त्रिस्था त्रिपुरमालिनी ।**

जगन्माता तीनों वेदों में साक्षात्कार के रूप में प्रकट होती हैं। वे जीवन के ३ भौतिक पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ और काम—हैं, और तीनों लोकों में व्याप्त होकर चेतना के ३ पुरों को त्रिपुरमालिनी के रूप में अलंकृत करती हैं।

> **निरामया निरालम्बा स्वात्मारामा सुधासृतिः ॥१६३॥**

समस्त रूपों में परिणत और रोगरहित होकर स्वाधीन माँ केवल अपने ही स्वरूप में आनंद लेती हैं, और हमें भी उनके पदचिह्नों पर चलने की प्रेरणा देती हैं। वे मधुर अमृत की प्रवहमान धारा हैं, जो समस्त अस्तित्व का पोषण करती है।

> **संसारपङ्क-निर्मग्न-समुद्धरण-पण्डिता ।**

माता संसार के दलदल में डूबते हुए अपने भक्तों का उद्धार करने में पूर्णतया निपुण हैं।

> **यज्ञप्रिया यज्ञकर्त्री यजमान-स्वरूपिणी ॥१६४॥**

हमारे द्वारा अपनी सीमाओं को जीवन-यज्ञ की पवित्र अग्नि में अर्पित करने पर वे अत्यंत प्रसन्न होती हैं, जहाँ हमें यह साक्षात्कार होता है कि वे ही यज्ञ की कर्त्री भी हैं और वे ही उसके आयोजन की अधिष्ठात्री भी हैं।

> **धर्माधारा धनाध्यक्षा धनधान्य-विवर्धिनी ।**

माँ धर्म का आधार हैं। वे परम कोशाध्यक्ष के रूप में अर्थ पर अधिष्ठान करती हैं, अपनी संतानों को धन और अन्न का प्रदान तथा संवर्धन करती हुई।

> **विप्रप्रिया विप्ररूपा विश्वभ्रमण-कारिणी ॥१६५॥**

वे उन विवेकशील साधकों से प्रेम करती हैं जो स्वयं को उनके ही स्वरूप में जानते हैं। जगन्माता ही ब्रह्मांड के चक्र को आवर्त गति में प्रवर्तित करती हैं।

> **विश्वग्रासा विद्रुमाभा वैष्णवी विष्णुरूपिणी ।**

चक्र के अंत में वही माता समस्त ब्रह्मांड को अपने भीतर समाहित कर लेती हैं। वे प्रवाल-सदृश अरुण प्रभा से दीप्त हैं, जो संसार के अनिवार्य आकर्षण का द्योतन करती है। वे ब्रह्मांड के चक्र का संचालन करती हैं, और इस प्रकार वे संरक्षण-शक्ति का साक्षात् स्वरूप और वास्तव में स्वयं भगवान विष्णु हैं।

> **अयोनिर्योनिनिलया कूटस्था कुलरूपिणी ॥१६६॥**

किसी भी गर्भ से उत्पन्न न होकर वे समस्त की उत्पत्ति के लिए गर्भस्वरूपा हैं। अपने स्वभाव में वे अविकारी हैं, और कौल परंपरा की अधिष्ठात्री देवी हैं।

> **वीरगोष्ठीप्रिया वीरा नैष्कर्म्या नादरूपिणी ।**

माँ वीरों—माँ के साहसी उपासकों—के समागम में आनंद लेती हैं, क्योंकि उन्हीं के भीतर वे निर्भय शक्ति के रूप में स्वयं प्रकट होती हैं। समस्त कर्मों से मुक्त रहकर वे सृष्टि का आद्य स्पन्दन हैं _(माँ तारा के रूप में)_।

> **विज्ञानकलना कल्या विदग्धा बैन्दवासना ॥१६७॥**

वे शाश्वत ज्ञान का साक्षात्कार और समस्त कलाओं में निहित प्रज्ञा हैं। वे सदा बिन्दु—अर्थात् हमारी चेतना के केन्द्र—में विराजमान रहती हैं।

> **तत्त्वाधिका तत्त्वमयी तत्त्वमर्थ-स्वरूपिणी ।**

वे समस्त तत्त्वों का अतिक्रमण भी ���रती हैं और साथ ही उन्हीं के रूप में प्रकट भी होती हैं। महावाक्य "तत् त्वम् असि" में वे अद्वैत सत्ता हैं।

> **सामगानप्रिया सौम्या सदाशिव-कुटुम्बिनी ॥१६८॥**

वे सामवेद के मधुर स्वरों में निहित गान से आनंदित होती हैं, कोमल करुणा का प्रसार करती हैं, और सदाशिव की प्रिया सहधर्मिणी हैं।

> **सव्यापसव्य-मार्गस्था सर्वापद्विनिवारिणी ।**

वे उपासना के दाहिने (सव्य) और बाएँ (अपसव्य)—दोनों ही मार्गों में निवास करती हैं, और इस प्रकार कौन-सा मार्ग श्रेष्ठ है—इस प्रश्न का एक बार में समाधान कर देती हैं। वे अपने भक्तों के दुर्भाग्य और आपदाओं का निवारण करती हैं।

> **स्वस्था स्वभावमधुरा धीरा धीरसमर्चिता ॥१६९॥**

वे स्वयं में, अपनी मधुर शांति में, दृढ़ रूप से प्रतिष्ठित हैं। वे हमारे भीतर की प्रज्ञा-माता हैं, और सदा विवेकशील जनों द्वारा पूजित होती हैं।

> **चैतन्यार्घ्य-समाराध्या चैतन्य-कुसुमप्रिया ।**

देवी माँ की उपासना हमारी संपूर्ण चेतना को आहुति के रूप में अर्पित करके की जाती है। हमारी चेतना के इसी पुष्प से की गई उपासना उन्हें अत्यंत प्रिय है।

> **सदोदिता सदातुष्टा तरुणादित्य-पाटला ॥१७०॥**

वे नित्य महिमा से दीप्त हैं और सदा संतुष्ट रहती हैं। उनका स्वरूप उदय होते सूर्य की यौवनपूर्ण अरुण आभा से प्रकाशमान हैं।

> **दक्षिणा-दक्षिणाराध्या दरस्मेर-मुखाम्बुजा ।**

वे दक्षिण और वाम—दोनों ही मार्गों द्वारा उपासित हैं, और उनके कमल-मुख का स्मित सभी के लिए समान रूप से खिल उठता है।

> **कौलिनी-केवलाऽनर्घ्य-कैवल्य-पददायिनी ॥१७१॥**

कौल साधक के लिए वे शुद्ध ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी हैं, जो अमूल्य मुक्ति का वरदान प्रदान करती हैं।

> **स्तोत्रप्रिया स्तुतिमती श्रुति-संस्तुत-वैभवा ।**

वे भक्ति-स्तुतियों और स्तवों में आनंद लेती हैं, और समस्त स्तुति की वास्तव में वे ही एकमात्र अधिकारी हैं। वे वही हैं जिनकी महिमा का गान वेद करते हैं।

> **मनस्विनी मानवती महेशी मङ्गलाकृतिः ॥१७२॥**

बुद्धि की स्रोत होने के कारण क्षुद्रता से ऊपर उठे उदात्त चित्त वाले जन उन्हें परम अधिष्ठात्री, मंगलस्वरूपा जगन्माता के रूप में पूजते हैं।

> **विश्वमाता जगद्धात्री विशालाक्षी विरागिणी ।**

समस्त ब्रह्मांड की माता और उसकी एकमात्र धारिका के रूप में, उनके विशाल कमल-नेत्र सब कुछ देखते हैं और सांसारिक माया से विरक्ति का प्रकाश प्रसारित करते हैं।

> **प्रगल्भा परमोदारा परामोदा मनोमयी ॥१७३॥**

साहसी और दृढ़ संकल्पी होते हुए भी परम उदार और आनंदमयी, वे विश्व-मन हैं, और हमारे मन को भी अपने समान गुणों से परिपूर्ण कर देती हैं।

> **व्योमकेशी विमानस्था वज्रिणी वामकेश्वरी ।**

आकाश को अपनी प्रवाहित केशराशि के रूप में धारण किए, और दिव्य रथ श्री चक्र पर आसीन होकर, वे वाममार्ग की अनुग्रहस्वरूपा देवी के रूप में आध्यात्मिक शक्ति की वज्रस्वरूपा हैं।

> **पञ्चयज्ञ-प्रिया पञ्च-प्रेत-मञ्चाधिशायिनी ॥१७४॥**

वे चेतना की महाग्नि में ५ इंद्रियों के माध्यम से संपन्न ५ महायज्ञों को अत्यंत प्रिय मानती हैं। जगन्माता ५ शवों—ब्रह्मा, विष्णु, शिव, ईशान और सदाशिव—के सिंहासन पर शयन करती हैं।

> **पञ्चमी पञ्चभूतेशी पञ्च-संख्योपचारिणी ।**

वे पाँचवें शव—सदाशिव—की भार्या हैं। वे पंचमहाभूतों द्वारा पूजित हैं और पंचविध अर्पणों की अधिष्ठात्री देवी हैं।

> **शाश्वती शाश्वतैश्वर्या शर्मदा शम्भुमोहिनी ॥१७५॥**

शाश्वत और अखंड ऐश्वर्य से युक्त होकर वे गहन आनंद का वरदान देती हैं और स्वयं भगवान शिव को भी मोहित करने का सामर्थ्य रखती हैं।

> **धराधरसुता धन्या धर्मिणी धर्मवर्धिनी ।**

वे वही पृथ्वी हैं जिस पर समस्त कुछ स्थित है। वे हिमालय पर्वतों की पुत्री हैं, जो पृथ्वी को धारण करते हैं—मंगल का साक्षात् स्वरूप—और इस प्रकार वे अपने भक्तों में धर्म को प्रेरित और सुदृढ़ करती हैं।

> **लोकातीता गुणातीता सर्वातीता शमात्मिका ॥१७६॥**

वे समस्त लोकों, समस्त गुणों और समस्त वस्तुओं से परे शांति-स्वरूपा के रूप में स्थित हैं।

> **बन्धूक-कुसुमप्रख्या बाला लीलाविनोदिनी ।**

माँ बंधूक पुष्प के अरुण वर्ण के समान दीप्त हैं, जो सौंदर्य, प्रेम और कामना का प्रतीक है। वे बाला हैं—बालसुलभ निष्कलुषता के साथ आनंदपूर्वक क्रीड़ा करने वाली—और लीला-विनोदिनी हैं, जो अस्तित्व की सृष्टि करने वाली अपनी दिव्य लीला में रमण करती हैं।

> **सुमङ्गली सुखकरी सुवेषाढ्या सुवासिनी ॥१७७॥**

शुभता और शाश्वत संतोष की प्रदात्री होकर, वे भगवान महादेव की नित्य भार्या के रूप में दिव्य सौंदर्य से अलंकृत हैं।

> **सुवासिन्यर्चन-प्रीताऽऽशोभना शुद्धमानसा ।**

माँ सुवासिनियों—भगवान शिव को पूर्णतः समर्पित साधकों—की उपासना से अत्यंत प्रसन्न होती हैं। वे सदा दीप्तिमान हैं, क्योंकि वे शुद्ध हैं और मन की संस्कारात्मक बंधनाओं से मुक्त हैं।

> **बिन्दु-तर्पण-सन्तुष्टा पूर्वजा त्रिपुराम्बिका ॥१७८॥**

वे हमारी चेतना के केंद्रीय बिन्दु में किए गए अर्पणों से संतुष्ट होती हैं। सर्वप्रथम अभिव्यक्ति के रूप में वे सर्वाधिक प्राचीन हैं। वे समस्त त्रयों की अधिष्ठात्री देवी हैं—जैसे ३ लोक, चेतना की ३ अवस्थाएँ, ३ गुण आदि।

> **दशमुद्रा-समाराध्या त्रिपुराश्री-वशङ्करी ।**

देवी की उपासना १० पवित्र मुद्राओं के माध्यम से की जाती है। वे श्रीचक्र के पंचम आवरण की अधिष्ठात्री देवी हैं, त्रिपुरश्री वशंकरी के रूप में।

> **ज्ञानमुद्रा ज्ञानगम्या ज्ञानज्ञेय-स्वरूपिणी ॥१७९॥**

वे ज्ञानमुद्रा हैं—परम प्रज्ञा की मुद्रा। वे ज्ञानगम्या हैं, अर्थात् ज्ञान और विवेक के द्वारा प्राप्त होने वाली। और वे स्वयं ज्ञान का स्वरूप तथा जानने की प्रक्रिया हैं, जो ध्यान में उनकी खोज करने वालों के समक्ष स्वयं को प्रकट करती हैं।

> **योनिमुद्रा त्रिखण्डेशी त्रिगुणाम्बा त्रिकोणगा ।**

माँ की दिव्य सृजनात्मक शक्ति योनि मुद्रा द्वारा अभिव्यक्त होती है, जो यह दर्शाती है कि वे ही वह गर्भ हैं जिससे समस्त कुछ अस्तित्व में आया है। _(माँ की उपासना में इस मुद्रा का प्रदर्शन साधक का उनसे संवाद करने का एक गुप्त उपाय है।)_ माँ समस्त त्रयों की अधिष्ठात्री देवी हैं और उन्हीं का संलयन भी हैं _(जिसका निरूपण त्रिखण्ड मुद्रा द्वारा भी होता है)_।

> **अनघाऽद्भुत-चारित्रा वाञ्छितार्थ-प्रदायिनी ॥१८०॥**

माँ गुणों से परे हैं, तथापि समस्त गुण उन्हीं में स्थित हैं, पूर्ण संतुलन के साथ। माँ हमारी माता हैं, जो न केवल हमें जन्म देती हैं _(जैसे जैविक माता)_, अपितु स्वयं हमारे रूप में भी प्रकट हो जाती हैं। त्रिकोणगा के रूप में वे समस्त त्रयों में बिन्दु के रूप में निवास करती हैं _(जिसका निरूपण श्री चक्र में त्रिकोण अथवा त्रिकोण के रूप में किया गया है)_।

माँ निष्पाप हैं, और उनकी लीला अत्यंत अद्भुत है। वे हमारी समस्त अभिलाषाओं की पूर्ति करती हैं।

> **अभ्यासातिशय-ज्ञाता षडध्वातीत-रूपिणी ।**

वे केवल निरंतर समर्पित अभ्यास और पूर्ण शरणागति के द्वारा ही जानी जाती हैं। माँ की उपासना षड् अध्वनों _(वर्ण, कला, तत्त्व, मंत्र, पद और भुवन)_ से परे है।

> **अव्याज-करुणा-मूर्तिरज्ञान-ध्वान्त-दीपिका ॥१८१॥**

उनका स्वरूप निःशर्त करुणा से परिपूर्ण होकर झरता रहता है। वे अपने भक्तों में अज्ञान के अंधकार का नाश करने वाली दीपशिखा हैं।

> **आबाल-गोप-विदिता सर्वानुल्लङ्घ्य-शासना ।**

वे सबके लिए सहज सुलभ हैं—निर्दोष बालकों के लिए, सरल गोपालकों के लिए, और उन जनों के लिए भी जो जटिल अनुष्ठानों में पारंगत नहीं हैं। परम सेनापति के रूप में उनकी इच्छाएँ ब्रह्मांड के अटल नियम हैं।

> **श्रीचक्रराज-निलया श्रीमत्-त्रिपुरसुन्दरी ॥१८२॥**

वे हमारे भीतर, चक्रों के अधिराज श्री चक्र में नित्य निवास करती हैं। माँ हमारे लोक का परम सौंदर्य हैं, इस समस्त सृष्टि की शोभा हैं, और हमारी सभी अवस्थाओं में व्याप्त मोहक तेज हैं।

> **श्रीशिवा शिव-शक्त्यैक्य-रूपिणी ललिताम्बिका ।**

वे श्री शिव हैं—शिव-शक्ति की ऐक्य-सत्ता का साक्षात् स्वरूप। वे क्रीडामयी माता ललिता हैं।

> **एवं श्रीललिता देव्या नाम्नां साहस्रकं जगुः ॥१८३॥**

इस प्रकार, जगत श्री ललिता देवी के सहस्र पावन नामों का जप करता है _(प्रत्येक नाम भक्ति का एक पुष्प, जो उनकी अनंत कृपा और मुक्ति की ओर ले जाता है)_।

> **॥ इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे उत्तरखण्डे श्रीहयग्रीवागस्त्यसंवादे**
>
> **श्रीललिता सहस्रनाम स्तोत्र कथनं सम्पूर्णम् ॥**

इस प्रकार श्री ब्रह्माण्ड पुराण के उत्तरखण्ड में स्थित श्री हयग्रीव और ऋषि अगस्त्य के संवाद में प्रकट श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्र का वर्णन समाप्त होता है।

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## 'तंत्र साधना' ऐप पर माँ त्रिपुर सुंदरी की उपासना

'तंत्र साधना' ऐप जगन्माता के १० महाविद्या स्वरूपों की उपासना हेतु एक पावन डिजिटल द्वार के रूप में कार्य करता है, [जिनमें तृतीय स्वरूप माँ त्रिपुर सुंदरी हैं](https://tantrasadhana.app/blog/ma-tripura-sundari-sadhana-a-guide-to-her-worship-hindi)।

क्रमानुसार उपासना करने पर, माँ काली और माँ तारा की जागृति के पश्चात्, साधक माँ त्रिपुर सुंदरी के लोक में प्रवेश करते हैं।

![ओम स्वामी द्वारा निर्मित 'तंत्र साधना' ऐप से ४ भुजाओं वाली माँ त्रिपुर सुंदरी का चित्र।](https://prod.superblogcdn.com/site_cuid_cmcefnv6x0009hoe0r2qjyjo4/images/untitled-design-1-1768822525041-compressed.png)

गुरुदेव वेदव्यास के मार्गदर्शन में साधकों को पावन, गु��्त पंचदशी मंत्र की स्वदीक्षा प्राप्त होती है, साथ ही श्री ललिता त्रिशती स्तोत्र _(माँ के ३०० नाम)_ के सहित जागृत यज्ञ का अनुष्ठान भी सम्पन्न होता है।

मंत्र जप और ११ दिनों तक यज्ञ सम्पन्न करने के पश्चात्, अंततः ४०-दिवसीय श्री यंत्र साधना का द्वार खुलता है—नवावरण पूजा के माध्यम से श्री चक्र की उपासना, जो बाह्य भूपुर _(जाग्रत अवस्था)_ से लेकर केंद्रीय बिंदु _(हमारी चेतना के केंद्र)_ तक उसके ९ आवरणों का पावन अनुवर्तन है।

यह ऐप दशमहाविद्याओं की गूढ़ विद्या को हमारे जीवन में लाती है। यह प्राचीन, गुप्त साधनाओं को शुद्ध भक्ति रखने वालों के लिए विश्वभर में सुलभ बनाती है, गृहस्थों को भी प्रवीण साधकों में रूपांतरित करते हुए।

माँ की कृपा को जागृत करें। परमात्मा के प्रेम में निमग्न हो जाएँ।

माँ केवल उन्हीं को बुलाती हैं जो उनकी उपासना के लिए तैयार होते हैं। यदि आप यहाँ हैं, तो आप तैयार हैं। दशमहाविद्याओं को जागृत करें। और भक्ति में आरोह करें।

[माँ की कृपा को जागृत करें](https://tantra-sadhana-app.onelink.me/jgcg/24u3wjsu)
## FAQs
Q: ललिता सहस्रनाम का पाठ कब करना उत्तम है?
A: <p>इसके फलश्रुति (अन्तिम भाग जिसमें लाभों का वर्णन होता है) के अनुसार, ललिता सहस्रनाम के पाठ हेतु श्रेष्ठ काल शुक्रवार, पूर्णिमा की रात्रि, चारों नवरात्रियाँ, तथा सन्ध्याकाल या प्रभातकाल हैं।<br></p>

Q: ललिता सहस्रनाम की रचना किसने की?
A: <p>वाग्देवियों (वाणी की देवियों) ने देवी ललिता त्रिपुर सुंदरी की प्रत्यक्ष आज्ञा से ललिता सहस्रनाम की रचना की। इसके पश्चात भगवान हयग्रीव ने इसे महर्षि अगस्त्य को प्रकट किया।</p>

Q: ललिता सहस्रनाम में कितने श्लोक हैं?
A: <p>​इसमें १,००० नाम १८३ श्लोकों में विन्यस्त हैं। ये नाम स्वतंत्र सूची के रूप में नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित स्तोत्र के अंतर्गत अंतर्निहित हैं।<br></p>

Q: ललिता सहस्रनाम क्या है?
A: <p>​ललिता सहस्रनाम देवी ललिता त्रिपुर सुंदरी के १,००० दिव्य नामों से युक्त एक पवित्र स्तोत्र है। यह ब्रह्माण्ड पुराण के ललितोपाख्यान खंड से प्राप्त है।<br></p>

Q: ललिता सहस्रनाम का प्रतिदिन पाठ करने से क्या लाभ मिलता है? 
A: <p>ब्रह्माण्ड पुराण की फलश्रुति (अन्तिम “फल-अध्याय”) के अनुसार, ललिता सहस्रनाम का दैनिक पाठ चारों पुरुषार्थों—धर्म (धार्मिक आचरण), अर्थ (समृद्धि), काम (इच्छाओं की पूर्ति), तथा मोक्ष (आध्यात्मिक मुक्ति)—की सिद्धि सुनिश्चित करता है।<br></p>

Q: ललिता सहस्रनाम किस भाषा में है?
A: <p>ललिता सहस्रनाम मूलतः संस्कृत भाषा में लिखा गया स्तोत्र है। हमारी वेबसाइट पर उसके हिंदी एवं इंग्लिश, दोनों अनुवाद उपलब्ध हैं। <br></p>

Q: ललिता सहस्रनाम का पाठ कैसे करना चाहिए?
A: <p>प्रारम्भ में ललिता सहस्रनाम स्तोत्र का उसके न्यास और ध्यान श्लोकों सहित पाठ करना चाहिए। सहस्र नामों का जप आदर्शतः शुद्ध उच्चारण और अर्थ-बोध के साथ प्रभातकाल या सन्ध्याकाल में करना चाहिए, ताकि अपेक्षित फल प्राप्त हों।<br></p>

Q: क्या पुरुष और महिलाएँ, दोनों ललिता सहस्रनाम का पाठ कर सकते हैं?
A: <p>हाँ, पुरुष और महिलाएँ दोनों ही श्री ललिता सहस्रनाम का जप कर सकते हैं और करते हैं।
<br><br>ग्रन्थ स्वयं यह स्पष्ट करता है कि जो कोई भी जगन्माता की कृपा का अभिलाषी है, वह इसका पाठ कर सकता है, क्योंकि वे सम्पूर्ण सृष्टि की सार्वभौम जननी हैं, जो लिंगभेद से परे हैं।<br></p>

Q: ललिता सहस्रनाम की विशेषता क्या है?
A: <p>श्री ललिता सहस्रनाम अद्वितीय है क्योंकि इसका रचना माँ की ही आज्ञा से वाणी की आठ देवियों द्वारा की गई थी और इसमें ठीक एक हजार नाम हैं, जिनमें कोई पुनरावृत्ति या निरर्थक शब्द नहीं हैं। यह श्रीविद्या का एक पूर्ण मार्गदर्शक माना जाता है, जहाँ प्रत्येक नाम एक प्रभावशाली मन्त्र के रूप में कार्य करता है, जो साधक के आध्यात्मिक ऊर्जा केन्द्रों को क्रमशः सक्रिय करता है।<br></p>




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