भक्ति और तंत्र : इनके सम्बन्ध का अन्वेषण
इस लेख में आप पढ़ेंगे :
भक्ति की तंत्र में भूमिका
वे तांत्रिक संत जिन्होंने भक्ति के माध्यम से अपनी साधना को गहन बनाया
तांत्रिक ग्रन्थों में वर्णित भक्ति
उपसंहार तथा ‘तंत्र साधना’ ऐप
भक्ति की तंत्र में भूमिका
कल्पना करें कि आप वर्षों से एक श्रेष्ठ पाकविद् बनने का अभ्यास कर रहे हैं। अब आप अपनी अन्तिम परीक्षा देने तथा अपनी दक्षता सिद्ध करने के लिए एक उत्कृष्ट एशियाई भोजन बनाने हेतु पूर्णतः तैयार हैं। मुख्य कार्य-स्थान पर आपने सभी प्रोटीन तथा शाक-भाजियों को सुव्यवस्थित रूप से काटकर रख दिया है।
बाईं ओर की पट्टिका पर विभिन्न मसाले तथा सुगन्धद्रव्य रखे हैं, और दाईं ओर की पट्टिका पर घृत तथा तेल रखे हैं। ऊपर की अलमारी में सिरके, मदिराएँ तथा मधुरक रखे हैं, और दराजों में बनावट बढ़ाने वाली सामग्री तथा ऊपर से डाली जाने वाली सज्जा-सामग्री रखी है।
परीक्षक उलटी गिनती आरम्भ करता है, और अब आरम्भ करने का समय आ गया है। तभी आपका हृदय बैठ जाता है, क्योंकि आपको ज्ञात होता है कि आप इस परीक्षा में असफल होने वाले हैं। आप चूल्हा प्रज्वलित करने के लिए न तो माचिस लाए हैं और न ही अग्निप्रज्वलनक।
ये सभी उत्कृष्ट सामग्रियाँ, सुगन्धद्रव्य, तेल, सिरके तथा उत्कृष्ट पाक-प्रविधियाँ उस समय तक किसी कार्य की नहीं होंगी, जब तक आप अग्नि प्रज्वलित नहीं कर सकते, क्योंकि वही इस उत्कृष्ट व्यंजन का सर्वाधिक मौलिक अवयव है।
भक्ति वह अग्नि है जो तांत्रिक अनुष्ठानों को प्रेरित करती है। अनेक बार हम साधनाओं, अनुष्ठानों की विधियों तथा उनके सूक्ष्मतम विवरणों में इतने अधिक उलझ जाते हैं कि उन्हें करने के वास्तविक उद्देश्य को ही पूर्णतः विस्मृत कर देते हैं।
वे तांत्रिक संत जिन्होंने भक्ति के माध्यम से अपनी साधना को गहन बनाया
श्री रामप्रसाद सेन
तांत्रिक साधनाओं का इन्धन भक्ति है—इस सिद्धान्त को समझने का सर्वोत्तम उपाय यह देखना है कि रामप्रसाद सेन जैसे संतों ने किस प्रकार तीव्र तांत्रिक साधनाओं का विशुद्ध भक्ति के साथ समन्वय किया।
साधक रामप्रसाद को उनके गुरु, कृष्णानन्द आगमवागीश से तांत्रिक साधना की दीक्षा प्राप्त हुई थी, और उन्होंने कुण्डलिनी योग तथा ५ मुण्डों से निर्मित पंचमुण्डी आसन पर ध्यान सहित अनेक गहन तांत्रिक साधनाएँ कीं।
किन्तु उनकी समस्त साधना का मूल कारण अपनी आराध्या माँ काली के दर्शन प्राप्त करना था। यही तीव्र विरह-लालसा अनेक बार कोमल तथा प्रेमपूर्ण भक्तिकाव्यों के रूप में प्रकट हो उठती थी। उनकी एक रचना, ‘डुब दे रे मन काली बोले’, की निम्नलिखित पंक्तियाँ हैं :
ডুব দে মন কালী ব’লে
হৃদি-রত্নাকরের অগাধ জলে।
রত্নাকর নয় শূন্য কখন,
দু-চার ডুবে ধন না পেলে;
তুমি দম-সামর্থ্যে এক ডুবে যাও
কুলকুণ্ডলিনীর কূলে॥"हे मन! काली का नाम लेकर हृदय की अथाह गहराइयों में गहन अवगाहन करो, जहाँ असंख्य अमूल्य रत्न गुप्त रूप से स्थित हैं। यदि प्रारम्भिक कुछ अवगाहनों में वे रत्न प्राप्त न हों, तो कभी यह मत मानना कि सागर का गर्भ रत्नों से रहित है। दृढ़ संकल्प तथा आत्मसंयम के साथ पुनः गहन अवगाहन करो और माँ काली के लोक तक पहुँचो।”
भक्ति के मूल सिद्धान्तों में से एक है समर्पण, और अपने व्यक्तित्व का पूर्णतः लय करके माँ काली के प्रति सम्पूर्ण समर्पित हो जाने की उनकी उत्कट आकांक्षा की झलक उनकी कविता ‘एबार काली तोमाय खाबो’ की निम्नलिखित पंक्तियों में प्राप्त होती है :
এবার কালী তোমায় খাব।
এবার তুমি খাও কি আমি খাই মা, দুটোর একটা করে যাব॥
খাব খাব বলি মাগো উদরস্থ না করিব,
এই হৃদিপদ্মে বসাইয়ে, মনোমানসে পূজিব॥“इस बार मैं आपको पूर्णतः ग्रस लूँगा, हे माँ काली!
पहले आपको ही मुझे पूर्णतः ग्रसना होगा, अन्यथा मैं स्वयं आपको ग्रस लूँगा; इन दोनों में से एक तो अवश्य होगा।
हे माँ, मैं आपको ग्रस लूँगा, किन्तु आपको पचा नहीं दूँगा; मैं आपको अपने हृदय में प्रतिष्ठित करूँगा और अपने मन से आपको अर्पण करूँगा।"
श्री बामाखेपा
इसका एक और भी अधिक प्रभावशाली उदाहरण बामाखेपा के जीवन में मिलता है—माँ तारा के वे परम भक्त जो तारापीठ के 'उन्मत्त संत' के रूप में विख्यात थे। वे वामाचार के एक अत्यन्त सामर्थ्यवान तांत्रिक साधक तथा मंदिर पुजारी थे, जो तारापीठ के श्मशान में निवास करते थे।
किन्तु वे सदैव माँ तारा को "बोड़ो माँ" (बड़ी माँ) कहकर सम्बोधित करते थे और अपनी जन्मदात्री माता को "छोटो माँ" (छोटी माँ) कहते थे।
वे उनके वेदी-स्थल पर बैठते, उनसे वार्तालाप करते, उनके अर्पित नैवेद्य का सेवन करते, और यहाँ तक कि उनसे उसी आवेग के साथ वाद-विवाद भी करते, जैसा केवल कोई बालक अपनी माता से रुष्ट होने पर कर सकता है। मंदिर के अन्य पुजारियों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, किन्तु कहा जाता है कि माँ तारा उनके स्वप्न में प्रकट हुईं और उनसे कहा कि बामाखेपा उनका पुत्र है।
दशमहाविद्याओं की उपासना के लिए साधकों को समर्थ बनाने वाली शक्तिशाली 'तंत्र साधना' ऐप का शुभारम्भ करते समय हिमालयी संन्यासी ओम स्वामी ने भी इस बात पर विशेष बल दिया कि जगन्माता के समीप पहुँचने का एकमात्र उपाय उनका बालक बनना है।
श्री रामकृष्ण परमहंस
तांत्रिक साधनाओं में भक्ति के सर्वोच्च शिखर का उदाहरण अतुलनीय श्री रामकृष्ण परमहंस के जीवन में मिलता है। जब लगभग १८६१ ईस्वी में उनकी भेंट उनकी गुरु, भैरवी ब्राह्मणी से हुई, तब वे पूर्णतः माँ काली के भक्ति-भाव में निमग्न थे। अधिकांश लोग उन्हें उन्मत्त समझते थे, किन्तु भैरवी ब्राह्मणी ने उन्हें समझाया कि उनका प्रत्येक आचरण वैष्णव ग्रन्थों में वर्णित तथा चैतन्य महाप्रभु जैसे साधकों द्वारा प्रत्यक्ष किए गए पराभक्ति के लक्षण हैं।
इसके पश्चात् भैरवी ब्राह्मणी ने उन्हें शाक्त तंत्र की दीक्षा दी, जिसके अन्तर्गत उन्होंने चौंसठ प्रमुख तांत्रिक साधनाएँ सम्पन्न कीं। उन्होंने अपने मन को स्थिर करने के लिए मंत्र जप जैसी परम्परागत साधनाओं से आरम्भ किया।
जब वे वामाचार के उन चरणों में प्रविष्ट हुए जिनमें परम्परानुसार पंचमकार (मुद्रा, मत्स्य, मांस, मद्य तथा मैथुन) का प्रयोग किया जाता है, तब श्री रामकृष्ण ने दिव्य अथवा प्रतिनिधि पद्धति का अनुसरण किया। कठोर ब्रह्मचारी होने के कारण तथा मद्य के प्रति अत्यन्त प्रबल विरक्ति होने से उन्होंने न तो वास्तव में मद्य का सेवन किया और न ही मैथुन का आचरण किया।
इसके स्थान पर उन्होंने इन तत्त्वों का आध्यात्मिकीकरण किया—वे माँ के चिह्न के रूप में मद्य की एक बूँद अपने ललाट पर स्पर्श करते थे, और अपनी साधना-सहचरी की स्वयं जगन्माता के रूप में उपासना (षोडशी पूजा) करते थे। भैरवी ब्राह्मणी ने पुष्टि की कि उनका मानसिक तादात्म्य इतना पूर्ण था कि उन्होंने संन्यास-व्रत का उल्लंघन किए बिना ही वाममार्ग की साधना के फल प्राप्त कर लिए।
तांत्रिक ग्रन्थों में वर्णित भक्ति
तांत्रिक साधना के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों में से एक कुलार्णव तंत्र है, जो कौलाचार की वाममार्गीय परम्परा का निरूपण करता है। यह ग्रन्थ भक्ति को इस परम्परा का स्पन्दित हृदय मानता है।
इसमें गुरु को केवल एक शिक्षक के रूप में नहीं, अपितु शिव के साक्षात् मूर्त स्वरूप के रूप में देखा गया है, जो परम करुणा से प्रेरित होकर मुक्ति के पवित्र ज्ञान का संप्रेषण करते हैं।
"जो गुरु को मनुष्य, मंत्र को मात्र अक्षर, तथा देवप्रतिमाओं को पत्थर समझता है, वह अधोगति को प्राप्त होता है।"
कौल ग्रन्थों का उल्लेख प्रायः उनके उन संदर्भों के कारण किया जाता है, जिनमें उनकी गूढ़ साधनाओं में प्रयुक्त पंचमकार (५ 'म') का वर्णन मिलता है। तंत्रग्रन्थ स्पष्ट रूप से कहते हैं कि इन विधियों का प्रत्यक्ष प्रयोग केवल उन्हीं साधकों के लिए है, जिन्होंने काम, भय तथा जगत् के प्रति द्वैत-बोध पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली हो। इसके पश्चात् ग्रन्थ यह स्पष्ट करता है कि इनका प्रयोग अधिकांश साधकों के लिए किस प्रकार समझा जाना चाहिए।
पंचमकारों का "दिव्यतत्त्व" आपकी यह समझने में सहायता कर सकता है कि जो अनुष्ठान बाह्य रूप से अत्यन्त उग्र प्रतीत होते हैं, वे वास्तव में आपकी भक्ति और समर्पण की गहराई का साक्षात्कार कराते हैं।
तंत्र और भक्ति के परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाले इन दोनों मार्गों का पूर्ण समन्वय करने वाला एक अन्य अत्यन्त रोचक ग्रन्थ लक्ष्मी तंत्र है। जहाँ अधिकांश तांत्रिक ग्रन्थ भगवान शिव अथवा माँ काली पर केन्द्रित हैं, वहीं लक्ष्मी तंत्र वैष्णव परम्परा और तंत्र के संगम पर स्थित एक आगमिक ग्रन्थ है।
लक्ष्मी तंत्र माँ लक्ष्मी को उस सृजनशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करता है, जो अपने ही एक अंश से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रकटीकरण करती हैं। इस ग्रन्थ में गूढ़ तांत्रिक साधनाओं का भी वर्णन है, किन्तु उन सभी का आधार प्रपत्ति (पूर्ण आत्मसमर्पण) के सिद्धान्त पर स्थापित है।
गजेन्द्र मोक्ष की कथा
लक्ष्मी तंत्र में तंत्र और भक्ति का समन्वय इस सिद्धान्त में स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है कि "याचना किए बिना कोई संरक्षण प्रदान नहीं किया जाएगा।" यह पूर्ण आत्मसमर्पण की अनिवार्यता को अधिक सुदृढ़ करता है।
श्रीमद्भागवतम् में वर्णित गजेन्द्र मोक्ष की कथा इसका अत्यन्त सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत करती है…
जब गजराज गजेन्द्र शीतलता प्राप्त करने के लिए पवित्र सरोवर में प्रविष्ट हुए, तभी जल के भीतर छिपे एक प्रबल ग्राह ने उनके चरण को पकड़ लिया। जो एक शान्त विश्राम के रूप में आरम्भ हुआ था, वह देखते ही देखते जीवनरक्षा के लिए एक भीषण संघर्ष में परिवर्तित हो गया।
गजेन्द्र ने दीर्घकाल तक अपनी समस्त शक्ति लगाकर ग्राह का सामना किया और केवल अपने ही पुरुषार्थ पर निर्भर रहा। जब उसे अपनी पूर्ण असहायता का यथार्थ बोध हुआ, तभी उसने समस्त अहंकार का परित्याग करके हृदय से भगवान विष्णु की शरण ग्रहण की तथा दिव्य संरक्षण के लिए पुकार उठा।
उसी क्षण, भगवान विष्णु उसकी रक्षा के लिए अवतीर्ण हुए और उसे मोक्ष प्रदान किया। यह प्रसंग लक्ष्मी तंत्र की उस शिक्षा का पूर्णतः प्रतिपादन करता है कि दिव्य कृपा तभी प्रवाहित होती है, जब साधक पूर्ण आत्मसमर्पण के साथ उसकी सचेत रूप से शरण ग्रहण करता है।
सांख्य एवं योग
सांख्य और योग परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध प्राचीन हिन्दू दार्शनिक प्रणालियाँ (दर्शन) हैं, जो दुःख से मुक्ति प्राप्त करने के लिए यथार्थ का विश्लेषण करती हैं।
सांख्य सैद्धान्तिक, द्वैतवादी रूपरेखा (पुरुष और प्रकृति जैसे तत्त्वों की गणना सहित) प्रदान करता है, जबकि योग उस मुक्ति की प्राप्ति के लिए व्यावहारिक तथा ध्यानप्रधान साधना-पद्धति प्रदान करता है।
"सांख्य" का अर्थ "संख्या" अथवा "गणना" है, जो अस्तित्व को २५ मूलभूत तत्त्वों (सिद्धान्तों) में विभाजित करके उसका विश्लेषण करने की इसकी पद्धति का सूचक है।
यह पुरुष (शुद्ध चैतन्य/आत्मा) और प्रकृति (पदार्थ) के भेद पर केन्द्रित है, जिससे यह समझा जा सके कि आत्मा शुद्ध चैतन्य है, जो भौतिक प्रकृति से सर्वथा भिन्न है। इस प्रकार दुःख का निरोध होता है।
तंत्र और भक्ति का समन्वय इसकी तांत्रिक परम्परा को भी उद्घाटित करता है, यह वर्णित करके कि साधक अपने आन्तरिक अवयवों को शुद्ध करके सांख्य और योग में प्रवीणता प्राप्त करने पर शुद्ध भक्ति से परिपूर्ण हो जाते हैं।
अन्ततः योगी समस्त क्लेशों का परित्याग करके "लक्ष्मी और नारायण द्वारा निरूपित परब्रह्म के साथ एकरूप हो जाता है।"
अन्ततः तंत्र भक्ति का ही एक स्वरूप है, जिसमें भक्त का यह विश्वास होता है कि यदि वह स्वयं ईश्वर का अंश है, तो एक दिन उसे उसी ईश्वर के साथ एकरूप होना है, जिसकी वह उपासना करता है।
भक्ति वह इन्धन है, जो तांत्रिक साधक को उस आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होने के लिए आवश्यक भाव-प्रगाढ़ता, विनम्रता तथा प्रज्ञा प्रदान करता है, जो प्रायः तलवार की धार के समान अत्यन्त सूक्ष्म और दुर्गम होता है।
यदि आप स्वयं को भक्ति में पर्याप्त रूप से प्रतिष्ठित नहीं करते, तो आपकी आध्यात्मिक यात्रा के अहंकार, यश की आकांक्षा अथवा अन्य कामनाओं द्वारा पथभ्रष्ट हो जाने की सम्भावना अत्यन्त प्रबल होती है।
इससे यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि आज के युग में भक्ति पर आधारित प्राचीन तांत्रिक साधनाओं का अभ्यास किस प्रकार किया जा सकता है?
इसका उत्तर ओम स्वामी द्वारा निर्मित अभिनव ‘तंत्र साधना’ ऐप में निहित है।
‘तंत्र साधना’ ऐप
यह क्रान्तिकारी मोबाइल ऐप दशमहाविद्याओं (तंत्र की १० ज्ञानस्वरूपा देवियों) की गूढ़ साधनाओं को आपकी हस्तपुटी तक ले आती है, जिससे प्राचीन तांत्रिक ज्ञान विश्वभर के सत्यनिष्ठ साधकों के लिए सुलभ हो जाता है।
वैदिक तथा तांत्रिक साधनाओं में दशकों के व्यक्तिगत अनुभव से सम्पन्न विख्यात आध्यात्मिक आचार्य ओम स्वामी ने प्रामाणिक तांत्रिक साधनाओं को सर्वसुलभ बनाने के उद्देश्य से ‘तंत्र साधना’ ऐप का निर्माण किया।
दिव्याचार (मानसिक उपासना) के मार्ग का अनुसरण करते हुए, स्वामीजी ने स्वयं इस ऐप में उपलब्ध सभी अनुष्ठानों में सिद्धि प्राप्त करने के उपरान्त ही उन्हें समस्त शक्ति-उपासकों के लिए सुलभ बनाने हेतु इस ऐप का निर्माण किया।
स्वामीजी श्रीविद्या का अभ्यास करने के इच्छुक साधकों के लिए ‘तंत्र साधना ऐप’ को "श्रीविद्या का प्रवेशद्वार" बताते हैं। वे ऐप के माध्यम से श्रीविद्या साधना के उस पथ का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं, जिसे किसी भी संक्षिप्त मार्ग के बिना एक समग्र, प्रामाणिक आध्यात्मिक यात्रा के रूप में निर्मित किया गया है।
‘तंत्र साधना’ ऐप आध्यात्मिक प्रौद्योगिकी की एक नवीन दिशा का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ प्राचीन ज्ञान और आधुनिक नवोन्मेष का समन्वय होकर रूपान्तरण के सुलभ मार्गों का सृजन होता है।
तंत्र के गूढ़ मार्ग की ओर आकृष्ट साधकों के लिए यह डिजिटल साधन उन साधनाओं का प्रामाणिक प्रवेशद्वार प्रस्तुत करता है, जो परम्परागत रूप से गोपनीय रही हैं और केवल चुनिंदा साधकों के लिए ही उपलब्ध थीं।
भक्ति और तंत्र के इस गूढ़ मार्ग का अनुसरण करें तथा अपने जीवन में जगन्माता की आनन्दमयी उपस्थिति का अनुभव करें।
संदर्भ :