शारदीय नवरात्रि 2026 : तिथियाँ, अनुष्ठान तथा अन्य जानकारी
इस लेख में आप पढ़ेंगे :
शारदीय नवरात्रि 2026 की महत्त्वपूर्ण तिथियाँ, अर्थ एवं आध्यात्मिक महत्त्व
शारदीय नवरात्रि अनुष्ठान एवं पौराणिक उत्पत्ति-कथा
क्यों शारदीय नवरात्रि का समापन दशहरा अथवा विजयादशमी पर होता है
दुर्गा पूजा विधि एवं समय-सारिणी सहित दुर्गा सप्तशती पाठ विधि
शारदीय नवरात्रि व्रत-नियम एवं आहार सूची एवं दशमहाविद्या यात्रा
‘तंत्र साधना’ ऐप के माध्यम से दशमहाविद्या उपासना
शारदीय नवरात्रि वह नवरात्रि है जो शरद ऋतु में आती है तथा विजयादशमी अथवा दशहरा के पर्व के साथ सम्पन्न होती है।
देवी-उपासना के इस सर्वाधिक पावन काल में ‘तंत्र साधना’ ऐप सभी साधकों को दशमहाविद्याओं—जगन्माता के १० महाशक्तिशाली स्वरूपों—में से प्रत्येक की उनके गुप्त शक्तिपीठ में उपासना करने का अवसर प्रदान करता है।
शारदीय नवरात्रि 2026 की महत्त्वपूर्ण तिथियाँ
शारदीय नवरात्रि 2026 आरम्भ एवं समापन तिथियाँ : 11 अक्टूबर (रवि) से 20 अक्टूबर (मंगल)
घटस्थापना मुहूर्त : 11 अक्टूबर (रवि) को प्रातः 6:19 से 10:12 तक
घटस्थापना मुहूर्त प्रतिपदा तिथि में है।
प्रतिपदा तिथि : 10 अक्टूबर (रवि) को रात्रि 9:19 से 11 अक्टूबर (सोम) को रात्रि 9:30 तक
नवदुर्गा एवं रंगों सहित शारदीय नवरात्रि 2026 कैलेंडर
नवदुर्गा हिन्दू धर्म में भगवती दुर्गा के ९ विशिष्ट स्वरूप हैं, जिनमें से प्रत्येक परम ब्रह्माण्डीय शक्ति (आदिशक्ति) के एक अद्वितीय आयाम का प्रतिनिधित्व करता है। नवरात्रि की ९ रात्रियों में पृथक-पृथक पूजित ये अवतार—शान्त स्वरूप माँ शैलपुत्री से लेकर उग्र स्वरूप माँ कालरात्रि तक—विभिन्न दैवी गुणों के मूर्त स्वरूप हैं। समष्टि रूप में ये सम्पूर्ण सृष्टि के समग्र स्वरूप का प्रतीकत्व करते हैं तथा साधकों को दुष्ट शक्तियों से संरक्षण, आध्यात्मिक ज्ञान और परम मुक्ति प्रदान करती हैं।
नवरात्रि के ९ रंगों में से प्रत्येक जगन्माता के एक विशिष्ट स्वरूप को दृश्य रूप में अभिव्यक्त करता है तथा साधक को उसके अनुरूप आध्यात्मिक गुणों का विकास करने की प्रेरणा देता है। अपने-अपने दिवस पर इन विशिष्ट रंगों को धारण करके भक्त देवी के दैवी गुणों के साथ स्वयं को सामंजस्य में स्थापित करते हैं, साथ ही आध्यात्मिकता और परम्परा का उत्सव भी मनाते हैं।
इस पर्व का समापन २० अक्टूबर (मंगलवार) को दशहरा (विजयादशमी) के साथ होता है।
शारदीय नवरात्रि का अर्थ एवं आध्यात्मिक महत्त्व
संस्कृत में नवरात्रि का अर्थ है ९ रात्रियाँ। सनातन धर्म में यह दिव्य प्रकृति (स्त्री-तत्त्व) को समर्पित ९ रात्रियों का महापर्व है।
यद्यपि हिन्दू परम्परा में प्रतिवर्ष ४ नवरात्रियाँ—चैत्र, शारदीय, माघ (गुप्त) तथा आषाढ़ (गुप्त)—मनाई जाती हैं, तथापि शारदीय नवरात्रि ही वह पर्व है जो शताब्दियों से सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में जगमाता के प्रमुख वार्षिक उत्सव के रूप में प्रतिष्ठित है।
यह भगवती दुर्गा की महिषासुर पर विजय का उत्सव है, राक्षसराज रावण पर विजय से पूर्व भगवान राम द्वारा जगन्माता की उपासना का स्मरण कराता है, जगन्माता की सनातन शक्ति का सम्मान करता है, तथा प्रत्येक साधक को अज्ञान से ज्ञान की ओर, भय से साहस की ओर और बन्धन से मुक्ति की ओर एक आन्तरिक आध्यात्मिक यात्रा का निमन्त्रण देता है।
शास्त्रों में इन ९ रात्रियों को असाधारण आध्यात्मिक अवसर का काल बताया गया है। इस वार्षिक शारदीय उपासना के दौरान जगन्माता स्वयं भक्तों को आश्वस्त करती हैं कि यदि उपासक प्रत्येक विधि-विधान से पूर्णतः परिचित न भी हो, तब भी वे उसके सत्यनिष्ठ अर्पणों को स्वीकार करती हैं।
उन्हें केवल श्रद्धा और भक्ति ही अपेक्षित है।
जानताजानता वापि बलिपूजां यथा कृताम् ।
प्रतीक्षिष्याम्यहं प्रीत्या वह्निहोमं तथाकृतम् ॥१२.११॥"चाहे बलि (अर्पण), पूजा अथवा यज्ञ विहित विधियों के पूर्ण ज्ञान के साथ सम्पन्न किए गए हों अथवा ऐसे ज्ञान के बिना, मैं उन सबको प्रेमपूर्वक स्वीकार करूँगी।"
— देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती), अध्याय १२
यह करुणामयी आश्वस्ति नवरात्रि के सार को प्रकट करती है : माँ की कृपा कर्मकाण्ड की शुद्धता से नहीं, बल्कि भक्ति से प्राप्त होती है।
घर पर किए जाने वाले नवरात्रि अनुष्ठान
शारदीय नवरात्रि का केन्द्रीय भाव जगन्माता का आविर्भाव है। प्रत्येक वर्ष भक्त उनके आगमन का उत्सव मनाते हैं, उनका अपने गृह में स्वागत करते हैं, उनकी स्तुति में स्तोत्रों का गान करते हैं, और अन्ततः विजयादशमी (विजय प्राप्ति के १०वें दिवस) पर उन्हें भावपूर्ण विदाई देते हैं।
विभिन्न परम्पराओं में इस अवधि के दौरान विविध अनुष्ठान सम्पन्न किए जाते हैं।
कलश स्थापन अथवा घटस्थापन
कळशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः ।
मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः ॥
कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा ।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वणः ॥"कलश के मुख में भगवान विष्णु, कण्ठ में भगवान रुद्र तथा मूल में भगवान ब्रह्मा विराजमान हैं। उसके मध्य में समस्त दिव्य मातृशक्तियाँ निवास करती हैं। उसके गर्भ में समस्त सागर, सप्तद्वीपयुक्त पृथ्वी तथा चारों वेद स्थित हैं।"
— स्मार्त, शाक्त तथा आगमिक उपासना में प्रयुक्त परम्परागत कलश आवाहन मंत्र
प्रत्येक प्रामाणिक शारदीय नवरात्रि उपासना का आरम्भ कलश स्थापन से होता है, जिसे घटस्थापन भी कहा जाता है। यह इस उद्घोषणा का प्रतीक है कि एक साधारण गृह अब पवित्र एक पावन स्थल में परिवर्तित हो गया है।
कलश स्वयं जीवन का प्रतीक है। उसमें जल भरा जाता है—जो जीवन का प्रत्यक्ष आधार है। उसके भीतर पत्र, धान्य तथा प्रायः नारियल स्थापित किए जाते हैं, जिनमें से प्रत्येक उर्वरता, समृद्धि तथा सृष्टि की निरन्तरता का प्रतीक है।
जिस प्रकार गर्भ जीवन का अदृश्य रूप से पोषण करता है, उसी प्रकार कलश उस ब्रह्माण्डीय गर्भ का दृश्य प्रतीक बन जाता है जिससे सम्पूर्ण सृष्टि का प्राकट्य होता है। इसी कारण अनेक शाक्त परम्पराएँ कलश को वैदिक साहित्य में वर्णित हिरण्यगर्भ के साथ अभिन्न मानती हैं।
जगन्माता की उपासना कलश के माध्यम से की जाती है, क्योंकि वे ही सम्पूर्ण अस्तित्व का स्रोत हैं।
सन्धि पूजा
शारदीय नवरात्रि में सन्धि पूजामहाष्टमी और महानवमी तिथियों के पवित्र सन्धिकाल में सम्पन्न की जाती है।
परम्परागत पंचांग के अनुसार यह पवित्र काल ४८ मिनटों का होता है, जिसमें सम्मिलित हैं :
महाष्टमी के अन्तिम २४ मिनट
महानवमी के प्रथम २४ मिनट
यह अल्पकाल सम्पूर्ण उत्सव के सर्वाधिक आध्यात्मिक शक्ति-संपन्न क्षणों में से एक माना जाता है, क्योंकि इसी समय जगन्माता के सर्वाधिक उग्र स्वरूपों में से एक—-चामुण्डा देवी—चण्ड और मुण्ड नामक असुरों के साथ युद्ध का समापन करने के लिए प्रकट हुई थीं।
इस काल में नवार्ण मंत्र—जिसमें चामुण्डा नाम समाहित है—का जप विशेष रूप से प्रभावशाली माना जाता है।
कन्या पूजन अथवा कुमारी पूजा
शारदीय नवरात्रि के समापन के समीप आते ही सम्पूर्ण भारत में भक्त इसकी सर्वाधिक भावपूर्ण तथा आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यन्त गहन परम्पराओं में से एक का पालन करते हैं—कन्या पूजन, जिसे कुमारी पूजा भी कहा जाता है।
बालिकाओं का गृह अथवा मन्दिर में अत्यन्त श्रद्धापूर्वक स्वागत किया जाता है। उनके चरण प्रक्षालित किए जाते हैं। उन्हें पुष्प, चन्दन तथा पवित्र नैवेद्य अर्पित किया जाता है। उन्हें नवीन वस्त्र अथवा उपहार भी प्रदान किए जा सकते हैं।
अन्त में भक्त उनके समक्ष प्रणाम करते हैं और उन्हें जगन्माता का साक्षात् स्वरूप मानकर वन्दना करते हैं। शाक्त परम्परा से अपरिचित व्यक्ति को यह केवल एक सांकेतिक अथवा धार्मिक अनुष्ठान प्रतीत हो सकता है, किन्तु देवी भागवत पुराण तथा कालिका पुराण जैसे शास्त्र इससे कहीं अधिक गहन सत्य का उद्घाटन करते हैं।
सांसारिक पहचान, महत्त्वाकांक्षा, सामाजिक भेद तथा अहंकार द्वारा व्यक्तित्व के निर्मित होने से पूर्व, बाल्यावस्था उन गुणों को प्रतिबिम्बित करती है जिन्हें शास्त्र बार-बार दिव्यता के साथ सम्बद्ध करते हैं—पवित्रता, निष्कपटता, सरलता, निर्भयता तथा सहजता।
अतः कुमारी का सम्मान केवल उसकी आयु के कारण नहीं किया जाता, बल्कि इसलिए किया जाता है कि वह साधक को उस निष्कलुष, दिव्य तेजस्विता का स्मरण कराती है जो जगन्माता का स्वाभाविक स्वरूप है। यह उपासना बालिका के व्यक्तित्व की नहीं, अपितु उस देवी की होती है जो उसके माध्यम से प्रकट होती हैं।
तांत्रिक ग्रन्थ इस उपासना का और भी विस्तारपूर्वक विवेचन करते हुए बताते हैं कि कुमारी उस नित्य-शुद्ध तथा नित्य-जाग्रत शक्ति का स्वरूप है, जो सांसारिक अस्तित्व की सीमाओं से सर्वथा अछूती रहती है।
यद्यपि विभिन्न परम्पराओं में इस अनुष्ठान की विधियाँ भिन्न-भिन्न हैं, तथापि उसका आध्यात्मिक सिद्धान्त एक ही रहता है :
जहाँ कहीं भी देवी की सजीव उपस्थिति का अनुभव हो, वहाँ उसका सम्मान किया जाना चाहिए।
विसर्जन
विसर्जन केवल विदाई नहीं है, बल्कि यह प्रार्थना है कि बाह्य उपासना अब आजीवन स्मरण के रूप में साधक के अन्तःकरण में पुष्पित और पल्लवित होती रहे।
विजयादशमी पर अन्तिम आरती के पश्चात् भक्त :
पुष्प अर्पित करते हैं तथा प्रणाम करते हैं।
कृतज्ञता की प्रार्थना का पाठ करते हैं।
क्षमा-प्रार्थना अर्पित करते हैं (उपासना के दौरान हुई त्रुटियों के लिए क्षमा याचना करते हुए)।
मन ही मन जगन्माता से अपने जीवन का मार्गदर्शन करते रहने की प्रार्थना करते हैं।
यदि कलश स्थापित किया गया हो, तो उसकी उपासना का विधिपूर्वक समापन करते हैं।
कलश के पवित्र जल का गृह अथवा उपवन में छिड़काव करते हैं।
नारियल तथा अन्य अर्पित सामग्री को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
यदि किसी प्रतिमा की अस्थायी स्थापना की गई हो, तो स्थानीय परम्परा के अनुसार उसका जल में विसर्जन करते हैं अथवा भावी उपासना के लिए आदरपूर्वक सुरक्षित रखते हैं।
शारदीय नवरात्रि की पौराणिक उत्पत्ति-कथा
शारदीय नवरात्रि न तो किसी एक ऐतिहासिक घटना पर आधारित है और न ही केवल किसी एक दैवी अवतार के स्मरण का पर्व है। अपितु, जब-जब धर्म संकट में पड़ता है, तब-तब दिव्य शक्ति की सनातन विजय का उत्सव ही शारदीय नवरात्रि है।
देवी माहात्म्य के ३ चरित
मार्कण्डेय पुराण का देवी माहात्म्य तीन प्रमुख भागों में विभाजित है, जिन्हें परम्परागत रूप से ३ चरित कहा जाता है। ये जगन्माता की ब्रह्माण्डीय लीला के तीन आयामों का उद्घाटन करते हैं।
प्रथम चरित
प्रथम चरित में वर्णन है कि किस प्रकार भगवती महाकाली भगवान विष्णु की योगनिद्रा से प्रकट होती हैं और उन्हें मधु तथा कैटभ नामक असुरों का वध करने में समर्थ बनाती हैं। उनके बिना स्वयं भगवान विष्णु भी योगनिद्रा में निमग्न रहते हैं।
मध्यम चरित
द्वितीय चरित में महिषासुरमर्दिनी की सुप्रसिद्ध कथा वर्णित है। महिषासुर का अकेले पराभव करने में असमर्थ होने पर समस्त देवताओं ने अपनी-अपनी दिव्य शक्तियों का समन्वय किया। उसी संयुक्त दिव्य तेज से भगवती दुर्गा का प्राकट्य हुआ।
इसके पश्चात् हुआ युद्ध ब्रह्माण्डीय व्यवस्था की पुनः स्थापना का प्रतीक है। यही चरित मन्दिर-उपासना, भक्तिपूर्ण स्तोत्रों तथा सम्पूर्ण भारत में विविध कलात्मक चित्रणों के माध्यम से सर्वाधिक प्रसिद्ध हुआ है।
उत्तम चरित
अन्तिम चरित में वर्णन है कि किस प्रकार भगवती शुम्भ, निशुम्भ, रक्तबीज, चण्ड तथा मुण्ड सहित अनेक अन्य महाबलशाली असुरों का संहार करती हैं।
युद्ध के दौरान वे बार-बार प्रत्यक्ष करती हैं कि रणभूमि में प्रकट होने वाले उनके असंख्य स्वरूप उनकी अपनी ही अनन्त शक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं।
देवीभागवत पुराण की कथा
नवरात्रि से सम्बद्ध सर्वाधिक प्रसिद्ध कथाओं में से एक राजा सुरथ और वैश्य समाधि की कथा है।
यद्यपि अधिकांश पाठकों का इस प्रसंग से प्रथम परिचय देवी माहात्म्य के माध्यम से होता है, तथापि देवी भागवत पुराण भी उनके आदर्श से प्रेरित नवरात्र-व्रत की परम्परा का संरक्षण करता है तथा उसका विस्तारपूर्वक वर्णन करता है।
राजा सुरथ अपना राज्य खो चुके थे। राज्य से वंचित हो जाने पर भी उनका मन उसी राज्य के प्रति आसक्त था, जो अब उनके अधिकार में नहीं था। वैश्य समाधि को उनके अपने परिवार ने त्याग दिया था, फिर भी उनका चित्त उन्हीं लोगों की चिन्ता में लगा रहता था जिन्होंने उन्हें अस्वीकार कर दिया था।
अपनी इस आसक्ति का कारण न समझ पाने पर दोनों महर्षि मेधस के पास पहुँचे। महर्षि ने उन्हें बताया कि यह रहस्यमयी शक्ति महामाया, स्वयं जगन्माता हैं, जिनके द्वारा सम्पूर्ण जगत का संचालन होता है।
उनके उपदेशानुसार सुरथ और समाधि ने गहन श्रद्धा तथा तपश्चर्या के साथ देवी की उपासना की। उन्होंने जप किया, जगन्माता का ध्यान किया, पुष्प अर्पित किए, पूजा की, संयम का पालन किया तथा अचल भक्ति के साथ साधना में निरन्तर स्थित रहे।
उनकी उपासना से प्रसन्न होकर जगन्माता उनके सम्मुख प्रकट हुईं। सुरथ ने अपने राज्य की पुनर्प्राप्ति तथा धर्मपूर्वक शासन करने की बुद्धि का वर माँगा। समाधि ने मोक्षप्रद ज्ञान की याचना की।
भगवती ने दोनों को उनकी-उनकी अभिलाषा के अनुरूप वर प्रदान किए। यह कथा अत्यन्त सुन्दर रूप से दर्शाती है कि जगन्माता प्रत्येक भक्त को उसके हृदय की निष्कपटता तथा उसकी अभिलाषा की परिपक्वता के अनुरूप अनुग्रह प्रदान करती हैं।
एक को धर्मसम्मत लौकिक सम्पन्नता प्राप्त होती है। दूसरे को मुक्ति प्राप्त होती है। दोनों को माँ की कृपा प्राप्त होती है।
भगवान राम के अकाल बोधन की कथा
बंगाल में रचित कृत्तिवासी रामायण में एक अत्यन्त सुन्दर कथा मिलती है, जिसने शताब्दियों तक दुर्गा पूजा की परम्परा को आकार दिया। इस कथा के अनुसार राक्षसराज रावण का सामना करने से पूर्व श्रीराम ने शरद ऋतु में जगन्माता की उपासना करने का संकल्प किया।
सामान्यतः देवी की पूजा वसन्त ऋतु की वसन्त नवरात्रि से सम्बद्ध मानी जाती थी। श्रीराम द्वारा शरद ऋतु में उनका आवाहन किए जाने के कारण यह उपासना अकाल बोधन के नाम से विख्यात हुई—अर्थात् देवी का ऐसे समय आवाहन, जो चैत्र के उस पारम्परिक ऋतु-क्रम से भिन्न था जब हिन्दू पंचांग में नववर्ष अथवा नव संवत्सर का आरम्भ होता है।
अकाल बोधन की परम्परा का एक अत्यन्त भावपूर्ण प्रसंग श्रीराम द्वारा देवी को १०८ नीलकमलों (नीलोत्पल) के अर्पण से सम्बन्धित है। हिन्दू परम्परा में १०८ की संख्या प्राचीन काल से ही पूर्णता का प्रतीक मानी जाती है।
गहन भक्ति के साथ नीलकमलों का संग्रह करने के पश्चात् श्रीराम ने उपासना आरम्भ की। उनकी भक्ति की गहराई की परीक्षा लेने के लिए देवी ने एक नीलकमल अदृश्य कर दिया। जब श्रीराम ने देखा कि अब केवल १०७ नीलकमल शेष हैं, तब उन्हें स्मरण हुआ कि उनकी स्वयं की उपमा कमल-नयन के रूप में दी जाती है।
क्षणमात्र का भी विलम्ब किए बिना उन्होंने लुप्त नीलकमल के स्थान पर अपना एक नेत्र अर्पित करने का निश्चय किया। जैसे ही वे अपना नेत्र अर्पित करने के लिए उद्यत हुए, जगन्माता उनके सम्मुख प्रकट हुईं, उनका हाथ रोक लिया और उनकी अचल भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया।
क्यों शारदीय नवरात्रि का समापन दशहरा अथवा विजयादशमी पर होता है
विजयादशमी अथवा दशहरा वह दिवस है जब शास्त्र मानवता को स्मरण कराते हैं कि धर्म का कभी स्थायी पराभव नहीं हो सकता, क्योंकि जब-जब धर्म का ह्रास होता है, तब-तब दैवी सत्ता स्वयं प्रकट होती है।
इसी दिवस भगवती दुर्गा ने महिषासुर पर तथा भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त की।
हिन्दू परम्परा धर्म की अनेक महान विजयों का स्मरण करती है, और वे सभी एक ही सनातन सिद्धान्त का उद्घाटन करती हैं : जब-जब अहंकार, अन्याय और अधर्म का प्रभुत्व प्रतीत होता है, तब-तब दैवी कृपा पुनः सामंजस्य की स्थापना करती है।
इसी कारण हिन्दू आध्यात्मिक परम्परा में विजयादशमी का अद्वितीय स्थान है तथा इसी के साथ नवरात्रि का समापन होता है।
शारदीय नवरात्रि के ९ दिन साधना की उस तैयारी का प्रतीक हैं जिसमें आत्मशुद्धि, अनुशासन, प्रार्थना, ध्यान, संयम तथा आन्तरिक रूपान्तरण सम्मिलित हैं। दशम दिवस इन समस्त साधनाओं के फलित होने का प्रतीक है, जब आध्यात्मिक साधना अपना फल प्रदान करती है।
यह यात्रा आवाहन से आरम्भ होती है। इसका समापन विजय में होता है। सनातन धर्म में १० की संख्या प्राचीन काल से ही पूर्णता का प्रतीक मानी गई है। एकल अंकों की श्रृंखला ९ पर पूर्ण होने के पश्चात् १० का प्राकट्य एक उच्चतर चक्र के आरम्भ का सूचक होता है।
अतः विजयादशमी केवल एक समापन का नहीं, बल्कि एक रूपान्तरित जीवन के आरम्भ का प्रतीक है।
शारदीय नवरात्रि दुर्गा पूजा विधि
पवित्र उपासना-स्थल की तैयारी
प्रथम चरण उपासना-स्थल की तैयारी है। वेदी स्वच्छ, शांत तथा जहाँ सम्भव हो, नौ दिनों तक केवल पवित्र उपासना के लिए ही नियत होनी चाहिए।
अनेक परम्पराएँ पूर्व, उत्तर अथवा ईशान दिशा की ओर मुख करके उपासना करने की अनुशंसा करती हैं, क्योंकि ये दिशाएँ परम्परागत रूप से आध्यात्मिक प्रकाश से सम्बद्ध मानी जाती हैं। वेदी पर एक स्वच्छ वस्त्र बिछाया जा सकता है।
उस पर निम्नलिखित वस्तुएँ स्थापित की जा सकती हैं :
भगवती दुर्गा, माँ ललिता त्रिपुर सुन्दरी अथवा अपनी परम्परा के अनुसार कुलदेवी की प्रतिमा अथवा चित्र,
कलश,
दीप,
धूप,
पुष्प,
पूजा के लिए जल,
देवी माहात्म्य जैसे पवित्र ग्रन्थ,
तथा पूजा के दौरान अर्पित की जाने वाली सामग्री।
वेदी पर अनावश्यक वस्तुओं का संचय नहीं होना चाहिए। सादगी एकाग्रता को बढ़ाती है। वेदी की बाह्य सुव्यवस्था मन की आन्तरिक सुव्यवस्था को सहज रूप से प्रोत्साहित करती है।
दीप
औपचारिक उपासना के आरम्भ से पूर्व दीप प्रज्वलित किया जाता है। अनेक परिवार नवरात्रि के सम्पूर्ण ९ दिनों तक अखण्ड ज्योति प्रज्वलित रखते हैं। चाहे अखण्ड ज्योति स्थापित की जाए अथवा नहीं, दीप को सदैव आन्तरिक ज्योति के प्रत्यक्ष प्रतीक के रूप में श्रद्धापूर्वक देखा जाना चाहिए।
घण्टा
उपासना के आरम्भ से पूर्व घण्टा-नाद को प्रायः केवल अनुष्ठान के प्रारम्भ की सूचना भर समझ लिया जाता है। किन्तु उसके अनेक उद्देश्य हैं, जैसे चंचल मन को एकत्र करना, पवित्रता का वातावरण निर्मित करना तथा सामान्य लौकिक गतिविधियों से पवित्र आध्यात्मिक चेतना की ओर संक्रमण का संकेत देना।
संकल्प
संकल्प एक पवित्र दृढ़-निश्चय है। यह केवल एक कामना नहीं, बल्कि यह सजग उद्घोषणा है कि आगामी उपासना निष्कपटता, विनम्रता तथा समर्पण-भाव से सम्पन्न की जा रही है।
साधक आत्मशुद्धि, भक्ति, अपने परिवार के कल्याण, विश्व-शान्ति, विघ्नों की निवृत्ति अथवा अन्ततः मोक्ष की प्रार्थना कर सकता है।
दैनिक षोडशोपचार पूजा
पूजा का प्रत्येक उपचार किसी आदरणीय अतिथि के सत्कार का प्रतिबिम्ब है। जगन्माता को आमंत्रित किया जाता है। उन्हें आसन अर्पित किया जाता है। उनके चरणों का विधिपूर्वक प्रक्षालन किया जाता है। उन्हें पान के लिए जल, सुगन्धित द्रव्य, वस्त्र, आभूषण, नैवेद्य तथा दीप अर्पित किए जाते हैं।
यद्यपि विभिन्न पद्धतियों में इनके क्रम में कुछ अल्प भेद मिलते हैं, तथापि परम्परागत क्रम सामान्यतः निम्नलिखित उपचारों को सम्मिलित करता है :
आवाहन
आसन
पाद्य – चरण प्रक्षालन हेतु जल
अर्घ्य – सम्मानपूर्वक स्वागतार्थ जल
आचमनीय – पान हेतु जल
स्नान अथवा अभिषेक
वस्त्र
आभरण – आभूषण
गन्ध – चन्दन लेप
पुष्प
धूप
दीप
नैवेद्य
ताम्बूल – पान-पत्र एवं सुपारी (अथवा उनका सांकेतिक विकल्प)
नीराजन (आरती)
नमस्कार एवं प्रार्थना
जगन्माता को ये १६ उपचार श्रीसूक्त के १६ श्लोकों के साथ अर्पित किए जा सकते हैं।
दुर्गा सप्तशती पाठ विधि एवं समय-सारिणी
पाठ से पूर्व की तैयारी
पाठ आरम्भ करने से पूर्व :
स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें; लाल रंग शुभ माना जाता है तथा अनुशंसित है।
वेदी अथवा कलश के समक्ष आसन ग्रहण करें।
दीप तथा धूप प्रज्वलित करें।
जगन्माता को पुष्प अर्पित करें।
मन ही मन शुद्धि तथा मार्गदर्शन की प्रार्थना करें।
बाह्य शुद्धि शरीर को तैयार करती है; भक्ति हृदय को तैयार करती है।
पाठ का पारम्परिक क्रम
परम्परागत चण्डी पद्धतियों के अनुसार पाठ का क्रम इस प्रकार है :
आचमन एवं संकल्प
गणेश स्मरण
गुरु स्मरण
देवी कवच
अर्गला स्तोत्रम्
कीलक स्तोत्रम्
शाप विमोचन मंत्र
सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम्
देवी माहात्म्य (समस्त १३ अध्याय)
पुनः सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम्
क्षमा प्रार्थना
यह क्रम शताब्दियों से परम्परागत पाठ-पद्धतियों में सुरक्षित रखा गया है।
दुर्गा सप्तशती पाठ की समय-सारिणी
यदि प्रतिदिन समस्त १३ अध्यायों का पाठ एक साथ न किया जा रहा हो, तो परम्परागत ९-दिवसीय विभाजन केवल क्रमिक अध्यायों पर नहीं, बल्कि देवी चरितों पर आधारित है :
यह क्रम स्वयं शास्त्र द्वारा अनुमोदित पद्धति के अनुरूप है, क्योंकि यह तीनों चरितों की अखण्डता को अक्षुण्ण रखते हुए सम्पूर्ण पाठ को नवरात्रि के नौ दिनों में सुगमतापूर्वक विभाजित करता है। इस प्रकार साधक नौ दिनों में सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती के तीन पूर्ण पाठ सम्पन्न करता है।
रहस्य त्रय
अनेक परम्परागत संस्करणों में तीन पूरक ग्रन्थ भी सम्मिलित होते हैं, जिन्हें निम्नलिखित नामों से जाना जाता है :
प्राधानिक रहस्य
वैकृतिक रहस्य
मूर्ति रहस्य
इनमें जगन्माता के विविध स्वरूपों के गूढ़ प्रतीकवाद का विवेचन किया गया है, तथा परम्परानुसार इनका पाठ मुख्य ग्रन्थ के पश्चात् किया जाता है। यद्यपि ये अत्यन्त पूजनीय हैं, तथापि ये देवी माहात्म्य के मूल तेरह अध्यायों का भाग नहीं हैं।
नवार्ण मंत्र अथवा श्रीविद्या मूल पंचदशी मंत्र जप
पवित्र नवार्ण मंत्र का चण्डी परम्परा में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। अनेक परम्पराओं में दुर्गा सप्तशती के पाठ के पश्चात् इसका जप किया जाता है।
श्रीविद्या मूल पंचदशी मंत्र का जप वे साधक करते हैं जो देवी की तांत्रिक साधना का अनुष्ठान करते हैं।
दुर्गा सप्तशती का पारायण सदैव उच्चारणपूर्वक करना चाहिए, मन ही मन नहीं। मंत्र जप मानसिक रूप से किया जा सकता है।
शारदीय नवरात्रि व्रत-नियम एवं आहार सूची
परम्परागत रूप से ग्रहण किए जाने वाले आहार
परम्परागत रूप से स्वीकार्य आहारों में सम्मिलित हैं :
ताजे फल
दूध तथा दही
छाछ
पनीर
सेंधा नमक
कुट्टू का आटा
सिंघाड़े का आटा
राजगीरा
सामक के चावल
साबूदाना
आलू
शकरकन्द
कद्दू
लौकी
नारियल
मूँगफली (जहाँ परम्परानुसार स्वीकार्य हो)
सूखे मेवे तथा अन्य मेवे
घी
विभिन्न प्रदेशों में भिन्न-भिन्न पाक-परम्पराएँ प्रचलित हैं, और जहाँ वे स्वास्थ्य अथवा व्रत के मूल सिद्धान्तों के प्रतिकूल न हों, वहाँ पारिवारिक परम्पराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
सामान्यतः वर्जित आहार
अधिकांश परम्पराओं में निम्नलिखित आहारों का त्याग किया जाता है :
चावल तथा गेहूँ
साधारण नमक
दालें
अधिकांश धान्य
प्याज़ तथा लहसुन
मांस, मछली तथा अण्डे
मद्य तथा अन्य मादक पदार्थ
कुछ समुदाय अपनी पारिवारिक परम्परा अथवा सम्प्रदाय के अनुसार अतिरिक्त नियमों का भी पालन करते हैं।
दशमहाविद्याओं की यात्रा के रूप में शारदीय नवरात्रि
अधिकांश भक्तों के लिए शारदीय नवरात्रि भगवती दुर्गा के विविध स्वरूपों की उपासना से सम्बद्ध है। किन्तु तांत्रिक परम्परा इसका एक और गूढ़ आध्यात्मिक स्वरूप उद्घाटित करती है।
तंत्रशास्त्रों में वर्णित है कि माँ आदिशक्ति अपनी अनन्त सत्ता के १० परम स्वरूपों को प्रकट करती हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से दशमहाविद्या—दिव्य ज्ञान के दस महान प्रकटीकरण—कहा जाता है।
ये दस भिन्न-भिन्न द्वार हैं, जिनके माध्यम से साधक परम सत्य का साक्षात्कार करता है।
यद्यपि शारदीय नवरात्रि का सार्वजनिक उत्सव भगवती दुर्गा की उपासना पर केन्द्रित रहता है, तथापि तांत्रिक परम्पराएँ इन नौ रात्रियों का चिन्तन महाविद्याओं के ज्ञान के माध्यम से क्रमशः भीतर की ओर अग्रसर होने वाली आध्यात्मिक यात्रा के रूप में करती हैं।
प्रत्येक रात्रि अज्ञान की एक और परत को दूर करती है। प्रत्येक मंत्र एक और आवरण का निवारण करता है। प्रत्येक ध्यान मातृशक्ति की अनन्त सत्ता के एक और स्वरूप का उद्घाटन करता है।
दशम दिवस केवल बाह्य अधर्म पर विजय का ही प्रतीक नहीं है, बल्कि इस पूर्ण अनुभूति का भी प्रतीक है कि समस्त दशमहाविद्याएँ एक ही अखण्ड आदिशक्ति की अभिव्यक्तियाँ हैं।
तब साधक दस देवियों की उपासना नहीं करता। वह एक ही माँ का दर्शन करता है, जो दस अनन्त अभिव्यक्तियों के रूप में प्रकट होती हैं।
'तंत्र साधना' ऐप के माध्यम से दशमहाविद्या उपासना
इस वर्ष अन्तर्मुख होकर 'तंत्र साधना' ऐप के माध्यम से तंत्र द्वारा शक्ति का आवाहन करें।
यह निःशुल्क तथा विज्ञापन-मुक्त ऐप माँ काली से लेकर माँ कमलात्मिका तक दशमहाविद्याओं की क्रमिक साधनाओं के लिए मार्गदर्शित मंत्र जप, यज्ञ तथा गूढ़ तांत्रिक साधनाएँ प्रदान करती है।
ऐप के निर्माता ओम स्वामी द्वारा सिद्ध की गई सभी साधनाएँ महाविद्याओं के सजीव थ्री-डी लोकों में सम्पन्न होती हैं तथा दिव्याचार के सिद्धान्तों का अनुसरण करती हैं—जो तंत्र में दैवी आचरण तथा मानसिक उपासना का सर्वोच्च मार्ग है।
शारदीय नवरात्रि २०२६ के लिए गुप्त शक्तिपीठ
चारों नवरात्रियों सहित प्रत्येक प्रभावशाली आध्यात्मिक काल में 'तंत्र साधना' ऐप के महाविद्या क्षेत्र (होम स्क्रीन) में गुप्त शक्तिपीठ नामक एक विशेष लोक प्रकट होता है।
नवरात्रि के दौरान यह प्रत्येक साधक के लिए दस दिनों तक दशमहाविद्याओं के ध्यान श्लोकों द्वारा उनकी उपासना करने का एक स्वर्णिम अवसर होता है, चाहे उसने अभी-अभी ऐप डाउनलोड की हो और अपनी मुख्य साधना-यात्रा अभी आरम्भ भी न की हो।
ध्यान श्लोक संस्कृत में किसी देवी/देवता के स्वरूप, गुणों तथा विशेषताओं का वर्णन करते हैं। उनका उद्देश्य साधक के मन को उस देवी/देवता पर एकाग्र करना, भक्ति का संवर्धन करना तथा देवता की शक्ति के साथ सामंजस्य स्थापित करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करना है।
ये साधक को शास्त्रों में वर्णित तथा गहन ध्यानावस्था में देवी/देवता का साक्षात्कार करने वाले ऋषियों द्वारा प्रत्यक्ष देखे गए दिव्य स्वरूप का ध्यान करने में सहायक होते हैं।
आप ध्यान श्लोक का जितनी बार जप करना चाहें, उतनी संख्या चुनें और उस दिन की महाविद्या के लिए उसी दिन रात्रि १२ बजे से अगले दिन रात्रि १२ बजे तक की २४ घंटों की अवधि में उसका इच्छानुसार कितनी भी बार जप करें।
माँ काली का शक्तिपीठ प्रत्येक नवरात्रि से एक दिन पूर्व खुलता है, क्योंकि वह सदैव अमावस्या होती है—उनकी उपासना के लिए सर्वोत्तम तिथि।
शारदीय नवरात्रि २०२६ के लिए गुप्त शक्तिपीठ की तिथियाँ
आरम्भ: १० अक्टूबर (शनिवार) रात्रि १२:०० बजे
समापन: २० अक्टूबर (मंगलवार) रात्रि १२:०० बजे
इस प्रभावशाली आध्यात्मिक काल का लाभ उठाकर प्रत्येक महाविद्या की विविध एवं प्रबल ऊर्जाओं से जुड़ें तथा उनकी शक्ति को अपने भीतर जागृत करें।