श्रावण २०२६ : सावन सोमवार व्रत तिथियाँ एवं अन्य जानकारी

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इस लेख में आप पढ़ेंगे :

  • उत्तर तथा दक्षिण भारत के लिए श्रावण मास २०२६ की प्रमुख तिथियाँ

  • श्रावण मास का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व

  • श्रावण सोमवार व्रत तथा सोलह सोमवार व्रत

  • घर पर श्रावण व्रत के नियम तथा चरणबद्ध पूजा विधि

  • महिलाओं तथा कन्याओं के लिए श्रावण के अनुष्ठान एवं नियम

  • ‘तंत्र साधना’ ऐप के माध्यम से शक्ति उपासना

श्रावण मास अथवा सावन माह उत्तर तथा दक्षिण भारत में प्रचलित पंचांगों के अनुसार जुलाई, अगस्त तथा सितम्बर में पड़ता है।

उत्तर तथा दक्षिण भारत के लिए श्रावण मास २०२६ (सावन) की प्रमुख तिथियाँ

उत्तर भारत (पूर्णिमान्त पंचांग)

तिथि

महत्त्व

३० जुलाई, गुरुवार

श्रावण का आरम्भ

३ अगस्त, सोमवार

प्रथम श्रावण सोमवार व्रत

१० अगस्त, सोमवार

द्वितीय श्रावण सोमवार व्रत

१७ अगस्त, सोमवार

तृतीय श्रावण सोमवार व्रत

२४ अगस्त, सोमवार

चतुर्थ श्रावण सोमवार व्रत

२८ अगस्त, शुक्रवार

श्रावण का समापन

दक्षिण भारत (अमान्त पंचांग)

आन्ध्रप्रदेश, तेलंगाना, गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक तथा तमिलनाडु के लिए…

तिथि

महत्त्व

१३ अगस्त, गुरुवार

श्रावण का आरम्भ

१७ अगस्त, सोमवार

प्रथम श्रावण सोमवार व्रत

२४ अगस्त, सोमवार

द्वितीय श्रावण सोमवार व्रत

३१ अगस्त, सोमवार

तृतीय श्रावण सोमवार व्रत

७ सितम्बर, सोमवार

चतुर्थ श्रावण सोमवार व्रत

११ सितम्बर, शुक्रवार

श्रावण का समापन

आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व : श्रावण मास इतना विशेष क्यों है

श्रावण मास का आगमन हिन्दू पंचांग में केवल एक नए मास के आरम्भ का संकेत नहीं है।

यह आध्यात्मिक अनुशासन के सर्वाधिक पवित्र कालों में से एक के आरम्भ की घोषणा करता है—एक ऐसा ऋतु, जिसमें ऐसा प्रतीत होता है कि स्वयं प्रकृति भी सनातन धर्म की शैव परम्परा के परमेश्वर, भगवान शिव, की उपासना में मानवता के साथ सम्मिलित हो जाती है।

भगवान शिव की पद्मासन में ध्यानमग्न श्वेत प्रतिमा का एक चित्र।
स्रोत : magnific.com

वर्षा ऋतु से इसका सम्बन्ध

भारत में ग्रीष्म ऋतु की प्रचण्ड उष्णता का स्थान शीतल वर्षा ले लेती है। नदियाँ पुनः जीवन से परिपूर्ण हो उठती हैं, वन पन्ने के समान हरित आच्छादन धारण कर लेते हैं, और स्वयं पृथ्वी भी मानो शुद्धीकरण का अनुभव करती है।

प्राचीन ऋषियों ने इन परिवर्तनों को केवल ऋतुजन्य नहीं माना; उन्होंने इन्हें एक आन्तरिक आध्यात्मिक सत्य का बाह्य प्रतिबिम्ब माना : जिस प्रकार वर्षा संसार की धूल को धो देती है, उसी प्रकार निष्कपट भक्ति मानव-हृदय की अशुद्धियों को दूर कर देती है।

इसी कारण श्रावण को तप, उपासना, दान तथा आत्मरूपान्तरण को समर्पित मास के रूप में आदर प्राप्त है।

स्कन्द पुराण में श्रावण माहात्म्य

स्कन्द पुराण में भगवान शिव इस पवित्र मास की परम महिमा का वर्णन करते हैं :

"समस्त मासों में कुछ तीर्थयात्रा के लिए प्रशंसित हैं, कुछ दान के लिए, और अन्य यज्ञ के लिए। किन्तु श्रावण इन सबसे विलक्षण है, क्योंकि यह इन सभी मार्गों को भक्ति के एक ही काल में एकत्र कर देता है। इस मास में निष्कपट भाव से किया गया अत्यन्त सरल कार्य भी परमात्मा को किया हुआ एक अर्पण बन जाता है।"

श्रावण माहात्म्य का अर्थ है श्रावण की अन्तर्निहित महानता। यह स्कन्द पुराण का एक ऐसा खण्ड है, जो पूर्णतः श्रावण मास की महिमा का वर्णन करने के लिए समर्पित है।

केवल श्रावण सोमवार व्रत पर केन्द्रित उत्तरकालीन ग्रन्थों के विपरीत, श्रावण माहात्म्य सम्पूर्ण श्रावण मास को उपासना, उपवास, दान, तीर्थयात्रा, शास्त्राध्ययन तथा धर्माचरण के पवित्र अनुशासन के रूप में प्रस्तुत करता है।

यह ग्रन्थ परम्परानुसार संवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें भगवान शिव उपदेश देते हैं भगवान ब्रह्मा के नित्य यौवनयुक्त मानसपुत्रों में से एक, सनत्कुमार को।

भगवान शिव श्रावण मास की महिमा केवल इसलिए नहीं करते कि वह उनसे सम्बद्ध है। इसके स्थान पर, वे इस मास का वर्णन उनके द्वारा निर्धारित ऐसे दिव्य अवसर के रूप में करते हैं, जिसके दौरान भक्ति के सामान्य कार्य भी असाधारण आध्यात्मिक सामर्थ्य प्राप्त कर लेते हैं।

यह उपासना को दैनिक जीवन से पृथक नहीं करता, अपितु आध्यात्मिक अनुशासन के प्रत्येक पक्ष का समन्वय करता है।

यह मास निम्नलिखित का संवर्धन करने का एक पवित्र अवसर बन जाता है :

  • भक्ति : उपासना तथा प्रार्थना के माध्यम से

  • तपस् : व्रत तथा आत्मसंयम के माध्यम से

  • दान : उदार कार्यों के माध्यम से

  • जप : दिव्य नाम की निरन्तर आवृत्ति के माध्यम से

  • स्वाध्याय : पवित्र ग्रन्थों के अध्ययन के माध्यम से

  • सेवा : अतिथियों, आचार्यों तथा आवश्यकता से युक्त जनों की सेवा के माध्यम से

इस प्रकार श्रावण स्वयं सनातन धर्म का एक व्यावहारिक मूर्त स्वरूप बन जाता है।

श्रावण सोमवार व्रत क्या है और इसका पालन कैसे किया जाता है?

संस्कृत शब्द ‘सोमवार’ का शाब्दिक अर्थ है सोम का दिन अथवा चन्द्रमा का दिन।

भगवान शिव अपनी जटाओं पर अर्धचन्द्र धारण करते हैं। इसी कारण शिव पुराण में उन्हें सोमेश्वर तथा सोमनाथ कहा गया है, जिनका अर्थ है चन्द्रमा के स्वामी। अतः सोमवार उनकी उपासना के लिए सप्ताह का सर्वाधिक शुभ दिन है।

श्रावण मास में सोमवार भगवान शिव को समर्पित आध्यात्मिक साधनाओं के लिए विशेष रूप से प्रभावशाली हो जाते हैं। उन सभी में श्रावण सोमवार व्रत सर्वाधिक प्रचलित है।

कुछ लोग इसका पालन विवाह, समृद्धि अथवा उत्तम स्वास्थ्य की कामना से करते हैं। अन्य इसे भगवान के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति मानते हैं। किन्तु शास्त्र इससे भी कहीं अधिक गहन उद्देश्य का उद्घाटन करते हैं।

संस्कृत शब्द ‘व्रत’ का अनुवाद प्रायः केवल ‘उपवास’ के रूप में किया जाता है, जो पूर्ण नहीं है। यह वृ धातु से बना है, जिसका अर्थ है ‘चयन करना’ अथवा ‘दृढ़ संकल्प के साथ प्रवृत्त होना’। अतः व्रत का मूल अर्थ एक पवित्र संकल्प है।

श्रावण सोमवार व्रत मूलतः आन्तरिक शुद्धीकरण का एक अनुशासन है, जिसमें उपवास और उपासना के बाह्य स्वरूपों के माध्यम से विनम्रता, आत्मसंयम, करुणा तथा अचल भक्ति का संवर्धन किया जाता है।

उपवास उस संकल्प की एक अभिव्यक्ति हो सकता है, किन्तु व्रत का सार अनुशासित जीवन में निहित है। श्रावण माहात्म्य व्रत को तीन अविभाज्य आयामों से युक्त बताता है :

  • शारीरिक अनुशासन, जिसमें आहार तथा आचरण में संयम सम्मिलित है

  • मानसिक अनुशासन, जो ईश्वर के स्मरण तथा इन्द्रियनिग्रह के रूप में व्यक्त होता है

  • नैतिक अनुशासन, जो प्रामाणिकता, करुणा तथा उदारता के रूप में प्रकट होता है

श्रावण माहात्म्य, शिव पुराण, लिंग पुराण तथा पारम्परिक शैव साधना-पद्धतियाँ मिलकर सोमवार व्रत को किसी पृथक अनुष्ठान के रूप में नहीं, अपितु भगवान शिव को केन्द्र में रखकर जीए जाने वाले सम्पूर्ण आध्यात्मिक जीवन के एक अंग के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

शास्त्र निरन्तर व्रत को ईश्वर को प्रसन्न करने का नहीं, अपितु साधक के परिष्कार का साधन बताते हैं।

इस व्रत का पालन साधक को निम्नलिखित गुणों का संवर्धन करने के लिए प्रेरित करता है :

  • उपवास के माध्यम से आत्मसंयम तथा शुद्धि

  • अभिषेक के माध्यम से समर्पण

  • मंत्र जप के माध्यम से एकाग्रता

  • प्रार्थना के माध्यम से विनय

  • दान तथा सेवा के माध्यम से करुणा

ये अनुशासन क्रमशः साधक के अन्तर्जीवन का रूपान्तरण करते हैं। जो साधक स्वास्थ्य, आयु अथवा परिस्थितियों के कारण उपवास करने में असमर्थ हो, वह भी निष्कपट उपासना, सात्त्विक एवं सरल आहार, भगवान शिव के स्मरण तथा परोपकार के कार्यों के माध्यम से व्रत के वास्तविक सार का पालन कर सकता है।

अभिषिक्त एवं पूजित शिवलिंग का एक चित्र।
स्रोत : shivalordimage.com

श्रावण सोमवार व्रत के बाह्य आचरण सरल हैं। साधक उपवास करता है। जल अर्पित करता है। मंत्रों का जप करता है। मन्दिर जाता है। बिल्वपत्र अर्पित करता है। किन्तु इन सरल आचरणों के भीतर एक गहन आध्यात्मिक उपदेश निहित है।

उपवास कामनाओं को अनुशासित करता है। जल मन के आवेगों को शान्त करता है। बिल्वपत्र विचार, वचन और कर्म के समन्वय का प्रतीक है। श्रीरुद्रम वाणी को पवित्र करता है। शिवलिंग साधक को उस अनन्त, निराकार तत्त्व का स्मरण कराता है जो समस्त नामों और रूपों से परे है।

अन्ततः श्रावण सोमवार का उद्देश्य केवल भगवान शिव की उपासना करना नहीं है, अपितु उनके समान बनना है—संक्षोभ के मध्य शान्त, दुःख के मध्य करुणामय, सांसारिक सफलता के मध्य अनासक्त तथा सत्य की खोज में अचल।

श्रावण सोलह सोमवार व्रत क्या है? इसका पालन कैसे करें?

भगवान शिव को समर्पित समस्त व्रतों में सोलह सोमवार व्रत जितने व्यापक रूप से पालन किया जाने वाला व्रत विरले ही है।

प्रतिवर्ष सहस्रों भक्त उत्तम स्वास्थ्य, शान्ति, धर्मसम्मत विवाह, पारिवारिक सामंजस्य, विघ्नों के निवारण तथा आध्यात्मिक उन्नति की प्रार्थना के साथ इस पवित्र व्रत का आरम्भ करते हैं।

१६ सोमवार ही क्यों? क्योंकि हिन्दू परम्परा में १६ संख्या का एक पवित्र स्थान है। यह अनेक सन्दर्भों में प्रकट होती है, जिनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध चन्द्रमा की १६ कलाएँ हैं।

चूँकि सोमवार का अधिपति सोम (चन्द्रमा) है, इसलिए १६ सोमवार का यह व्रत प्रतीकात्मक रूप से चित्त के पूर्ण शुद्धीकरण तथा पूर्णता की साधना है।

सोलह सोमवार व्रत का पालन कैसे करें?

इसकी विधि जानबूझकर सरल रखी गई है। प्रत्येक सोमवार, सामान्यतः श्रावण के प्रथम सोमवार से आरम्भ करके, साधक :

  • प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करता है।

  • संकल्प लेता है।

  • भगवान शिव की उपासना करता है।

  • जल (तथा परम्परा के अनुसार अन्य उपहारों) से अभिषेक करता है।

  • बिल्वपत्र अर्पित करता है।

  • शिव पंचाक्षरी मंत्र, महामृत्युंज मंत्र अथवा श्रीरुद्रम का जप करता है।

  • सोलह सोमवार व्रत कथा का पाठ करता है अथवा उसका श्रवण करता है (वैकल्पिक, किन्तु परम्परानुसार प्रचलित)।

  • अपनी क्षमता के अनुसार उपवास करता है।

  • जहाँ सम्भव हो, दान अथवा सेवा करता है।

  • उपासना के पश्चात् शान्तिपूर्वक व्रत का पारण करता है।

इस क्रम का पालन लगातार १६ सोमवारों तक किया जाता है।

सोलह सोमवार व्रत में उपवास के प्रकार

श्रावण माहात्म्य तथा धर्मशास्त्रीय ग्रन्थ व्रत के विभिन्न प्रकारों का वर्णन करते हैं, जिनमें सम्मिलित हैं :

  • निर्जल – अन्न और जल के बिना (केवल विशिष्ट व्रतों तथा शारीरिक रूप से समर्थ व्यक्तियों के लिए उपयुक्त)।

  • फलाहार – फल तथा दुग्ध का ग्रहण।

  • एकभुक्त – दिन में एक बार भोजन।

  • नक्त – सूर्यास्त के पश्चात् एक बार भोजन।

  • अयाचित – बिना माँगे जो प्राप्त हो, उसी का ग्रहण।

इनमें से किस प्रकार का पालन किया जाए, यह स्वास्थ्य, आयु, पारिवारिक परम्परा तथा क्षमता पर निर्भर करता है।

उद्यापन (समापन संस्कार)

१६वें सोमवार के पश्चात परिवारजन उद्यापन करते हैं, जिससे व्रत का विधिवत समापन होता है।

इसमें रुद्राभिषेक, ब्राह्मणों अथवा अतिथियों को भोजन कराना, दान, प्रसाद का वितरण तथा कृतज्ञतापूर्वक प्रार्थना सम्मिलित हो सकते हैं।

श्रावण उपवास के नियम : क्या ग्रहण करें और किसका त्याग करें

श्रावण उपवास के ३ आयाम

शास्त्र उपवास के ३ स्तरों का अप्रत्यक्ष रूप से वर्णन करते हैं :

१. शारीरिक उपवास — आहार के सेवन को सीमित करना

२. मानसिक उपवास — क्रोध, ईर्ष्या, परनिन्दा, अतिभाषण, लोभ, मनोमालिन्य, कठोर निर्णय तथा अनावश्यक विक्षेपों से दूर रहना

३. आध्यात्मिक उपवास — उपवास का सर्वोच्च स्वरूप, जिसमें साधक दिनभर मंत्र जप, ध्यान, स्मरण, शास्त्र-पाठ तथा पूर्ण समर्पण के माध्यम से भगवान शिव के निरन्तर सान्निध्य में स्थित रहने का प्रयास करता है।

परम्परानुसार ग्रहणीय आहार

यद्यपि प्रथाएँ क्षेत्र तथा पारिवारिक परम्परा के अनुसार भिन्न-भिन्न होती हैं, तथापि निम्नलिखित आहार व्यापक रूप से स्वीकार्य माने जाते हैं :

  • फल

  • दुग्ध तथा दुग्धजन्य पदार्थ

  • मेवे तथा शुष्क फल

  • उपवास में प्रयुक्त आटे

अनेक क्षेत्रों में साधक निम्नलिखित सामग्री से निर्मित आहार ग्रहण करते हैं :

  • सिंघाड़े का आटा

  • राजगीरे का आटा

  • कुट्टू का आटा

  • साबूदाना

  • सेंधा नमक

परम्परानुसार वर्जनीय आहार

यद्यपि प्रथाएँ भिन्न-भिन्न होती हैं, तथापि श्रावण उपवास के समय सामान्यतः निम्नलिखित का त्याग किया जाता है :

  • मांस, मत्स्य तथा अण्डे

  • मद्य तथा मादक पदार्थ

  • प्याज़ तथा लहसुन

  • अत्यधिक तीखा तथा गरिष्ठ आहार

जो व्यक्ति गर्भवती हों, वृद्ध हों, गम्भीर रोग से पीड़ित हों, अनिवार्य औषधियों का सेवन कर रहे हों, शल्यचिकित्सा से उबर रहे हों, अथवा अत्यधिक शारीरिक परिश्रम करते हों, उन्हें अपनी परिस्थितियों के अनुसार उपवास में आवश्यक परिवर्तन करना चाहिए।

गृह में श्रावण सोमवार की चरणबद्ध पूजाविधि

भगवान शिव, जो एक पत्र, एक पुष्प, थोड़े-से जल और भक्तिभाव से परिपूर्ण हृदय से ही प्रसन्न हो जाते हैं, वे अर्पण की भव्यता नहीं, अपितु उपासक की निष्कपट श्रद्धा को देखते हैं।

गृह में उनकी पूजा के लिए एक सरल विधि के चरण निम्नलिखित हैं :

  • पवित्र संकल्प : अपने पूजास्थल में बैठकर पूर्ण श्रद्धा एवं सजगता के साथ अपना संकल्प करें। अपना नाम, गोत्र (यदि गोत्र ज्ञात न हो, तो नारायण गोत्र का प्रयोग करें) तथा अपना आध्यात्मिक अथवा व्यक्तिगत लक्ष्य उच्चारित करते हुए उपवास का समस्त पुण्यफल महादेव को समर्पित करें।

  • वेदी की तैयारी : पूजास्थल को स्वच्छ करके वहाँ पत्थर, धातु, स्फटिक अथवा मिट्टी से निर्मित शिवलिंग अथवा शिव-पार्वती का चित्र स्थापित करें। शिवलिंग के सम्मुख नन्दी की स्थापना करें। साथ ही जलपात्र, घण्टा, दीप, धूप तथा पूजा की समस्त सामग्री व्यवस्थित रखें।

  • आवाहन एवं गणेश पूजा : दीप एवं धूप प्रज्वलित करें। कुछ क्षण मौन ध्यान में बैठें, तत्पश्चात् विघ्नों के निवारण तथा भगवान गणेश के आवाहन के लिए उनके नाममंत्र का जप करें। इसके उपरान्त अपने गुरु तथा गुरु-परम्परा का स्मरण कर प्रार्थना करें।

  • अखण्ड अभिषेक : एकत्रित पवित्र सामग्री (शुद्ध जल, गंगाजल, दुग्ध, दधि, मधु, घृत, ईख का रस अथवा नारिकेल जल) से शिवलिंग पर बिना रुके धीरे-धीरे अभिषेक करें। अभिषेक के समय शिव पंचाक्षरी मंत्र का जप करें अथवा श्रीरुद्रम् का पाठ करें।

  • चन्दन एवं विभूति अर्पण : शिवलिंग को सावधानीपूर्वक पोंछकर सुखाएँ। तत्पश्चात् आन्तरिक शान्ति के निमित्त शीतल चन्दन का लेप करें तथा पवित्र विभूति अर्पित करें।

  • बिल्वपत्र एवं पुष्प अर्पण : बिल्वपत्रों को शिवलिंग पर कोमलता से इस प्रकार अर्पित करें कि उनका चिकना भाग शिवलिंग की ओर रहे (शास्त्रों में इसे ऊपर की ओर रखने का निर्देश मिलता है, अर्थात् वह भाग देवता की ओर होना चाहिए) तथा डण्ठल आपकी ओर से विपरीत दिशा में हो। प्रत्येक बिल्वपत्र अर्पित करते समय शिव पंचाक्षरी मंत्र का जप करें। इसके पश्चात् ताजे पुष्प अर्पित करें।

  • नैवेद्य अर्पण : स्वच्छतापूर्वक तैयार किया गया सात्त्विक शाकाहारी भोजन अथवा ताजे फल भगवान शिव को कृतज्ञताभाव से अर्पित करें। पूजा के उपरान्त यही नैवेद्य परिवार के सदस्यों में प्रसाद के रूप में वितरित करें।

  • अन्तर्मुख ध्यान एवं जप : बाह्य उपचारों का समापन करके पूर्ण स्थिरता के साथ बैठें और शिव पंचाक्षरी मंत्र तथा महामृत्युंजय मंत्र का जप करें, अथवा लिंगाष्टकम् एवं बिल्वाष्टकम् जैसे स्तोत्रों का पाठ करें।

महिलाओं एवं कन्याओं के लिए श्रावण के अनुष्ठान तथा नियम

महिलाएँ श्रावण व्रत क्यों करती हैं

श्रावण में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले व्रत को कभी-कभी केवल पति की प्राप्ति अथवा उसके कल्याण के लिए किए जाने वाले अनुष्ठान के रूप में समझ लिया जाता है। किन्तु शास्त्र इसकी कहीं अधिक समृद्ध व्याख्या प्रस्तुत करते हैं।

श्रावण में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले इन व्रतों का उद्देश्य निम्नलिखित के लिए प्रार्थना करना है :

  • धर्म में दृढ़ता

  • परिवार में सामंजस्य

  • सम्बन्धों में विवेक

  • प्रियजनों की रक्षा

  • धर्मानुकूल समृद्धि

  • और सबसे बढ़कर, आध्यात्मिक उन्नति

क्या महिलाएँ रजस्वला अवस्था में भगवान शिव की उपासना कर सकती हैं?

इस प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न के उत्तर के लिए शास्त्र, अनुष्ठान-परम्परा तथा क्षेत्रीय प्रथा के मध्य सावधानीपूर्वक भेद करना आवश्यक है।

प्रमुख पुराणों में ऐसा कोई सार्वभौमिक निषेध नहीं मिलता, जिसमें यह कहा गया हो कि रजस्वला अवस्था में महिलाएँ भगवान शिव का स्मरण अथवा प्रार्थना करने के लिए आध्यात्मिक रूप से अयोग्य होती हैं।

जो तथ्य समस्त परम्पराओं में निर्विवाद है, वह यह है कि निष्कपट, मधुर स्मरण तथा मानसिक उपासना के माध्यम से ईश्वर तक पहुँच कभी अवरुद्ध नहीं होती।

यदि पारिवारिक परम्परा के अनुसार बाह्य अनुष्ठानों को कुछ समय के लिए स्थगित भी किया जाए, तब भी निम्नलिखित साधनाएँ निरन्तर की जा सकती हैं :

  • शिव पंचाक्षरी मंत्र का जप

  • भगवान शिव का ध्यान

  • शिव पुराण का पाठ

  • श्रीरुद्रम् का श्रवण

  • हृदय की गहराइयों से प्रार्थना अर्पित करना

श्रावण में कन्याओं की भूमिका

परम्परानुसार कन्याओं को अल्पायु से ही श्रावण के अनुष्ठानों में सहभागिता के लिए प्रोत्साहित किया जाता रहा है।

सरल आचरणों में भगवान शिव को पुष्प अर्पित करना, छोटे-छोटे स्तोत्र अथवा श्लोक सीखना, भगवान शिव की कथाओं का श्रवण करना, पूजा की तैयारी में सहायता करना, पक्षियों एवं पशुओं को आहार देना तथा दान-पुण्य के कार्यों में सहभागिता करना सम्मिलित है।

ऐसे आचरण भय अथवा अन्धविश्वास नहीं, अपितु करुणा, अनुशासन तथा श्रद्धा का संवर्धन करते हैं। माता-पिता को चाहिए कि वे श्रावण को उनके समक्ष कठोर निषेधों के काल के रूप में नहीं, अपितु दया, सद्भाव तथा भक्ति के आजीवन संस्कार विकसित करने के अवसर के रूप में प्रस्तुत करें।

देवी पार्वती की तपस्या

जहाँ हृदय में भक्ति का प्रस्फुटन होता है, वहाँ जगन्माता का निवास पहले से ही होता है।

श्रावण केवल भगवान शिव का ही नहीं, अपितु देवी पार्वती की उस अटल भक्ति का भी सम्मान करता है, जिनकी तपस्या युगों-युगों से साधकों के लिए आदर्श बनी हुई है।

शास्त्र महिलाओं को केवल श्रावण के अनुष्ठानों में सहभागियों के रूप में प्रस्तुत नहीं करते। अपितु वे स्वयं देवी पार्वती को श्रावण साधना का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत करते हैं।

अतः श्रावण में महिलाओं की भूमिका को समझने के लिए सर्वप्रथम देवी पार्वती के रूप में जगन्माता के जीवन तथा आध्यात्मिक पथ को समझना आवश्यक है।

जो भी महिला निष्कपट श्रद्धा के साथ श्रावण का पालन करती है, वह किसी-न-किसी सीमा तक उस पथ पर चलती है, जिसे सर्वप्रथम स्वयं जगन्माता ने आलोकित किया था।

मंगला गौरी व्रत

श्रावण के सर्वाधिक पूजनीय व्रतों में से एक मंगला गौरी व्रत है, जिसका पालन अनेक क्षेत्रों, विशेषतः महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश तथा उत्तर भारत के कुछ भागों में, मंगलवार के दिन किया जाता है।

‘मंगला’ शब्द का अर्थ है मंगल, जबकि ‘गौरी’ देवी पार्वती के तेजोमय एवं कल्याणमय स्वरूप का द्योतक है।

मंगला गौरी व्रत के दौरान दीपकों से पूजित देवी की प्रतिमा का एक छायाचित्र।
स्रोत : vedaangam.com

इस अनुष्ठान में सामान्यतः निम्नलिखित सम्मिलित होते हैं :

  • गौरी की प्रतिमा का श्रृंगार

  • पुष्प, फल तथा मिष्टान्न अर्पित करना

  • दीप प्रज्वलित करना

  • स्तोत्रों का पाठ

  • स्थानीय परम्परा के अनुसार मंगला गौरी व्रत कथा का श्रवण

यद्यपि क्षेत्रीय प्रथाएँ भिन्न-भिन्न होती हैं, तथापि इसका मूल सिद्धान्त एक ही रहता है—शुभ तथा धर्ममय जीवन के लिए जगन्माता का आशीर्वाद प्राप्त करना।

‘तंत्र साधना’ ऐप के माध्यम से शक्ति उपासना

निःशुल्क तथा विज्ञापन-मुक्त ‘तंत्र साधना’ ऐप विश्वभर के तांत्रिक शक्ति उपासना के इच्छुक एवं साधनारत साधकों के लिए एक क्रान्तिकारी डिजिटल मंच है, जिसके माध्यम से वे अपने घर पर ही दशमहाविद्याओं (तंत्र की १० ज्ञानस्वरूपा देवियों) की उपासना तथा जागृति कर सकते हैं।

हिमालयी संन्यासी ओम स्वामी द्वारा निर्मित यह ऐप दिव्याचार के सिद्धान्तों का अनुसरण करती है—तंत्र का वह मार्ग, जिसमें किसी भी भौतिक सामग्री की आवश्यकता नहीं होती और सभी अर्पण मानसिक रूप से किए जाते हैं।

इस ऐप की यात्रा साधक को दशमहाविद्याओं को समर्पित १० सजीव थ्री-डी लोकों से होकर ले जाती है, जिनका क्रम माँ काली से माँ कमलात्मिका तक है।

इस ऐप के निर्माण से पूर्व ओम स्वामी द्वारा सिद्ध किए गए तांत्रिक मंत्र जपों, यज्ञों तथा गूढ़ साधनाओं के माध्यम से दशमहाविद्याओं की शक्तियों की क्रमशः जागृति कराई जाती है।

इस श्रावण, भगवान शिव की आपकी उपासना को और भी समृद्ध बनाएँ—उनकी अविभाज्य शक्ति का १० सामर्थ्यशाली एवं सर्वसमावेशी स्वरूपों में आवाहन आरम्भ करके।

माँ की कृपा को जागृत करें। परमात्मा के प्रेम में निमग्न हो जाएँ।
माँ केवल उन्हीं को बुलाती हैं जो उनकी उपासना के लिए तैयार होते हैं। यदि आप यहाँ हैं, तो आप तैयार हैं। दशमहाविद्याओं को जागृत करें। और भक्ति में आरोह करें।

Frequently Asked Questions

श्रावण मास विशेष क्यों है?

श्रावण हिन्दू पंचांग के सर्वाधिक पवित्र मासों में से एक माना जाता है, क्योंकि यह पूर्णतः भगवान शिव की उपासना को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि इस शुभ काल में भगवान शिव अत्यन्त सहजता से अपने भक्तों पर कृपा करते हैं। भक्त विशेषतः श्रावण के सोमवारों (श्रावण सोमवार) को कठोर व्रत का पालन करते हैं तथा आध्यात्मिक उन्नति और शान्ति की प्राप्ति के लिए शिवलिंग पर जल अथवा दुग्ध के अभिषेक जैसे अनुष्ठान करते हैं।

क्या श्रावण और सावन एक ही मास के नाम हैं?

हाँ, दोनों एक ही मास के नाम हैं। श्रावण उसका संस्कृत नाम है, जबकि सावन उसका प्रचलित हिन्दी रूप है, जिसका उत्तर भारत में व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है। दोनों भगवान् शिव की उपासना को समर्पित उसी पवित्र मास का उल्लेख करते हैं। इन दोनों में अन्तर केवल भाषा अथवा क्षेत्रीय बोली का है।

२०२६ में श्रावण कब है?

२०२६ में पूर्णिमान्त पंचांग का पालन करने वाले उत्तर भारत में श्रावण मास ३० जुलाई से आरम्भ होकर २८ अगस्त को समाप्त होता है। अमान्त पंचांग का पालन करने वाले पश्चिम एवं दक्षिण भारत में श्रावण मास १३ अगस्त से आरम्भ होकर ११ सितम्बर २०२६ को समाप्त होता है।