गौरवमय श्री रुद्रम् और अत्यन्त दुर्लभ महारुद्र साधना

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इस लेख में आप पढ़ेंगे :

  • श्री रुद्रम् का परिचय

  • श्री रुद्रम् पाठ के विवरण

  • श्री रुद्रम् के पाठ अथवा श्रवण के लाभ

  • ओम स्वामी के साथ महारुद्र साधना

1. श्री रुद्रम् का परिचय

“रुद्र” प्रतीकात्मक रूप से उस अग्नि का द्योतक है जो पृथ्वी के गर्भ से प्रकट होकर सम्पूर्ण सृष्टि में दिव्य ऊर्जा का प्रसार करतीहै। श्री रुद्रम् भगवान शिव के उग्र किन्तु शुभ रुद्र स्वरूप को समर्पित एक प्राचीन वैदिक स्तोत्र है।

शत रुद्रीय के नाम से भी प्रसिद्ध, श्री रुद्रम् कृष्ण और शुक्ल—दोनों यजुर्वेदों में वर्णित है। यह वैदिक परम्परा के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्तोत्रों में से एक है और अनेक शैव अनुष्ठानों तथा साधनाओं का आधार है। पंचाक्षरी मंत्र ‘नमः शिवाय’ का उद्गम भी इसी स्तोत्र से हुआ है।

श्री रुद्रम् भगवान रुद्र को इस प्रकार वर्णित करके उनकी स्तुति करता हैं :

  • ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का स्रोत

  • समस्त प्राणियों के अन्तर्यामी नियन्ता

  • सृष्टि के समस्त रूपों में सर्वव्यापी परम तत्त्व

परम्परानुसार इसका प्रयोग नित्य सस्वर पाठ, अभिषेक, यज्ञ तथा ध्यान-साधनाओं में किया जाता है।

यज्ञ की पवित्र अग्नि का एक छायाचित्र

2. श्री रुद्रम् पाठ के विवरण

श्री रुद्रम् के २ खंड हैं :

नमकम्

  • भगवान रुद्र की स्तुति और महिमा का वर्णन

  • ईश्वर के विविध स्वरूपों को बारम्बार “नमः” कहकर प्रणाम

चमकम्

  • भौतिक और आध्यात्मिक कल्याण हेतु प्रार्थना

  • बल, स्पष्टता, समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति की मांग

प्रत्येक भाग में ११ अध्याय होते हैं, जिन्हें अनुवाक्य कहा जाता है।

पाठ क्रम

जप के विभिन्न स्तर पुनरावृत्ति के आधार पर निर्धारित किए जाते हैं :

  • रूपम् : नमकम् + चमकम् एक बार

  • एकादश रुद्रम् : नमकम् के ११ पाठ + १ चमकम्

  • लघुरुद्रम् : ११ एकादश रुद्रम्

  • महारुद्रम् : ११ लघुरुद्रम्

  • अतिरुद्रम् : ११ महारुद्रम्

एक महारुद्रम् में सामान्यतः सम्मिलित होता है :

  • १२१ पुरोहितों का एक-साथ पाठ

  • श्री रुद्रम् के कुल १३३१ पाठ

यदि महारुद्रम् को ११ बार किया जाए, तो वह अतिरुद्रम् बन जाता है, जिसमें कुल १४,६४१ पाठ होते हैं।

इस महाशिवरात्रि, १००० वर्षों में प्रथम बार आयोजित हो रही ओम स्वामी के साथ महारुद्र साधना में सम्मिलित हों—और इसे अतिरुद्र साधना बनाएँ।

उपासना में उपयोग

श्री रुद्रम् अभिषेक और यज्ञ—दोनों के लिए केंद्रीय है।

यज्ञ में अग्निदेव को स्वयं रुद्र रूप में आवाहित किया जाता है। आहुति प्रदान करते समय श्री रुद्रम् के मंत्रों का जप किया जाता है।

अग्नि दृश्य तत्त्वों में प्रथम और वैदिक आहुति का प्रधान माध्यम है। अग्नि को उस ब्रह्माण्डीय दूत के रूप में माना जाता है जो अर्पित आहुतियों को आवाहित देवता तक पहुँचाता है, जिससे यह अनुष्ठान अग्नि के माध्यम से भगवान रुद्र की प्रत्यक्ष उपासना बन जाता है।

श्री रुद्रम् का जप निम्न अवसरों पर भी किया जा सकता है :

  • शिवलिंग के अभिषेक के समय

  • नित्य पाठ अथवा श्रवण में

  • भगवान शिव के विशेष व्रत-उपवास एवं पर्व, जैसे प्रदोष, मासिक शिवरात्रि या महाशिवरात्रि पर

3. श्री रुद्रम् के पाठ अथवा श्रवण के लाभ

श्री रुद्रम् हमारी ईश्वर की समझ का विस्तार करता है, क्योंकि यह ईश्वर को अस्तित्व के प्रत्येक आयाम में उपस्थित दर्शाता है—प्रकृति में, मनुष्यों में, जीवन की शक्तियों में तथा दैनिक कर्मों में। यह दृष्टि विभेदपूर्ण चिन्तन को क्षीण करती है और एकीकृत आध्यात्मिक दृष्टिकोण का समर्थन करती है।

परम्परागत ग्रन्थों के अनुसार, श्री रुद्रम् का नियमित पाठ अथवा श्रवण :

  • मानसिक तथा भावनात्मक क्लेशों को शान्त करता है

  • मन को स्पष्टता और बुद्धि को स्थिरता प्रदान करता है

  • भावनात्मक संतुलन और आन्तरिक स्थैर्य का समर्थन करता है

  • विचारों और कर्मों का शोधन करता है

  • पूर्वकृत नकारात्मक कर्मों के प्रभाव को क्षीण करता है

  • ध्यान और आध्यात्मिक अनुशासन को सुदृढ़ करता है

  • समस्त सृष्टि में ईश्वर का दर्शन करने की क्षमता का विकास करता है

  • मोक्ष की ओर अग्रसर होने में सहायक होता है

श्री रुद्रम् का नियमित पाठ साधक को उच्च आध्यात्मिक ज्ञान के लिए उपयुक्त बनाने वाला आन्तरिक शोधन प्रदान करता है। इसमें हमारे समस्त पापकर्मों और अशुद्ध विचारों को परिशुद्ध करने का सामर्थ्य निहित है।

ध्यानमग्न मुखमुद्रा सहित भगवान शिव का एक सृजनात्मक चित्रण

4. ओम स्वामी के साथ महारुद्र साधना

भगवान शिव, आदि गुरु, इस ब्रह्माण्ड का स्रोत और प्रथम गुरु हैं। समस्त रूपान्तरण के पथ अन्ततः उनकी मौन अवस्था, उनके ज्ञान और उनकी अनन्त कृपा से ही उद्भूत होते हैं।

श्री रुद्रम् उनके अत्यन्त प्रत्यक्ष वैदिक आवाहनों में से एक है।

इस महाशिवरात्रि अत्यन्त दुर्लभ महारुद्र साधना में सहभागी बनें, जो १००० वर्षों में प्रथम बार सम्पन्न हो रही है।

परम्परानुसार यह साधना प्रशिक्षित पुरोहितों और साधकों के विशाल समूह द्वारा सम्पन्न की जाती थी; अब यह आपके लिए अवसर है इसमें सहभागी होकर इसे अतिरुद्र साधना में परिवर्तित करने का।

रुद्र-तत्त्व में प्रवेश करें और अज्ञान के संहारक तथा सत्य के प्रकाशक का साक्षात्कार करें। उनकी कृपा प्राप्त करें और श्री रुद्रम् की शक्ति द्वारा आन्तरिक रूपान्तरण के पथ पर अग्रसर हों।

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