# विज्ञान भैरव तंत्र : ११२ ध्यान पद्धतियाँ
Published: 2025-11-11
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Meta Title: विज्ञान भैरव तंत्र : ११२ ध्यान पद्धतियाँ
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### **इस लेख में आप पढ़ेंगे :**

📜 [विज्ञान भैरव तंत्र का परिचय](#h_14559884317106475) ​

🖋️ [श्लोक तथा उनके अर्थ](#h_35048814734261113) ​

♥️ ['तंत्र साधना' ऐप पर भगवान् भैरव तथा माँ भैरवी का आवाहन](#h_28468173349651527) ​

## विज्ञान भैरव तंत्र क्या है?

विज्ञान भैरव तंत्र [कश्मीर शैव](https://en.wikipedia.org/wiki/Kashmir_Shaivism) परंपरा का एक तांत्रिक ग्रंथ है। यह १६३ श्लोकों का ग्रंथ है, जिसमें भगवान् शिव का उग्र रूप, भगवान् भैरव और पाँचवी महाविद्या, माँ भैरवी, के मध्य संवाद रूप में प्रस्तुत किया गया है।

‘विज्ञान’ का अर्थ है ‘वैज्ञानिक ज्ञान’। इस ग्रंथ में भगवान् भैरव माँ के प्रश्नों के उत्तर में आत्मबोध प्राप्त करने हेतु ध्यान की ११२ विधियाँ बताते हैं।

![](https://prod.superblogcdn.com/site_cuid_cmcefnv6x0009hoe0r2qjyjo4/images/4757535285403789023585216234619704559894827n-1762839233120-compressed.jpg)

दैवी पुरुष तथा दैवी स्त्री — दोनों एक ही हैं। किंतु यहाँ माँ स्वयं को पृथक करती हैं और एक स्वायत्त सत्ता बन जाती हैं। यह उस साधक की अवस्था का प्रतीक है, जो स्वयं को ईश्वर से भिन्न अनुभव करता है। माँ वही प्रश्न पूछती हैं जो ईश्वर की ओर गमन करने वाला साधक पूछता है।

जब भगवान् उत्तर देते हैं, तब माँ पुनः अपने परम स्वरूप में स्थित हो जाती हैं, जहाँ वे और भगवान् एक ही तत्त्व बन जाते हैं।

जब आप इन श्लोकों को पढ़ेंगे, तो कुछ प्रश्न गूढ़ अथवा रहस्यमय प्रतीत हो सकते हैं। किंतु जैसे प्रत्येक शास्त्रीय ग्रंथ के साथ होता है, प्रत्येक पुनःपाठ में इसका एक नवीन स्तर स्वयं प्रकट होता जाता है।

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## विज्ञान भैरव तंत्र : श्लोक एवं अर्थ

_आप बाद में पुनरवलोकन करने हेतु इस अनुभाग की पी-डी-एफ़ डाउनलोड़ सकते हैं :_

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> _देवी उवाच —_
>
> _श्रुतं देव मया सर्वं रुद्रयामलसम्भवम् ।_
>
> _त्रिकभेदमशेषेण सारात्सारविभागशः ॥ १ ॥_
>
> _अद्यापि न निवृत्तो मे संशयः परमेश्वर ।_

**मैंने सुना है कि सम्पूर्ण सृष्टि ईश्वर एवं देवी के संयोग से उत्पन्न हुई है।**

**त्रिक तंत्र के सार तथा उसके उपविभागों सहित यह ज्ञान प्राप्त हुआ है, किन्तु हे भगवान, अभी भी मेरे संशय निवृत्त नहीं हुए हैं।**

> _किं रूपं तत्त्वतो देव ? शब्दराशिकलामयम् ॥ २ ॥_
>
> _किं वा नवात्मभेदेन भैरवेभैरवाकृतौ ।_
>
> _त्रिशिरोभेदभिन्नं वा किं वा शक्तित्रयात्मकम् ॥ ३ ॥_
>
> _नादबिन्दुमयं वापि किं चन्द्रार्धनिरोधिकाः ।_
>
> _चक्रारूढमनच्कं वा किं वा शक्तिस्वरूपकम् ॥ ४ ॥_

**हे भगवान, आपका वास्तविक स्वरूप क्या है? क्या वह केवल शब्दों का समूह है?**

**या भगवान का स्वरूप ९ भेदों में स्थित है? अथवा वह 3 सिरों या 3 शक्तियों का संयोग है?**

**या आप नाद, बिन्दु अथवा अर्धचन्द्ररूप हैं? क्या आपका स्वरूप चक्रों में आरोहण करती हुई शक्ति है, अथवा निर्बर्ण निःस्वर ध्वनि है?**

> _परापरायाः सकलम्‌ अपरायाश्च वा पुनः ।_
>
> _परया यदि तद्वत् स्यात् परत्वं तद्विरुध्यते ॥ ५ ॥_
>
> _न हि वर्णविभेदेन देहभेदेन वा भवेत् ।_
>
> _परत्वं निष्कलत्वेन सकलत्वे न तद्भवेत् ॥ ६ ॥_

**क्या मध्यम और नीची शक्ति खण्डों में विभाज्य हैं? यदि वही परम (पारमार्थिक) शक्ति का भी स्वरूप हो, तो यह उसकी पारमार्थिकता के विपरीत होगा।**

**परमात्मा निश्चित ही न रंगों का विभाग है, न देहों का। वह अविभाज्य होकर भी खण्डों का संयोग कैसे हो सकता है?**

**हे प्रभो, मुझपर कृपा करें और मेरे समस्त संशयों का निवारण करें।**

> _भैरव उवाच —_
>
> _साधु साधु त्वया पृष्टं तन्त्रसारमिदं प्रिये ॥ ७ ॥_
>
> _गृहनीयतमं भद्रे ! तथापि कथयामि ते ।_

**भगवान् भैरव बोले —**

**अत्युत्तम! अत्युत्तम! प्रिय देवी, तुमने तंत्र के सार के विषय में प्रश्न किया है।**

**प्रिय देवी, यद्यपि यह विषय अत्यन्त जटिल है, मैं इसे स्पष्ट करूँगा।**

> _यत्किञ्चत्सकलं रूपं भैरवस्य प्रकीर्तितम् ॥ ८ ॥_
>
> _तत्सारतया देवि ! विज्ञेयं शक्रजालवत् ।_
>
> _मायास्वप्नोपमं चैव गन्धर्वनगरभ्रमम् ॥ ९ ॥_
>
> _ध्यानार्थं भ्रान्तबुद्धीनां क्रियाडम्बरवतिनाम् ।_
>
> _केवलं वर्णितं पुंसां विकल्पनिहतात्मनाम् ॥ १० ॥_

**जो भी ईश्वर के विभक्त रूपों के रूप में घोषित किया गया है…**

**…जानो, हे देवी, वह असार है, जैसे जादू का खेल, जैसे माया या स्वप्न, अथवा जैसे आकाश में कल्पित नगर।**

**ये विचार उन भ्रमित व्यक्तियों के ध्यान का आधार बनने हेतु प्रयुक्त होते हैं, जो बाह्य क्रियाओं में रुचि रखते हैं।**

**यह केवल उन लोगों के लिए है जो द्वैतमय विचारों में बंधे हुए हैं।**

> _यतः —_
>
> _तत्त्वतो न नवात्मासौ शब्दराशिर्न भैरवः ।_
>
> _न चासौ त्रिशिरा देवो न च शक्तित्रयात्मकः ॥ ११ ॥_
>
> _नादबिन्दुमयो वापि न चन्द्रार्धनिरोधिकाः ।_
>
> _न चक्रक्रमसम्भिन्नो न च शक्तिस्वरूपकः ॥ १२ ॥_

**वास्तव में ईश्वर न तो नौ भिन्न रूपों में है और न शब्दों के संग्रह में। न तीन सिरों वाले, न तीन शक्तियों वाले।**

**न वह ध्वनि है, न बिंदु, न अर्धचन्द्र। चक्रों का आरोहण मेरा सार नहीं है, और न शक्ति मेरी स्वभाविकता है।**

> _अप्रबुद्धमतीनां हि एता बालविभीषिकाः ।_
>
> _मातृमोदकवत् सर्वं प्रवृत्त्यर्थमुदाहृतम् ।। १३ ।।_

**ये विचार उन लोगों के लिए हैं जिनकी बुद्धि परम सत्य को समझने के लिए पर्याप्त परिपक्व नहीं है।**

**वे उसी प्रकार हैं जैसे एक माँ अपने बच्चों को संकट से भयभीत करती है और सभी को आध्यात्मिक साधना आरम्भ करने हेतु प्रोत्साहित करती है।**

> _दिक्कालकलनोन्मुक्ता देशोद्देशाविशेषिणी ।_
>
> _त्वपदेष्टुमशक्यासावकथ्या परमार्थतः ॥ १४ ॥_
>
> _अन्तः स्वानुभवानन्दा विकल्पोन्मुक्तगोचरा ।_
>
> _यावस्था भरिताकारा भैरवी भैरवात्मनः ॥ १५ ॥_
>
> _तद्पुस्तत्त्वतो ज्ञेयं विमलं विश्वपूर्णकम् ।_
>
> _एवंविधे परे तत्त्वे कः पूज्यः कश्च तृप्यति ॥ १६ ॥_

**मैं काल अथवा दिशा के समस्त संकल्पनाओं से परे हूँ। मैं किसी एक विशेष स्थान पर स्थित नहीं हूँ।**

**ईश्वर का यथार्थ चित्रण या वर्णन शब्दों में करना असम्भव है।**

**जब मन शान्त हो जाता है और विचाररहित होता है, तब साधक अपने भीतर ईश्वरानन्द का अनुभव कर सकता है।**

**वह आनन्दमय ईश्वर-स्थिति ही देवी है।**

**मेरे मूल तत्त्व को उसी आनन्दरूप में जानना चाहिए, जो शुद्ध है और सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है।**

**जब यह परम सत्य का स्वभाव ही है, तो कौन उपास्य है और किसे तृप्त करना है?**

> _एवंविधा भैरवस्य यावस्था परिगीयते ।_
>
> _सा परा पररूपेण परादेवी प्रकीर्तिता ॥ १७ ॥_

**इस प्रकार ईश्वर की परम अवस्था का उत्सव मनाया जाता है।**

**मेरे उसी परम रूप के माध्यम से परमेश्वरी देवी के सर्वोच्च स्वरूप का भी उत्सव मनाया जा रहा है।**

> _शक्तिशक्तिमतोर्यद्वत् अभेदः सर्वदा स्थितः ।_
>
> _अतस्तद्धर्मर्धामत्वात् परा शक्तिः परात्मनः ॥ १८ ॥_

**शक्ति और शक्तिमान, कर्तव्य और कर्त्तव्यनिष्ठ — इनके मध्य कभी कोई भेद नहीं होता।**

**इसी कारण परमशक्ति (देवी) और भगवान के बीच भी कोई भेद नहीं है।**

> _न वह्निर्दाहिका शक्तितिर्व्यतिरिक्ता विभाव्यते ।_
>
> _केवलं ज्ञानसत्तायां प्रारम्भोऽयं प्रवेशने ॥ १९ ॥_

**अग्नि की दहन-शक्ति को अग्नि से पृथक नहीं माना जा सकता।**

**इसे केवल आरम्भ में पृथक रूप में वर्णित किया जाता है, ताकि उसका मूल स्वरूप समझा जा सके।**

> _शक्त्यवस्थाप्रविष्टस्य निर्विभागेन भावना ।_
>
> _तदासौ शिवरूपो स्यात् शैवी मुखमिहोच्यते ॥ २०॥_

**जब कोई दिव्य शक्ति की अवस्था में प्रवेश करता है, तो वह ईश्वर की अवस्था में होता है।**

**यहाँ कहा गया है कि देवी ही ईश्वर का प्रवेशद्वार हैं।**

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> _यथालोकेन दीपस्य किरणैर्भास्करस्य च।_
>
> _ज्ञायते दिग्विभागादि तद्वच्छक्त्या शिवः प्रिये ॥ २१ ॥_

**जिस प्रकार दीपक के प्रकाश और सूर्य की किरणों से अंतरिक्ष के अंश दिखाई पड़ते हैं, हे प्रिय देवी, उसी प्रकार देवी (शक्ति) के माध्यम से ईश्वर की अनुभूति होती है।**

> देवी प्रश्न करती हैं —
>
> _देवदेव त्रिशूलाङ्क ! कपालकृतभूषण ! ।_
>
> _दिग्देशकालशून्या च व्यपदेशविवर्जिता ! ॥ २२॥_
>
> _यावस्या भरिताकारा भैरवस्योपलभ्यते ।_
>
> _कैरूपायैर्मुखं तस्य परादेवी कथं भवेत् ॥ २३ ॥_
>
> _यथा सम्यगहं वेद्मि तथा मे ब्रूहि भैरव ! ।_

**हे देवों के देव, जिनके शृंगार में पात्र और प्रतीक में त्रिशूल है, जो दिशा, स्थान, काल और वर्णन से रहित हैं —**

**किस प्रकार कोई उस ईश्वर स्वरुप को प्राप्त कर सकता है और उससे परिपूर्ण हो सकता है? सर्वोच्च देवी ईश्वर में प्रवेश का मार्ग कैसे हैं? हे प्रभु, मुझे इसे इस प्रकार समझाएँ कि मैं पूर्णतः समझ सकूँ।**

> _श्रीभैरव उवाच —_
>
> _ऊर्ध्वे प्राणो ह्यधो जीवो विसर्गात्मा परोच्चरेत् ।_
>
> _उत्पत्तिद्वितयस्थाने भरणाद्भूरिता स्थितिः ॥ २४ ॥_
>
> _मरुतोऽन्तर्बहिर्वापि वियद्युग्मानिवर्तनात् ।_
>
> _भैरव्या भैरवस्येत्थं भैरवि व्यज्यते वपुः ॥ २५ ॥_
>
> _न व्रजेन्न विशेच्छक्ति निर्मरुद्रूपा विकासिते ।_
>
> _निर्विकल्पतया मध्ये तया भैरवरूपता ॥ २६ ॥_

**भगवान ने कहा: सर्वोच्च शक्ति (श्वास) प्रस्थान के समय ऊपर की ओर और प्रवेश के समय नीचे की ओर जाती है। इसके दो उद्गमस्थलों पर एकाग्रचित्त होकर, एक व्यक्ति पूर्णता की अवस्था को प्राप्त करता है।**

**उन दो स्थानों पर ध्यान लगाओ जहाँ श्वास भीतर से बाहर और बाहर से भीतर की ओर दिशा बदलता है। हे देवी, इस प्रकार, देवी के माध्यम से, ईश्वर का साररूप अनुभव किया जाता है।**

**उस केन्द्र पर जहाँ श्वास न भीतर जाता है और न बाहर, सभी विचार नष्ट हो जाते हैं। शक्ति का रूप प्रत्यक्ष होता है, और उसके द्वारा ईश्वर का रूप प्रकट होता है।**

> _कुम्भिता रचिता वापि पूरिता वा यदा भवेत् ।_
>
> _तदन्ते शान्तनामासो शक्त्या शान्तः प्रकाशते ॥ २७ ॥_
>
> _आ मुलात्किरणाभासां सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरात्मिकाम् ।_
>
> _चिन्त्येत् तां द्विषट्कान्ते शाम्यन्तों भैरवोदयः ॥ २८ ॥_

**जब श्वास अपने आप ही प्रवेश या प्रस्थान के पश्चात् रोका जाता है, तो अन्ततः शांति नामक शक्ति के द्वारा शांति प्रकट होती है।**

**एक तेजस्वी किरण के रूप में शक्ति पर ध्यान करो, जो मूल शक्ति केन्द्र से उदित होकर अधिक सूक्ष्म बनते हुए सर्वोच्च केंद्र में अन्ततः विलीन हो जाती है।** **तब ईश्वर का प्राकट्य होता है।**

> _उद्गच्छंतों तडिद्रूपां प्रतिचक्रं क्रमात्क्रमम् ।_
>
> _ऊर्ध्वं मुष्टित्रयं यावत् तावदन्ते महोदयः ॥ २९ ॥_
>
> _क्रमाद्वादशकं सम्यग् द्वादशाक्षरभेदितम् ।_
>
> _स्थूलसूक्ष्मपरस्थित्या मुक्त्या मुक्त्वान्ततः शिवः ॥ ३० ॥_

**बिजली के रूप में शक्ति पर ध्यान लगाओ, जो शक्ति केंद्र से शक्ति केंद्र तक आरोहण करते हुए सर्वोच्च केंद्र तक पहुँचती है। अन्ततः महाप्रेम का उदय अनुभव करो।**

**क्रमशः १२ संस्कृताक्षरों पर ध्यान लगाओ। प्रथम स्थूल रूप में; तत्पश्चात उसका परित्याग करके सूक्ष्म रूप में; तत्पश्चात उसका परित्याग करके परम रूप में। अन्ततः उसका परित्याग करके शिव बनो।**

> _खेचरीमुद्रामाह —_
>
> _तयापूर्याशु मूर्धान्तं भंक्त्वा भ्रूक्षेपसेतुमा ।_
>
> _निर्विकल्पं मनः कृत्वा सर्वोर्ध्वे सर्वगोद्गमः ॥ ३१ ॥_
>
> _शिखिपक्षैश्चित्ररूपैर्मण्डलैः शून्यपंचकम् ।_
>
> _ध्यायतोSनुत्तरे शून्ये प्रवेशो हृदये भवेत् ॥ ३२ ॥_
>
> _ईदृशेन क्रमेणैव यत्र कुत्रापि चिन्तना ।_
>
> _शून्ये कुड्ये पर पात्रे स्वयं लेना वरप्रदा ॥ ३३ ॥_

**विचारों के बिना भौंहों के बीच तथा थोड़े ऊपर स्थित बिंदु पर ध्यान लगाओ। दैवी शक्ति प्रवाहित होती है और सिर के शिखर की ओर उठती है, तत्क्षण व्यक्ति को अपने परमानंद से परिपूर्ण करती हुई।**

**मोर के पंख पर स्थित पाँच वर्णमय वृत्तों के रूप में पाँच शून्यों पर ध्यान लगाओ। जब वृत्त विलीन हो जाएँ, तब व्यक्ति भीतर स्थित परम शून्य में प्रवेश करेगा।**

**इसी प्रकार, ध्यान धीरे-धीरे किसी भी वस्तु — चाहे आकाश, भीत अथवा किसी महापुरुष — पर लगाने से व्यक्ति सम्पूर्णतः परम सत्य में लीन हो जाता है।**

> _कपालान्तर्मनो न्यस्य तिष्ठन्मीलितलोचनः ।_
>
> _क्रमेण मनसो दार्ढ्यात् लाक्षायेल्लक्ष्यमुत्तमम् ॥ ३४ ॥_

**बैठे हुए, नेत्रों को मूदकर, मस्तिष्क के भीतर चित्त को एकाग्र करो। ध्यान की दृढ़ता से व्यक्ति क्रमशः परम सत्य का साक्षात्कार करने लगेगा।**

> _मध्यनाडी मध्यसंस्था बिससूत्राभरूपया ।_
>
> _ध्यातान्तर्व्योमया देव्या तया देवः प्रकाशते ॥ ३५ ॥_

**केंद्रीय नाड़ी, जो मेरुरज्जु के मध्य स्थित है, कमल के सूत्र की भांति प्रतीत होती है। इसके भीतर ध्यान लगाओ। तत्पश्चात देवी भगवान को प्रत्यक्ष करती हैं।**

> _कररुद्धदृगस्त्रेण भरूभेदाद् द्वाररोधानात् ।_
>
> _दृष्टे बिन्दौ क्रमाल्लीने तन्मध्ये परमा स्थितिः ॥ ३६ ॥_

**भौंहों के बीच स्थित बिंदु पर ध्यान केंद्रित करने से एक प्रकाश प्रकट होगा। ततः हस्त की उंगलियों से सिर में स्थित ७ इन्द्रिय द्वारों को बंद करो।**

**प्रकाश क्रमशः विलीन हो जाएगा, और तत्पश्चात व्यक्ति अपनी उच्चतम स्थिति में सदैव निवास करेगा।**

> _धामान्तः क्षोभसम्भूतसूक्श्माग्नितिलकाकृतिम् ।_
>
> _बिन्दुं शिखान्ते हृदये लयान्ते घ्यायतो लयः ॥ ३७ ॥_

**नेत्रों पर सौम्यता से दबाव डालो। सिर के शीर्ष या हृदय में एक बिन्दु सदृश सूक्ष्म प्रकाश प्रकट होगा। वहाँ स्वयं को अवगाहन करो। इस ध्यान से व्यक्ति परम सत्य में लीन हो जाता है।**

> _अनाहते पात्रकर्णेSभग्नशब्दे सरिद् द्रुते ।_
>
> _शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ ३८ ॥_

**नदी की निरन्तर प्रवाहित ध्वनि में गहन रूप से स्नान करो, अथवा कानों को बंद करके ईश्वर की अनाहत ध्वनि सुनो। तत्पश्चात व्यक्ति ईश्वर का अनुभूति करेगा।**

> _प्रणवादिसमुच्चारात्प्लुतान्ते शून्यभावनात् ।_
>
> _शून्यया परया शक्त्या शून्यतोमति भैरवि ॥ ३९ ॥_

**हे देवी, धीरजपूर्वक ॐ का जप करो। विस्तारित ध्वनि के अन्त में स्थित शून्य पर ध्यान केंद्रित करो। ततः शून्य की परम ऊर्जा से व्यक्ति शून्य में प्रविष्ट होता है।**

> _यस्य कस्यापि वर्णस्य पूरवान्तावनुभावयेत् ।_
>
> _शून्यया शून्यभूतोSसौ शून्यकारः पुमान्भवेत् ॥ ४० ॥_

**किसी भी अक्षर की ध्वनि के आरम्भ या अन्त में स्थित शून्य पर ध्यान केंद्रित करो। ततः उस शून्य की शक्ति से व्यक्ति शून्य-रूप हो जाएगा।**

> _तन्त्र्यादिवाद्यशब्देषु दीर्घेषु क्रमसंस्थितेः ।_
>
> _अनन्यचेताः प्रत्यन्ते परव्योमवपुर्भवेत् ॥ ४१ ॥_

**तारवाद्य एवं अन्य संगीत यंत्रों की दीर्घ समय तक चलने वाली ध्वनि को उसके अंत के समय पूर्णतः एकाग्रचित्त होकर सुनो।**

**ध्वनि के क्रमशः लोप होने के साथ बने रहकर व्यक्ति परम आकाश का रूप प्राप्त करेगा।**

> _पिण्डमन्त्रस्य सर्वस्य स्थूलवर्णक्रमेण तु ।_
>
> _अर्द्धेन्दुबिन्दुनादन्तः शून्योच्चाराद्भवेच्छवः ॥ ४२ ॥_

**ॐ का स्पष्ट रूप से उच्चारण करो। क्रमशः ध्वनि लुप्त होती जाती है। जहाँ ध्वनि शून्यता में विलीन होती है, उस क्षण पर ध्यान केंद्रित करने से व्यक्ति शिव बन जाता है।**

> _निजदेहे सर्वदिक्कं युगपद्भावयेद्वियत् ।_
>
> _निर्विकल्पमनास्तस्य वियत्सर्वं प्रवतंते ॥ ४३ ॥_

**विचाररहित मन से अपने शरीर पर ध्यान केंद्रित करो। कल्पना करो कि आकाश सभी दिशाओं में एकसाथ व्याप्त है। ततः व्यक्ति सर्वव्यापी बन जाएगा।**

> _पृष्ठशून्यं मूलशून्यं युगपद्भावयेच्चयः ।_
>
> _शरोरनिरपेक्षिण्या शक्त्या शून्यमना भवेत् ॥ ४४ ॥_

**ऊपर को शून्यता एवं आधार को शून्यता मानकर उनपर एकसाथ ध्यान करो। शरीर से स्वतंत्र ऊर्जा व्यक्ति को विचाररहित बना देगी।**

> _पृष्ठशून्यं मूलशून्यं हृच्छून्यं भावयेत् स्थिरम् ।_
>
> _युगपन्निर्विकल्पत्वान्निर्विकल्पोदयस्ततः ॥ ४५ ॥_

**ऊपर को शून्यता एवं आधार को शून्यता एवं ह्रदय को शून्यता मानकर उनपर एकसाथ दृढ़ता से ध्यान करो। ततः, विचाररहित होकर, वह अवस्था उत्पन्न होगी जो सदैव के लिए विचारों से रहित है।**

> _तनूदेशे शून्यतैव क्षणमात्रं विभावयेत् ।_
>
> _निर्विकल्पं निर्विकल्पो निर्विकल्पस्वरूपभाक् ॥ ४६ ॥_

**विचाररहित होकर थोड़े समय के लिए अपने शरीर के किसी भी भाग को केवल शून्यता मानो। व्यक्ति सदैव के लिए विचाररहित हो जाता है। ततः उसका अपना रूप विचाररहित अवस्था की तेजस्विता को प्राप्त करता है।**

> _सर्वं देहगतं द्रव्यं विदद्व्याप्तं मृगेक्षणे ।_
>
> _विभावयेत् ततस्तस्य भावना सा स्थिरा भवेत् ॥ ४७ ॥_

**हे मृगनेत्रे, अपने शरीर के समस्त घटकों को शून्य-आकाश से व्यापित मानो। ततः व्यक्ति सदैव के लिए उस धारणा में स्थिर हो जाएगा।**

> _देहान्तरे तवाग्विभागं भित्तिभूतं विचिन्तयेत् ।_
>
> _न किञ्चिदन्तरे तस्य ध्याय यन्नध्येयभाग्भवेत् ॥ ४८ ॥_

**त्वचा को ऐसे शून्य शरीर की भित्ति मानो, जिसमें भीतर कुछ भी न हो। इस प्रकार ध्यान करने से व्यक्ति ध्यान से परे स्थान तक पहुँचता है।**

> _हृद्याकाशे निलीनाक्षः पद्मसम्पुटमध्यगः ।_
>
> _अनन्यचेताः सुभगे परं सौभाग्यमाप्नुयात् ॥ ४९ ॥_

**जब इन्द्रिय हृदय के अन्तःस्थान में लीन हों, तब वहाँ स्थित कमल के २ पात्रों के केंद्र पर सम्पूर्ण एकाग्रचित्त होकर ध्यान करना चाहिए। ततः, हे प्रिय देवी, व्यक्ति परम भाग्य को प्राप्त कर लेता है।**

> भगवान कहते हैं —
>
> _सर्वतः स्वशरीरस्य द्वादशान्ते मनो लयात् ।_
>
> _दृढबुद्धेर्दृढीभूतं तत्त्वलक्ष्यं प्रवर्तते ॥ ५० ॥_

**मन को पूर्णतः अपने शरीर के उस केन्द्र में लीन करो, जहाँ भीतर लिये हुए श्वास का अंत होता है। ध्यान में स्थिर होने से व्यक्ति मन में स्थिर होता है, और ततः व्यक्ति को अपने मूल स्वभाव का साक्षात्कार होता है।**

> _यथा तथा यत्र तत्र द्वादशान्ते मनः क्षिपेत् ।_
>
> _प्रतिक्षणं क्षीणवृत्तेर्वैलक्षण्यं दिनैर्भवेत् ॥ ५१ ॥_

**दिन के प्रत्येक क्षण में, चाहे जिस प्रकार से, चाहे जिस स्थान पर, अपने ध्यान को २ श्वासों के मध्य केन्द्रित करो। चित्त के समर्थन का साधन विहीन किया जाएगा, और कुछ ही दिनों में व्यक्ति मुक्त हो जाएगा।**

> _कालाग्निना कालपदादुत्यितेन स्वकं पुरम् ।_
>
> _प्लुष्टं विचिन्तयेदन्ते शान्ताभासस्तदा भवेत् ॥ ५२ ॥_

**कल्पना करो कि आपका अपना शरीर एक ऐसी विनाशकारी अग्नि से दहन हो रहा है, जो दाहिने पाँव से शीर्ष तक उठ रही है। ततः व्यक्ति शांत तेजस्विता को प्राप्त करेगा।**

> _एवमेव जगत्सर्वं दग्धं ध्यात्वा विकल्पतः ।_
>
> _अनन्यचेतसः पुंसः पुंभावः परमो भवेत् ॥ ५३ ॥_

**समतः, सम्पूर्ण एकाग्रचित्त होकर ध्यान करो कि सारा जगत अग्नि द्वारा दहन हो रहा है। ततः वह व्यक्ति परम अवस्था को प्राप्त करता है।**

> _स्वदेहे जगतो वापि सूक्ष्मसूक्ष्मतराणि च ।_
>
> _तत्त्वानि यानि निलयं ध्यात्वान्ते व्यज्यते परा ॥ ५४ ॥_

**ध्यान करो कि अपने शरीर के या जगत के घटक तत्त्व क्रमशः सूक्ष्मतर हो रहे हैं, उनके लुप्त हो जाने तक यहाँ तक। अन्ततः, परम देवी प्रत्यक्ष होती हैं।**

> _पीनां च दुर्बलां शक्तिं ध्यात्वा द्वादशगोचरे ।_
>
> _प्रविश्य हृदये ध्यायन्मुक्तः स्वातन्त्र्यमावाप्नुयात् ॥ ५५ ॥_

**धीरे-धीरे श्वास लो और छोड़ो, ध्वनि के साथ। उन २ स्थानों पर ध्यान केंद्रित करो जहाँ श्वास समाप्त होती है। ततः व्यक्ति मुक्त होता है तथा स्वतंत्रता प्राप्त करता है।**

> _भुवनाद्वादिरूपेण चिन्तयेत् क्रमशोखिलम् ।_
>
> _स्थूलसूक्ष्मपरस्थितया यावदन्ते मनोलयः ॥ ५६ ॥_

**कल्पना करो कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड क्रमशः स्थूल अवस्था से सूक्ष्म में, और सूक्ष्म अवस्था से परम में विलीन हो रहा है, जब तक कि अंततः मन भी विलीन हो गया हो।**

> _अस्य सर्वस्य विश्वस्य पर्यन्तेषु समन्ततः ।_
>
> _अध्वप्रक्रियया तत्त्वं शैवं ध्यात्वा महोदयः ॥ ५७ ॥_

**ध्यान करो कि यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उसके अन्त तक शिव का अंग है। इस प्रकार ध्यान करके व्यक्ति महाजागृति को प्राप्त करता है।**

> _विश्वमेतन्महादेवि शून्यभूतं विचिन्तयेत् ।_
>
> _तत्रैव च मनो लीनं ततस्तल्लयभाजनम् ॥ ५८ ॥_

**हे महादेवी, इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को शून्य मानना चाहिए। ततः मन विलीन हो जाएगा, और व्यक्ति शून्यता में अवगाहन हो जाएगा।**

> _घटादिभाजने दृष्टिं भित्तीस्त्यक्त्वा विनिक्षिपेत् ।_
>
> _तल्लयं तत्क्षणाद् गत्वा तल्लयात् तन्मयो भवेत् ॥ ५९ ॥_

**किसी पात्र या किसी अन्य बर्तन को देखो, उसके विभाजनों को न देखकर। जिस क्षण व्यक्ति आकाश में लीन होता है, वह आकाश से परिपूर्ण हो जाता है।**

> _निर्वृक्षगिरिभित्त्यादिदेशे दृष्टिं विनिक्षिपेत् ।_
>
> _विलीने मानसे भावे वृत्तिक्षीणः प्रजायते ॥ ६० ॥_

**अपनी दृष्टि एक विशाल खुली भूमि पर डालो, जहाँ न वृक्ष हों, न पर्वत, न भित्तियाँ। जब मन पूर्णतः विलीन हो जाता है, तब व्यक्ति नवजन्म प्राप्त करता है।**

> _उभयोर्भवयोर्ज्ञाने ध्यात्वा मध्यं समाश्रयेत् ।_
>
> _युगपच्च द्वयं त्यक्त्वा मध्ये तत्त्वं प्रकाशतॆ ॥ ६१ ॥_

**जब व्यक्ति को २ विचारों का ज्ञान या अनुभव हो, तब दोनों को एकसाथ त्यागकर उनके मध्य स्थित केंद्र में स्थिर होना चाहिए। उस केंद्र में अपना स्वस्वरूप प्रकाशमान होता है।**

> _भावे न्यक्ते निरुद्धा चित् नैव भावान्तरं व्रजेत् ।_
>
> _तदा तन्मध्यभावेन विकसत्यति भावना ॥ ६२ ॥_

**जब मन एक विचार को त्याग देता है और दूसरे विचार की ओर गमन से विरत होता है, तब वह मध्य में विश्रांत होता है। ततः उसी मध्यावस्था के माध्यम से अपना स्वस्वरूप दीप्तिमान होकर प्रकट होता है।**

> _सर्वं देहं चिन्मयं हि जगद्वा परिभावयेत् ।_
>
> _युगपन्निर्विकल्पेन मनसा परमोदयः ॥ ६३ ॥_

**विचाररहित मन से दृढ़तापूर्वक अपने सम्पूर्ण शरीर या सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को चैतन्य मानो। ततः परम जागृति घटित होती है।**

> _वायुद्वयस्य सङ्घट्टादन्तर्वा बहिरन्ततः ।_
>
> _योगी समत्वविज्ञानसमुद्गमनभाजनम् ॥ ६४ ॥_

**अपने श्वास के २ मिलन बिंदुओं में से किसी एक—अन्तर्हित या बहिर्हित—पर ध्यान केन्द्रित करो। ततः योगी पूर्ण समझ के जन्म का अनुभव करेगा।**

> _सर्वं जगत्स्वदॆहं वा स्वानन्दभरितं स्मरॆत् ।_
>
> _युगपत् स्वामृतॆनैव पपरानन्दमयो भवेत् ॥ ६५ ॥_

**अपने सम्पूर्ण शरीर या सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने ही आनन्द से पूर्ण मानना चाहिए। ततः अपने ही आनंदरस से व्यक्ति परमानंद से परिपूर्ण हो जाएगा।**

> _कुहनेन प्रयोगेण सद्य एव मृगेक्षणे ।_
>
> _समुदॆति महानन्दॊ येन तत्त्वं प्रकाशतॆ ॥ ६६ ॥_

**हे मृगनेत्रे, सहलाए जाते समय अत्यंत आनन्द तात्कालिक रूप से उत्पन्न होता है। उस आनन्द के माध्यम से अपना स्वस्वरूप प्रकट होता है।**

> _सर्वस्रोतॊनिबन्धॆन प्राणशक्त्यॊर्ध्वया शनैः ।_
>
> _पिपीलस्पर्शविलायां प्रथते परमं सुखम् ॥ ६७ ॥_

**सभी इन्द्रियों को बंद करके जीवन की ऊर्जा क्रमशः मेरुदंड के केन्द्र से उठती है, और व्यक्ति को उस पर चल रही चींटी के समान सिहरन का अनुभव होता है। ततः परम आनन्द सम्पूर्ण शरीर में फैल जाता है।**

> _वाह्नोर्विषयस्य मध्ये तु चित्तं सुखमयं क्षिपेत् ।_
>
> _केवलं वायुपूर्णं वा स्मरानन्देन युज्यतॆ ॥ ६८ ॥_

**शारीरिक आत्मीयता के प्रारंभ से अन्त तक अनुभव होने वाले आनन्द पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। ततः मनुष्य ऊर्जा से परिपूर्ण होता है, और प्रेम के आनन्द के माध्यम से वह ईश्वर के साथ ऐक्य प्राप्त करता है।**

> _शक्तिसङ्गमसंक्षुब्धशक्त्यावेशावसानिकम् ।_
>
> _यत्सुखं ब्रह्मतत्त्वस्य तत्सुखं स्वाक्यमुच्यते ॥ ६९ ॥_

**किसी अन्य के साथ शारीरिक आत्मीयता के समय अन्तिम विमोचन में महान आनन्द उत्पन्न होता है। वह आनन्द ईश्वर के स्वभाव का संकेत देता है, और वह स्वयं के ही स्वभाव का अनुभव है।**

> _लेहनामन्थनाकोटैः स्त्रीसुखस्य भरात्स्मृतेः ।_
>
> _शक्त्यभावॆऽपि देवेशि भवॆदानन्दसंप्लवः ॥ ७० ॥_

**हे देवी, किसी अन्य के अभाव में भी, अन्तिम विमोचन के तीव्र आनन्द की स्मृति से व्यक्ति आनन्द के प्रचुर प्रवाह का अनुभव करेगा।**

> _आनन्दे महति प्राप्ते दृष्टे वा बान्धवे चिरात् ।_
>
> _आनन्दमुद्गतं ध्यात्वा तल्लयस्तन्मना भवेत् ॥ ७१ ॥_

**जब भी अत्यंत आनन्द प्राप्त होता है अथवा किसी मित्र या सगे-संबंधी को लंबे समय बाद देखकर आनन्द उत्पन्न होता है, तब उस आनन्द पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। ततः चित्त आनन्द में लीन हो जाएगा।**

> _जग्घिपानकृतोल्लासरसानन्दविजृम्भणात् ।_
>
> _भावयेद्भरितावस्थां महानन्दस्ततो भवेत् ॥ ७२ ॥_

**भोजन एवं पान के सुख से आनन्द का विकास अनुभव होता है। उस आनन्द की अवस्था से व्यक्ति परिपूर्ण हो जाना चाहिए। ततः परमानन्द की प्राप्ति होगी।**

> _गोतादिविषयास्वादासमसौख्यैकतात्मनः ।_
>
> _योगिनस्तन्मयत्वेन मनोरूढेस्तदात्मता ॥ ७३ ॥_

**जब कोई गायन एवं अन्य इन्द्रिय सुखों का आनंद लेता है, तब अत्यंत आनन्द उत्पन्न होता है। एक योगी को उस आनन्द के साथ ऐक्य स्थापित करना चाहिए। ततः व्यक्ति आत्मा के विकास का अनुभव करता है।**

> _यत्र यत्र मनस्तुष्टिर्मनस्तत्रैव धारयेत् ।_
>
> _तत्र तत्र परानन्दस्वरूपं सम्प्रवर्तते ॥ ७४ ॥_

**जहाँ भी मन संतोष पाता है, उसी स्थान पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। ततः अपने स्वस्वरूप का परम आनन्द प्रकट होता है।**

> _अनागतायां निद्रायां प्रणष्टे बाह्यगोचरे ।_
>
> _सावस्था मनसा गम्या परा देवी प्रकाशते ॥ ७५ ॥_

**उस अवस्था पर ध्यान केंद्रित करो, जहाँ निद्रा पूर्णतः प्रकट नहीं हुई है, पर बाह्य जगत लुप्त हो चुका है। उस अवस्था में परम देवी प्रत्यक्ष होती हैं।**

> _तेजसा सूर्यदीपादेराकाशे शवलीकृते ।_
>
> _दृष्टिर्निवेश्या तत्रैव स्वात्मरूपं प्रकाशते ॥ ७६ ॥_

**अपनी दृष्टि उस स्थान पर स्थिर करो, जहाँ सूर्य, दीप तथा अन्य स्रोतों की ज्योति विभिन्न रंग उत्पन्न करती है। वहाँ अपना स्वस्वरूप स्वयं को प्रत्यक्ष करेगा।**

> _करंकिण्या क्रोधनया भैरव्या लॆलिहानया ।_
>
> _खेचर्या दृष्टिकाले च परावाप्तिः प्रकाशते ॥ ७७ ॥_

**करणकिनी, क्रोधना, भैरवी, लेलिहाना एवं खेचरी मुद्रा के योगाभ्यासों से परम सत्य प्रत्यक्ष होता है।**

> _मृद्वासने स्फिजैकॆन हस्तपादौ निराश्रयम् ।_
>
> _निधाय तत्प्रसङ्गेन परा पूर्णा मतिर्भवेत् ॥ ७८ ॥_

**एक मृदु आसन पर एक नितम्ब रखकर हाथों एवं पैरों का कोई सहारा न लेकर बैठो। उस स्थिति में बने रहने से व्यक्ति परम सत्य के बोध से परिपूर्ण हो जाएगा।**

> _उपविश्यासने सम्यक् बाहू कृत्वार्द्धकुञ्चितौ ।_
>
> _कक्षव्योम्नि मनः कुर्वन् शममायाति तल्लयात् ॥ ७९ ॥_

**आराम से बैठकर दोनों भुजाओं को सिर के ऊपर मेहराबाकार मोड़ो। बगलों के आकाश में चित्त लीन करके महा-शांति प्राप्त होगी।**

> _स्थूलरूपस्य भावस्य स्तब्धां दृष्टि निपात्य च ।_
>
> _अचिरेण निराधारं मनः कृत्वा शिवं व्रजेत् ॥ ८० ॥_

**किसी भी वस्तु के स्थूल रूप को पलक न झपकाते हुए दृढ़तापूर्वक देखो। चित्त असहाय हो जाएगा, और थोड़े ही समय में व्यक्ति शिव में लीन हो जाएगा।**

माँ की कृपा को जागृत करें। परमात्मा के प्रेम में निमग्न हो जाएँ।

माँ केवल उन्हीं को बुलाती हैं जो उनकी उपासना के लिए तैयार होते हैं। यदि आप यहाँ हैं, तो आप तैयार हैं। दशमहाविद्याओं को जागृत करें। और भक्ति में आरोह करें।

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> _मध्यजिह्वे स्फारितास्ये मध्ये निक्षिप्य चेतनाम् ।_
>
> _ह्योच्चारं मनसा कुर्वस्ततः शान्ते प्रलीयते ॥ ८१ ॥_

**मुख को बड़े खुला करके जीभ को ऊपर तालु के केंद्र की ओर में डालो। जीभ के मध्य पर ध्यान केंद्रित करो, और वहाँ ‘हा’ ध्वनि का उच्चारण अनुभव करो। ततः व्यक्ति शांति में विलीन हो जाएगा।**

> _आसने शयने स्थित्वा निराधारं विभावयेत् ।_
>
> _स्वदेहं मनसि क्षीणे क्षणात् क्षीणाशयो भवेत् ॥ ८२ ॥_

**बिस्तर या सोफ़े पर बैठकर लगातार अपने शरीर को बिना सहारे वाला मानो। जिस क्षण मन लुप्त हो जाता है, उसी क्षण व्यक्ति का स्थिर निवास स्थान भी लुप्त हो जाता है।**

> _चलासने स्थितस्याथ शनैर्वा देहचालनात् ।_
>
> _प्रशान्ते मानसे भावे देवि दिव्यौघमाप्नुयात् ॥ ८३ ॥_

**हे देवी, किसी चलती गाड़ी में या स्थिर स्थान पर शरीर की लयात्मक गति का अनुभव करके शरीर को धीरे-धीरे झुलाकर चित्त शान्त होता है, और व्यक्ति ईश्वर के प्रचुर प्रवाह को प्राप्त करता है।**

> _आकाशं विमलं पश्यन् कृत्वा दृष्टिं निरन्तराम् ।_
>
> _स्तब्धात्मा तत्क्षणाद् देवि भैरवं वपुराप्नुयात् ॥ ८४ ॥_

**स्वयं को न हिलाते हुए निरंतर स्पष्ट आकाश की ओर देखो। उस क्षण से, हे देवी, व्यक्ति ईश्वर का रूप प्राप्त करेगा।**

> _लीनं मूर्ध्नि वियत् सर्वं भैरवत्वेन भावयेत् ।_
>
> _तत्सर्वं भैरवाकारस्तेजस्तत्त्वं समाविशेत् ॥ ८५ ॥_

**ध्यान करो कि सम्पूर्ण आकाश या स्थान स्वयं के मस्तक में लीन हो गया है। ईश्वर के गुणों को आत्मसात करके व्यक्ति ईश्वर का दीप्तिमान रूप प्राप्त करेगा।**

> _किञ्चिज्ज्ञातं द्वैतदायि बाह्यालोकस्तमः पुनः ।_
>
> _विश्वादि भैरवं रूपं ज्ञात्वानन्तप्रकाशभृत् ॥ ८६ ॥_

**जागृत अवस्था में कुछ द्वैतजन्य ज्ञान उत्पन्न होता है। स्वप्नावस्था में बाह्य जगत के संस्कार विद्यमान रहते हैं। सुषुप्ति अवस्था में पूर्ण अन्धकार रहता है।**

**इन समस्त चेतना अवस्थाओं को भगवान के ही स्वरूप जानो। तब व्यक्ति ईश्वर के अनन्त प्रकाश से परिपूर्ण हो जाएगा।**

> _एवमेव दुर्निशायां कृष्णपक्षागमे चिरम् ।_
>
> _तैमिरं भावयन् रूपं भैरवं रूपमेष्यति ॥ ८७ ॥_

**उसी प्रकार, कृष्णपक्ष की पूर्णतः अन्धकारमयी रात्रि में उस अन्धकार पर दीर्घ समय तक एकाग्र होकर ध्यान करो। तब व्यक्ति ईश्वर-स्वरूप की ओर प्रवृत्त होगा।**

> _एवमेव निमील्यादौ नेत्रे कृष्णाभमग्रतः ।_
>
> _प्रसार्य भैरवं रूपं भावयन्स्तन्मयो भवेत् ॥ ८८ ॥_

**यदि अन्धकारमयी रात्रि का अभाव हो, तो नेत्र बन्द करके सामने के अन्धकार पर ध्यान करो। नेत्र खोलने पर ईश्वर के उस अंधकारमय स्वरूप को सर्वत्र प्रसारित देखो।**

**तब व्यक्ति ईश्वर के साथ एकत्व प्राप्त करेगा।**

> _यस्य कस्येन्द्रियस्यापि व्याघाताच्च निरोधतः ।_
>
> _प्रविष्टस्याद्वये शून्ये तत्रैवात्मा प्रकाशते ॥ ८९ ॥_

**जब कोई इन्द्रिय बाह्य रूप से अवरुद्ध कर दिया जाता है अथवा व्यक्ति स्वयं उसे उसके कार्य से विरत कर देता है, तब वह द्वैतातीत शून्य में प्रविष्ट होता है।**

**वहाँ वास्तव में उसका नित्यमुक्त आत्मस्वरूप प्रत्यक्ष होगा।**

> _अबिन्दुमिवसर्गं च अकारं जपतॊ महान् ।_
>
> _उदॆति देवि सहसा ज्ञानौघः परमेश्वरः ॥ ९० ॥_

**लगातार ‘अ’ स्वर का जप करो, ‘म’ या ‘ह’ ध्वनि के बिना। तब, हे देवी, ईश्वर-ज्ञान की एक महान तरंग प्रबलता से उदित होगी।**

> _वर्णस्य सर्विसर्गस्य विसर्गान्तं चितिं कुरु ।_
>
> _निराधारेण चित्तेन स्पृशेद् ब्रह्म सनातनम् ॥ ९१ ॥_

**'ह’ ध्वनि उत्पन्न करो और उस ध्वनि के अन्त पर एकाग्र हो जाओ। जब मन असमर्थित हो जाएगा, तब व्यक्ति नित्य रूप से ईश्वर को स्पर्श करेगा।**

> _व्यॊमाकारं स्वमात्मानं ध्यायेद् दिग्भिरनावृतम् ।_
>
> _निराश्रया चितिः शक्तिः स्वरूपं दर्शयेत् तदा ॥ ९२ ॥_

**स्वयं का ध्यान आकाशरूप में करो, जो सभी दिशाओं में असीम है। तब व्यक्ति अपने ही रूप को चेतना की असमर्थित शक्ति के रूप में देखेगा।**

> _चित्ताद्यन्तःकृतिर्नास्ति ममान्तर्भबयेदिति ।_
>
> _विकल्पानामभावेन विकल्पैरुज्झितो भवेत् ॥ ९४ ॥_

**इस प्रकार ध्यान करना चाहिए — “मेरे भीतर कुछ भी नहीं है। न मन है, न बुद्धि, न अस्थियाँ, न इन्द्रियाँ।”**

**इससे व्यक्ति समस्त विचारों का परित्याग कर देगा। विचारशून्य अवस्था में स्थित होकर वह ईश्वर तक पहुँच जाएगा।**

> _माया विमोहिनी नाम कलायाः कलनं स्थितम् ।_
>
> _इत्यादिधर्मं तत्त्वानां कलयन्न पृथग्भवेत् ॥ ९५ ॥_

**अपने इस बोध में दृढ़ रहो कि किसी भी नामयुक्त वस्तु का छोटा-सा अंश भी मोह-माया है। इस प्रकार, अपने सत्य स्वरूप का मूल गुण एकत्व है।**

**इस बोध से व्यक्ति कभी पृथक नहीं रहेगा।**

> _झगितोच्छां समुत्पन्नामवलोक्य शमं नयेत् ।_
>
> _यत् एव समुद्भूता ततस्तत्रैव लीयते ॥ ९६ ॥_

**जब कोई इच्छा उत्पन्न होती दिखाई दे, तब उसे तत्क्षण समाप्त कर देना चाहिए। तब व्यक्ति उसी स्रोत में लीन हो जाएगा, जहाँ से वह इच्छा उदित हुई थी।**

> _यदा ममेच्छा नोत्पन्ना ज्ञानं वा कस्तदास्मि वै ।_
>
> _तत्त्वतोऽहं तथा भूतस्तल्लीनस्तन्मना भवेत् ॥ ९७ ॥_

**जब मुझमें न इच्छा उत्पन्न हुई हो, न ज्ञान — तो 'मैं कौन हूँ?' उस अवस्था में। वही वास्तव में मेरा मौलिक सत्य है।**

**इस प्रकार मनन करने पर व्यक्ति उसी सत्य स्वरूप में लीन हो जाएगा।**

> _इच्छायामथवा ज्ञाने जाते चित्तं निवेशयेत् ।_
>
> _आत्मबुद्ध्यानन्यचेतास्ततस्तत्त्वार्थदर्शनम् ॥ ९८ ॥_

**जब इच्छा या ज्ञान उत्पन्न हो जाए, तब उन पर चिंतन करना रोककर अपनी आत्मा को ही चेतना के समान मानो। तब व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप प्रकट होगा।**

> _निर्निमित्तं भवेज्ज्ञानं निराधारं श्रमात्मकम् ।_
>
> _तत्त्वतः कस्यचिन्नैतदेवम्भावी शिवः प्रिये ॥ ९९ ॥_

**ईश्वर का सत्य स्वरूप कारणरहित और असमर्थित है। किसी भी मनुष्य का ज्ञान या अनुभूति यह नहीं है। हे प्रिय देवी, इस प्रकार व्यक्ति शिव हो जाता है।**

> _चिद्धर्मा सर्वदेहेषु विशेषो नास्ति कुत्रचित् ।_
>
> _अतश्च तन्मयं सर्वं भावयन् भवजिज्जनः ॥ १०० ॥_

**सभी देहों में चेतना ही मूल तत्त्व है। कहीं भी कोई भेद नहीं है। अतः समस्त सृष्टि उसी चेतना से निर्मित है।**

**इसका बोध होने पर मनुष्य सांसारिक अस्तित्व पर विजय प्राप्त करता है।**

> _कामक्रोधलोभमोहमदमात्सर्यगोचरे ।_
>
> _बुद्धिं निस्तिमितां कृत्वा तत्तत्त्वमवशिष्यते ॥ १०१ ॥_

**जब इच्छा, क्रोध, लोभ, मोह, मद या मत्सर जैसे प्रबल भाव उत्पन्न हों, तब मन को रोक दो। ऐसा करने से उन भावों के अधिष्ठान में स्थित सत्य स्वरूप प्रत्यक्ष होता है।**

> _इन्द्रजालमयं विश्वं व्यस्तं वा चित्रकर्मवत् ।_
>
> _भ्रमद्वा ध्यायतः सर्वं पश्यतश्च सुखोद्गमः ॥ १०२ ॥_

**सम्पूर्ण जगत् को जादूगरी, चित्र या भ्रम के रूप में देखो। इस ध्यान से आनन्द उत्पन्न होता है।**

> _न चित्तं निक्षिपेद्दुःखे न सुखे वा परिक्षिपेत् ।_
>
> _भैरवि ज्ञायतां मध्ये किं तत्त्वमवशिष्यते ॥ १०३ ॥_

**सुख या दुःख पर अपने विचारों को स्थिर नहीं करना चाहिए। हे देवी, जानो कि सत्य स्वरूप इन दोनों के मध्य स्थित है।**

> _विहाय निजदेहास्थां सर्वत्रास्मीति भावयन् ।_
>
> _दृढेन मनसा दृष्ट्या नान्येक्षिण्या सुखी भवेत् ॥ १०४ ॥_

**अपने शरीर के प्रति चिन्ता का परित्याग करो। दृढ़ मन और किसी अन्य दृश्य के अभाव में यह विश्वास रखो — “मैं सर्वत्र हूँ।”**

**तब व्यक्ति आनन्द को प्राप्त होगा।**

> _घटादौ यच्च विज्ञानमिच्छाद्यं वा ममान्तरे ।_
>
> _नैव सर्वगतं जातं भावयन्निति सर्वगः ॥ १०५ ॥_

**“ज्ञान और इच्छा केवल मुझमें ही नहीं, बल्कि घटों तथा समस्त वस्तुओं में भी विद्यमान हैं।”**

**इस भाव से स्थित होने पर व्यक्ति सर्वव्यापक हो जाएगा।**

> _ग्राह्यग्राहकसंवित्तिः सामान्या सर्वदेहिनाम् ।_
>
> _योगिनां तु विशेषोऽस्ति सम्बन्धे साधनता ॥ १०६ ॥_

**विषय और विषयज्ञ की जागरूकता समस्त प्राणियों में समान होती है, किन्तु योगियों की विशेषता यह है कि वे सदैव आत्म-जागरूक रहते हैं।**

> _स्ववदन्यशरीरेऽपि संवित्तिमनुभावयेत् ।_
>
> _अपेक्षां स्वशरीरस्य त्यक्त्वा व्यापी दिनैर्भवेत् ॥ १०७ ॥_

**अपने शरीर की चिन्ता त्यागकर यह निरन्तर विश्वास रखो कि वही चेतना मुझमें भी है और अन्य देहों में भी।**

**कुछ ही दिनों में व्यक्ति सर्वव्यापक हो जाएगा।**

> _निराधारं मनः कृत्वा विकल्पान्न विकल्पयेत् ।_
>
> _तदात्मपरमात्मत्वे भैरवो मृगलोचने ॥ १०८ ॥_

**हे मृगनयनी, समस्त विचारों को रोक देने से मन असमर्थित हो जाता है।**

**तब आत्मा ईश्वर के परमात्मस्वरूप में परिणत होती है।**

> _सर्वज्ञः सर्वकर्ता च व्यापकः परमेश्वरः ।_
>
> _स एवाहं शैवधर्मा इति दार्ढ्याद्भवेच्छिवः ॥ १०९ ॥_

**ईश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् और सर्वव्यापक है। दृढ़ विश्वास रखो — “मुझमें भी ईश्वर के वही गुण हैं।”**

**तब व्यक्ति स्वयं ईश्वरस्वरूप हो जाता है।**

> _जलस्येवोर्मयो वाह्नोर्ज्वालाभंग्यः प्रभा रवेः ।_
>
> _ममैव भैरवस्येता विश्वभङ्गयो विभेजिताः ॥ ११० ॥_

**जिस प्रकार तरंगें जल से, ज्वालाओं से, और सूर्य प्रकाश से उत्पन्न होती हैं, उसी प्रकार यह सम्पूर्ण सृष्टि के विविध रूप मुझसे, अर्थात ईश्वर से, प्रकट हुए हैं।**

> _आधारेष्वथबाऽशक्त्याऽज्ञानाच्चित्तलेयन वा ।_
>
> _जातशक्तिसमावेशक्षोभान्ते भैरवं वपुः ॥ ११२ ॥_

**जब शक्ति या ज्ञान का अभाव होता है, तब मन लय को प्राप्त होता है और व्यक्ति शक्ति में लीन हो जाता है।**

**अन्ततः जब वह शक्ति शांत हो जाती है, तब ईश्वर प्रकट होता हैं।**

> _कूपादिके महागर्ते स्थित्वोपरि निरीक्षणात् ।_
>
> _अविकल्पमतेः सम्यक् सद्यश्चित्तलयः स्फुटम् ॥ ११५ ॥_

**किसी गहरे कुएँ के ऊपर खड़े होकर उसकी गहन गर्त में बिना पलक झपकाए दृष्टि डालो। तब मन पूर्णतः विचारशून्य हो जाता है और तत्क्षण लय को प्राप्त होता है।**

> _यत्र यत्र मनो याति बाह्ये वाम्भयन्तरेऽपि वा ।_
>
> _तत्र तत्र शिवावस्था व्यापकत्वात् क्व यास्यति ॥ ११६ ॥_

**मन जहाँ भी जाए — बाह्य या आन्तरिक — सर्वत्र शिव का ही स्वरूप है। जब ईश्वर सर्वव्यापक है, तो मन जा ही कहाँ सकता है?**

> _यत्र यत्राक्षमार्गेण चैतन्यं व्यज्यते विभोः ।_
>
> _तस्य तन्मात्रधर्मित्वाच्चिल्लयाद्भरितात्मा ॥ ११७ ॥_

**जब भी किसी इन्द्रिय के माध्यम से जागरूकता बढ़े, उस जागरूकता में ही स्थित रहो। तब मन विलीन हो जाएगा और व्यक्ति परमात्मा से परिपूर्ण हो जाएगा।**

> _क्षुताद्यन्ते भयॆ शोकॆ गह्वरे वा रणाद् द्रुते ।_
>
> _कुतूहले क्षुधाद्यन्ते ब्रह्मसत्तामयी दशा ॥ ११८ ॥_

**छींक की आरम्भ और समाप्ति के क्षणों में, संकट के समय, शोक, रोधन, रणभूमि से पलायन, जिज्ञासा की अवस्था में तथा भूख के आरम्भ और अन्त में — ये सभी अवस्थाएँ ईश्वर-स्थिति से परिपूर्ण होती हैं।**

> _वस्तुषु स्मर्यमाणेषु दृष्टे देशे मनस्त्यजेत् ।_
>
> _स्वशरीरं निराधारं कृत्वा प्रसरति प्रभुः ॥ ११९ ॥_

**अपने शरीर की चिन्ता त्यागकर किसी स्थान, वस्तु या घटना के दृश्य को स्मरण करो। तब मन असमर्थित हो जाएगा और व्यक्ति दिव्यता की एक प्रबल तरंग का अनुभव करेगा।**

> _क्वचिद्वस्तुनि विन्यस्य शनैर्द्रुष्टिं निवर्तयेत् ।_
>
> _तज्ज्ञानं चित्तसहितं देवि शून्यालयो भवेत् ॥ १२० ॥_

**किसी वस्तु को देखने के पश्चात, दृष्टि को धीरे-धीरे उससे लौटा लो, फिर उस वस्तु के ज्ञान और विचार को भी लौटा लो।**

**हे देवी, तब व्यक्ति शून्य में स्थित हो जाएगा।**

> _भक्त्युद्रेेकाद्विरक्तस्य यादृशी जायते मतिः ।_
>
> _सा शक्तिः शाङ्करी नित्यं भावयेत्तां ततः शिवः ॥ १२१ ॥_

**भक्ति की प्रचुरता और वैराग्यपूर्ण स्वभाव से दिव्य ऊर्जा की अनुभूति का जन्म होता है। व्यक्ति को निरन्तर उसी स्वरूप में स्थित रहना चाहिए। तब शिव प्रकट होते हैं।**

> _वस्त्वन्तरे वेद्यमाने शनैर्वस्तुषु शून्यता ।_
>
> _तामेव मनसा ध्यात्वा विदितोऽपि प्रशाम्यति ॥ १२२ ॥_

**यह समझो कि प्रत्येक वस्तु अपने भीतर शून्य है। शून्यता सभी वस्तुओं का स्वभाव है। विचार-रहित मन के साथ उसी शून्यता पर ध्यान करो।**

**तब, यद्यपि वस्तु देखी या जानी जाती है, व्यक्ति शान्त हो जाता है।**

> _किञ्चिज्ज्ञैर्या स्मृता शुद्धिः साऽशुद्धिः शम्भुदर्शने ।_
>
> _न शुचिर्ह्यशुचिस्तस्मान्निर्विकल्पः सुखी भवेत् ॥ १२३ ॥_

**जिन वस्तुओं को अल्पज्ञानी शुद्ध मानते हैं, वे शैव दर्शन में न तो शुद्ध हैं और न अशुद्ध।**

**जो व्यक्ति द्वैतपूर्ण विचारों से ऊपर उठ जाता है, वह पूर्ण आनंद को प्राप्त करता है।**

> _सर्वत्र भैरवो भावः सामान्येष्वपि गोचरः ।_
>
> _न च तद्व्यतिरेकेण परोऽस्तीत्यद्वया गतिः ॥ १२४ ॥_

**ईश्वर सर्वत्र विद्यमान है और सबमें समान रूप से स्थित है। ईश्वर के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है।**

**इस ज्ञान के साथ व्यक्ति अद्वैत की अवस्था को प्राप्त करता है।**

> _समः शत्रौ च मित्रे च समो मानावमानयोः ।_
>
> _ब्रह्मणः परिपूर्णत्वादिति ज्ञात्वा सुखी भवेत् ॥ १२५ ॥_

**जब यह ज्ञात हो जाता है कि ईश्वर सम्पूर्ण सृष्टि में पूर्ण रूप से व्याप्त है, तब व्यक्ति शत्रु और मित्र, मान और अपमान — सबके प्रति समान भाव रखता है।**

**ऐसी भावना से वह आनन्द को प्राप्त करता है।**

> _न द्वेषं भावयेत् क्वापि न रागं भावयेत् क्वचित् ।_
>
> _रागद्वेषविनिर्मुक्तौ मध्ये ब्रह्म प्रसर्पति ॥ १२६ ॥_

**किसी व्यक्ति या स्थान के प्रति न तो द्वेष की भावना होनी चाहिए, न ही आसक्ति की। इन दोनों के मध्य केन्द्र में स्थित रहने से व्यक्ति राग-द्वेष की द्वैतता से मुक्त हो जाता है।**

**तब वह सर्वत्र व्यापी ईश्वर का अनुभव करता है।**

> _यदवेद्यं यदग्राह्यं यच्छून्यं यदभावगम् ।_
>
> _तत्सर्वं भैरवं भाव्यं तदन्ते बोधसम्भवः ॥ १२७ ॥_

**जो ज्ञान से परे है, ग्रहण से परे है, अभाव से परे है, जो शून्य है — उस समस्त को ईश्वर मानकर चिन्तन करो।**

**अन्ततः उसी से आत्मज्ञान का जन्म होता है।**

> _नित्ये निराश्रये शून्ये व्यापकॆ कलनोज्झिते ।_
>
> _बाह्याकाशे मनः कृत्वा निराकाशं समाविशेत् ॥ १२८ ॥_

**मन को बाह्य आकाश में स्थिर करो — जो नित्य, आधाररहित, शून्य, सर्वव्यापक और निःशब्द है।**

**ऐसा करने से व्यक्ति पूर्णतः आकाशरहित अवस्था में प्रवेश करता है।**

> _यत्र यत्र मनो याति तत्तत् तेनैव तक्षणम् ।_
>
> _परित्यज्यानवस्थित्या निस्तरङ्गस्ततो भवेत् ॥ १२९ ॥_

**जहाँ कहीं मन जाता है, उसी क्षण उस विचार को त्याग देना चाहिए।**

**मन को विचारों में स्थिर न होने देने से व्यक्ति विचारों से मुक्त हो जाता है।**

> _भया सर्वं रवयाति सर्वदो व्यापकोऽखिले ।_
>
> _इति भैरवशब्दस्य सन्ततोच्चारणाच्छिवः ॥ १३० ॥_

**ईश्वर ही समस्त का उद्गम है, वही सर्वत्र और प्रत्येक ध्वनि में व्याप्त है। अतः ‘भैरव’ (ईश्वर) शब्द का निरन्तर जप करने से व्यक्ति स्वयं ईश्वरस्वरूप हो जाता है।**

'तंत्र साधना' ऐप देखें

> _अहं ममेदमित्यादिप्रतिपत्तिप्रसङ्गतः ।_
>
> _निराधारे मनो याति तद्द्यानप्रेरणाच्छ्मी ॥ १३१ ॥_

**“मैं हूँ, यह मेरा है।”**

**— इस अभिप्राय के उत्पन्न होते ही मन को उस पर ले जाओ, जो आधाररहित है।**

**इस ध्यान की प्रेरक शक्ति से व्यक्ति शान्ति प्राप्त करता है।**

> _नित्यो विभुर्निराधारो व्यापकश्चाखिलाधिपः ।_
>
> _शब्दान् प्रतिक्षणं ध्यायन् कृतार्थोऽर्थानुरूपतः ॥ १३२ ॥_

**“नित्य, सर्वत्र उपस्थित, आधाररहित, सर्वव्यापक और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के अधिपति।”**

**— इन शब्दों पर अपने अभिप्रेत लक्ष्य के अनुरूप प्रत्येक क्षण ध्यान करने से व्यक्ति अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है।**

> _अतत्त्वमिन्द्रजालाभमिदं सर्वमवस्थितम् ।_
>
> _किं तत्त्वमिन्द्रजालस्य इति दार्ढ्याच्छमं व्रजेत् ॥ १३३ ॥_

**यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड असत्य है। वह माया या जादूगरी के समान है।**

**“माया में क्या वास्तविक है?”**

**— इस दृढ़ विश्वास से व्यक्ति शान्ति में स्थित होता है।**

> _आत्मनो निर्विकारस्य क्व ज्ञानं क्व च वा क्रिया ।_
>
> _ज्ञानायत्ता बहिर्भावा अतः शून्यमिदं जगत् ॥ १३४ ॥_

**आत्मा अपरिवर्तनीय है। वहाँ ज्ञान या क्रिया कहाँ है? बाह्य अस्तित्व या वस्तुएँ ज्ञान पर आश्रित हैं। अतः यह जगत् शून्य है।**

> _न मे बन्धो न मोक्षो मे भीतस्यैता विभीषिकाः ।_
>
> _प्रतिबिम्बमिदं बुद्धेर्जलेष्विव विवस्वतः ॥ १३५ ॥_

**“मेरे लिए न बन्धन है, न मुक्ति।”**

**जो लोग इन कल्पनाओं से भयभीत हैं, उन्हें इन्हें मन की प्रतिमाओं के रूप में देखना चाहिए, वैसे ही जैसे जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब होता है।**

> _इन्द्रियद्वारकं सर्वं सुखदुःखादिसङ्गमम् ।_
>
> _इतीन्द्रियाणि सन्त्यज्य स्वस्थः स्वात्मनि वर्तते ॥ १३६ ॥_

**सुख और दुःख से सम्पर्क इन्द्रियों के माध्यम से ही होता है। अतः व्यक्ति को इन्द्रियों से स्वयं को अलग करके, अन्तर्मुखी होकर अपनी आत्मा में स्थित होना चाहिए।**

> _ज्ञानप्रकाशकं सर्वेणात्मा प्रकाशकः ।_
>
> _एकमेकस्वभावत्वात् ज्ञानं ज्ञेयं विभाव्यते ॥ १३७ ॥_

**समस्त वस्तुएँ ज्ञाता के द्वारा प्रत्यक्ष होती हैं। आत्मा सब वस्तुओं के माध्यम से प्रत्यक्ष होती है।**

**चूँकि उनका स्वभाव एक ही है, अतः ज्ञाता और ज्ञेय को एक ही रूप में देखो।**

> _मानसं चेतना शक्तिरात्मा चेति चतुष्टयम् ।_
>
> _यदा प्रिये परिक्षीणं तदा तद्भैरवं वपुः ॥ १३८ ॥_

**मन, बुद्धि, प्राणशक्ति और सीमित अहंभाव — हे प्रिय देवी, जब यह चतुष्टय लय को प्राप्त होता है, तब ईश्वर की अवस्था प्रकट होती है।**

> _निस्तरङ्गोपदेशानां शतमुक्तं समासतः ।_
>
> _द्वादशाभ्यधिकं देवि ! यज्ज्ञात्वा ज्ञानविज्जनः ॥ १३९ ॥_

**हे देवी, मैंने संक्षेप में वे ११२ ध्यान-विधियाँ वर्णित की हैं, जिनके द्वारा व्यक्ति अपने मन को स्थिर कर सकता है।**

**इनका ज्ञान प्राप्त करने से व्यक्ति प्रज्ञावान हो जाता है।**

> _अत्र चैकतमे युक्तो जायते भैरवः स्वयम् ।_
>
> _वाचा करोति कर्माणि शापानुग्रहकारकः ॥ १४० ॥_

**इनमें से किसी एक साधना में निपुण हो जाने पर व्यक्ति ईश्वर से एकत्व प्राप्त करता है, और ईश्वर उसके भीतर प्रकट होता है।**

**तब वह केवल वचन मात्र से कोई भी कार्य सम्पन्न कर सकता है।**

**उसमें शाप या वर प्रदान करने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है।**

> _अजरामरतामेति सोSणिमादिगुणान्वितः ।_
>
> _योगिनीनां प्रियो देवि ! सर्वमेलापकाधिपः ॥ १४१ ॥_
>
> _जीवन्नपि विमुक्तोSसौ कुर्वन्नपि च चेष्टितम् ।_

**वह अमर और वृद्धावस्था से रहित, हो जाता है। उसमें अणु के समान सूक्ष्म होने का सामर्थ्य तथा अन्य सिद्धियाँ प्रकट होती हैं।**

**हे देवी, वह योगिनियों का प्रिय तथा आध्यात्मिक सभाओं का अधिपति बन जाता है। जीवित रहते हुए ही वह मुक्त हो जाता है।**

**यद्यपि वह लौकिक कर्म करता है, तथापि उनसे अप्रभावित रहता है।**

> _श्रीदेवी उवाच —_
>
> _इदं यदि वपुर्देव परायाश्च महेश्वर ! ॥ १४२ ॥_
>
> _एवमुक्तेऽव्यवसथ्यायां जप्यते को जपश्च कः ।_
>
> _ध्यायते को महानाथ पूज्यते कश्च तृप्यति ॥ १४३ ॥_
>
> _हूयते कस्य वा होमो यागः कस्य च किं कथम् ।_

**देवी ने कहा —**

**हे देव, यदि परम सत्ता का स्वरूप ऐसा ही है जैसा आपने वर्णित किया है, तो निरन्तर जप किसका किया जाए और क्या जपा जाए?**

**हे महेश्वर, ध्यान किस पर किया जाए, पूजा किसकी की जाए और तुष्टि किसे प्रदान की जाए?**

**अर्घ्य किसे अर्पित किया जाए, यज्ञ किसके लिए किया जाए और किस प्रकार किया जाए?**

> _श्रीभैरव उवाच —_
>
> _एषात्र प्रक्रिया बाह्या स्थूलेष्वेव मृगेक्षणे ॥ १४४ ॥_
>
> _भूयो भूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या ।_
>
> जपः सोSत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप्य ईदृशः ॥ १४५ ॥

**भगवान ने कहा —**

**हे मृगनयनी, जिन साधनाओं का तुमने उल्लेख किया है, वे बाह्य हैं और केवल स्थूल रूपों से सम्बन्ध रखती हैं। उस परम सत्ता पर बारम्बार किया गया ध्यान ही निरन्तर जप है।**

**व्यक्ति को अपने भीतर स्वयमेव और निरन्तर गूँजने वाले नाद का मंत्र के रूप में ध्यान करना चाहिए। यही वास्तविक मंत्र जप है।**

> _ध्यानं हि निश्चला बुद्धिर्निराकारा निराश्रया ।_
>
> _न तु ध्यानं शरीराक्षिमुखहस्तादिकल्पना ॥ १४६ ॥_

**ध्यान वह अचल एकाग्रता है, जो निराकार और निराधार होती है।**

**देवता के शरीर, नेत्र, मुख और करों वाले कल्पित रूप पर एकाग्र होना ध्यान नहीं है।**

> _पूजा नाम न पुष्पाद्यैर्या क्रियते दृढ़ा ।_
>
> _निर्विकल्पे परे व्योम्नि सा पूजा ह्यादराल्लयः ॥ १४७ ॥_

**पुष्प आदि का अर्पण उपासना नहीं कहलाता। हृदय को दृढ़तापूर्वक उस परम आकाश में स्थिर करना चाहिए, जो विचार से परे है।**

**उस प्रेम से ईश्वर के साथ एकत्व होता है। वही वास्तविक उपासना है।**

> _अत्रैकतमयुक्तस्थे यत्पद्येत दिनाद्दिनम् ।_
>
> _भरिताकारता सात्र तृप्तिरत्यन्त पूर्णता ॥ १४८ ॥_

**यहाँ वर्णित ध्यानों में से किसी एक में भी दृढ़ता से स्थित होने पर व्यक्ति प्रतिदिन चेतना की वृद्धि का अनुभव करता है, जब तक कि वह परमावस्था को प्राप्त न हो जाए।**

**इसी को यहाँ तुष्टि कहा गया है।**

> _महाशून्यालये वह्नौ भूताक्षविषयादिकम् ।_
>
> _हूयते मनसा सार्धं स होमश्चेतनास्रु चा ॥ १४९ ॥_

**चेतना को करछुल बनाकर इन्द्रियों, इन्द्रिय-विषयों और मन को परम शून्य की अग्नि में समर्पित करके विलीन करना ही वास्तविक आहुति है।**

> _योगोऽत्र परमेशानि तुष्टिरानन्दलक्षणा ।_
>
> _क्षपणात्सर्वपापनां त्राणात्सर्वस्य पार्वति ॥ १५० ॥_
>
> _रुद्रशक्तिसमावेशस्तत्क्षेत्रं भावना परा ।_
>
> _अन्यथा तस्य तत्त्वस्य का पूजा कश्च तृप्यति ॥ १५१ ॥_

**हे पारवती, अपने समस्त पापों का नाश करके व्यक्ति पूर्णतः परम सत्ता में लीन हो जाता है, और तुष्टि-रूप आनन्द को प्राप्त करता है। इसी को इस प्रणाली में बलिदान कहा गया है।**

**ईश्वर और शक्ति का एकीकरण — वही परम अवस्था तीर्थस्थल के समान माननी चाहिए। अन्यथा, अपने वास्तविक स्वरूप में रहते हुए, कौन उपासना करेगा और किसे तुष्ट करेगा?**

> _स्वतन्त्रानन्दचिन्मात्रसारः स्वात्मा हि सर्वतः ।_
>
> _आवेशनं तत्स्वरूपे स्वात्मनः स्नानमीरितम् ॥ १५२ ॥_

**आत्मा का सार पूर्णतः स्वतंत्रता, आनन्द और चैतन्य से निर्मित है।**

**अपने सीमित अहंभाव को अपने सत्य स्वरूप में विलीन कर देना ही स्नान है।**

> _यैरेव पूज्यते द्रव्यैस्तर्प्यते वा परापरः ।_
>
> _यश्चैव पूजकः सर्वः स एवैकः क्व पूजनम् ॥ १५३ ॥_

**जिन वस्तुओं से पूजा की जानी है, अथवा जिनसे परा और अपरा वास्तविकता को तुष्ट किया जाना है — उपासक और ईश्वर — ये सब वस्तुतः एक ही हैं। तो फिर यह उपासना किसके लिए?**

> _व्रजेत् प्राणो विशोज्जीव इच्छया कुटिलाकृतिः ।_
>
> _दीर्घतिमा सा महादेवी परक्षेत्रं परापरा ॥ १५४ ॥_
>
> _अस्यामनुचरन् तिष्ठन् महानन्दमयेऽध्वरे ।_
>
> _तया देव्या समाविष्टः परं भैरवमाप्नुयात् ॥ १५५ ॥_
>
> _षट् शतानि दिवा रात्रौ सहस्राण्यैकविंशति ।_
>
> _जपो देव्याः समुद्दिष्टः प्राणस्त्यान्ते सुदुर्लभः ॥ १५६ ॥_

**श्वास स्वभावतः बाहर जाता है और भीतर आता है, वक्र रूप में। वह ऊपर और नीचे, दूर तक पहुँचता है। वही महादेवी परम तीर्थस्थान है।**

**यह अग्नि (देवी) परमानन्द से परिपूर्ण है। उसकी गति का अनुसरण करके उसी में स्थित होने से व्यक्ति उसके साथ पूर्णतः एकत्व को प्राप्त करता है। तब देवी के माध्यम से वह ईश्वर को प्राप्त करता है।**

**जब श्वास बाहर जाता है तब ‘स’ ध्वनि और भीतर प्रवेश करता है तब ‘ह’ ध्वनि उत्पन्न होती है। “हंस, हंस” — यह मंत्र प्रत्येक जीव के द्वारा निरन्तर जपा जाता है…**

**एक दिन और एक रात्रि में २१६०० बार। इस देवीस्वरूप निरन्तर जप का पूर्ण विवरण यही है, और सहजता से प्राप्य है। यह कठिन केवल मूढ़जनों के लिए है।**

> _इत्येतत् कथितं देवि परमामृतमुत्तमम् ।_
>
> _एतच्च नैव कस्यापि प्रकाश्यं तु कदाचन ॥ १५७ ॥_
>
> _परशिष्ये खले क्रूरे अभक्ते गुरुपादयोः ।_
>
> _निर्विकल्पमतीनां तु वोराणामुन्नतात्मनाम् ॥ १५८ ॥_

**हे देवी, इन शब्दों के माध्यम से मैंने परम उपदेश का विवेचन किया है, जो व्यक्ति को अमरत्त्व की सर्वोच्च अवस्था तक ले जाता है। यह शिक्षा किसी अयोग्य व्यक्ति को प्रदान नहीं करनी चाहिए…**

**…विशेषतः अन्य परंपरा के शिष्यों को, या ऐसे शिष्यों को जो दुष्ट, क्रूर और अपने गुरु के प्रति अविश्वासी हों। इसके विपरीत, इसे निःसंकोच उन साहसी व्यक्तियों को दिया जा सकता है, जिनके मन संदेहों से मुक्त हैं…**

> _भक्तानां गुरुवर्गस्य दातव्यं निर्विशङ्कया ।_
>
> _ग्रामो राज्यं पुरं देशः पुत्रदारकुटुम्बकम् ॥ १५९ ॥_
>
> _सर्वमतत् परित्यज्य ग्राह्यमेतंमृगेक्षणे ।_
>
> _किमेभिरस्थिरैर्देवि स्थिरं परमिदं धनम् ॥ १६० ॥_

**और जो अपने गुरुवर्ग, कुल, राज्य, नगर, देश, संतान, पत्नी और परिवार के प्रति निष्ठावान हैं।**

**हे मृगनयनी, इस सबको त्याग देना चाहिए। ये क्षणभंगुर वस्तुएँ किस काम की?**

**इसके स्थान पर, हे देवी, इस उपदेश को ग्रहण करना चाहिए, जो शाश्वत परम सम्पदा की ओर ले जाता है।**

> _प्राणा अपि प्रदातव्या न देयं परमामृतम् ।_

**जीवन को भी त्याग दिया जा सकता है, परन्तु यह उपदेश, जो अमरत्त्व के परम अमृत की ओर ले जाता है, अयोग्य व्यक्तियों को नहीं दिया जाना चाहिए।**

> _श्रीदेवी उवाच —_
>
> _देवदेव ! महादेव ! परिप्तास्मि शङ्कर ॥ १६१ ॥_
>
> _रुद्रयामलतन्त्रस्य सारर्मद्यावधारितम् ।_
>
> _सर्वशक्तिप्रभेदानां हृदयं ज्ञातमद्य च ॥ १६२ ॥_

**देवी ने कहा —**

**हे देव, हे देवों के देव, हे महादेव, मैं पूर्णतः तुष्ट हूँ।**

**अब मैंने पूर्णतः रुद्रायमाल तंत्र का सार तथा विभिन्न स्तरों की ऊर्जा का सार समझ लिया है।**

> _इत्युक्त्वाऽऽनन्दिता देवी कण्ठे लग्ना शिवस्य तु ॥ १६३ ॥_

**इन शब्दों को कहने के पश्चात्, आनन्द से परिपूर्ण देवी ने भगवान् को आलिंगन किया।**

**और वे पुनः एकाकार हो गए।**

## भगवान् काल भैरव एवं माँ भैरवी की जागृति : 'तंत्र साधना' ऐप

तंत्र की रहस्यमयी साधनाएँ अब गुप्त नहीं रहीं। प्रबुद्ध संन्यासी ओम स्वामी द्वारा निर्मित ‘तंत्र साधना’ ऐप दशमहाविद्याओं की उपासना हेतु एक डिजिटल माध्यम है।

ओम स्वामी की तपस्या तथा तांत्रिक अनुष्ठानों में उनकी सिद्धि से संस्कारित यह ऐप दशमहाविद्याओं का आवास है — उनके जागृत तांत्रिक मंत्रों तथा उनकी मुख्य गूढ़ साधनाओं का केंद्र।

साधक अपनी यात्रा माँ काली से आरम्भ करता है और क्रमशः प्रत्येक महाविद्या का आवाहन करते हुए माँ कमलात्मिका पर पूर्णता को प्राप्त करता है। माँ भैरवी दशमहाविद्याओं में पाँचवीं देवी हैं।

![An illustration of a 4-armed Ma Bhairavi in a red sareee, sitting atop 5 skulls and holding a Japa Mala  and a sacred scripture in 2 of Her hands while the other 2 display Abhaya and Varada Mudras.](https://prod.superblogcdn.com/site_cuid_cmcefnv6x0009hoe0r2qjyjo4/images/39164b19fb32cfc5a03b7dd32fe4d0e6-1762836729642-compressed.jpg)

साधक को उनकी तांत्रिक मंत्र दीक्षा प्राप्त होती है, वह जप तथा यज्ञ पूर्ण करता है, और अंततः उनकी मुख्य साधना — पंच मुंडी साधना — को प्राप्त करता है, जिसमें पाँच मुंडों का आवाहन [रुद्रयामल तंत्र](https://hinduonline.co/Scriptures/Tantra/Rudrayamala.html) में वर्णित भैरवी कवच के माध्यम से किया जाता है।

यद्यपि ऐप में अभी भगवान् भैरव का कोई विशिष्ट रूप नहीं है, तथापि उन्हें माँ काली साधना में उनकी रक्षक शक्ति के रूप में भगवान् शिव तथा भगवान् रुद्र के साथ आवाहित किया जाता है।

माँ काली की उपासना करने वाला साधक काल भैरव की भी उपासना करता है।

इन दिव्य शक्तियों को अपने जीवन में आमंत्रित करें और अपनी आध्यात्मिक यात्रा को रूपांतरित करें। आज ही माँ तथा भगवान् का आवाहन करें।

माँ की कृपा को जागृत करें। परमात्मा के प्रेम में निमग्न हो जाएँ।

माँ केवल उन्हीं को बुलाती हैं जो उनकी उपासना के लिए तैयार होते हैं। यदि आप यहाँ हैं, तो आप तैयार हैं। दशमहाविद्याओं को जागृत करें। और भक्ति में आरोह करें।

[माँ की कृपा को जागृत करें](https://tantra-sadhana-app.onelink.me/jgcg/24u3wjsu)
## FAQs
Q: भगवान् काल भैरव कौन हैं?
A: <p>काल भैरव भगवान् शिव का उग्रतम स्वरूप हैं, जो काल एवं धर्म (सृष्टि-व्यवस्था) के रक्षक हैं। वे भगवान् शिव के तृतीय नेत्र से प्रकट हुए थे, भगवान् ब्रह्मा के अहंकार एवं अज्ञान का नाश करने हेतु उनका पाँचवाँ मस्तक विच्छिन्न करने के लिए।
<br><br></p>

Q: काल भैरव मदिरा का पान क्यों करते हैं?
A: <p>काल भैरव भक्तों द्वारा अर्पित मदिरा का पान प्रतीकात्मक रूप से करते हैं — यह उनकी इन्द्रियों पर पूर्ण विजय का द्योतक है। वे संसार की समस्त अशुद्धियों का भक्षण करते हैं, पर स्वयं उनसे कभी कलुषित नहीं होते।<br></p>

Q: काल भैरव इतने शक्तिशाली क्यों हैं?
A: <p>काल भैरव अत्यन्त शक्तिशाली हैं क्योंकि वे शिव की अनियन्त्रित ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के प्रतिरूप हैं — काल, मरण और कर्म के अधिपति। जब ब्रह्मा ने अहंकारवश असत्य कहा था, तब शिव का दिव्य क्रोध भैरव के रूप में प्रकट हुआ था।<br></p>

Q: काल भैरव के ८ रूप क्या हैं?
A: <p>काल भैरव के ८ मुख्य रूप अष्टभैरव कहलाते हैं — असितांग भैरव, रुरु भैरव, चण्ड भैरव, क्रोध भैरव, उन्मत्त भैरव, कपाल भैरव, भीषण भैरव तथा संहार भैरव।<br></p>

Q: काल भैरव की उपासना का प्रभाव क्या है?
A: <p>काल भैरव की उपासना भय, अज्ञान, अहंकार और कर्मबन्धन को नष्ट करती है, रक्षण देती है और तीव्र आध्यात्मिक प्रगति सुनिश्चित करती है। कहा जाता है कि उनकी आराधना साधक को तांत्रिक शक्ति-उपासना के मार्ग हेतु तैयार करती है और अन्ततः उसी की ओर ले जाती है।<br></p>

Q: काल भैरव को प्रसन्न कैसे करें?
A: <p>काल भैरव को प्रसन्न करने के लिए प्रतिदिन उनके स्तोत्रों और मन्त्रों का जप किया जाता है तथा विधिपूर्वक उनकी पूजा सम्पन्न की जाती है। जिन साधकों को गुरु दीक्षा प्राप्त है, वे गुरु-उपदिष्ट विधि से पूजन करके, तथा अन्य साधक काल भैरव अष्टकम् जैसे पवित्र स्तोत्रों का प्रतिदिन पाठ करके भैरव कृपा प्राप्त कर सकते हैं।<br></p>




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