योग और तंत्र : योगाभ्यास कैसे होता है तांत्रिक उपासना में सहायक
इस लेख में आप पढ़ेंगे —
आध्यात्मिक परम्परा में तंत्र योग का वास्तविक अर्थ और उद्देश्य
तंत्र योग कैसे भिन्न है हठयोग और राजयोग जैसे अन्य योग मार्गों से
कैसे तंत्र और योग का संगम होता है और आध्यात्मिक उत्क्रान्ति को रूप देता है
योग क्या है?
आज ‘योग’ इस शब्द सुनते ही मन में तुरन्त आसनों और प्राणायाम की छवि उभर आती है। आधुनिक आरोग्य-उद्योगों के जगत में योग को प्रायः केवल शरीर-स्वास्थ्य, मानसिक तनाव-निवारण और विश्रान्ति के एक साधन तक सीमित कर दिया गया है।

परन्तु वैदिक दर्शन में योग शारीरिक अभ्यास से कई अधिक है।यह मनःशान्ति और अन्तःसंयोग का एक पवित्र अभ्यास है।
संस्कृत शब्द ‘योग’ निष्पन्न है ‘युज्’ धातु से, जिसका अर्थ है जोड़ना, मिलाना अथवा एकीकृत करना। यह जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का द्योतक है।
योग का प्राचीनतम उल्लेख ऋग्वेद (५.८१.१) में प्राप्त होता है—
“युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः...”
अनुवाद :
बुद्धिमान जन अपने मन और विचारों को एकाग्र करते हैं। वे व्यापक, सर्वज्ञ सविता की वंदना में पवित्र अनुष्ठान करते हुए ब्रह्माण्डीय व्यवस्था की दिशा निर्धारित करते हैं।
अतः योग मन का नियमन है — विचार, ऊर्जा और कार्य को उच्चतर चैतन्य के साथ सामंजस्य में लाने हेतु एक साधन।
आन्तरिक समत्व के रूप में योग : भगवद्गीता का सन्दर्भ
भगवद्गीता (२.४८) में भगवान श्रीकृष्ण योग को समत्व के रूप में परिभाषित करते हैं—
“योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥”
अनुवाद :
अपने समस्त दैनिक कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए निरंतर समत्व-भाव में स्थित रहो, हे अर्जुन), सफलता और असफलता की आसक्तियों का त्याग करके। यही समत्व योग है।
पतंजलि के योगसूत्रों में वर्णित योग
महर्षि पतंजलि ने योग, उसकी साधनाओं तथा उसके लाभों संबंधी अपने ज्ञान का सूत्रात्मक रूप में संहिताकरण किया है। इन्हें योग-सूत्र कहा जाता है। उन्होंने अपने ग्रंथ ‘पतंजलि योगसूत्र’ में योग की स्पष्ट परिभाषा तथा उसकी अष्टांग व्यवस्था को अत्यंत सूक्ष्मता और वैज्ञानिकता के साथ ४ भिन्न पादों अथवा विभागों में प्रस्तुत किया है—समाधि पाद, साधना पाद, विभूति पाद, और कैवल्य पाद।
“योगः चित्तवृत्तिनिरोधः।”
पतंजलि योगसूत्र I/2
अनुवाद :
योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है।
उन्होंने योग के ८ अंग इस प्रकार निर्दिष्ट किए हैं :
“यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार
धारणा ध्यान समाधयः अष्टौ अङ्गानि।”
पतंजलि योगसूत्र II/29
अनुवाद :
स्वानुशासन (यम), नियम, आसन, प्राण-नियमन (प्राणायाम), इन्द्रिय-विषयों से मन का संह��ण (प्रत्याहार), एकाग्रता (धारणा), ध्यान तथा समाधि)—ये योग के ८ अंग हैं।
योग के प्रकार : काल में एक यात्रा
योग एक एकीकृत प्रणाली नहीं, अपितु विभिन्न मार्गों का परिवार है। प्राचीन भारतीय शास्त्र योग के कई भिन्न परंतु परस्पर सम्बद्ध रूपों का वर्णन करते हैं, जो प्रत्येक आत्मा को ईश्वर की ओर ले जाने का एक अलग मार्ग प्रदान करते हैं।
मंत्र योग
योग का सबसे प्राचीन रूप, मंत्र योग, पवित्र ध्वनि कंपन(मंत्र) के माध्यम से चैतन्य को उच्चतर करने का साधन है। यह ऋग्वे�� और अथर्ववेद में वर्णित है तथा ध्वनि-संवेग द्वारा दिव्य ऊर्जा को आवाहित करने पर केन्द्रित है।
ज्ञान योग
ज्ञान और आत्म-परीक्षण का मार्ग, ज्ञान योग, उपनिषदों से उत्पन्न हुआ है और भगवद्गीता में विस्तृत किया गया है—
“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते...”
— भगवद्गीता ४.३८
ज्ञान से अधिक शुद्ध करने वाला कुछ भी नहीं है।
यह योग साधक को विवेक द्वारा माया से परे ले जाता है।
कर्म योग
कर्म योग निष्काम कर्म का मार्ग है, जो फल की आसक्ति से रहित होता है।
“ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम...”
— भगवद्गीता ३.३
कुछ लोग ज्ञान मार्ग का अनुसरण करते हैं, अन्य कर्म मार्ग का।
यह हमारे हृदय को शुद्ध करता है और हमें आन्तरिक जागृति हेतु तैयार करता है।
भक्ति योग
भक्ति का योग ईश्वर के प्रति निःशर्त प्रेम पर केन्द्रित है।

“ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः...”
— भगवद्गीता १२.६–७
जो लोग अविचल भक्ति के साथ सभी कर्मों को मुझमें समर्पित करते हैं, उन्हें मैं जन्म-मरण के सागर से शीघ्र मुक्त कर देता हूँ।
अष्टांग योग
ध्यान योग के नाम से भी प्रसिद्ध, अष्टांग योग पतंजलि के योग सूत्रों में ८ अंगों के मार्ग के रूप में प्रतिपादित है :
१. यम
२. नियम
३. आसन
४. प्राणायाम
५. प्रत्याहार
६. धारणा
७. ध्यान
८. समाध��

“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”
— योगसूत्र १.२
योग मनोवृत्तियों के निरोध का नाम है।
कुण्डलिनी योग
सुषुप्त कुण्डलिनी शक्ति की जागृति पर केन्द्रित, यह योग चक्रों (ऊर्जा केन्द्रों) को सक्रिय करता है और चैतन्य को उच्चतर स्तर पर ले जाता ह��।

हठयोग
हठयोग १०वीं–१५वीं शताब्दी ईस्वी के बीच विकसित हुआ और इसका मुख्य उद्देश्य है शरीर और प्राण के शुद्धिकरण द्वारा उच्चतर ध्यानावस्था की तैयारी करना।
‘हठयोग’ ‘ह’ और ‘ठ’ योग से व्युत्पन्न है, जो २ बीज मंत्रों (बीजाक्षरों) का संयोजन है। ‘ह’ प्राण, अर्थात् जीवन-शक्ति का प्रतीक है, और ‘ठ’ मन, अर्थात् मानसिक ऊर्जा का। अतः हठयोग का अर्थ प्राणिक और मानसिक शक्तियों का संघटन है। जब यह घटित होता है, तब साधक के भीतर एक महान घटना घटती है—उच्चतर चेतना की जागृति।
हठयोग के अनेक प्रामाणिक आचार्यों में एक विशिष्ट व्यक्तित्व स्वात्माराम हैं, जिन्होंने शुद्धि-विज्ञान के रूप में ‘हठयोग प्रदीपिका’ (हठयोग पर प्रकाश) का संकलन किया। प्रदीपिका का अर्थ ‘स्वयं-प्���काशमान’ अथवा ‘प्रकाश प्रदान करने वाला' है। यहाँ यह संकेतित करता है कि यह ग्रंथ साधकों के लिए शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक समस्याओं के बहुविध पक्षों को प्रकाशमान करता है।
हठयोगप्रदीपिका जैसे ग्रंथ निम्नलिखित अभ्यासों का वर्णन करते हैं—
आसन
प्राणायाम
मुद्राएँ
बन्ध
षट्कर्म (शुद्धि क्रियाएँ)
आज के योग केंद्र प्रायः हठयोग के आसन ही सिखाते हैं, यद्यपि कुछ केंद्र इसक��� ऊर्जा-गहन स्वरूप पर भी ध्यान देते हैं।
शैव योग परम्परा का ग्रन्थ अमनस्क, जिसका काल १२वीं शताब्दी माना जाता है, वामदेव और भगवान शिव के मध्य हुआ एक संवाद है। इसके द्वितीय अध्याय में ग्रन्थ राजयोग का उल्लेख करता है। इसमें कहा गया है कि इसे राजयोग इसलिए कहा गया है क्योंकि यह योगी को अपने भीतर स्थित उस तेजस्वी नरेश तक पहुँचाने में समर्थ बनाता है, जो परमस्वरूप आत्मा है। राजयोग को उस लक्ष्य के रूप में घोषित किया गया है जहाँ साधक अविक्षुब्ध आनन्द का ही अनुभव करता है—शान्त, प्रशान्त, स्वाभाविक अवस्था का, जिसमें आन्तरिक एकात्मता और तृप्ति का बोध होता है।
राजयोग का यह लक्ष्य और अवस्था अमनस्क, उन्मनी तथा सहज जैसे विभिन्न नामों से भी अभिहित की जाती है।
राजयोगः समाधिश्च उन्मनी च मनोन्मनी | अमरत्वं लयस्तत्त्वं शून्याशून्यं परं पदम || ३ ||
अमनस्कं तथाद्वैतं निरालम्बं निरञ्जनम | जीवन्मुक्तिश्च सहजा तुर्या चेत्येक-वाचकाः || ४ ||
सलिले सैन्धवं यद्वत्साम्यं भजति योगतः | तथात्म-मनसोरैक्यं समाधिरभिधीयते || ५ ||
यदा संक्ष्हीयते पराणो मानसं च परलीयते | तदा समरसत्वं च समाधिरभिधीयते || ६ ||
तत-समं च दवयोरैक्यं जीवात्म-परमात्मनोः | परनष्ह्ट-सर्व-सङ्कल्पः समाधिः सोऽभिधीयते || ७ ||
— हठयोगप्रदीपिका, ४.३
अनुवाद :
जिस प्रकार जल में घुला हुआ लवण उसके साथ एकरूप हो जाता है, उसी प्रकार आत्मा और मनस् (मन) का संयोग समाधि कहलाता है।
जब श्वास क्षीण हो जाती है और मन प्रलीयमान (स्थिर, पुनः लीन) हो जाता है, तब दोनों का जो ऐक्य होता है, वही समाधि नाम से अभिहित है।
जीवात्मा और परमात्मा—इन दोनों की यह समता, यह एकत्व, जब समस्त संकल्प (इच्छाएँ, आकांक्षाएँ) समाप्त हो जाते हैं, समाधि ���हलाती है।
हठयोगप्रदीपिका में स्वात्माराम यम और नियम के रूप में आत्मसंयम और आत्मानुशासन की कोई विशेष चिन्ता नहीं करते। यहाँ क्रम पूर्णतः भिन्न है। वे यह कहकर आरम्भ करते हैं कि सर्वप्रथम सम्पूर्ण शरीर का शोधन होना चाहिए—उदर, आंत्र, स्नायु-तंत्र तथा अन्य तंत्रों का। अतः षट्कर्म पहले आते हैं, अर्थात् नेति, धौती, बस्ति, कपालभाति, त्राटक और नौलि। हठयोग का आरम्भ इन्हीं साधनाओं से होता है।
किन्तु केवल षट्कर्म ही सम्पूर्ण हठयोग नहीं हैं। ग्रन्थ में कहा गया है कि षट्कर्म के पश्चात् आसन और प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। आत्मसंयम और आत्मानुशासन का आरम्भ शरीर से होना चाहिए, जो अपेक्षाकृत सरल है। आसन अनुशासन है; प्राणायाम अनुशासन है; कुम्भक (श्वास-निरोध) आत्मसंयम है। इसके उपरान्त वज्रोली, सहजोली, खेचरी, शांभवी, विपरीतकरणी आदि मुद्राओं का अभ्यास करना चाहिए। इस प्रकार गहन ध्यान में प्रविष्ट होना सम्भव होता है। ये साधनाएँ प्रत्याहार को उत्पन्न करती हैं और धारणा, ध्यान तथा समाधि की ओर ले जाती हैं।
तंत्र योग
उपर्युक्त सभी योग-रूपों की भांति, जो ईश्वर की ओर मार्ग प्रशस्त करते हैं, तंत्र योग — यद्यपि पश्चिमी देशों में सबसे अधिक भ्रांत समझा जाने वाला योग है — वास्तव में समन्वय का मार्ग है।
यह शरीर, श्वास, मंत्र, अनुष्ठान और कुण्डलिनी जागृति को सम्पूर्ण आध्यात्मिक उत्क्रान्ति की एक प्रणाली में सम्मिलित करता है।
तंत्र योग का उल्लेख अमृतसिद्धि तथा नाथ परंपरा के ग्रंथों में मिलता है, जो १०वीं–१२वीं शताब्दी ईस्वी के हैं।
अन्य योगमार्गों के विपरीत — जो त्याग, ध्यान या भक्ति पर अधिक बल देते हैं — तंत्र योग शरीर और भौतिक जगत को बाधा नहीं, अपितु आध्यात्मिक यात्रा के अनिवार्य अंग मानता है।
इसके अभ्यास शारीरिक जीवनशक्ति और सूक्ष्म ऊर्जा के बीच सामंजस्य स्थापित करने हेतु रचित हैं, जो अन्ततः चैतन्य के विस्तार की ओर ले जाते हैं।
तंत्र योग को कौल योग भी कहा जाता है। तंत्र और योग के सम्मिलन की इस प्रणाली में प्राण (जीवन-शक्ति) और भौतिक शरीर पर आधारित शाश्वत सूत्र निहित है।
यह समन्वय साधक को इन २ शक्तियों के बीच संतुलन स्थापित करके द्वैत-मायाओं से परे उठने और उच्चतर योगात्मक अवस्थाओं तक पहुँचने में सहायक होता है।
योग में जीवन और चेतना को प्रकृति और पुरुष कहा जाता है; तंत्र में इन्हें शक्ति और शिव के नाम से जाना जाता है। हठयोग में इन्हें इड़ा और पिंगला कहा गया है, तथा ताओ मत में यिन और यांग। भिन्न-भिन्न कालों और भिन्न-भिन्न दर्शन-पद्धतियों में इनके नाम अलग-अलग रहे हैं। यह स्थूल शरीर, जैसा कि दिखाई देता है, सूक्ष्म का स्थूल प्रकटीकरण है, और वह सूक्ष्म विचारों तथा भावनाओं से निर्मित है। इन सबका आधार और मूल स्रोत शुद्ध चेतना है, जिसे हम द��व्य मानते हैं।
इसका अर्थ यह है कि भौतिक शरीर का आधार स्वयं दिव्य है, और इसलिए योग की साधनाओं के द्वारा शरीर के भौतिक तत्त्वों का अभौतिक तत्त्वों में रूपान्तरण सम्भव है। द्रव्य ऊर्जा में परिवर्तित हो सकता है और ऊर्जा पुनः द्रव्य में। इसी प्रकार यह शरीर आत्मतत्त्व में परिवर्तित हो सकता है और आत्मतत्त्व पुनः द्रव्यरूप धारण कर सकता है। यही माया (मोहशक्ति) और सृष्टि का सनातन क्रीड़ाचक्र है। चूँकि यह चिरन्तन है, इसलिए किसी को भी यह मानने का कोई कारण नहीं है कि उसका शरीर अपवित्र या अकल्याणकारी है और उस पर ध्यान न दिया जाए। तंत्रयोग इस प्रकार की दृष्टि की संस्तुति नहीं करता।
इतिहास में ऐसे महान् संतों के उदाहरण मिलते हैं, जिनके विषय में कहा जाता है कि उन्होंने अपने शरीर को प्रकाश-कणों में रूपान्तरित कर लिया और जब उन्होंने इस लौकिक अस्तित्व का त्याग करना चाहा, तो पूर्णतः विलीन हो गए। उनके स्थूल भौतिक शरीर का कोई अवशेष नहीं रहा। तंत्रयोग के अनुसार शरीर केवल मां�� और अस्थियों का संघात नहीं है, न ही मात्र मज्जा और असंख्य स्रावों का समुच्चय; वह अत्यन्त सूक्ष्म शक्ति का स्थूल प्रकटीकर��� है, जो प्राण और मनस्-शक्ति के रूप में ध्रुवीकृत है।
योग एवं तंत्र अथवा तंत्र योग?
तंत्र एक आध्यात्मिक विज्ञान है — दिव्य एकत्व की ओर ले जाने वाला पवित्र मार्ग।
‘तंत्र’ शब्द ‘तन्’ (इन्द्रिय अथवा मानसिक विस्तार) और ‘त्र’ (संवर्द्धन अथवा संरक्षण) से बना है।
अतः तंत्र शरीर के माध्यम से चेतना का विस्तार करने की विधि है — भोग के लिए नहीं, बल्कि अतिक्रमण के लिए।
तंत्र योग, जैसा कि पूर्वोक्त है, मन, शरीर और आत्मा की स्थिरता प्राप्त करने का मार्ग है, जो विधियों, प्राणायाम, मंत्र जप तथा कुण्डलिनी जागृति के समन्वयसे सिद्ध होता है।
हठयोग के समान इसमें भी आसनों तथा प्राणायाम (श्वास-नियंत्रण) की क्रमबद्ध विधियाँ सम्मिलित होती हैं, किन्तु यह आध्यात्मिक साधना के ऊर्जात्मक एवं क्रियात्मक पक्षों प��� अधिक गहन बल देता है।
तंत्र योग का ऊर्जात्मक सार उद्भूत होता है — शक्ति (सृजनात्मक, गतिशील स्त्री-तत्त्व) तथा शिव (संहारक, स्थिर पुरुष-तत्त्व) के आराधन से — अर्थात् ब्रह्माण्ड के गतिशील और स्थिर सिद्धान्तों का संतुलन, या प्रकृति तथा अस्तित्व की द्वैत भावना का साम्य।

इस सिद्धान्त में शरीर को ऊर्जा जागृति के उपकरण के रूप में देखा जाता है, जो चार प्रमुख साधनाओं के माध्यम से सम्पन्न होता है —
आसन – शारीरिक मुद्राएँ
प्राणायाम – श्वास का नियंत्रण
मुद्रा – हस्त-मुद्राएँ अथवा ऊर्जाबन्ध
षट्कर्म – शुद्धीकरण की क्रियाएँ
मुद्राएँ सरल हस्त-चालों से लेकर उन उन्नत संयोजनों तक हो सकती हैं, जिनमें आसन, श्वास एवं मांसपेशीय बन्धनों का समावेश होता है।
षट्कर्म, जिसे प्रायः क्रिया भी कहा जाता है, ऐसे शुद्धिकरण अभ्यासों का समूह है जो शरीर को निर्मल करके ऊर्जा-मार्गों को प्रशस्त करते हैं।
जो योगी अथवा योगिनियाँ तंत्र योग का अभ्यास करते थे, उन्हीं ने अनेक ऐसे आसनों और प्राणायाम विधियों का रूप निर्माण किया जो आगे चलकर हठयोग की आधारशिला बने।
यह कहना उचित होगा कि तंत्र योग और हठयोग में विशेष अन्तर नहीं है — वे दर्शन और साधना, दोनों ही स्तरों पर, अत्यन्त गहराई से परस्पर गुंथे हुए हैं।
तंत्र योग एवं हठयोग में अंतर
हठयोगप्रदीपिका में नाथ परम्परा के स्वामी स्वात्माराम ने प्राचीन हठयोग सम्बन्धी ज्ञान को संकलित किया, जो अमृतसिद्धि जैसे ग्रन्थों तथा गोरक्षनाथ के उपदेशों से प्रेरित था।
हठयोगप्रदीपिका आगे चलकर हठयोग पर लिखे गए अत्यन्त प्रभावशाली ग्रन्थों में से एक बनी, जिसमें साधना के चार प्रमुख अंगों का निरूपण किया गया है —
आसन (शारीरिक मुद्राएँ)
प्राणायाम (श्वास-नियंत्रण)
मुद्राएँ (बन्ध अथवा हस्त-मुद्राएँ)
समाधि (ध्यानमग्न अवस्था)
हठयोग का सम्बन्ध राजयोग से भी निकटता से जुड़ा हैं, जो पतंजलि के योगसूत्रों में वर्णित मुख्य ध्यानमार्ग है। यह सम्बन्ध स्पष्ट करता है कि हठयोग, उन उच्च चेतनास्थितियों की प्राप्ति के लिए एक पूर्व-तैयारी का चरण है, जिनकी ओर राजयोग लक्षित है।
साधना में प्रमुख भेद
तंत्र योग और हठयोग अनेक रूपों से समान हैं, पर उनका उद्देश्य और ज़ोर थोड़ा भिन्न हैं।
तंत्र योग में आसनों का प्रयोग चक्रों, अर्थात् शरीर के ऊर्जा-केन्द्रों, को सक्रिय करने के लिए किया जाता है, जिससे कुण्डलिनी ऊर्जा का प्रवाह जागृत हो। यह अभ्यास सामान्यतः श्वास-साधना, ध्यान तथा योगनिद्रा के साथ संयोजित होता है, और इसका ज़ोर चेतना के विस्तार तथा मन को सीमाओं से मुक्त करने पर होता है।
इसके विपरीत, हठयोग आसनों को अधिक शारीरिक अनुशासन के रूप में देखता है, और शारीरिक शुद्धि हेतु षट्कर्मों का उपदेश देता है। यद्यपि अंतिम लक्ष्य देह से अतीत होना है, तथापि यह शारीरिक शुद्धि को उसकी ओर एक अनिवार्य सोपान मानता है—क्योंकि जब हम ध्यान में बैठते हैं, तब हमारी चेतना देह की ओर स्थानांतरित हो जाती है, और उसकी असुविधाएँ अवश्यंभावी रूप से सामने आती हैं। ���से व्यवधानों को दूर करने हेतु ६ क्रियाएँ (नेति, धौती, बस्ति, नौलि, कपालभाति और त्राटक) हठयोग का अभ्यास करने वाले आध्यात्मिक साधकों के लिए आवश्यक हैं।
इसका केंद्र केवल देह-केन्द्रित होना नहीं है, अपितु उन आसनों के माध्यम से स्थिरता और बल का निर्माण करना है, जो देह को प्राणायाम और ध्यान की दीर्घ अवधि तक सहज रूप से बैठने हेतु तैयार करते हैं।
। इसका लक्ष्य आसनों के माध्यम से स्थिरता और शक्ति का विकास करना है, जिससे साधक दीर्घकाल तक प्राणायाम और ध्यान में सहजता से बैठ सके।



इस तैयारी के बिना शरीर अस्थिर या असुविधाजनक हो सकता है, जिससे ध्यान की एकाग्रता बनाए रखना कठिन हो जाता है।
संक्षेप में :
तंत्र योग अधिक ऊर्जामूलक साधना है, जो विधियों, चक्रों तथा कुण्डलिनी जागृति के साथ कार्य करता है।
हठयोग अधिक शारीरिक तैयारी पर केन्द्रित है, जो आसन और श्वास के माध्यम से गहन स्थिरता की आधारभूमि निर्मित करता है।
दोनों ही मार्ग ईश्वर तक ले जाने वाले हैं — केवल आरम्भ के स्थान थोड़े भिन्न हैं।
योग और तंत्र — संक्षेप में
मूलतः, चाहे योग साधना हो या तंत्र साधना, दोनों एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं :
शरीर, मन और आत्मा का एकत्व हमें उस पूर्णता की ओर ले जाता है जो हमारे भीतर पहले से विद्यमान है।
चाहे कोई साधक योग साधना के रूप में सरल आसन से आरम्भ करे, अथवा तंत्र साधना में मंत्र से — अन्तिम लक्ष्य एक ही है : संतुलन का विकास, अन्तःशक्ति की जागृति और गहन चेतना के साथ जीवन का अनुभव।
भिन्न मार्ग, एक गन्तव्य
योग, विशेषतः आसनों और अष्टांग मार्ग के रूप में, आज अत्यन्त लोकप्रिय है। इसे अनेक माध्यमों से सीखा जा सकता है — योग कक्षाओं, ऑनलाइन मार्गदर्शन, पुस्तकों अथवा वर्कशॉप्स जैसे।
विपरीत रूप से, तंत्र साधनाआरम्भिक साधकों के लिए सहज मार्ग नहीं है। यह गहन समर्पण, दीक्षा और प्रायः गुरु-मार्ग��र्शन की अपेक्षा रखता है, क्योंकि इसकी साधनाएँ सूक्ष्म, तीव्र और पवित्र होती हैं।
अपनी साधना यात्रा का आरम्भ करें
तंत्र साधना की शक्ति को वास्तव में जानने और अनुभव करने के लिए आप ‘तंत्र साधना’ ऐप का उपयोग कर सकते हैं — जो हिमालय के सिद्ध ओम स्वामी द्वारा निर्मित एक अद्भुत आध्यात्मिक साधन है।
यह ऐप साधक के लिए पूर्ण गुरु के समान है, जिसके माध्यम से विविध साधनाएँ सुरक्षित और प्रभावी रूप से सम्पन्न की जा सकती हैं। इसके द्वारा आप परमचेतना से दिव्य सम्पर्क का अनुभव कर सकते हैं और ब्रह्माण्डीय संतुलन तथा सामंजस्यके रहस्यों का अनावरण आरम्भ कर सकते हैं।
क्या आप अपनी चेतना के सर्वोच्च और परम रूप से जुड़ने के लिए तत्पर हैं?
Comments
Your comment has been submitted