माँ बगलामुखी जयंती (प्राकट्य दिवस) २०२६ : तिथि, समय एवं महत्त्व
इस लेख में आप पढ़ेंगे :
२०२६ में तिथि एवं समय
माँ बगलामुखी के विषय में
उनके प्राकट्य की कथा
बगलामुखी प्राकट्य दिवस का महत्त्व
'तंत्र साधना' ऐप के गुप्त शक्तिपीठ में उनकी उपासना
२०२६ में तिथि एवं समय
माँ बगलामुखी प्राकट्य दिवस अथवा बगलामुखी जयंती वैशाख शुक्ल अष्टमी को पड़ती है।
२०२६ में — २३–२४ अप्रैल (गुरु–शुक्र)
अष्टमी तिथि — सायं ८:४९ (२३ अप्रैल) से सायं ७:२१ (२४ अप्रैल) तक
माँ बगलामुखी के विषय में
माँ बगलामुखी तंत्र परम्परा की दशमहाविद्याओं में अष्टमी महाविद्या हैं। वे श्रीकुल परम्परा का भी अंग हैं। उनका नाम संस्कृत धातु ‘वल्ग’ से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है संयमित या नियंत्रित करना, जो उनके मूल कार्य को प्रत्यक्ष रूप से दर्शाता है — नकारात्मक शक्तियों को स्थिर अथवा नियंत्रित करने की क्षमता।
वे व्यापक रूप से पीताम्बरा देवी के नाम से विख्यात हैं, जिनकी पहचान उनकी मूर्ति-विज्ञान तथा उपासना में पीत वर्ण के प्रमुख प्रयोग से होती है। उनका वह स्वरूप, जिसमें वे मदनासुर नामक असुर की जिह्वा को पकड़े हुए हैं, हानिकारक वाणी तथा अभिव्यक्ति के नियंत्रण का प्रतीक है।
यह प्रतीक केवल बाह्य शत्रुओं तक सीमित नहीं है, अपितु साधक के भीतर उत्पन्न होने वाले विक्षेपों पर भी लागू होता है, जैसे आवेगपूर्ण प्रतिक्रियाएँ तथा अनियंत्रित विचारों पर।

उनकी साधना परम्परागत रूप से अत्यन्त विशिष्ट फलों से संबद्ध मानी जाती है :
विरोधी तथा शत्रुतापूर्ण शक्तियों का शमन
विवादों में विजय की प्राप्ति, जिसमें न्यायिक तथा प्रतिस्पर्धात्मक परिस्थितियाँ भी सम्मिलित हैं
वाक् सिद्धि (वाणी तथा अभिव्यक्ति पर अधिकार) की प्राप्ति
अन्य कुछ रूपों के विपरीत, जो समृद्धि या मोक्ष का प्रतीक हैं, माँ बगलामुखी हस्तक्षेप तथा नियंत्रण का प्रतीक हैं, जिससे उनकी उपासना उन परिस्थितियों में विशेष रूप से प्रभावशाली बनती है जहाँ निर्णायक क्रिया की आवश्यकता होती है।
रुद्रयामल तंत्र उन्हें स्तम्भन के सिद्धान्त से संबद्ध करता है — अर्थात् विरोधी शक्तियों को तत्काल स्थिर कर देना :
स्तम्भयेत् सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं तथा ।
जिह्वां कीलयते देवी बगलापरमेश्वरी ॥"देवी बगला समस्त शत्रुतापूर्ण शक्तियों की वाणी, मुख एवं गति को रोक देती हैं; वे स्वयं जिह्वा को ही कीलित कर देती हैं।"
उनके प्राकट्य की कथा
उनका प्राकट्य कृत युग (सत्य युग) के अन्त में हुए महाप्रलय से संबद्ध माना जाता है — यह एक अत्यन्त तीव्र ब्रह्माण्डीय अशान्ति का काल था। एक प्रबल आंधी सम्पूर्ण सृष्टि के लिए संकट बन गई, जिसके परिणामस्वरूप सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु ने जगन्माता की आराधना हेतु हरिद्रा सरोवर नामक पवित्र हल्दी-सरः पर घोर तपस्या की। इसके प्रत्युत्तर में जगन्माता ने परिस्थिति को स्थिर करने तथा विनाशकारी शक्तियों को नियंत्रण में लाने का निर्णय लिया।
इसके उपरान्त वे हरिद्रा सरोवर से एक दीप्तिमान पीतवर्णा देवी के रूप में प्रकट हुईं — माँ बगलामुखी। उनके स्वरूप तथा सरोवर से दिव्य, प्रकाशमान किरणें प्रकट होकर समस्त दिशाओं में व्याप्त हो गईं, जिन्होंने उस आंधी को शान्त कर दिया तथा ब्रह्माण्ड में संतुलन पुनः स्थापित किया। यही किरणें आगे चलकर दिव्य ब्रह्मास्त्र के रूप में प्रतिष्ठित हुईं।
उनका यह प्राकट्य रात्रि के समय हुआ बताया जाता है, जो चरम अशान्ति के क्षण में स्थिरता की स्थापना का प्रतीक है। चूँकि वे हल्दी-जल से प्रकट हुईं, अतः वे पीताम्बरी — अर्थात् पीतवर्णा — के नाम से भी विख्यात हैं, और उनकी उपासना प्रायः पीतवर्णीय उपचरों से की जाती है।
उनके प्राकट्य का सन्दर्भ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है — वे अव्यवस्था के चरम बिन्दु पर प्रकट हुईं। इससे उनका स्वरूप एक ऐसी शक्ति के रूप में स्थापित होता है जो केवल संरक्षण ही नहीं करती, अपितु विक्षोभ को उसके मूल स्रोत पर ही स्थिर एवं निष्प्रभावी कर देती है।
साधक के अन्तःकरण में अशान्ति को स्थिर करने की उनकी क्षमता इस तथ्य का प्रतीक है कि वे चंचल मन को शान्त करके साधक को ईश्वर के साक्षात्कार के समीप ले जाती हैं।
बगलामुखी प्राकट्य दिवस का महत्त्व
वैशाख शुक्ल अष्टमी को माँ बगलामुखी की शक्ति के आवाहन हेतु अत्यन्त प्रभावशाली काल माना जाता है। इस दिन उनकी शक्ति विशेषतः सुलभ मानी जाती है, विशेषकर उन साधनाओं के लिए जो जीवन में नियंत्रण, संरक्षण तथा स्थिरीकरण से सम्बद्ध हैं।

इस तिथि का महत्त्व दो स्तरों पर कार्य करता है।
बाह्य रूप से यह विरोध पर विजय प्राप्त करने, संघर्षों के समाधान तथा चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में बढ़त प्राप्त करने से संबद्ध है।
आन्तरिक रूप से यह मानसिक अशान्ति को विराम देने तथा उसे संयमित करने की क्षमता का प्रतीक है, विशेषतः तनाव अथवा उद्वेग के क्षणों में।
इसका तात्पर्य यह है कि माँ की उपासना केवल तंत्र साधकों द्वारा ही नहीं, अपितु उन सभी द्वारा भी की जा सकती है जो अपने दैनिक जीवन में व्यव��ारिक स्पष्टता तथा कौशल की सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं।
'तंत्र साधना' ऐप के गुप्त शक्तिपीठ में उनकी उपासना
हिमालयी संन्यासी ओम स्वामी द्वारा निर्मित 'तंत्र साधना' ऐप दिव्याचार (मानसिक उपासना) के तांत्रिक मार्ग के माध्यम से दशमहाविद्याओं में से प्रत्येक को जागृत करने हेतु एक निःशुल्क तथा विज्ञापन-रहित 'वर्चुअल' यात्रा प्रदान करती है।
माँ काली से आरम्भ होकर माँ कमलात्मिका तक, प्रत्येक महाविद्या का एक पृथक थ्री-डी लोक है, जिसमें साधक प्रविष्ट होकर उनके तांत्रिक मंत्र जप, यज्ञ तथा निर्दिष्ट अवधियों के लिए विशेष तंत्र साधना को अनावृत करके सम्पन्न कर सकता है।
साधक को प्रत्येक अनुष्ठान में चरणबद्ध रूप से मार्गदर्शन प्राप्त होता है। ओम स्वामी द्वारा प्रतिष्ठित एवं जागृत किए गए मंत्र प्रत्यक्षतः शास्त्रीय ग्रन्थों से ग्रहण किए गए हैं।
यह ऐप न केवल अनुभवी दीक्षित साधकों के लिए, अपितु उन प्रारम्भिक स्तर के साधकों के लिए भी एक उत्कृष्ट प्रवेशद्वार है, जिनके पास व्यक्तिगत गुरु नहीं है, किन्तु जो तंत्र की दशमहाविद्याओं की उपासना करना चाहते हैं।
गुप्त शक्तिपीठ
ऐप के महाविद्या क्षेत्र में विशेष अवसरों पर गुप्त शक्तिपीठ प्रकट होता है, और यह व्यक्तिगत महाविद्याओं की उपासना के लिए एक प्रभावशाली तथा सुलभ माध्यम प्रदान करता है, विशेषतः उन साधकों के लिए जो ऐप का उपयोग कर रहे हैं और जिन्होंने अपनी मुख्य दशमहाविद्या यात्रा में अभी तक उनके लोक को खोला नहीं है।
बगलामुखी जयंती के इस दिवस पर माँ बगलामुखी के लिए यह गुप्त शक्तिपीठ साधकों हेतु खुल जाएगा, जहाँ वे उनके जागृत ध्यान श्लोक तथा तांत्रिक मंत्र का जप कर सकेंगे।
माँ की कृपा आपके जीवन को स्थिर करे तथा आपकी आगामी आध्यात्मिक यात्रा में आपको नकारात्मक शक्तियों से संरक्षण प्रदान करे।
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