इस लेख में आप पढ़ेंगे :
२०२७ में तिथि एवं समय
छिन्नमस्ता जयंती का महत्त्व
छिन्नमस्ता जयंती की कथा
छिन्नमस्ता देवी के विषय में
'तंत्र साधना' ऐप में छिन्नमस्ता जयंती का उत्सव मनाएँ
२०२७ में तिथि एवं समय
माँ छिन्नमस्ता प्राकट्य दिवस अथवा छिन्नमस्ता जयंती वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को पड़ती है।
बगलामुखी जयंती २०२७ के प्रमुख समय
२०२७ में : १८-१९ मई (मंगल-बुध)
चतुर्दशी तिथि : १८ मई को अपराह्न ४:०३ बजे से १९ मई को अपराह्न ४:०२ बजे तक
छिन्नमस्ता जयंती का महत्त्व
वैशाख शुक्ल चतुर्दशी, जो छिन्नमस्ता प्राकट्य दिवस अथवा छिन्नमस्ता जयंती की तिथि है, तीव्र तथा परिवर्तनकारी ऊर्जाओं से सम्बद्ध मानी जाती है।
इस दिवस का महत्त्व व्यवहारिक तथा दार्शनिक — दोनों स्तरों पर है। व्यवहारिक स्तर पर उनकी उपासना से निम्न फल प्राप्त होने का विश्वास किया जाता है :
आकस्मिक संकटों तथा विपत्तियों से संरक्षण
भावनात्मक तथा मानसिक बन्धनों से वैराग्य
उच्चतर चेतना की अवस्थाओं की ओर प्रगति

गहन स्तर पर यह दिवस अहंकार तथा मिथ्या पहचान के छेदन के सिद्धान्त का प्रतिनिधित्व करता है। उनकी प्रतीकात्मकता यह संकेत करती है कि रूपान्तरण के लिए मूलभूत भय — जैसे हानि, नियंत्रण तथा पहचान से सम्बन्धित भय — का सामना करना आवश्यक है।
इस कारण यह तिथि विशेष रूप से उन साधकों के लिए प्रासंगिक है जो केवल बाह्य परिणामों की नहीं, अपितु आन्तरिक अनुशासन तथा गहन स्पष्टता की खोज कर रहे हैं।
इसके अतिरिक्त, प्राणतोषिणी तंत्र में उन्हें ऐसी देवी के रूप में वर्णित किया गया है जो भोग तथा मोक्ष — दोनों प्रदान करती हैं, जीवन-शक्ति के इस विरोधाभास को धारण करते हुए :
भोगं मोक्षं च या देवी ददाति साधकाय वै ।
सा छिन्नमस्ता विज्ञेया परमतत्त्वस्वरूपिणी ॥"जो साधक को भोग तथा मोक्ष, दोनों प्रदान करती हैं, वे छिन्नमस्ता कहलाती हैं, जो परम तत्त्व का मूर्त स्वरूप हैं।"
छिन्नमस्ता जयंती की कथा
उनका प्राकट्य प्राणतोषिणी तंत्र तथा शक्तिसंगम तंत्र जैसे तांत्रिक ग्रन्थों में वर्णित है।
कथा के अनुसार, माँ पार्वती अपनी सहायिकाओं, डाकिनी तथा वर्णिनी, के साथ मन्दाकिनी नदी में स्नान करने गईं। स्नान के पश्चात् उनकी सहायिकाओं ने तीव्र भूख व्यक्त की और माँ द्वारा धैर्य रखने के निवेदन के उपरान्त भी बार-बार आहार की याचना की।
तब अपनी असीम करुणा में माँ ने अपना ही सिर छिन्न कर दिया, और उनके कण्ठ से ३ रक्तधाराएँ प्रवाहित हुईं।
२ धाराओं ने उनकी सहायिकाओं का पोषण किया।
तृतीय धारा का पान उनके ही छिन्न सिर द्वारा किया गया।
इस दिव्य कृत्य के द्वारा वे देवी छिन्नमस्ता के रूप में प्रकट हुईं। यह उनके आत्मत्याग तथा असीम पोषण शक्ति का प्रत्यक्ष प्राकट्य है।
छिन्नमस्ता देवी के विषय में
माँ छिन्नमस्ता दशमहाविद्याओं में षष्ठी महाविद्या हैं, और वे काली कुल उपपरम्परा से सम्बद्ध हैं। वे 'प्रचण्ड चण्डिका' के नाम से भी विख्यात हैं तथा कबन्ध शिव की शक्ति के रूप में मानी जाती हैं — भगवान शिव का एक दुर्लभ तांत्रिक स्वरूप, जिसमें उन्हें शिरविहीन दर्शाया जाता है (कबन्ध का अर्थ है शिरविहीन धड़ या काया)। प्रतीकात्मक रूप से यह स्वरूप मन, पहचान तथा अहंकार से परे चेतना का बोध कराता है।
उनका मूर्ति-विज्ञान दशमहाविद्याओं में अत्यन्त विशिष्ट है। वे स्वयंस्वशिरच्छिन्ना हैं, अपने ही सिर को धारण की हुई, और उनकी कण्ठदेश से रक्त की ३ धाराएँ प्रवाहित होती हैं। यह दृश्य विनाश का प्रतीक नहीं, अपितु आत्मत्याग का द्योतक है।
माँ छिन्नमस्ता करुणा तथा निःस्वार्थता के कारण स्वयं का सिर छिन्न करके अपने साथ-साथ अपनी भूखी सहायिकाओं का पोषण करती हैं। उनके कण्ठ से प्रवाहित ३ रक्तधाराएँ प्राणशक्ति के उन ३ नाड़ियों — इड़ा, पिंगला तथा सुषुम्ना — के माध्यम से प्रवाह का प्रतीक हैं, जो जीवन को धारित करती हैं।
ये तीनों धाराएँ कुण्डलिनी शक्ति का भी प्रतिनिधित्व करती हैं, जो सहस्रार चक्र तक पहुँचने हेतु निम्नलिखित ३ ग्रन्थियों (ऊर्जा-गाठों) को भेदती है :
ब्रह्म ग्रन्थि, जो मूलाधार तथा स्वाधिष्ठान चक्र से सम्बद्ध है, जीवन-निर्वाह तथा भय का प्रतिनिधित्व करती है।
विष्णु ग्रन्थि, जो मणिपूर तथा अनाहत चक्र (नाभि तथा हृदय चक्र) से सम्बद्ध है, भावनात्मक आसक्तियों का प्रतिनिधित्व करती है।
रुद्र ग्रन्थि, जो विशुद्धि तथा आज्ञा चक्र (कण्ठ तथा भ्रूमध्य चक्र) से सम्बद्ध है, अहंकार का प्रतिनिधित्व करती है।
यही वह ऊर्जा-प्रक्रिया है जो योग (शक्ति का शिव के साथ दिव्य संयोग) की ओर ले जाती है, जिसे सामान्यतः मोक्ष के नाम से जाना जाता है।

माँ छिन्नमस्ता के मूर्तिशास्त्रीय चित्रण में उन्हें कामदेव और रति — कामना, प्रेम और आकर्षण के हिन्दू देवता — के संभोगरत युगल के ऊपर खड़े हुए भी दर्शाया जाता है। यह प्रतीकत्व दर्शाता है कि माँ उन कामनाओं से परे हैं जो बन्धन उत्पन्न करती हैं, तथा वे अपने भक्तों को भी उनसे ऊपर उठकर मोक्ष प्राप्त करने हेतु प्रेरित करती हैं।
माँ की उपासना ऐतिहासिक रूप से तांत्रिकों, योगियों, अघोरियों तथा नाथ पन्थियों जैसे विशिष्ट साधक-समूहों से सम्बद्ध रही है, जिनमें गोरक्षनाथ जैसे महापुरुष भी सम्मिलित हैं।
किन्तु गृहस्थ भी उनकी शरण ग्रहण कर सकते हैं, संरक्षण तथा तीव्र आन्तरिक परिवर्तन हेतु। उनकी साधना साधक के भीतर स्थित अप्रस्फुटित आसक्तियों तथा बन्धनों को उद्भासित करती है, जिससे वह उनसे मुक्त हो सके।
'तंत्र साधना' ऐप में छिन्नमस्ता जयंती का उत्सव मनाएँ
हिमालयी संन्यासी ओम स्वामी द्वारा निर्मित 'तंत्र साधना' ऐप दिव्याचार (मानसिक उपासना) के तांत्रिक मार्ग के माध्यम से दशमहाविद्याओं में से प्रत्येक को जागृत करने हेतु एक निःशुल्क तथा विज्ञापन-रहित 'वर्चुअल' यात्रा प्रदान करती है।
माँ काली से आरम्भ होकर माँ कमलात्मिका तक, प्रत्येक महाविद्या का एक पृथक थ्री-डी लोक है, जिसमें साधक प्रविष्ट होकर उनके तांत्रिक मंत्र जप, यज्ञ तथा निर्दिष्ट अवधियों के लिए विशेष तंत्र साधना को अनावृत करके सम्पन्न कर सकता है।
साधक को प्रत्येक अनुष्ठान में चरणबद्ध रूप से मार्गदर्शन प्राप्त होता है। ओम स्वामी द्वारा प्रतिष्ठित एवं जागृत किए गए मंत्र प्रत्यक्षतः शास्त्रीय ग्रन्थों से ग्रहण किए गए हैं।
यह ऐप न केवल अनुभवी दीक्षित साधकों के लिए, अपितु उन प्रारम्भिक स्तर के साधकों के लिए भी एक उत्कृष्ट प्रवेशद्वार है, जिनके पास व्यक्तिगत गुरु नहीं है, किन्तु जो तंत्र की दशमहाविद्याओं की उपासना करना चाहते हैं।
गुप्त शक्तिपीठ
छिन्नमस्ता प्राकट्य दिवस पर ऐप का गुप्त शक्तिपीठ माँ छिन्नमस्ता की उपासना हेतु एक सरल माध्यम प्रदान करता है — प्रारम्भिक तथा अनुभवी साधकों, दोनों के लिए।
इस दिन आप इस शक्तिपीठ में प्रवेश करके उनके जागृत ध्यान श्लोक तथा बीजाक्षरों सहित तांत्रिक मंत्र का जप कर सकते हैं, भले ही आपने अभी तक महाविद्या क्षेत्र में उनके मुख्य लोक को खोला न हो।
दिव्याचार (मानसिक उपासना के तांत्रिक मार्ग) के सिद्धान्तों का अनुसरण करते हुए, यह ऐप साधकों को बिना किसी पारम्परिक व्यवस्था अथवा व्यक्तिगत गुरु के भी उनकी साधना में संलग्न होने की सुविधा प्रदान करती है।
इस अवसर का पूर्णतः उपयोग करें, ताकि निःस्वार्थ कर्म, वैराग्य एवं अपनी जीवन-शक्ति पर नियंत्रण के माध्यम से गहन आत्म-परिवर्तन की प्राप्ति की जा सके।