माँ मातंगी जयंती (प्राकट्य दिवस) २०२६ : तिथि, समय एवं महत्त्व

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इस लेख में आप पढ़ेंगे :

  • २०२६ में तिथि एवं समय

  • माँ मातंगी के विषय में

  • उनके प्राकट्य की कथा

  • मातंगी प्राकट्य दिवस का महत्त्व

  • 'तंत्र साधना' ऐप के गुप्त शक्तिपीठ में उनकी उपासना

२०२६ में तिथि एवं समय

माँ मातंगी प्राकट्य दिवस अथवा मातंगी जयंती वैशाख शुक्ल तृतीया को पड़ती है।

२०२६ में — १९-२० अप्रैल (रवि–सोम)

तृतीया तिथि — प्रातः १०:४९ (१९ अप्रैल) से प्रातः ७:२७ (२० अप्रैल) तक

माँ मातंगी के विषय में

माँ मातंगी दशमहाविद्याओं में नवमी हैं। वे अन्य कोई नहीं, अपितु माँ सरस्वती ही हैं, जिनकी तंत्र में माँ मातंगी के रूप में उपासना की जाती है।

दोनों ही औपचारिक ज्ञान, अध्ययन, कलाएँ तथा संरचित अभिव्यक्ति का अधिपत्य रखती हैं। माँ मातंगी स्वस्फूर्त अभिव्यक्ति की भी अधिष्ठात्री हैं — वह परम सृजनात्मकता जो वाणी, संगीत तथा कलाओं के माध्यम से प्रवाहित होती है।

वे वाक् (वाणी), ध्वनि तथा उच्चारण से संबद्ध हैं, तथा विशेष रूप से उन साधकों द्वारा पूजित हैं जो संप्रेषण तथा कलाओं में सिद्धि की कामना रखते हैं।

महाविद्या मातंगी के मूर्ति-विज्ञान का एक चित्रण।
स्रोत : drikpanchang.com

तंत्र के भीतर उनकी भूमिका अत्यन्त सुस्पष्ट है — वे इस बात का अधिपत्य करती हैं कि आन्तरिक बुद्धि किस प्रकार बाह्य अभिव्यक्ति में परिवर्तित होती है। इसमें केवल यह नहीं आता कि कोई क्या जानता है, अपितु यह भी कि वह उसे ���ितनी प्रभावशीलता से व्यक्त कर सकता है। इसी कारण वे वाक् सिद्धि से घनिष्ठ रूप से संबद्ध हैं, जो स्पष्टता, अधिकार तथा प्रभाव के साथ बोलने की क्षमता है।

पुरश्चर्यार्णव में कहा गया है :

अक्षवक्ष्ये महादेवीं मातङ्गी सर्वसिद्धिदाम्।
अस्याः सेवनमात्रेण वाक्-सिद्धिं लभते ध्रुम्॥

“अब मैं महान देवी मातंगी का वर्णन करूँगा, जो समस्त सिद्धियों की प्रदायिनी हैं।

केवल उनकी सेवा (उपासना) करने मात्र से ही मनुष्य निःसंदेह वाणी की सिद्धि प्राप्त करता है।”

उनके प्राकट्य की कथा

माँ मातंगी के विषय में यह मान्यता है कि उनका प्राकट्य वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हुआ — यह अवसर प्रतिवर्ष मातंगी जयंती अथवा मातंगी प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है।

उनकी उत्पत्ति का वर्णन एक रेखीय कथा के रूप में नहीं, अपितु विविध तांत्रिक आख्यानों के माध्यम से किया गया है। एक धारा उनके प्राकट्य को महर्षि मातंग की तीव्र तपस्या से जोड़ती है, जहाँ जगन्माता ने उनकी पुत्री के रूप में मातंगी का स्वरूप धारण किया। दूसरी धारा में उनका उद्भव शिव और शक्ति के उच्छिष्ट (अन्न के अवशेष) से बताया गया है, जो इस सत्य का प्रतीक है कि दिव्यता वहाँ भी विद्यमान है जिसे सामाजिक अथवा आचारगत दृष्टि से त्याज्य माना जाता है।

कुछ परम्पराएँ उन्हें उच्छिष्ट चाण्डालिनी के रूप में वर्णित करती हैं, जहाँ ‘चाण्डालिनी’ संस्कृत में एक बहिष्कृत स्त्री को सूचित करता है। यह उनके उस स्वरूप को प्रकट करता है जो सामाजिक मर्यादाओं तथा शुद्ध-अशुद्ध के कठोर भेदों का अतिक्रमण करता है।

उनकी उत्पत्ति की प्रत्येक कथा में माँ का मूल तत्त्व एक ही है — वे वह ज्ञान और शक्ति हैं जो परम्परागत समाज की सीमाओं के बाहर भी विद्यमान हैं।

मातंगी प्राकट्य दिवस का महत्त्व

मातंगी प्राकट्य दिवस अथवा मातंगी जयंती एक विशेष रूप से प्रासंगिक तथा आध्यात्मिक रूप से प्रभावशाली दिन है, विशेषतः उन सभी के लिए जो संप्रेषण, अध्ययन, रचनात्मकता अथवा अभिव्यक्त बुद्धि के साथ कार्य कर रहे हैं, और विशेषकर जगन्माता के उपासकों के लिए। व्यवहारिक स्तर पर इस दिन का उपयोग स्वयं को निम्न गुणों के साथ सामंजस्य स्थापित करने हेतु किया जाता है :

  • विचार एवं अभिव्यक्ति में स्पष्टता

  • संप्रेषण में सुधार

  • संगीत, कलाओं तथा रचनात्मक अभिव्यक्ति में परिष्कार

शास्त्रीय सन्दर्भ यह स्पष्ट करते हैं कि माँ की कृपा से सीमित बोध वाला व्यक्ति भी वाणी में स्पष्टता तथा प्रभावशीलता विकसित कर सकता है।

स्वामी विवेकानन्द द्वारा शिकागो में दिए गए उनके प्रसिद्ध भाषण का श्वेत-श्याम, ए-आइ द्वारा निर्मित चित्र।
स्वामी विवेकानन्द का अपनी वाक् सिद्धि का प्रदर्शन करते हुए ए-आइ द्वारा निर्मित चित्र

'तंत्र साधना' ऐप के गुप्त शक्तिपीठ में उनकी उपासना

हिमालयी संन्यासी ओम स्वामी द्वारा निर्मित 'तंत्र साधना' ऐप दिव्याचार (मानसिक उपासना) के तांत्रिक मार्ग के माध्यम से दशमहाविद्याओं में से प्रत्येक को जागृत करने हेतु एक निःशुल्क तथा विज्ञापन-रहित 'वर्चुअल' यात्रा प्रदान करती है।

माँ काली से आरम्भ होकर माँ कमलात्मिका तक, प्रत्येक महाविद्या का एक पृथक थ्री-डी लोक है, जिसमें साधक प्रविष्ट होकर उनके तांत्रिक मंत्र जप, यज्ञ तथा निर्दिष्ट अवधियों के लिए विशेष तंत्र साधना को अनावृत करके सम्पन्न कर सकता है।

साधक को प्रत्येक अनुष्ठान में चरणबद्ध रूप से मार्गदर्शन प्राप्त होता है। ओम स्वामी द्वारा प्रतिष्ठित एवं जागृत किए गए मंत्र प्रत्यक्षतः शास्त्रीय ग्रन्थों से ग्रहण किए गए हैं।

यह ऐप न केवल अनुभवी दीक्षित साधकों के लिए, अपितु उन प्रारम्भिक स्तर के साधकों के लिए भी एक उत्कृष्ट प्रवेशद्वार है, जिनके पास व्यक्तिगत गुरु नहीं है, किन्तु जो तंत्र की दशमहाविद्याओं की उपासना करना चाहते हैं।

गुप्त शक्तिपीठ

ऐप के महाविद्या क्षेत्र में विशेष अवसरों पर एक गुप्त शक्तिपीठ प्रकट होता है, जैसे कि ४ नवरात्रियाँ तथा विविध महाविद्या जयंतियाँ। यह सभी उपयोगकर्ताओं को उस दिन की महाविद्या की उपासना करने का अवसर प्रदान करता है।

मातंगी प्राकट्य दिवस (मातंगी जयंती) के लिए यह गुप्त शक्तिपीठ खुल जाएगा।

आप इस तीर्थ में प्रवेश करके उनके जागृत ध्यान श्लोक का जप कर सकते हैं। उनका तांत्रिक मूल मंत्र भी इस दिन आपके लिए अनावृत हो जाएगा, भले ही आप अभी तक उनके मुख्य लोक तक न पहुँचे हों।

मंत्रों की अधिष्ठात्री होने के कारण इस दिन माँ की उपासना साधक के प्रत्येक अन्य अनुष्ठान को अत्यन्त सशक्त बना देती है और आपके एकाग्रता तथा ध्यान को तीक्ष्ण कर देती है।

यह एक स्वर्णिम अवसर है। मातंगी जयंती को केवल एक स्मारक अवसर न रहने दें, अपितु इसे एक व्यवहारिक अवसर बनाएँ, जिसमें आप अपनी अभिव्यक्ति, संप्रेषण तथा सृजन की प्रभावशीलता पर कार्य करें — वे कौशल जो प्रत्यक्ष रूप से दैनिक जीवन तथा अन्य साधनाओं को प्रभावित करते हैं।

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