२१-२२ मार्च २०२७ : फाल्गुन पूर्णिमा, लक्ष्मी जयन्ती, होलिका दहन
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२१ एवं २२ मार्च २०२७ के पर्व
२०२७ में उनकी तिथियाँ एवं समय
'तंत्र साधना' ऐप पर उपासना
२१ एवं २२ मार्च २०२७, हिन्दू पंचांग के अनुसार, ३ महत्त्वपूर्ण पर्वों के शुभ-संयोग का एक दुर्लभ अवसर प्रदान करते हैं — फाल्गुन पूर्णिमा, लक्ष्मी जयंती तथा होलिका दहन। नीचे हम इन सभी अवसरों का सम्यक् विवेचन प्रस्तुत कर रहे हैं, तथा यह भी कि आप अपनी आध्यात्मिक यात्रा में इनसे किस प्रकार लाभान्वित हो सकते हैं।
२१ एवं २२ मार्च २०२७ के पर्व
फाल्गुन पूर्णिमा
सभी पूर्णिमाएँ शुभ मानी जाती हैं और सामान्यतः हिन्दू पर्वों या जयन्तियों के साथ संयोग करती हैं।
फाल्गुन पूर्णिमा, हिन्दू वर्ष की अंतिम पूर्णिमा तिथि, होली तथा लक्ष्मी जयंती के साथ संयोग करती है, जो धन और समृद्धि की देवी माँ लक्ष्मी के आविर्भाव का दिवस है।

फाल्गुन पुष्पन का काल है। वायु सुगंधित हो जाती है, वृक्ष पुष्पित होते हैं, और प्रकृति रस का प्राकटन करती है। अतः फाल्गुन पूर्णिमा भाव-तरंगों को तीव्र करती है, और इसी कारण होली जैसे उत्सव आनंद और भाव-शुद्धि, दोनों को अभिव्यक्त करते हैं।
जब यह पूर्णिमा पूर्ण चन्द्र ग्रहण तथा रक्तिम चन्द्र (ब्लड़ मून) के साथ भी संयोग करती है, तब इसके प्रभाव अत्यधिक प्रबल हो जाते हैं।
लक्ष्मी जयंती
लक्ष्मी जयंती अथवा लक्ष्मी प्राकट्य दिवस देवी लक्ष्मी के आविर्भाव का पावन दिवस है। पुराणों के अनुसार, वे प्रथम बार फाल्गुन पूर्णिमा के दिन समुद्र मन्थन (क्षीरसागर के महान मन्थन) के समय प्रकट हुईं।
फाल्गुन पूर्णिमा प्रायः उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र के साथ संयोग करती है। अतः उत्तर फाल्गुनी के दिन को ही लक्ष्मी जयंती माना जाता है। दीपावली के अवसर पर होने वाले लक्ष्मी पूजन की भाँति, यह भी माँ लक्ष्मी की उपासना तथा उनके आशीर्वाद की कामना हेतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण दिवसों में से एक है।
होलिका दहन
होलिका दहन, जिसे छोटी होली अथवा होलिका दीपक भी कहा जाता है, एक पवित्र हिन्दू अनुष्ठान है जो फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि की रात्रि में, होली की पूर्वसंध्या पर सम्पन्न होता है। यह अनुष्ठान एक विधिवत् अग्निकुण्ड प्रज्वलन के केंद्र में स्थित है तथा धर्म की अधर्म पर विजय, भक्ति की अहंकार पर विजय, तथा दिव्य संरक्षण की विनाशकारी शक्तियों पर विजय का प्रतीक है।

होलिका दहन का आधार प्रह्लाद की पौराणिक कथा है, जो असुर हिरण्यकशिपु का भक्तिपरायण पुत्र था। हिरण्यकशिपु स्वयं को सर्वोच्च मानकर अपनी उपासना की आज्ञा देता था। अनेक धमकियों के उपरान्त भी प्रह्लाद भगवान विष्णु के प्रति अटल श्रद्धावान रहा। उसे मारने के उद्देश्य से राजा ने अपनी भगिनी होलिका की सहायता ली, जिसे अग्नि से अभेद्य माना जाता था। वह प्रज्वलित चिता में प्रह्लाद को लेकर बैठी, परंतु जहाँ प्रह्लाद अपनी अचल भक्ति के कारण अक्षत निकला, वहीं होलिका दग्ध हो गई।
अतः होलिका दहन की अग्नि अहंकार और अधर्म के विनाश तथा निष्कपट भक्ति की विजय का प्रतीक है।
२०२७ में उनकी तिथियाँ एवं समय
फाल्गुन पूर्णिमा और लक्ष्मी जयंती
फाल्गुन पूर्णिमा — २१ एवं २२ मार्च २०२७ (रविवार एवं सोमवार)
शुक्ल पूर्णिमा चंद्रोदय — २१ मार्च २०२७ को सायं ६:३७ बजे
पूर्णिमा तिथि आरम्भ — २१ मार्च २०२७ को सायं ६:२१ बजे
पूर्णिमा तिथि अन्त — २२ मार्च २०२७ को सायं ४:१३ बजे
होलिका दहन
होलिका दहन — २१ मार्च २०२७ (रविवार)
मुहूर्त — सायं ६:३३ बजे से रात्रि ८:५५ बजे तक
रंगवाली होली — २२ मार्च २०२७ (सोमवार)
'तंत्र साधना' ऐप पर उपासना
तंत्र में होलिका दहन की रात्रि को मंत्र की ऊर्जा को जागृत करने तथा मंत्र-सिद्धि (मंत्र पर पूर्ण अधिकार) की प्राप्ति के लिए अत्यन्त प्रभावशाली माना गया है। इस काल में किया गया जप सामान्य से कहीं अधिक फल प्रदान करता है।
लक्ष्मी जयंती और फाल्गुन पूर्णिमा भी इसकी शुभता को और अधिक बढ़ाते हैं।
२१–२२ मार्च २०२७ (रविवार एवं सोमवार) के इन पर्वों का यह अद्वितीय संयोग इसे तंत्र साधना हेतु अत्यन्त शक्तिशाली द्विदिवसीय कालखंड बनाता है, विशेषतः माँ कमलात्मिका की, जो देवी लक्ष्मी का तांत्रिक स्वरूप हैं।
ओम स्वामी द्वारा निर्मित 'तंत्र साधना' ऐप इन २ दिनों में उनका गुप्त शक्तिपीठ कुछ समय के लिये सुलभ करेगा। साधक माँ कमलात्मिका की उपासना ओम स्वामी की वाणी में उनके जागृत ध्यान-श्लोक सहित, जितनी बार इच्छित हो, निःशुल्क कर सकते हैं।
गुप्त शक्तिपीठ की तिथियाँ एवं समय (भारतीय समयानुसार) :
प्रारम्भ : २१ मार्च (रविवार) सायं ५ बजे
समापन : २२ मार्च (सोमवार) प्रातः ७ बजे
'तंत्र साधना' ऐप की मुख्य साधना-यात्रा — जिसमें दशमहाविद्याओं की क्रमशः जागृति कराई जाती है — भी पूर्णतः निःशुल्क तथा विज्ञापन-रहित है। समस्त दक्षिणा स्वैच्छिक है, और उसकी राशि आपके चयन पर निर्भर है।
समस्त अनुष्ठान ओम स्वामी द्वारा जागृत एवं मार्गदर्शित हैं। अतः तंत्र के आरम्भिक साधक होने पर भी किसी त्रुटि की संभावना नहीं रहती।
यह आगामी पावन काल आपको जगन्माता के और भी समीप ले आए, ऐसी मंगलकामना।
सन्दर्भ :
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