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एक चित्रण जिसमें ऋषि अगस्त्य और उनकी पत्नी लोपा मुद्रा के साथ भगवान हयग्रीव संवाद करते हुए दर्शाए गए हैं, जबकि जगन्माता उन्हें निहार रही हैं।

जगन्माता को समर्पित शास्त्रों के विशाल, पवित्र महासागर में कुछ ही ग्रंथ ऐसे हैं जो ललिता त्रिशती के समान दीप्तिमान हैं—और उतने ही गोपनीय रूप से संरक्षित भी।

जहाँ संसार-भर के असंख्य भक्त ललिता सहस्रनाम (१००० नामों) के भव्य जप में आनंद और शांति का अनुभव करते हैं, वहीं त्रिशती (३०० नाम) त्रिपुर सुंदरी उपासना की परंपरा में एक विशिष्ट, रहस्यात्मक स्थान धारण करती है।

ललिता त्रिशती का उद्गम

ललिता त्रिशती की उत्पत्ति-कथा एक साधक की दिव्य असंतुष्टि की अत्यंत रोचक गाथा है। महर्षि अगस्त्य को पहले ही भगवान हयग्रीव—भगवान विष्णु के अश्वमुख अवतार और समस्त ज्ञान के अधिष्ठाता—से देवी के १००० नामों का उपदेश प्राप्त हो चुका था।

फिर भी ऋषि अगस्त्य का हृदय शुष्क बना रहा।

उन्हें एक सूक्ष्म अपूर्णता का बोध हो रहा था, मानो जगन्माता की उपासना का कोई अधिक पूर्ण और अधिक गहन मार्ग हो, जिसे भगवान हयग्रीव प्रकट नहीं कर रहे हों। प्रश्न किए जाने पर भगवान हयग्रीव मौन रहे, क्योंकि वे श्रीविद्या के परम रहस्य की रक्षा करने के लिए एक दिव्य नियम से आबद्ध थे।

ऋषि अगस्त्य की प्रामाणिक तृष्णा को देखकर स्वयं जगन्माता ललिता त्रिपुर सुंदरी प्रकट हुईं, और उन्होंने भगवान् हयग्रीव को ललिता त्रिशती का उपदेश देने की आज्ञा दी, यह घोषित करते हुए कि अगस्त्य और उनकी पत्नी लोपामुद्रा इस परम विद्या के योग्य अधिकारी हैं।

ललिता त्रिशती के माध्यम से माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी की उपासना इस कारण अद्वितीय है कि इसके ३०० नाम किसी भी प्रकार से यादृच्छिक नहीं हैं; वे सीधे उनके पंचदशाक्षरी मंत्र पर आधारित संरचना में स्थित हैं, जिससे यह स्तोत्र स्वयं देवी का सजीव ध्वनि-शरीर बन जाता है। ललिता त्रिशती में इन १५ अक्षरों से प्रत्येक के लिए २० नामों की उत्पत्ति की गई है।

श्रीविद्या परंपरा में ललिता सहस्रनाम की तुलना प्रायः पुष्प की सुगंध से की जाती है, जबकि त्रिशती को स्वयं पुष्प के समान माना गया है। त्रिशती का श्री यंत्र से भी अत्यंत निकट संबंध है। इसके १५ अक्षर श्री चक्र की ज्यामिति के विभिन्न अंगों से संबद्ध माने गए हैं।

तीनों लोकों की साम्राज्ञी : माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी

माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी—लाल वर्ण की देवी—परम श्रीचक्र यंत्र के केन्द्र में विराजमान साम्राज्ञी हैं।

उनका नाम स्वयं एक गहन ध्यान है। ‘ललिता’ का अर्थ है क्रीडामयी—वे देवी जिनके लिए ब्रह्माण्डों की सृष्टि, पालन और लय केवल एक दिव्य लीला है।

श्रीविद्या परंपरा में उनकी उपासना जगन्माता के दीप्त हृदय के रूप में की जाती है, जहाँ सौंदर्य, प्रज्ञा और परम चेतना एक करुणामय सान्निध्य में एकीकृत हो जाते हैं। उन्हें आदि पराशक्ति के परम स्वरूप के रूप में भी पूजित किया जाता है—वह आद्य शक्ति, जो प्रेम की सहज लीला के रूप में जगत की सृष्टि, धारण और संहार करती हैं।

प्रतिमाशास्त्र में माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी को एक युवा, तेजस्विनी देवी के रूप में निरूपित किया गया है, जो कमलासन पर विराजमान हैं। यह संसार के मध्य प्रस्फुटित होने वाली पवित्रता और आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक है।

माँ को प्रायः श्री चक्र पर अथवा देवताओं द्वारा धारित सिंहासन पर आसीन दर्शाया जाता है, जो इस तथ्य का संकेत है कि समस्त देवता, शक्तियाँ और तत्त्व उन्हीं से उत्पन्न होते हैं और उन्हीं में प्रतिष्ठित रहते हैं। उनकी ४ भुजाओं में पाश, अंकुश, इक्षुधनुष और पंचपुष्प बाण सुशोभित हैं। यहाँ धनुष मन का, बाण ५ इन्द्रियों का, पाश माँ के बन्धनकारी प्रेम का, और अंकुश उस कोमल प्रेरणा का प्रतीक है, जो साधक के विचलित होने पर उसे पुनः सत्य की ओर मोड़ देती है।

‘त्रिपुर सुंदरी’ का अर्थ है ३ पुरों अथवा लोकों की सुंदरी। वे हमारे अस्तित्व की ३ अवस्थाओं—जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति—में व्याप्त चेतना हैं, और आनंदमयी बालिका देवी बाला त्रिपुर सुंदरी से लेकर परम सार्वभौम महारानी तक विविध रूपों में अभिव्यक्त होती हैं।

संपन्नता का आश्वासन : ललिता त्रिशती के पाठ के लाभ

श्रीविद्या के साधक इस विशेष स्तोत्र को इतनी विस्मयपूर्ण श्रद्धा से क्यों देखते हैं? इसका उत्तर इसके फलश्रुति में निहित है—अर्थात् ग्रंथ के वे श्लोक, जो इसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों का विस्तृत वर्णन करते हैं।

देवी स्वयं स्पष्ट रूप से कहती हैं कि यह स्तोत्र सर्वपूर्तिकर है—समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला।

फलश्रुति सच्चे साधक के लिए अत्यंत महान फल का विधान करती है। कहा गया है कि त्रिशती विशिष्ट रूप से भोग (सांसारिक सुख और भौतिक स्थिरता) तथा मोक्ष (आध्यात्मिक मुक्ति) के बीच के अंतर को समाप्त कर देती है।

यह साधक से यह अपेक्षा नहीं करती कि वह समृद्ध जीवन और आध्यात्मिक जीवन में से किसी एक का चयन करे; अपितु वे इन दोनों पर अधिपत्य प्रदान करती है।

इस ग्रंथ में शुक्रवार की उपासना पर विशेष और असाधारण बल दिया गया है। इसमें कहा गया है कि शुक्रवार के दिन ललिता त्रिशती का पाठ करने से भक्त और माँ त्रिपुर सुंदरी के मध्य स्थित आवरण लगभग विलीन हो जाता है, जिससे साधना का फल करोड़ों गुना बढ़ जाता है।

जो साधक पूर्ण रूपांतरण, बुद्धि की प्रखर स्पष्टता और जगन्माता की साक्षात् उपस्थिति की अभिलाषा रखते हैं, उनके लिए ललिता त्रिशती आज भी वह परम स्वर्ण-कुंजी बनी हुई है।

सिंहासन पर आसीन माँ त्र���पुरा सुंदरी की मानक प्रतिमात्मक रूप-रचना का एक चित्रण।

ललिता त्रिशती – जगन्माता के ३०० दिव्य नाम

ककाररूपा

प्रकाश का प्रतिनिधि एवं पंचदशाक्षरी मंत्र का प्रथम अक्षर, 'क'

कल्याणी

वे जो शुभ घटनाओं का कारण हैं

कल्याणगुणशालिनी

सद्गुणों की साक्षात मूर्ति

कल्याणशैलनिलया

वे जो कल्याण-रूपी पर्वत की शिखरस्थ निवासिनी हैं

कमनीया

वे जो आकर्षक हैं

कलावती

वे जिनमें ललित कलाएँ निवास करती हैं

कमलाक्षी

कमलों के समान नेत्रों वाली

कल्मषघ्नी

पाप-नाशिनी

करुणामृतसागरा

करुणा के अमृत की सागर

१०

कदम्बकाननावासा

वे जो कदंब के वन में निवास करती हैं

११

कदम्बकुसुमप्रिया

वे जिन्हें कदंब के पुष्प प्रिय हैं

१२

कन्दर्पविद्या

वह दिव्य ज्ञान जिसकी प्रेम के भगवान आराधना करते हैं

१३

कन्दर्पजनकापाङ्गवीक्षणा

वे जिन्होंने प्रेम के भगवान को केवल अपनी दृष्टि से निर्माण किया

१४

कर्पूरवीटी-सौरभ्य-कल्लोलित-ककुप्तटा

वे जो चबे हुए पान की पवित्र सुरभि के साथ जगत को कर्पूर, केसर, इलायची इत्यादि मसालों से सुवासित करती हैं

१५

कलिदोषहरा

वे जो कलियुग के दोषों का विनाश करती हैं।

वे जो सामाजिक वैमनस्य के दुष्प्रभावों का विनाश करती हैं।

१६

कञ्जलोचना

नीलोत्पलों के समान कमल-नेत्रों वाली

१७

कम्रविग्रहा

मनों को चुराने वाली

१८

कर्मादिसाक्षिणी

सर्व क्रियाओं की साक्षी

१९

कारयित्री

वे जो हमसे क्रियाएँ करवाती हैं

२०

कर्मफलप्रदा

कार्यों के फलों की प्रदाता

२१

एकाररूपा

‘ए’ अक्षर, जो परम सत्य का प्रतीक एवं पंचदशाक्षरी मंत्र का द्वितीय अक्षर है

२२

एकाक्षर्या

दिव्य अक्षर, ॐ

२३

एकानेकाक्षराकृति

प्रत्येक अक्षर एवं समस्त वर्णों का मानवीय स्वरूप

२४

एतत्तदित्यनिर्देश्या

वे जो 'यह' या 'वह' कहकर ज्ञात नहीं हो सकतीं

२५

एकानन्दचिदाकृति

परमानंद एवं परम ज्ञान का मानवीय स्वरूप

२६

एवमित्यागमाबोध्या

वे जिनका वर्णन ग्रंथों में नहीं हैं

२७

एकभक्तिमदर्चिता

वे जिनकी उपासना एकाग्र भक्ति द्वारा की जाती है

२८

एकाग्रचितनिर्ध्याता

वे जिनपर एकाग्र चित्त से ही ध्यान किया जा सकता है

२९

एषणारहितादृता

वे जिन्हें आसक्तिरहित लोग आधार देते हैं

३०

एलासुगन्धिचिकुरा

वे जिनके केश इलायची के समान सुवासित हैं

३१

एनःकूटविनाशिनी

पापों के गट्ठों की नाशिनी

३२

एकभोगा

समस्त सुखों को भोगने वाली

३३

एकरसा

प्रेम का सार

३४

एकैश्वर्यप्रदायिनी

वे जो एकमात्र वास्तविक संपत्ति प्रदान करती हैं — मोक्ष

३५

एकातपत्रसाम्राज्यप्रदा

वे जो एक साधक को जगत के सम्राट की शक्ति प्रदान करती हैं

३६

एकान्तपूजिता

वे जिनकी उपासना संपूर्ण एकांत में होती है

३७

एधमानप्रभा

अग्रण्य आभा

३८

एजदनेजज्जगदीश्वरी

गतिमान जगत की देवी

३९

एकवीरादिसंसेव्या

वे जिनकी प्रथम आराधना वीर योद्धाओं द्वारा की जाती है

४०

एकप्राभवशालिन्या

वे जो सर्व परम-शक्तियों की प्रचुरता से युक्त हैं

४१

ईकाररूपा

'ई' अक्षर, जो शक्ति का प्रतीक एवं पंचदशाक्षरी मंत्र का तृतीय अक्षर है

४२

ईशित्री

प्रोत्साहित करने वाली शक्ति

४३

ईप्सितार्थप्रदायिनी

जो माँगा है, उसकी प्रदाता

४४

ईदृगित्याविनिर्देश्या

वे जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता

४५

ईश्वरत्वविधायिनी

वे जो एक साधक को ईश्वर का अनुभव प्रदान करती हैं

४६

ईशानादिब्रह्ममयी

ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र, ईश्वर एवं सदाशिव — इन 5 देवताओं की स्वरूपा

४७

ईशित्वाद्यष्टसिद्धिदा

८ दिव्य शक्तियों की प्रदाता

४८

ईक्षित्री

वे साक्षिणी, जो केवल उन्हीं की इच्छा के कारण अस्तित्व में हैं

४९

ईक्षणसृष्टाण्डकोट्या

वे जो अपनी इच्छा से अरबों जीवों का निर्माण करती हैं

५०

ईश्वरवल्लभा

ईश्वर की पत्नी

५१

ईडिता

वे जिनकी दिव्य ग्रन्थ प्रशंसा करते हैं

५२

ईश्वरार्धाङ्गशरीरा

ईश्वर की अर्धांगिनी

५३

ईशाधिदेवता

भगवान शिव की देवी

५४

ईश्वरप्रेरणकरी

वे जो भगवान शिव को सुझाव देती हैं

५५

ईशताण्डवसाक्षिणी

वे जो भगवान शिव के तांडव-नृत्य की साक्षिणी हैं

५६

ईश्वरोत्सङ्गनिलया

वे जो भगवान शिव की गोद में बैठती हैं

५७

ईतिबाधाविनाशिनी

अनपेक्षित आपदाओं की नाशिनी

५८

ईहाविरहिता

वे जिनमें अप्राप्य को प्राप्त करने की इच्छा नहीं है

५९

ईशशक्ति

ईश्वर में स्थित शक्ति

६०

ईषत्स्मितानना

वे जो हँसमुख हैं

६१

लकाररूपा

'ल' अक्षर, जो ज्ञान की तरंग का प्रतीक है एवं पंचदशाक्षरी मंत्र का चतुर्थीय अक्षर है

६२

ललिता

वे जो सरलता का मूर्त स्वरूप एवं अतीव लीलामय हैं

६३

लक्ष्मीवाणीनिषेविता

वे जिनकी सेवा संपत्ति की देवी, लक्ष्मी, एवं ज्ञान की देवी, सरस्वती, करती हैं

६४

लाकिनी

वे जो सहजतया सुलभ होती हैं

६५

ललनारूपा

सर्व स्त्रियों में स्थित देवी

६६

लसद्दाडिमपाटला

प्रस्फुटित अनार के पुष्प के वर्ण वाली

६७

ललन्तिकालसत्फाला

वे जिनका ललाट दीप्तिमान है तथा उसके मध्य में बिंदु शोभित है

६८

ललाटनयनार्चिता

वे जिनकी योगी उपासना करते हैं।

वे जिनकी उपासना 3 नेत्रों वाले भगवान रूद्र करते हैं।

६९

लक्षणोज्ज्वलदिव्याङ्गी

वे जो देदीप्यमान रूप से उत्तम हैं

७०

लक्षकोट्यण्डनायिका

अरबों ब्रह्माण्डों की अधिष्ठात्री

७१

लक्ष्यार्था

लक्ष्य का सार

७२

लक्षणागम्या

वे जो किसी भी विवरण द्वारा ज्ञात नहीं हो सकतीं

७३

लब्धकामा

वे जिनकी इच्छाएँ पूर्ण हो चुकी हैं

७४

लतातनु

वे जिनका शरीर एक लता के समान कोमल है

७५

ललामराजदलिका

वे जिनके ललाट पर कस्तूरी से अंकित तिलक है

७६

लम्बिमुक्तालताञ्चिता

वे जो लम्बी मोतियों की मालाओं से अपना भूषण करती हैं

७७

लम्बोदरप्रसा

भगवान गणपति की माता

७८

लभ्या

वे जिनकी प्राप्ति हो सकती हैं

७९

लज्जाढ्यायै

वे लज्जारूपा, जो अभक्तजनों से छिपती हैं

८०

लयवर्जिता

वे जो संहार के समय भी जीवित रहती हैं

८१

ह्रीङ्काररूपा

'ह्रीं' अक्षर, जो पंचदशाक्षरी मंत्र का पंचम अक्षर है

८२

ह्रीङ्कारनिलया

वे जो 'ह्रीं' अक्षर में निवास करती हैं

८३

ह्रीम्पदप्रिया

वे जिन्हें 'ह्रीं' अक्षर प्रिय है

८४

ह्रीङ्कारबीजा

वे जो 'ह्रीं' अक्षर में छिपती हैं

८५

ह्रीङ्कारमन्त्रा

वे जिनके मंत्रों में से एक 'ह्रीं' है

८६

ह्रीङ्कारलक्षणा

वे जिनके लक्षणों में से एक 'ह्रीं' है

८७

ह्रीङ्कारजपसुप्रीता

वे जो 'ह्रीं' के जप से प्रसन्न होती हैं

८८

ह्रीम्मती

वे जो 'ह्रीं' को स्वयं में समाती हैं

८९

ह्रींविभूषणा

वे जो 'ह्रीं' को एक आभूषण के रूप में धारण करती हैं

९०

ह्रींशीला

वे जिनमें 'ह्रीं' के समस्त सद्गुण हैं

९१

ह्रीम्पदाराध्या

वे जिनकी 'ह्रीं' के साथ आराधना हो सकती है

९२

ह्रीङ्गर्भा

वे जो 'ह्रीं' को अपनी योनि में समाती हैं

९३

ह्रीम्पदाभिधा

वे जो 'ह्रीं' इस नाम को अपनाती हैं

९४

ह्रीङ्कारवाच्या

वे जो स्वयं 'ह्रीं' का अर्थ हैं

९५

ह्रीङ्कारपूज्या

वे जो 'ह्रीं' के साथ पूजी जाती हैं

९६

ह्रीङ्कारपीठिका

वे जो 'ह्रीं' का मूल आधार हैं

९७

ह्रीङ्कारवेद्या

वे जिनका 'ह्रीं' के द्वारा साक्षात्कार हो सकता है

९८

ह्रीङ्कारचिन्त्या

वे जिनका चिंतन 'ह्रीं' के साथ हो सकता है

९९

ह्रीं

वे जो मुक्ति प्रदान करती हैं

१००

ह्रींशरीरिणी

वे जिनका शरीर 'ह्रीं' है

१०१

हकाररूपा

'ह' अक्षर, जो शत्रुओं का वध करने वाले वीरत्व का प्रतीक है एवं पंचदशाक्षरी मंत्र का षष्ठ अक्षर है

१०२

हलधृत्पूजिता

वे जिनकी आराधना हल धारण करने वाले द्वारा की जाती है

१०३

हरिणेक्षणा

वे जिनके नेत्र मृगों के समान हैं

१०४

हरप्रिया

भगवान शिव की प्रियतमा

१०५

हराराध्या

वे जिनकी भगवान शिव आराधना करते हैं

१०६

हरिब्रह्मेन्द्रवन्दिता

वे जिनका भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु एवं भगवान इंद्र वंदन करते हैं

१०७

हयारूढासेविताङ्घ्री

वे जिनकी अर्चना प्राचीन अश्वारूढ़ योद्धाओं द्वारा की जाती है

१०८

हयमेधसमर्चिता

वे जिनकी अश्वमेध यज्ञ के समय अर्चना होती है

१०९

हर्यक्षवाहना

वे जो एक सिंह पर सवार होती हैं — माँ दुर्गा

११०

हंसवाहना

वे जो एक हंस पर सवार होती हैं — माँ सरस्वती

१११

हतदानवा

असुरों की संहारिणी

११२

हत्त्यादिपापशमनी

वे जो हत्या जैसे पापों के परिणामों को कम करती हैं

११३

हरिदश्वादिसेविता

वे जिनकी उपासना हरे अश्व पर सवार इंद्र करते हैं

११४

हस्तिकुम्भोत्तुङ्गकुचा

वे जिनके स्तन हस्ति के ललाट के समान उच्च हैं

११५

हस्तिकृत्तिप्रियाङ्गना

वे जो हस्ति की खाल धारण करने वाले भगवान शिव की प्रियतमा हैं

११६

हरिद्राकुङ्कुमादिग्धा

वे जिनका शरीर हल्दी एवं सिंदूर में लिप्त है

११७

हर्यश्वाद्यमरार्चिता

वे जिनकी उपासना हरे अश्व पर सवार इंद्र एवं अन्य देव करते हैं

११८

हरिकेशसखी

वे जो हरित-कपिल केशों वाले परमशिव की सखी हैं

११९

हादिविद्या

वे जो ‘ह’ से आरंभ होने वाली पंचदशाक्षरी विद्या हैं, जिसे श्रीविद्या के १२ प्रधान आचार्याओं में से एक लोपामुद्रा ने प्रसारित किया

१२०

हालामदालसा

वे जो क्षीरसागर से उत्पन्न हुए मदिरा से मतवाली हैं

१२१

सकाररूपा

'स' अक्षर, जो भौतिक संपत्ति का प्रतीक है एवं पंचदशाक्षरी मंत्र का सप्तम अक्षर है

१२२

सर्वज्ञा

वे जिनके पास सर्व ज्ञान है

१२३

सर्वेशी

वे जो सबकी अधिष्ठात्री हैं

१२४

सर्वमङ्गला

मंगलता का मानवीय स्वरूप

१२५

सर्वकर्त्री

सर्व क्रियाओं की कर्त्री

१२६

सर्वभर्त्री

वे जो सबका पालन करती हैं

१२७

सर्वहन्त्री

वे जो सबका विनाश करती हैं

१२८

सनातना

वे जो सनातन हैं

१२९

सर्वानवद्या

वे जो निष्कलंक एवं सदा नवीन रहती हैं

१३०

सर्वाङ्गसुन्दरी

वे जिनका प्रत्येक अंग सुंदर है

१३१

सर्वसाक्षिणी

वे जो सबकी साक्षिणी हैं

१३२

सर्वात्मिका

वे जो सबकी आत्मा हैं

१३३

सर्वसौख्यदात्री

समस्त शुभ एवं सुखद वस्तुओं की दात्री

१३४

सर्वविमोहिनी

सभी को मोहित करने वाली

१३५

सर्वाधारा

सभी का मूल आधार

१३६

सर्वगता

वे जो सर्वव्यापी हैं

१३७

सर्वावगुणवर्जिता

वे जिन्होंने अपने समस्त दुर्गुण नष्ट किये हैं

१३८

सर्वारुणा

समस्त जगत का उदय

१३९

सर्वमाता

सभी की माता

१४०

सर्वभुषणभुषिता

वे जो समस्त आभूषणों से भूषित हैं

१४१

ककारार्था

'क' अक्षर, जो प्रकाश का प्रतीक है एवं पंचदशाक्षरी मंत्र का अष्टम अक्षर है

१४२

कालहन्त्री

समय की नाशिनी।

मृत्यु के देवता की नाशिनी।

१४३

कामेशी

इच्छाओं की अधिष्ठात्री

१४४

कामितार्थदा

इच्छाओं की पूर्ति करने वाली

१४५

कामसञ्जीविनी

वे जिन्होंने प्रेम के देव, कामदेव, को पुनर्जीवित किया था

१४६

कल्या

वे जो ललित कलाओं में निपुण हैं।

वे जिनपर ध्यान करना उचित है।

१४७

कठिनस्तनमण्डला

वे जिनका स्तनमण्डल दृढ़ है

१४८

करभोरु

वे जिनकी जांघें हस्ति की सूंढ़ के समान है

१४९

कलानाथमुखी

वे जिनका मुख पूर्णचंद्र के समान है

१५०

कचजिताम्बुदा

वे जिनके केश श्यामवर्ण मेघों के सदृश हैं

१५१

कटाक्षस्यन्दिकरुणा

वे जिनकी दृष्टि करुणामयी है

१५२

कपालिप्राणनायिका

भगवान शिव की पत्नी

१५३

कारुण्यविग्रहा

करुणा का मानवी स्वरूप

१५४

कान्ता

मनों की चोर

१५५

कान्तिधूतजपावली

वे जिनकी आभा पुष्पों से अधिक है

१५६

कलालापा

वे जिनका मधुर स्वर ही एक कलाकृति है

१५७

कम्बुकण्ठी

वे जिनका कंठ शंख के समान है

१५८

करनिर्जितपल्लवा

वे जिनके हस्त नवपल्लवों से भी अधिक कोमल हैं

१५९

कल्पवल्लीसमभुजा

वे जिनकी भुजाएँ कल्पवृक्ष की लताओं जितनी सुंदर हैं

१६०

कस्तूरीतिलकाञ्चिता

वे जिनके ललाट पर कस्तूरी से अंकित तिलक है

१६१

हकारार्था

'ह' अक्षर, जो संपत्ति एवं वीरत्व का प्रतीक है तथा पंचदशाक्षरी मंत्र का नवम अक्षर है

१६२

हंसगति

वे जिनकी चाल हंस के समान है।

वे जो केवल सिद्धात्माओं को प्राप्त होती हैं।

१६३

हाटकाभरणोज्ज्वला

वे जो स्वर्ण के अलंकारों में दीप्त��मान हैं

१६४

हारहारिकुचाभोगा

वे जिनका स्तनमण्डल अलंकारों से सुशोभित है।

वे जिनका स्तनमण्डल भगवान शिव को आकर्षित करता है।

१६५

हाकिनी

समस्त बंधनों की नाशिनी

१६६

हल्यवर्जिता

वे जो अशुभ विचारों को दूर रखती हैं

१६७

हरित्पतिसमाराध्या

वे जिनकी उपासना सर्व दिशाओं के रक्षक देवता करते हैं

१६८

हटात्कारहतासुरा

वे जो वीरता एवं गति से असुरों का संहार करती हैं

१६९

हर्षप्रदा

सुख की दात्री

१७०

हविर्भोक्त्री

वे जो यज्ञ में देवताओं को अर्पित की हुई यज्ञ सामग्री का भोग स्वीकार करती हैं

१७१

हार्दसन्तमसापहा

मन से अंधकार को मिटाने वाली

१७२

हल्लीसलास्यसन्तुष्टा

वे जो वाद्ययंत्रों की संगति में स्त्रियों के गीत एवं नृत्य को देखकर प्रसन्न होती हैं

१७३

हंसमन्त्रार्थरूपिणी

वे जो हंस मंत्र के मर्म को समझती हैं

१७४

हानोपादाननिर्मुक्ता

वे जो इच्छाओं के परे हैं

१७५

हर्षिणी

वे जो एक साधक को सुख प्रदान करती हैं

१७६

हरिसोदरी

भगवान विष्णु की भगिनी

१७७

हाहाहूहूमुखस्तुत्या

वे जिनका 'हाहा' एवं 'हूहू' नामक गंधर्व स्तुति करते हैं

१७८

हानिवृद्धिविवर्जिता

वे जो वृद्धि एवं क्षय के परे हैं

१७९

हय्यङ्गवीनहृदया

वे जिनका ह्रदय मक्खन के समान है

१८०

हरिकोपारुणांशुका

वे जिनका लाल वर्ण है

१८१

लकाराख्या

'ल' अक्षर, जो पंचदशाक्षरी मंत्र का दशम अक्षर है

१८२

लतापुज्यायै

वे जो प्रांजल स्त्रियों द्वारा पूजित हैं

१८३

लयस्थित्युद्भवेश्वरी

वर्तमान एवं संहार के समय की जगन्माता

१८४

लास्यदर्शनसन्तुष्टा

वे जो स्त्रियों के नृत्य से प्रसन्न होती हैं

१८५

लाभालाभविवर्जिता

वे जो लाभ एवं क्षति के परे हैं

१८६

लङ्घ्येतराज्ञा

वे जो आदेशों का पालन नहीं करती।

वे जिनकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।

१८७

लावण्यशालिनी

अतुलनीय सुंदरता एवं लावण्य

१८८

लघुसिद्धदा

वे जो सहजता से शक्ति प्रदान करती हैं

१८९

लाक्षारससवर्णाभा

वे जिनकी आभा लाख के रस के समान दीप्तिमान है

१९०

लक्ष्मणाग्रजपूजिता

वे जिनकी पूजा भगवान राम, अर्थात श्री लक्ष्मण के भ्राता ने की थी

१९१

लभ्येतरा

वे जो कार्यों के परिणामों से भिन्न हैं

१९२

लब्धभक्तिसुलभा

वे जो भक्ति द्वारा प्राप्त होती हैं

१९३

लाङ्गलायुधा

वे जिनका अस्त्र एक हल हैं

१९४

लग्नचामरहस्त-श्रीशारदा-परिवीजिता

वे जिनकी माँ लक्ष्मी एवं माँ सरस्वती पंखा झलकर सेवा करती हैं

१९५

लज्जापदसमाराध्या

वे जिनकी आराधना सन्यासियों के लिए उपयुक्त है

१९६

लम्पटा

वे जो भौतिक सिद्धांतों से छिपती हैं

१९७

लकुलेश्वरी

वे जिनमें संसार के समस्त समुदाय एकाकार होते हैं

१९८

लब्धमाना

वे जिनकी सभी स्तुति करते हैं

१९९

लब्धरसा

वे जिन्होंने परम सुख को प्राप्त किया है

२००

लब्धसम्पत्समुन्नति

वे जिन्होंने संपत्ति की सर्वोच्च सीमा को प्राप्त किया है

२०१

ह्रीङ्कारिणी

'ह्रीं' अक्षर, जो पंचदशी मंत्र का एकादश अक्षर है

२०२

ह्रीङ्काराद्या

वे जो 'ह्रीं' एवं 'ॐ' का स्रोत हैं

२०३

ह्रीम्मध्या

वे जो 'ह्रीं' के मध्य में स्थित हैं।

वे जिनके कारण पृथ्वी के मध्य पर जीवन संभव है।

२०४

ह्रींशिखामणि

वे जो 'ह्रीं' को अपनी सिर पर धारण करती हैं

२०५

ह्रीङ्कारकुण्डाग्निशिखा

वे जो 'ह्रीं' नामक यज्ञ कुण्ड में प्रज्वलित ज्वाला हैं

२०६

ह्रीङ्कारशशिचन्द्रिका

वे जो 'ह्रीं' नामक अमृतमयी चाँदनी की किरणें हैं

२०७

ह्रीङ्कारभास्कररुची

वे जो सूर्य की 'ह्रीं' नामक तीव्र एवं शक्तिशाली किरणें हैं

२०८

ह्रीङ्काराम्भोदचञ्चला

वे जो 'ह्रीं' नामक काले मेघों की विद्युत्-रेखा हैं

२०९

ह्रीङ्कारकन्दाङ्कुरिका

वे जो 'ह्रीं' नामक कंद की अंकुरित लता हैं

२१०

ह्रीङ्कारैकपरायणा

वे जो 'ह्रीं' पर पूर्णतः निर्भर हैं

२११

ह्रीङ्कारदीर्धिकाहंसी

वे जो 'ह्रीं' नामक सरिता में विहार करने वाली हंस हैं

२१२

ह्रीङ्कारोद्यानकेकिनी

वे जो 'ह्रीं' नामक उद्यान में विहार करने वाली मोरनी हैं

२१३

ह्रीङ्कारारण्यहरिणी

वे जो 'ह्रीं' नामक वन में विहार करने वाली मृगी हैं

२१४

ह्रीङ्कारावालवल्लरी

वे जो 'ह्रीं' नामक पुष्पवाटिका की शोभायुक्त लता हैं

२१५

ह्रीङ्कारपञ्जरशुकी

वे जो 'ह्रीं' नामक पिंजरे में स्थित हरितवर्णी शुकी हैं

२१६

ह्रीङ्काराङ्गणदीपिका

वे जो 'ह्रीं' नामक आँगन का प्रकाश हैं

२१७

ह्रीङ्कारकन्दरासिंही

वे जो 'ह्रीं' नामक कमल में क्रीड़ा करने वाली मादा कीट�� हैं

२१८

ह्रीङ्काराम्भोजभृङ्गिका

वे जो 'ह्रीं' नामक कमल में क्रीड़ा करने वाली मादा कीटक हैं

२१९

ह्रीङ्कारसुमनोमाध्वी

वे जो 'ह्रीं' नामक पुष्प में स्थित मधु हैं

२२०

ह्रीङ्कारतरुमञ्जरी

वे जो 'ह्रीं' नामक वृक्ष में स्थित पुष्प गुच्छ हैं

२२१

सकाराख्या

'स' अक्षर, जो पंचदशी मंत्र का द्वादश अक्षर है

२२२

समरसा

वे जो समस्त ब्रह्माण्ड में समभाव से व्याप्त हैं

२२३

सकलागमसंस्तुता

वे जिनकी सर्व दिव्य ग्रन्थ स्तुति करते हैं

२२४

सर्ववेदान्त-तात्पर्यभूमि

वे जो वह स्थान हैं जहाँ पर वेदांत का सर्वोच्च अर्थ ज्ञात होता है

२२५

सदसदाश्रया

वे जो वह स्थान हैं जो साकार एवं निराकार — दोनों का निवास हैं

२२६

सकला

वे जो संपूर्ण हैं।

वे जिनमें समस्त किरणें स्थित हैं।

२२७

सच्चिदानन्दा

परम यथार्थ सुख

२२८

साध्या

वे जो साध्य हैं

२२९

सद्गतिदायिनी

मोक्ष की दात्री

२३०

सनकादिमुनिध्येया

वे जिनका सनक जैसे ऋषि ध्यान करते हैं

२३१

सदाशिवकुटुम्बिनी

भगवान सदाशिव की पत्नी

२३२

सकलाधिष्ठानरूपा

वे जो विभन्न उपासना-पद्धतियों की एकरूप आधारभूता हैं

२३३

सत्यरूपा

सत्य की स्वरूपा

२३४

समाकृती

वे जो सभी के प्रति समभाव रखती हैं

२३५

सर्वप्रपञ्चनिर्मात्री

ब्रह्माण्ड की रचिता

२३६

समानाधिकवर्जिता

वे जो अतुलनीय हैं

२३७

सर्वोत्तुङ्गा

वे जो सर्वश्रेष्ठ हैं

२३८

सङ्गहीना

वे जो असंलग्न हैं

२३९

सगुणा

वे जिनमें समस्त सद्गुण हैं

२४०

सकलेष्टदा

वे जो समस्त अभिलषित वस्तुओं की दात्री हैं

२४१

ककारिणी

'क' अक्षर, जो पंचदशाक्षरी मंत्र का त्रयोदश अक्षर है

२४२

काव्यलोला

परमानंद की स्वरूपा, जैसे ग्रंथों में वर्णित है

२४३

कामेश्वरमनोहरा

वे जो प्रेम के देवता, कामेश्वर, का मन चुराती हैं

२४४

कामेश्वरप्राणनाड़ी

वे जो कामेश्वर के प्राण की संकेतिनी हैं

२४५

कामेशोत्सङ्गवासिनी

वे जो कामेश्वर की वाम गोद पर विराजमान हैं

२४६

कामेश्वरालिङ्गिताङ्गी

वे जो कामेश्वर द्वारा आलिंगित हैं

२४७

कामेश्वरसुखप्रदा

वे जो कामेश्वर को सुख देती हैं

२४८

कामेश्वरप्रणयिनी

कामेश्वर की प्रियतमा

२४९

कामेश्वरविलासिनी

वे जो एक भक्त को कामेश्वर को समझने में सहायता करती हैं

२५०

कामेश्वरतपस्सिद्धि

वे जो कामेश्वर ने पूर्ण की हुई तपस्या का परिणाम हैं

२५१

कामेश्वरमनःप्रिया

वे जो कामेश्वर के मन को सर्वाधिक प्रिय हैं

२५२

कामेश्वरप्राणनाथा

वे जो कामेश्वर के मन की अधिष्ठात्री हैं

२५३

कामेश्वरविमोहिनी

वे जो कामेश्वर के मन को मोहित करती हैं

२५४

कामेश्वरब्रह्मविद्या

वे जो मोक्ष की परम विद्या हैं, जो कामेश्वर द्वारा प्रत्यक्ष हुई थी

२५५

कामेश्वरगृहेश्वरी

वे जो कामेश्वर के गृह की अधिष्ठात्री हैं

२५६

कामेश्वराह्लादकरी

वे जो कामेश्वर को परम सुख प्रदान करती हैं

२५७

कामेश्वरमहेश्वरी

वे जो कामेश्वर की जगन्माता हैं

२५८

कामेश्वरी

वे जिनकी कामेश्वर आराधना करते हैं

२५९

कामकोटिनिलया

वे जो कांचीपुरम में स्थित कामकोटि पीठ पर विराजमान हैं — वह आसन, जिसमें कामेश्वर के प्रेम की ऊर्जा से अरब गुना अधिक शक्ति निवास करती है

२६०

काङ्क्षितार्थदा

इच्छा-पूर्ति करने वाली

२६१

लकारिणी

'ल' अक्षर, जो पंचदशाक्षरी मंत्र का चतुर्दश अक्षर है

२६२

लब्धरूपा

वे जो एक भक्त की कामनाओं की पूर्ति के रूप में प्रकट हुई हैं

२६३

लब्धधि

वे जो उनकी मनीषा के लिए प्रसिद्ध हैं

२६४

लब्धवाञ्छिता

सर्व इच्छाओं की पूर्ति-कर्त्री

२६५

लब्धपापमनोदूरा

वे जो पापियों की पहुँच से परे हैं

२६६

लब्धाहङ्कारदुर्गमा

वे जो अहंकारी व्यक्तियों की पहुँच से परे हैं

२६७

लब्धशक्ति

वे जो अपनी शक्तियों को अपनी इच्छा के अनुसार प्रकट करती हैं

२६८

लब्धदेहा

वे जो एक शरीर को अपनी इच्छा के अनुसार प्रकट करती हैं

२६९

लब्धैश्वर्यसमुन्नति

वे जो समस्त संपत्ति को इच्छा के अनुसार प्रकट करती हैं

२७०

लब्धवृद्धि

वे जो अनंतता तक पहुँच चुकी हैं

२७१

लब्धलीला

वे जो इच्छा के अनुसार क्रीड़ारत होती हैं

२७२

लब्धयौवनशालिनी

वे जो अपनी इच्छा के अनुसार सदा यौवन हैं

२७३

लब्धातिशयसर्��ाङ्गसौन्दर्या

वे जो अपनी इच्छा के अनुसार सर्वाधिक सुंदर हैं

२७४

लब्धविभ्रमा

वे जो लोकों के पालन की लीला का अभिनय करती हैं

२७५

लब्धरागा

वे जो इच्छाओं से युक्त हैं

२७६

लब्धपती

वे जिनके पति भगवन शिव हैं

२७७

लब्धनानागमस्थिति

वे जो दिव्य ग्रंथों के अस्तित्व का कारण हैं

२७८

लब्धभोगा

वे जो स्वयं की इच्छा-पूर्ति से प्रसन्न हैं

२७९

लब्धसुखा

वे जो आराम के सुखों को भोगती हैं

२८०

लब्धहर्षाभिपूजिता

वे जो परमानंद से परिपूर्ण हैं

२८१

ह्रीङ्कारमूर्ति

'ह्रीं' अक्षर, जो पंचदशाक्षरी मंत्र का पंचदश एवं अंतिम अक्षर है

२८२

ह्रीङ्कारसौधशृङ्गकपोतिका

वे जो 'ह्रीं' नामक महल के शिखर पर निवास करने वाली कपोतिका हैं

२८३

ह्रीङ्कारदुग्धब्धिसुधा

वे जो 'ह्रीं' नामक क्षीरसागर से मथी गई मक्खन-अमृत हैं

२८४

ह्रीङ्कारकमलेन्दिरा

वे जो 'ह्रीं' नामक कमल पर विराजमान माँ लक्ष्मी हैं

२८५

ह्रीङ्करमणिदीपार्चि

वे जो 'ह्रीं' नामक भूषणमय दीप की प्रभा हैं

२८६

ह्रीङ्कारतरुशारिका

वे जो ‘ह्रीं’ नामक वृक्ष पर स्थित शारीका हैं

२८७

ह्रीङ्कारपेटकमणि

वे जो ‘ह्रीं’ नामक पेटिका में बंद मोती हैं

२८८

ह्रीङ्कारादर्शबिम्बिता

वे जो ‘ह्रीं’ नामक दर्पण में स्थित प्रतिबिंबि हैं

२८९

ह्रीङ्कारकोशासिलता

वे जो ‘ह्रीं’ नामक को�� में स्थित चमकती तलवार हैं

२९०

ह्रीङ्कारास्थाननृर्तकी

वे जो ‘ह्रीं’ नामक रंगमंच पर स्थित नर्तकी हैं

२९१

ह्रीङ्कारशुक्तिका-मुक्तामणि

वे जो ‘ह्रीं नामक शुक्ति में प्राप्त होने वाला मोती हैं

२९२

ह्रीङ्कारबोधिता

वे जो ह्रीं नामक ध्वनि द्वारा शिक्षिता हैं

२९३

ह्रीङ्कारमयसौर्णस्तम्भविदृम-पुत्रिका

वे जो 'ह्रीं' नामक दीप्तिमान स्तम्भों पर स्थित मूंगे की प्रतिमा हैं

२९४

ह्रीङ्कारवेदोपनिषदा

वे जो 'ह्रीं' नामक वेद के ऊपर स्थित उपनिषद हैं

२९५

ह्रीङ्काराध्वरदक्षिणा

वे जो 'ह्रीं' नामक द्वार से अर्पित की गई दक्षिणा हैं

२९६

ह्रीङ्कारनन्दनारामनवकल्पक-वल्लरी

वे जो 'ह्रीं' नामक नंदन-उद्यान में स्थित नवीन दिव्य वल्लरी हैं

२९७

ह्रीङ्कारहिमवद्गङ्गा

वे जो 'ह्रीं' नामक हिमालय में स्थित गंगा नदी हैं

२९८

ह्रीङ्कारार्णवकौस्तुभा

वे जो 'ह्रीं' नामक सागर से जन्मी हुई रत्न हैं

२९९

ह्रीङ्कारमन्त्रसर्वस्वा

वे जो 'ह्रीं' मंत्र से मथित संपूर्ण संपदा हैं

३००

ह्रीङ्कारपरसौख्यदा

वे जो ‘ह्रीं’ का जप करने वालों को समस्त सुख प्रदान करती हैं

'तंत्र साधना' ऐप पर ललिता त्रिशती के साथ माँ की उपासना

मानव अनुभव की यात्रा वाणी से लिपि तक और आज डिजिटल क्रांति तक विकसित हो चुकी है। वैदिक और तांत्रिक साधना की हमारी प्राचीन परंपराओं को भी इस माध्यम में रूपांतरित होना आवश्यक है, ताकि भावी पीढ़ी के साधक उनसे लाभान्वित हो सकें।

हिमालयी संन्यासी ओम स्वामी द्वारा स्थापित 'तंत्र साधना' ऐप एक समग्र डिजिटल संप्रेषण प्रणाली है। वह ऐसी जाग्रत तांत्रिक साधनाएँ प्रदान करती है, जो परंपरागत रूप से केवल प्रत्यक्ष दीक्षा के माध्यम से ही सुलभ थीं।

इस ऐप में दशमहाविद्याओं—दिव्य स्त्री तत्त्व की १० ब्रह्माण्डीय अभिव्यक्तियों—के ऊर्जित मंत्र समाहित हैं।

क्रमानुसार उपलब्ध होने वाली इन महाविद्याओं में माँ काली और माँ तारा के पश्चात् माँ त्रिपुर सुंदरी तृतीय महाविद्या हैं। यदि आप उनकी उपासना करना चाहते हैं, तो आप उनके बीज मंत्र का जप कर सकते हैं, ललिता त्रिशती के पाठ के साथ यज्ञ कर सकते हैं, तथा शक्तिशाली श्री यंत्र साधना का अनुष्ठान कर सकते हैं।

एक क्रमबद्ध आध्यात्मिक यात्रा

यह ऐप उपयोगकर्ताओं को आध्यात्मिक रूप से स्तरबद्ध पथ पर मार्गदर्शन देने के लिए संरचित है, जिसमें अधिक उन्नत साधनाएँ केवल तभी उपलब्ध कराई जाती हैं, जब साधक आधारभूत साधनाओं के माध्यम से अपनी पात्रता सिद्ध कर देता है।

यह व्यवस्था प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का ही प्रतिबिंब है, और साथ ही इन शिक्षाओं को वैश्विक स्तर पर सुलभ भी बनाती है।

परंपरा और टेक्नोलोजी के मध्य एक जीवंत सेतु

जिस प्रकार महर्षि अगस्त्य और आदि शंकराचार्य ने अपने-अपने युग में धर्म तक पहुँच को पुनर्परिभाषित किया, उसी प्रकार 'तंत्र साधना' ऐप यह सुनिश्चित करती है कि श्री यंत्र साधना जैसी अत्यंत गुह्य उपासना-पद्धतियाँ भी शुद्धता, सम्यक् मार्गदर्शन और भक्ति के साथ विश्व के किसी भी कोने में साध्य हो सकें।

यह केवल एक ऐप नहीं है।

यह एक सजीव मंदिर, आध्यात्मिक संप्रेषण और एक पवित्र दीक्षा है—सब एक-साथ।


​दसों महाविद्याओं की उपासना का दुर्लभ अवसर
इस गुप्त नवरात्रि में समान भाव वाले साधकों के समूह के साथ दश महाविद्याओं की पावन उपासना में सहभागी बनें।

प्रारंभ : १७ जनवरी, सायं ७ बजे (भारतीय समय)।

अधिक जानकारी हेतु व्हाट्सऐप ग्रूप में सम्मिलित हों।


संदर्भ :

kadambakusumam.blogspot.com