सर्वाधिक सुरक्षित तांत्रिक पथ : एक आध्यात्मिक मार्गदर्शिका
इस लेख में आप पढ़ेंगे :
अनुकूलता का प्रश्न
तीन आन्तरिक अवस्थाएँ
तीन शाखाएँ
आरम्भकर्ताओं हेतु सर्वाधिक सुरक्षित तंत्र
'तंत्र साधना' ऐप
"इस जन्म अथवा आगामी जन्म में मोक्ष और सुख की प्राप्ति के लिए तंत्रों द्वारा प्रदर्शित मार्ग के समान कोई अन्य मार्ग नहीं है।"
— महानिर्वाण तंत्र २.२० (सर जॉन वुडरॉफ़ द्वारा अनूदित, जिन्होंने आर्थर एवलॉन नाम से लेखन किया)
अनुकूलता का प्रश्न
पिछले कुछ वर्षों में तंत्र ने मुख्यधारा के विमर्श में प्रवेश किया है। यह पोडकास्ट्स, स्वास्थ्य एवं कल्याण संबंधी लेखों तथा उन पुस्तकालयों की अलमारियों पर दिखाई देने लगा है जहाँ पहले आत्मविकास, योग अथवा ध्यान का प्रभुत्व था। जैसे-जैसे इस मार्ग के प्रति जिज्ञासा बढ़ रही है, वैसे-वैसे उस पर प्रतिक्रियाएँ भी बढ़ रही हैं। अधिकांशतः यह लोगों को विस्मित कर देता है।
जहाँ कुछ लोग श्रद्धा के साथ इसकी ओर अग्रसर होते हैं, वहीं कुछ अन्य इसके विवादास्पद पक्षों, जैसे पंचमकार (ऐसे अनुष्ठान जिनमें उन द्रव्यों और आचरणों का प्रयोग होता है जिन्हें रूढ़ परम्परा निषिद्ध मानती है), को देखकर सावधान होकर पीछे हट जाते हैं। कुछ अन्य गुप्त विधियों (सिद्धियां, कृत्य) के आकर्षण से प्रेरित होकर इसके समीप आते हैं—समझने की आकांक्षा से नहीं, अपितु प्राप्त करने की तीव्र अभिलाषा से। और कुछ लोग इसे आधुनिक योग अथवा स्वास्थ्य कल्याण की किसी पद्धति के रूप में मान लेते हैं।
सत्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति सम्पूर्ण चित्र के केवल एक अंश को पकड़े हुए है और उसी अंश को सम्पूर्ण सत्य समझ बैठा है।
किन्तु तंत्र इनमें से कोई भी विकृत धारणा नहीं है, यहाँ तक कि इन सबका संकलन भी नहीं। तंत्र सनातन धर्म का आध्यात्मिक विज्ञान है, एक रचनात्मक मार्ग जो दिव्य रहस्योद्घाटन के माध्यम से प्रदान किया गया है, जिससे साधक कलियुग की परिस्थितियों को पार कर सके।
जहाँ वेद हमें यह संरचना प्रदान करते हैं कि जीवन कैसे जीना है, उपासना कैसे करनी है और यह जगत किस प्रकार धारण किया हुआ है, वहीं तंत्र साधक को उसका प्रत्यक्ष अनुभव करने के साधन प्रदान करता है।
"तन" का अर्थ है विस्तार करना, बुनना अथवा फैलाना; "त्र" का अर्थ है साधन अथवा उपकरण। दोनों को मिलाकर इस शब्द का अर्थ होता है चेतना का विस्तार करने वाला साधन। यह व्यापक अर्थ विरले ही जनसामान्य के विमर्श तक पहुँच पाता है। जो पक्ष जनमानस की कल्पना को आकर्षित करते हैं, जैसे अनुष्ठान, सिद्धियाँ और विशिष्ट साधनाएँ, वे सभी वास्तविक हैं, किन्तु पृथक पृथक रूप में वे भ्रम उत्पन्न करते हैं।
यथार्थ तंत्र उस आन्तरिक रूपान्तरण की प्रक्रिया के माध्यम से प्रकट होता है, जिसे साधक उस गुरु के साथ सम्पन्न करता है जिसने स्वयं उसी मार्ग का अनुसरण किया हो और उन सभी पक्षों को एक सूत्र में पिरो दिया हो।
तंत्र के अन्तर्गत अनेक मार्ग हैं, जिन्हें आचार कहा जाता है। कुछ में यंत्र (पवित्र आकृति में दिव्य सत्ता) तथा अनुष्ठानों के माध्यम से बाह्य उपासना की जाती है, कुछ में उपासना पूर्णतः अन्तर्मुखी हो जाती है, और कुछ इन दोनों के मध्य स्थित मार्ग का अनुसरण करते हैं। इन मार्गों का चयन और आचरण गुरु के मार्गदर्शन में किया जाता है, क्योंकि इनमें अत्यधिक भिन्नता होती है। कुछ मार्ग सौम्य होते हैं और साधक को उसी अवस्था में स्वीकार करते हैं जहाँ वह स्थित है; अन्य अत्यन्त तीव्र होते हैं और केवल उसी साधक के लिए उपयुक्त होते हैं जो वर्षों की साधना से परिपक्व हुआ हो। कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने अत्यन्त जोखिमपूर्ण होने की प्रतिष्ठा प्राप्त की है और जिन्हें केवल गुरु के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में ही ग्रहण किया जाता है। अतः यह स्वाभाविक है कि कोई साधक पूछे कि इन तांत्रिक मार्गों में आरम्भ करने वाले साधक के लिए सबसे सुरक्षित मार्ग कौनसा है।
यद्यपि उत्तर के रूप में किसी एक नाम का उल्लेख अवश्य किया जा सकता है, किन्तु सत्य यह है कि ग्रन्थ ऐसा कोई एकमात्र निर्देश नहीं देते जो प्रत्येक साधक पर समान रूप से लागू हो। वे जिस बात पर बल देते हैं, वह है साधक और उपयुक्त साधना के मध्य सामंजस्य, जिसकी पहचान वह गुरु करता है जो दोनों को उचित प्रकार से एकत्रित करना जानता है।

स्वयं भगवान सदाशिव ने महानिर्वाण तंत्र में इस विषय पर देवी को संबोधित करते हुए कहा है :
“हे देवि! उपासकों के स्थान, काल और सामर्थ्य के भेद के अनुसार मैंने कुछ तंत्रों में उनकी अपनी परम्पराओं और स्वभाव के अनुरूप गुप्त उपासना का वर्णन किया है। जहाँ मनुष्य उस उपासना का आचरण करते हैं, जिसके वे अधिकारी हैं, वहाँ वे उपासना के फल में सहभागी होते हैं और पापों से मुक्त होकर सुरक्षित रूप से भवसागर को पार कर जाते हैं।”
— महानिर्वाण तंत्र ४.३६-३७
अतः स्थान, काल और सामर्थ्य, ये तीन स्थितियाँ हैं जिन्हें सदाशिव सुरक्षित साधना हेतु आवश्यक बताते हैं।
स्थान का अर्थ है साधक की परम्परा, उसके आचार और वह आध्यात्मिक परम्परा जिससे वह सम्बद्ध है; काल का अर्थ है कलियुग, वह युग जिसके लिए स्वयं तंत्रों का प्रादुर्भाव हुआ (महा निर्वाण तंत्र २.२०); और सामर्थ्य वह है जिसे ग्रन्थ साधक का भाव कहते हैं, अर्थात वह आन्तरिक अवस्था जिससे वह साधना के समीप आता है। जहाँ साधना इन तीनों के अनुरूप होती है, वहाँ साधक सुरक्षित रूप से भवसागर (सांसारिक अस्तित्व के चक्र) को पार कर जाता है।
स्थान का अर्थ है साधक का कुल, उसके आचार और वह परम्परा जिससे वह सम्बद्ध है; काल है कलियुग, वह युग जिसके लिए स्वयं तंत्र प्रदान किए गए थे (महानिर्वाण तंत्र २.२०); और सामर्थ्य वह है जिसे ग्रन्थ साधक का भाव कहते हैं, अर्थात वह आन्तरिक अवस्था जिससे वह साधना के समीप आता है। जहाँ साधना इन तीनों के अनुरूप होती है, वहाँ साधक सुरक्षित रूप से भवसागर (सांसारिक अस्तित्व के चक्र) को पार कर जाता है।
जहाँ यह अनुरूपता नहीं होती, वहाँ वही साधना जो एक साधक को परिपक्व बना सकती है, दूसरे के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती है। इसका कारण यह नहीं कि तंत्र अस्थिर है, अपितु यह कि प्रत्येक साधना साधक की आन्तरिक अवस्था से एक विशिष्ट अपेक्षा रखती है। यही एक कारण है कि तंत्र को नकारात्मक दृष्टि से भी देखा गया है। जब साधक और साधना के मध्य सामंजस्य नहीं होता, तब परिणाम प्रतिकूल होते हैं। इसी कारण कुछ साधनाओं के साथ सावधानी की चेतावनियाँ जुड़ी होती हैं अथवा वे विवादास्पद प्रतीत होती हैं। वे अपने आप में अनुचित नहीं हैं। वे केवल अनुपयुक्त हैं।
यह पूछना कि कौनसा मार्ग सर्वाधिक सुरक्षित है, वस्तुतः दो प्रश्न पूछना है : साधक किस भाव से साधना कर रहा है, और कौनसा आचार उस भाव के अनुरूप है।
आगे साधकों के तीन भावों—पाशु, वीर और दिव्य—का वर्णन है। तत्पश्चात् जगन्माता के ललिता त्रिपुर सुंदरी स्वरूप की उपासना के तीन आचारों—कौलाचार, मिश्राचार और समयाचार—का विवेचन है। और अन्ततः उस प्रश्न का उत्तर है, जो आपको यहाँ तक लेकर आया है।
तीन आन्तरिक अवस्थाएँ
किसी भी साधना के आरम्भ होने से पूर्व, साधक को उस भाव को समझना आवश्यक है जिससे वह संचालित होता है। साधक किसी मंत्र अथवा देवता के समान भाव का चयन नहीं करता। वह इस जन्म तथा पूर्वजन्मों के संस्कारों से निर्मित एक भाव को साथ लेकर ही तंत्र के द्वार पर पहुँचता है।
कुलार्णव तंत्र तीन भावों का निरूपण करता है :
पशु, बन्धनयुक्त साधक
वीर, वीर साधक
दिव्य, देवतुल्य साधक
भाव पहले आता है। साधना उसके पश्चात् आती है।
पशु भाव
संस्कृत शब्द पशु का सामान्य अनुवाद प्राणी किया जाता है, किन्तु इसका अर्थ बन्धनयुक्त के अधिक समीप है। अर्थात् बन्धनयुक्त व्यक्ति। किसके बन्धन में? पाशों के। पाश वह संस्कृत शब्द है जो उन बन्धनों का बोध कराता है जो मनुष्य को सामान्य जीवन की सीमाओं से बाँधे रखते हैं। अतः पशु वह साधक है जो अभी भी शरीर और अहंकार के साथ अपनी पहचान बनाए रखता है तथा इन्द्रियों द्वारा संचालित होता है। कुलार्णव इन पाशों में से कुछ का उल्लेख करता है : दया, अज्ञान, लज्जा, कुल, परम्परा, जाति तथा अन्य। हममें से अधिकांश के लिए यही यथार्थ आरम्भिक अवस्था है। पशु वह नहीं है जिसे तुच्छ समझा जाए। अधिकांश समय हममें से अधिकांश इसी अवस्था में रहते हैं।
पशु भाव में स्थित साधक को चंचल मन को स्थिर करने के लिए अनुशासन की आवश्यकता होती है। इस सुव्यवस्थित साधना में सम्मिलित हैं :
मंत्र जप, जो मन को पुनः लौटने के लिए एक केन्द्र प्रदान करता है
भक्ति, जो हृदय को खोलती है
ध्यान तथा पूजा, गुरु के मार्गदर्शन में की जाने वाली सरल साधनाएँ
यंत्र पूजा, एक पवित्र ज्यामितीय रचना की श्रद्धापूर्वक आराधना
यम-नियम (संयम और आचरण), प्रत्येक व्यवहार में धारण किया जाने वाला सदाचार, जब तक मन स्थिर होने न लगे
ये साधनाएँ साधारण प्रतीत हो सकती हैं। किन्तु वे कदापि साधारण नहीं हैं। वे शुद्धीकरण की धैर्यपूर्ण साधना हैं, जो आन्तरिक स्थिरता तक ले जाती हैं, जिसके बिना आगे की कोई भी अवस्था उद्घाटित नहीं हो सकती।
वीर भाव
वीर है वीर साधक। वीर शब्द का अर्थ प्रायः शारीरिक अथवा युद्ध सम्बन्धी वीरता के रूप में समझ लिया जाता है। ऐसा नहीं है। ग्रन्थ वीर को उस साधक के रूप में परिभाषित करते हैं जिसने इन्द्रियों पर नियन्त्रण प्राप्त कर लिया है तथा जो सत्य की खोज करता है। वह अन्तर्मुखी वीर है, जिसमें उन शक्तियों का सामना करने की क्षमता होती है जो अप्रस्तुत मन को विचलित कर दें, स्वयं उनसे विचलित हुए बिना।
वीर उन साधनाओं का अनुष्ठान कर सकता है जिन्हें पशु नहीं कर सकता। यही वह भाव है जिससे तंत्र की अधिक दुष्कर साधनाएँ उपलब्ध होती हैं, जिनमें वह शाखा भी सम्मिलित है जिसे व्यापक तांत्रिक परम्परा वामाचार कहती है। इसमें पंचमकारों का अनुष्ठानिक प्रयोग किया जाता है : मद्य (सुरा), मांस, मत्स्य, मुद्रा (भुना हुआ धान्य) तथा मैथुन (यौन संयोग)। ये सामान्य साधन नहीं हैं। परम्परा इन्हें उन्हीं उन विषों के रूप में देखती है जो मनुष्य को बन्धन में रखते हैं—मद्य मन को जड़ बनाता है, इन्द्रियभोग अहंकार को पोषित करता है। गुरु के मार्गदर्शन में यही तत्त्व उस औषधि में रूपान्तरित हो जाते हैं जो साधक को उन बन्धनों से मुक्त करती है।
पंचमकारों को विष से औषधि में क्या रूपान्तरित करता है? स्वयं वे पदार्थ नहीं, अपितु वह साधक जो उनका प्रयोग कर रहा है। शल्यचिकित्सक के हाथों में शल्यचिकित्सा का चाकू जीवन को बचाता है। वही चाकू अप्रशिक्षित हाथों में घाव उत्पन्न करता है। गुरु द्वारा समुचित रूप से तैयार किए गए वीर साधक के हाथों में पंचमकार मुक्ति का साधन बन जाते हैं। अन्य किसी के हाथों में वे वही बने रहते हैं जो वे हैं—उपासना के रूप में आच्छादित भोग।
अनुष्ठानों को किसी भी ग्रन्थ से सीखा जा सकता है। किन्तु गुरु जो सिखाते हैं, वह कुछ और ही है : ध्यान को किस प्रकार स्थिर रखा जाए, उस क्षण को किस प्रकार पहचाना जाए जब वह सामान्य कामना में परिवर्तित होने लगे, और उसे पुनः किस प्रकार साधना की ओर लौटाया जाए। गुरु केवल शिक्षक नहीं हैं। गुरु वे हैं जो साधक के भाव को भीतर से देख सकते हैं, जो जानते हैं कि पात्रता कैसी होती है और विचलन कैसा होता है। क्योंकि गुरु स्वयं उसी पथ पर चल चुके हैं, इसलिए साधना कब अथवा कभी प्रदान की जाए, इसका निर्णय केवल गुरु ही करते हैं। साधना प्रदान किए जाने के पश्चात् भी गुरु साधक पर निरन्तर दृष्टि रखते हैं। यदि साधक विचलित होने लगे, तो साधना को वापस ले लिया जाता है, उसमें परिवर्तन किया जाता है अथवा उसे रोक दिया जाता है।
जो साधक वामाचार की खोज में आया है, उसके लिए यही उत्तर है : वह विद्यमान है, वह वास्तविक है, वह केवल पात्र साधकों के लिए है, और निश्चय ही आरम्भिक साधकों के लिए सर्वाधिक सुरक्षित मार्ग नहीं है।
दिव्य भाव
दिव्य है देवतुल्य साधक। यह आन्तरिक स्थिरता और समत्व का भाव है, जहाँ मन स्वाभाविक रूप से माँ की ओर प्रवृत्त होता है। साधक सात्त्विक प्रकृति का होता है, उसका मन निर्मल एवं शान्त होता है, और वह अब न तो पशु भाव की प्रवृत्तियों से संचालित होता है और न ही वीर के संघर्ष से। दहराकाश, वह हृदयगुहा जहाँ माँ का साक्षात्कार होता है, उसके लिए पहले से ही एक यथार्थ अनुभव होता है। यह मन की वह अवस्था है जो दीर्घकालीन साधना से परिपक्व होकर स्वाभाविक रूप से विश्रान्ति को प्राप्त हो चुकी होती है।
यह अवस्था अत्यन्त दुर्लभ है। यह पशु और वीर भाव की वर्षों, और अनेक बार अनेक जन्मों तक की साधना का फल है, कोई आरम्भिक अवस्था नहीं। अधिकांश साधकों के लिए यह परिपक्वता अनेक जन्मों में विकसित होती है। श्री रामकृष्ण परमहंस इसका आधुनिक उदाहरण हैं, जिन्होंने अपने गुरुओं के मार्गदर्शन में वर्षों की तीव्र साधना के माध्यम से एक ही जीवन में इन भावों का अतिक्रमण किया। कुछ अत्यन्त विरले साधकों के लिए यह तैयारी उनके जन्म लेने से पूर्व ही लगभग पूर्ण हो चुकी होती है। आदिशंकराचार्य, जिनके विषय में परम्परा का मत है कि वे पूर्वसिद्ध अन्तःसाधना के साथ जन्मे थे, इसका एक उदाहरण हैं। यही वह अवस्था है जिसमें माँ को जगन्माता के रूप में पूजने की सर्वाधिक आन्तरिक उपासना पद्धति—समयाचार—सम्भव होती है।
समयाचार में माँ की उपासना वहीं की जाती है जहाँ वे सदैव से विराजमान हैं—साधक के भीतर। स्वयं शरीर ही मन्दिर बन जाता है, और सम्पूर्ण उपासना भीतर ही सम्पन्न होती है। इसमें किसी बाह्य साधन का प्रयोग नहीं होता। मंत्र मौन में धारण किया जाता है। यंत्र, अर्थात् श्रीचक्र (ज्यामितीय रूप में माँ का स्वरूप), दहराकाश में रचित किया जाता है। पूजा पुष्प, दीप अथवा धूप के बिना ही अर्पित की जाती है। इसके एकमात्र साधन हैं—सजगता, श्वास तथा यह अनुभूति कि साधक और माँ दो नहीं हैं। यह आरम्भिक साधकों की साधना नहीं है। यह केवल उन्हीं साधकों के लिए उद्घाटित होती है जिन्हें पशु और वीर भाव ने परिपक्व कर दिया है।
उनके मध्य गमन
ये तीनों भाव परिपक्वता की अवस्थाएँ हैं। जैसा कि हमने देखा, इस जीवन में ही दिव्य भाव तक पहुँचने वाले साधक अत्यन्त विरले होते हैं। अधिकांश साधकों के लिए मार्ग पशु से वीर और वीर से दिव्य भाव की ओर अग्रसर होने का है, और प्रत्येक अवस्था के अनुरूप साधनाएँ ही इस परिपक्वता का कारण बनती हैं। शुद्धीकरण के द्वारा पशु वीर बनता है। वीर अपने वीरतापूर्ण संघर्ष का आन्तरिक स्थिरता में विलय करके दिव्य बनता है।
इसी कारण कौनसा मार्ग सर्वाधिक सुरक्षित है, इस प्रश्न का उत्तर पहले यह जाने बिना नहीं दिया जा सकता कि साधक किस भाव में स्थित है। पशु भाव में स्थित साधक के लिए सर्वाधिक सुरक्षित मार्ग वही अनुशासित साधना है जो उसकी वर्तमान अवस्था के अनुरूप हो। यहाँ वास्तविक संकट साधना नहीं, अपितु अधैर्य है—अपने भाव से आगे बढ़ने का प्रलोभन। वीर भाव में सुरक्षा गुरु की दृष्टि में निहित है। दिव्य भाव में समयाचार माँ की उपासना की उस अत्यन्त आन्तरिक विधि का उद्घाटन करता है जिसमें अर्पण सजगता और श्वास के माध्यम से किए जाते हैं। यह गहनता केवल उसी साधक के लिए उपलब्ध होती है जिसका भाव पूर्णतः परिपक्व हो चुका हो, चाहे इस जीवन की वर्षों की साधना से अथवा पूर्वजन्मों की साधना के फलस्वरूप।
जो साधना साधक के लिए अत्यधिक उन्नत हो, वह उसका रूपान्तरण नहीं करेगी; और जिस साधना से साधक आगे बढ़ चुका हो, वह उसे धारण नहीं कर पाएगी।
तंत्र में आने वाला लगभग प्रत्येक साधक पशु भाव में ही प्रवेश करता है। इसलिए लगभग सभी के लिए सर्वाधिक सुरक्षित आरम्भ वही साधना है जो उनकी वर्तमान अवस्था के अनुरूप हो।
भाव साधक के विषय में बहुत कुछ बताते हैं। किन्तु साधक सम्पूर्ण चित्र का केवल एक पक्ष है (महानिर्वाण तंत्र ४.३६–३७)। साधनाओं का भी अपना स्वभाव होता है—कुछ सौम्य, कुछ दुष्कर, और कुछ ऐसी जिनमें ऐसे तत्त्व सम्मिलित होते हैं जिनके लिए साधक अभी पात्र नहीं होता।
आपको यहाँ तक लाने वाले प्रश्न का उत्तर देने के लिए हमें स्वयं साधनाओं पर भी दृष्टि डालनी होगी। ललिता त्रिपुर सुंदरी के रूप में जगन्माता की उपासना तीन आचारों के माध्यम से सम्पन्न होती है, जिनमें से प्रत्येक उनकी उपासना का एक भिन्न मार्ग है।
तीन शाखाएँ

कौलाचार में बाह्य अनुष्ठानों की केन्द्रीय भूमिका होती है। इसमें शरीर सक्रिय रूप से सम्मिलित होता है, इन्द्रियाँ सहभागिता करती हैं, और उपासना एक प्रत्यक्ष रूप धारण करती है। किन्तु यह बाह्य अनुष्ठान अपने आप में लक्ष्य नहीं है। कौलाचार की साधना में यही बाह्य अनुष्ठान आन्तरिक रूपान्तरण का माध्यम बन जाता है, जहाँ साधक क्रमशः यह अनुभव करता है कि शरीर, मंत्र, यंत्र तथा देवी की उपस्थिति उपासना के एक ही अखण्ड क्षेत्र के विविध आयाम हैं।
मिश्राचार बाह्य अनुष्ठान और आन्तरिक सजगता का समन्वय करता है। मिश्र का अर्थ है मिला हुआ, और इस मार्ग में उपासना के बाह्य स्वरूप यथावत् बने रहते हैं। किन्तु उपासना अब केवल बाह्य क्रियाओं तक सीमित नहीं रहती। उसका अधिकाधिक भाग साधक के भीतर, सजगता, श्वास तथा मौन चिन्तन के माध्यम से सम्पन्न होने लगता है। अनुष्ठान बना रहता है, किन्तु उसका केन्द्र धीरे-धीरे भीतर की ओर स्थानान्तरित होने लगता है।
समयाचार उपासना का सर्वाधिक आन्तरिक मार्ग है। उपासना सजगता, श्वास तथा आन्तरिक अनुभूति के माध्यम से सम्पन्न होती है। स्वयं शरीर ही देवालय बन जाता है। साधक यह अनुभव करने लगता है कि माँ कभी उससे दूर थीं ही नहीं। वे सदैव उसके भीतर ही विराजमान थीं।
आरम्भकर्ताओं हेतु सर्वाधिक सुरक्षित तंत्र
अब हम पुनः उस प्रश्न पर लौटते हैं जिसने आपको यहाँ तक लाया है।
ग्रन्थ जो उत्तर देते हैं, वह प्रश्न से कहीं अधिक व्यापक है। वे किसी एक आचार को सर्वाधिक सुरक्षित नहीं बताते, अपितु वे हमें यह समझाते हैं कि किसी भी मार्ग में सुरक्षित साधना की पहचान कैसे की जाए। प्रत्येक मार्ग की अपनी चुनौतियाँ होती हैं, प्रत्येक मार्ग की अपनी चुनौतियाँ होती हैं, जिनका सामना साधक के भाव के अनुसार उचित या अनुचित ढंग से होता है। ग्रन्थ हमें जो प्रदान करते हैं, वह है सुरक्षित साधना को पहचानने की दृष्टि, जो अनेक वाणियों से प्राप्त होती है, किन्तु जो सभी एक ही दिशा की ओर संकेत करती हैं।
जैसा कि हमने पहले पढ़ा, भगवान सदाशिव ने स्थान, काल और पात्रता को साधक तथा साधना के मध्य उपयुक्त सामंजस्य की शर्तों के रूप में निरूपित किया है (महानिर्वाण तंत्र ४.३६–३७)। अतः तांत्रिक साधना में सुरक्षा किसी मार्ग का स्वाभाविक गुण नहीं है। वह तब प्रकट होती है जब साधना साधक की वास्तविक अवस्था के अनुरूप हो—उसकी आन्तरिक स्थिति, उसकी तैयारी, साधना-पथ पर उसकी अवस्था—सब एक सिद्ध गुरु के आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन में।
ग्रन्थ हमें एक और बात भी बताते हैं :
त्रिपुरा रहस्य कहता है कि उपासना का अर्थ बाह्य अथवा अनुष्ठानिक पूजा नहीं है; वास्तविक उपासना तो ‘अहं ब्रह्मास्मि’ की अनुभूति में अचल रूप से स्थित होना है।
कुलार्णव तंत्र कहता है कि जो साधक आन्तरिक बलिदान में निरन्तर संलग्न रहते हैं, वे देवताओं के प्रिय होते हैं।
महानिर्वाण तंत्र कहता है कि जब बाह्य अर्पण करना सम्भव न हो, तब माँ के चरणकमलों का ध्यान अर्पित किया जा सकता है।
इन सभी वाणियों का संकेत एक ही दिशा में है : माँ की उपासना भीतर ही सम्पन्न होती है।
आन्तरिक उपासना अधिक सुरक्षित होने का कारण यह है कि उसमें किसी बाह्य साधन की आवश्यकता नहीं होती। न किसी द्रव्य की आवश्यकता होती है, न किसी अनुष्ठान की, और न ही ऐसे उपकरणों की जिनका अनुचित प्रयोग हो सके। जब कुछ भी बाह्य नहीं है, तब न कुछ विफल हो सकता है और न ही उसका दुरुपयोग हो सकता है। आन्तरिक उपासना सजगता, श्वास तथा साधक के अपने भाव पर आधारित होती है, जिसे वह निष्कपट भाव से अपने हृदय में धारण करता है।
किन्तु जो साधक इस लेख को पढ़ रहा है, उसके मन में प्रश्न है : आरम्भ कहाँ से किया जाए? आज से ही सुरक्षित साधना का स्वरूप क्या है? इसका उत्तर हमारे पास है।
कृत्य और प्रयोग तांत्रिक अनुष्ठानों की वे श्रेणियाँ हैं जिनका उद्देश्य विशिष्ट फल की प्राप्ति है—हानि से संरक्षण, उपचार, विवादों का समाधान—तथा दूसरी ओर, किसी अन्य की इच्छा को वश में करना अथवा उसे हानि पहुँचाना। ग्रन्थ इन विधियों से भलीभाँति परिचित हैं और इन्हें अत्यन्त गम्भीरता से ग्रहण करते हैं। इनका उपदेश केवल उचित उद्देश्यों के लिए, परम्परा के अन्तर्गत, तथा केवल उन्हीं साधकों को दिया जाता है जिन्हें गुरु पात्र मानते हैं। इनका दुरुपयोग तब होता है जब इनकी शक्ति को इस मर्यादा से बाहर ले जाया जाता है, जब अप्रशिक्षित एवं बिना गुरु के मार्गदर्शन वाला साधक इनका व्यक्तिगत लाभ के लिए अथवा अन्य लोगों पर प्रभाव डालने के उद्देश्य से प्रयोग करने का प्रयास करता है। अतः तंत्र की जो विकृत छवि बनी है, उसका बड़ा कारण उन साधनाओं का दुरुपयोग है जो कभी भी अप्रस्तुत साधकों के लिए अभिप्रेत नहीं थीं। तांत्रिक साधना तब सुरक्षित रहती है जब इनका परित्याग किया जाता है।
सुरक्षित साधना के लक्षण हैं :
मानसिक अर्पण, जो हृदयगुहा में सजगता के साथ मानसिक रूप से किए जाते हैं।
अन्तःकरण की निष्कपट भावनिष्ठा।
सिद्ध गुरु का मार्गदर्शन।
तो कोई साधक यह कैसे जाने कि जिस साधना से उसका परिचय हुआ है, अथवा जिस साधना का वह अनुसरण कर रहा है, वह सुरक्षित है?
जब ये चार लक्षण विद्यमान हों, तब साधना सुरक्षित है :
स्पष्टता, शान्ति तथा करुणा में वृद्धि।
अहंकार तथा चंचलता में कमी।
साधक का धर्म में दृढ़तापूर्वक स्थित होना।
समुचित मार्गदर्शन में की जाने वाली साधना।
जहाँ इनमें से कोई एक भी लक्षण अनुपस्थित हो, वहाँ साधक को रुककर पुनर्विचार करना चाहिए।
पशु भाव में स्थित साधक—जहाँ लगभग प्रत्येक साधक का प्रवेश होता है—प्रथम दिन से ही इन लक्षणों के अनुरूप साधना कर सकता है। यही तंत्र का वह आरम्भिक मार्ग है जिसे परम्परा लगभग प्रत्येक साधक के लिए निर्दिष्ट करती है : जगन्माता के प्रति समर्पित नित्य मंत्र जप, निरन्तर भक्तिपूर्ण साधना, श्रद्धापूर्वक की जाने वाली यंत्र पूजा, प्रत्येक व्यवहार में यम-नियमों का पालन, तथा हृदय से किए जाने वाले मानसिक अर्पण—उन छोटे-छोटे दैनिक क्षणों में जब साधक माँ का स्मरण करता है।
ये वे भी साधनाएँ हैं जिनके माध्यम से साधक परिपक्व होता है। धैर्य के साथ पशु वीर बन सकता है, और अनुग्रह से वीर दिव्य बन सकता है। आन्तरिक साधना के गहनतम स्तर कब और किसके लिए उद्घाटित होंगे, इसका निर्णय माँ और गुरु ही करते हैं।
यही सुरक्षित साधना का स्वरूप है।
'तंत्र साधना' ऐप
‘तंत्र साधना’ ऐप का निर्माण इसी उद्देश्य से किया गया है—उन साधकों के लिए सुरक्षित साधना प्रदान करने हेतु जो माँ की खोज में आते हैं। यह दशमहाविद्याओं, जगन्माता के दस स्वरूपों, की तांत्रिक साधनाएँ सम्पन्न करने के लिए एक मंच है। ललिता त्रिपुर सुंदरी, जिनकी उपासना के माध्यम से यह लेखमाला आगे बढ़ती है, इन दस महाविद्याओं में तृतीय हैं।
ऐप में सम्मिलित साधनाओं में मंत्र जप, यंत्र पूजा तथा देवी साधनाएँ हैं, साथ ही प्रत्येक महाविद्या के लिए मंत्र और रक्षात्मक कवच भी उपलब्ध हैं। इन मंत्रों को हिमालयी सिद्ध ओम स्वामी द्वारा जागृत किया गया है, जिन्होंने इस मंच की स्थापना की। प्रत्येक अनुष्ठान को उन्होंने स्वयं पूर्ण एवं सिद्ध किया है।
ऐप में न कोई कृत्य है और न कोई प्रयोग। यह पूर्णतः आन्तरिक भाव और मानसिक अर्पणों पर आधारित है तथा सुरक्षित साधना के पूर्वोक्त चार लक्षणों पर स्थापित है—स्पष्टता, शान्ति और करुणा में वृद्धि; अहंकार और चंचलता में कमी; साधक को धर्म में दृढ़तापूर्वक स्थित रखना; तथा साधना को समुचित मार्गदर्शन में सम्पन्न कराना।
ऐप में ओम स्वामी द्वारा स्वयं प्रदत्त स्वदीक्षा उपलब्ध है, जिसमें वे ऐप के आध्यात्मिक आचार्य के रूप में गुरुदेव वेदव्यास के स्वर में साधक का मार्गदर्शन करते हैं। जो साधक इस साधना पथ का अनुसरण करता है, वह उनके मार्गदर्शन में ही साधना करता है।
माँ प्रतीक्षारत हैं, और साधना भी तैयार है। अब केवल साधक को आरम्भ करना है।
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