समयाचार तंत्र : माता की ओर आरम्भकर्ता का आन्तरिक पथ

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इस लेख में आप पढ़ेंगे :

  • तीन आचार

  • समयाचार की उत्पत्ति

  • मन्दिर के रूप में हृदय

  • साधना

  • 'तंत्र साधना' ऐप

समयाचार तंत्र शक्ति उपासना का आन्तरिक मार्ग है, जिसमें प्रत्येक अनुष्ठान बाह्य जगत में नहीं, अपितु साधक के भीतर सम्पन्न होता है।

यह लेख समयाचार तंत्र की उत्पत्ति, दर्शन तथा साधना का परिचय प्रस्तुत करता है, जो मानव हृदय को ही जगन्माता का सजीव देवालय मानता है।

तीन शाखाएँ

जगन्माता की उपासना को शक्ति साधना भी कहा जाता है। शक्ति माता की सजीव ऊर्जा है, वह शक्ति जिसके द्वारा वे सृष्टि की रचना करती हैं, उसका पालन करती हैं तथा कार्य करती हैं; साधना वह अनुशासित अभ्यास है जिसके माध्यम से साधक उनकी ओर अग्रसर होता है।

शक्ति साधना में परम्परा तीन आचारों, अर्थात् साधना की तीन पद्धतियों का वर्णन करती है, जिनमें से प्रत्येक साधक के स्वभाव तथा उसकी पात्रता के अनुरूप है। ये तीनों ही मेरुदण्ड के मूल भाग (मूलाधार) में स्थित सुप्त देवी-शक्ति कुण्डलिनी को जागृत करने तथा उसे मस्तक के शिखर (सहस्रार) तक आरोहित कराने का कार्य करती हैं, किन्तु अपनी-अपनी विशिष्ट पद्धति से।

कौलाचार : बाह्य उपासना

साधक देवी की उपासना बाह्य रूप से करता है, यंत्रों—देवी के पवित्र ज्यामितीय स्वरूपों—तथा अन्य अनुष्ठानिक साधनों के माध्यम से। इसमें शरीर संलग्न रहता है, इन्द्रियाँ सहभागी होती हैं, और साधना दृश्य जगत में सम्पन्न होती है। कौलाचार बाह्य साधनों द्वारा मूलाधार, अर्थात् मूल चक्र में स्थित दिव्य शक्ति, को जागृत करने का कार्य करता है।

मिश्राचार : मिश्रित पथ

मिश्र का अर्थ है संयोजन। यहाँ साधक उस तत्त्व का आन्तरीकरण आरम्भ करता है जो पहले बाह्य था। यंत्रों तथा मण्डलों का अध्ययन अभी भी किया जाता है, किन्तु अब उनका अर्थ अन्तर्मुख कर दिया जाता है। ध्यान का केन्द्र मूलाधार से अनाहत, अर्थात् हृदय केन्द्र की ओर अग्रसर होता है, जहाँ साधक भक्ति के माध्यम से कुण्डलिनी का मार्गदर्शन करना सीखता है।

समयाचार : आन्तरिक उपासना

तीनों में सर्वाधिक आन्तरिक। कोई बाह्य प्रतिमा नहीं। कोई बाह्य अनुष्ठान नहीं। सम्पूर्ण उपासना साधक के अपने ही हृदय में सम्पन्न होती है, और शरीर स्वयं एक सजीव देवालय बन जाता है। इसका ग्रहण केवल वे ही करते हैं जो अनेक वर्षों की आन्तरिक साधना द्वारा स्वयं को इसके लिए तैयार कर चुके हों।

किन्तु समयाचार का पथ केवल उसी के लिए उद्घाटित होता है जिसने दिव्य-भाव की प्राप्ति कर ली हो, जो शान्ति, स्पष्टता तथा समत्व की अवस्था है।

समयाचार की उत्पत्ति

‘समयाचार’ शब्द ‘समय’ से बना है, जिसका अर्थ है शिव और शक्ति का ऐक्य—वह मिलन जहाँ द्वैत का अन्त हो जाता है। यह समता की भावना को भी व्यक्त करता है, अर्थात् देवी की उपासना शिव के समतुल्य स्वरूप के रूप में।

इसी मूल से उस आन्तरिक उपासना मार्ग का नाम भी उत्पन्न हुआ है, जो हृदय के अन्तराकाश (दहराकाश) में सम्पन्न होता है और जिसे अनेक परम्पराएँ माता की उपासना का सर्वोच्च मार्ग मानती हैं।

समया स्वयं माता का एक नाम भी है। ललिता सहस्रनाम के सहस्र नामों में उन्हें समयाचारतत्परा कहा गया है, अर्थात् इसी विशेष मार्ग में निरत।

अष्टादश शताब्दी के विद्वान भास्करराय, जिनके इन सहस्र नामों पर रचित भाष्य का अध्ययन आज भी किया जाता है, इस मार्ग की एक से अधिक उत्पत्तियों का उल्लेख करते हैं। वे इस आन्तरिक उपासना का आधार उन पाँच शास्त्रों में स्थापित करते हैं जिन्हें उन ऋषियों ने प्राप्त किया था जिन्होंने इसे सर्वप्रथम ग्रहण किया, और वे उन्हें वेद के अनुरूप मानते हैं। साथ ही, वे आचरण के लिए रुद्रयामल के दस अध्यायों की ओर संकेत करते हैं। यहाँ आचरण से उनका अभिप्राय उस आन्तरिक उपासना से है जिसमें देवी को शरीर के विभिन्न केन्द्रों से ऊपर उठाकर मस्तक के शिखर पर शिव के साथ उनके ऐक्य तक पहुँचाया जाता है, और तत्पश्चात उन्हें पुनः उनके विश्रामस्थल में स्थापित किया जाता है। भास्करराय विशेष रूप से यह प्रतिपादित करते हैं कि इस आचरण और साधना का ज्ञान केवल गुरु से ही प्राप्त किया जाता है। और यही वह साधना है जिसका वर्णन इस लेख के शेष भाग में किया गया है।

यह मार्ग एक गुरु-शिष्य परम्परा का अनुसरण करता है, जिसका उद्गम शिव तथा उन ऋषियों से माना जाता है जिन्होंने इसे सर्वप्रथम प्राप्त किया था। उनसे यह शताब्दियों तक प्रवाहित होता हुआ आदिशंकराचार्य तक पहुँचा, जिन्होंने सौन्दर्यलहरी में इसे अपना स्तोत्र प्रदान किया। बाद में भाष्यकार लक्ष्मीधर ने उस स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक की व्याख्या आन्तरिक आरोहण के मानचित्र के रूप में की। इसी नाम को और इसी उपासना को इस मार्ग का साधक, अर्थात् समयी, ग्रहण करता है।

मन्दिर के रूप में हृदय

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समयाचार एक निषेध से आरम्भ होता है। यह उपासना के बाह्य अनुष्ठानों का निषेध करता है : कोई प्रतिमा स्थापित नहीं की जाती, कोई अनुष्ठान हाथों से सम्पन्न नहीं किया जाता, कोई वस्तु अर्पित नहीं की जाती। बाह्य मार्ग दृश्य जगत में जो कुछ सम्पन्न करते हैं, समयी उसे अपने भीतर सम्पन्न करता है। इसमें शरीर का परित्याग नहीं किया जाता। वही साधना का आधार बनता है—वह मन्दिर जिसमें सम्पूर्ण उपासना सम्पन्न की जाती है।

भावनोपनिषद्, जो देवी तथा उनके श्रीचक्र का मानचित्र साधक के अपने शरीर में स्थापित करती है, इस आन्तरिक उपासना की परिभाषा प्रदान करती है। वह उपदेश देती है कि वास्तविक अर्पण वह भावना है जिसमें ज्ञाता, ज्ञान तथा ज्ञेय को एक ही तत्त्व के रूप में देखा जाता है, तीन के रूप में नहीं। यही भावना स्वयं श्रीचक्र की उपासना है।

किन्तु ऐसी साधना उस प्रत्येक व्यक्ति के लिए उद्घाटित नहीं होती जो इसकी याचना करे। साधक तभी समयी बनता है जब गुरु उसमें पात्रता का दर्शन करते हैं। गुरु साधक में तीन लक्षणों का अवलोकन करते हैं : विवेक, अर्थात् सत्य और असत्य में भेद करने का सामर्थ्य; आचारशुद्धि, अर्थात् सत्य तथा सदाचार के अनुरूप जीवन; तथा मुमुक्षुत्व, अर्थात् मोक्ष की तीव्र अभिलाषा। जब तक ये उपस्थित न हों, यह मार्ग बन्द रहता है; यह केवल उसी के लिए उद्घाटित होता है जो इस पर बिना किसी क्षति के चल सके।

पात्रता की स्वीकृति के पश्चात्, दीक्षा के क्षण में गुरु मंत्र प्रदान करते हैं और साधना की आन्तरिक संरचना का ज्ञान प्रदान करते हैं : भीतर क्या निर्मित करना है, और किस क्रम में।

और समयी क्या करता है? वह बैठता है। वह श्वास को स्थिर करता है। वह इन्द्रियों को उनके विषयों में भटकने से प्रत्याहृत करता है, और जो नीरवता तब प्रकट होती है, उसमें वह सम्पूर्ण उपासना का निर्माण अपने भीतर आरम्भ करता है।

साधना

इस साधना के पाँच चरण हैं, और प्रत्येक चरण अगले चरण में क्रमशः विकसित होता है।

चरण १ : तैयारी

इस चरण में समयी शरीर को स्थिर करता है तथा श्वास को संतुलित करता है। यह अभी साधना नहीं है। यह उस साधना का प्रवेशद्वार है, जिसे खोलने में वर्षों का निःशब्द प्रयास लग सकता है।

चरण २ : आन्तरिक क्षेत्र

द्वितीय चरण में दहराकाश (अन्तराकाश) अथवा हृदयगुहा कहलाने वाले आन्तरिक उपासना क्षेत्र की रचना की जाती है। यही वह स्थान है जहाँ साधना की समस्त आगामी प्रक्रियाएँ सम्पन्न होंगी।

शरीर के स्थिर होने और चित्त के अन्तर्मुख होने पर श्रीचक्र प्रकट होने लगता है। श्रीचक्र स्वयं देवी हैं, जो रेखा और रूप में अभिव्यक्त होती हैं। उनके स्वरूप की अन्तःरचना करना उन्हें अपने भीतर स्वरूप ग्रहण करने के लिए आमन्त्रित करना है।

चरण ३ : मंत्र

इस चरण में पंचदशी का अभ्यास किया जाता है, जो देवी का पन्द्रह अक्षरों वाला ध्वनि स्वरूप है। मंत्र का निःशब्द एवं निरन्तर जप किया जाता है, जब तक कि वह समयी का श्वास और विचारों की लय न बन जाए।

चरण ४ : आरोहण (कुण्डलिनी का उदय)

आन्तरिक एकाग्रता की स्थापना तथा मंत्र के स्थिर प्रवाह के साथ, समयी कुण्डलिनी को—अर्थात उस सुप्त देवी शक्ति को जो मेरुदण्ड के मूल (मूलाधार) में कुण्डली मारे विश्राम करती है—जागृत होकर आरोहित होने हेतु आमन्त्रित करता है।

वे धीरे धीरे चक्रों के माध्यम से आरोहण करती हैं, जब तक कि मस्तक के शिखर (सहस्रार) में भगवान शिव से उनका मिलन नहीं हो जाता। साधक के शरीर के भीतर घटित यह मिलन ही ‘समय’ है, तथा उसी एकत्व के कारण इस मार्ग का यह नाम है।

यह सब शीघ्रता से घटित नहीं होता। समयाचार वर्षों का कार्य है, यहाँ तक कि अनेक जन्मों का भी। यह मार्ग दृढ़ता की अपेक्षा करता है, प्रतिदिन उसी आसन, उसी श्वास तथा उसी निःशब्द मंत्र की ओर पुनः लौटने के समर्पण की, तब भी जब ऐसा प्रतीत हो कि कुछ भी घटित नहीं हो रहा है।

यह पवित्रता की भी अपेक्षा करता है, समयी के आन्तरिक जीवन से स्वार्थ, क्रोध तथा चंचल इच्छाओं के धीमे और धैर्यपूर्ण परिशोधन की, जब तक कि मन सत्य का दर्शन करने योग्य पर्याप्त प्रकाशमान न हो जाए—उस सत्य का, जो सदैव से विद्यमान रहा है।

चरण ५ : अभिज्ञान

और तब, ऐसे आन्तरिक प्रयत्न के दीर्घ वर्षों के पश्चात्, एक नीरव बोध उदित होता है। जगन्माता, जो सदा से साधक में विद्यमान थीं किन्तु आवृत्त थीं, अब स्वयं को प्रकट कर रही हैं।

"धन्य हैं वे विरले जन जो आपकी उपासना करते हैं, जो चैतन्य और आनन्द की तरंग हैं, जो अमृतसागर के मध्य रत्नद्वीप पर कामनापूरक रत्नों के प्रासाद में, शय्या के रूप में स्वयं शिव पर विराजमान हैं।"

— सौन्दर्यलहरी, श्लोक ८ (आदिशंकराचार्य)

'तंत्र साधना' ऐप

समयाचार का यह मार्ग, जिसका उद्घाटन यह श्रृंखला करेगी, जगन्माता की दशमहाविद्याओं में से एक की ओर उन्मुख होने का आन्तरिक पथ है : ललिता त्रिपुर सुंदरी—वे परम सुंदर साम्राज्ञी जो तीनों लोकों का संचालन करती हैं। वे दशमहाविद्याओं में तृतीय हैं, और उनकी साधना श्री यंत्र के माध्यम से की जाती है, जो उनका ज्यामितीय स्वरूप है।

'तंत्र साधना' ऐप में चित्रित माँ त्रिपुर सुंदरी का मानक मूर्तिशास्त्रीय स्वरूप।
माँ त्रिपुर सुंदरी का मूर्तिशास्त्रीय स्वरूप

दसों महाविद्याओं की साधना का उपदेश एवं अभ्यास हिमालयी सिद्ध ओम स्वामी द्वारा स्थापित ‘तंत्र साधना’ ऐप पर किया जाता है। ऐप पर प्रत्येक मंत्र स्वामीजी की तपस्या द्वारा जागृत किया गया है, तथा ऐप में सत्यनिष्ठ साधक हेतु चरणबद्ध साधना प्रदान की गई है।

यदि आप उनकी साधना में और आगे बढ़ने का आह्वान अनुभव करते हैं, तो ‘तंत्र साधना’ ऐप वही स्थान है जहाँ यह साधना पथ आपके सम्मुख खुलता है।

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Frequently Asked Questions

समयाचार तंत्र क्या है और यह अन्य तांत्रिक मार्गों से किस प्रकार भिन्न है?

समयाचार, श्रीविद्या तंत्र का एक पूर्णतः आन्तरिक एवं ध्यानप्रधान मार्ग है, जो सहस्रार चक्र में स्थित दिव्य माता की उपासना पर केन्द्रित होता है। कौलाचार अथवा बाह्य तांत्रिक मार्गों के विपरीत, यह पूर्णतः बाह्य अनुष्ठानों, पूजन सामग्रियों, अथवा भौतिक प्रतीकों का त्याग करता है तथा सम्पूर्ण रूप से मानसिक उपासना (अन्तर्याग) पर आधारित रहता है।

समयाचार साधना में श्री यंत्र की क्या भूमिका है?

समयाचार में श्री यंत्र की उपासना धातु अथवा कागज से निर्मित किसी बाह्य भौतिक वस्तु के रूप में नहीं की जाती। इसके स्थान पर, साधक अपने सूक्ष्म शरीर के भीतर मानसिक रूप से श्री यंत्र का ध्यान एवं आन्तरिकीकरण करता है, तथा उसकी दिव्य ज्यामिति को प्रत्यक्ष रूप से अपने चक्रों से सम्बद्ध करता है।

समयाचार तंत्र का अभ्यास करने के लिए कौन पात्र है?

क्योंकि यह अत्यन्त उच्च मानसिक अनुशासन, गहन एकाग्रता, एवं उच्च स्तर की शुद्धता की अपेक्षा करता है, इसलिए परम्परागत रूप से इसे एक उन्नत मार्ग माना जाता है। इसके लिए विधिवत दीक्षा तथा उस योग्य गुरु का सतत मार्गदर्शन अनिवार्य होता है, जिसने आन्तरिक ऊर्जा-साधना में सिद्धि प्राप्त की हो।