जगद्गुरु आदिशंकराचार्य जयंती २०२६

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इस लेख में आप पढ़ेंगे :

  • आदिशंकराचार्य के विषय में

  • कैसे आदिशंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा की

  • आदिशंकराचार्य की कालातीत आध्यात्मिक रचनाएँ

  • आदिशंकराचार्य का जगन्माता के साथ सम्बन्ध

  • तंत्र एवं शक्ति उपासना में आदिशंकराचार्य का योगदान

  • 'तंत्र साधना' ऐप और दिव्याचार का पथ

आदिशंकराचार्य की १२३८वीं जयंती : २१ अप्रैल २०२६ (मंगलवार)

पंचमी तिथि (भारतीय समय) — प्रातः ४:१४ (२१ अप्रैल) से रात्रि १:१९ (२२ अप्रैल)

आदिशंकराचार्य के विषय में

जगद्गुरु आदिशंकराचार्य एक आत्मसाक्षात्कारी भारतीय आध्यात्मिक दार्शनिक एवं धर्मशास्त्रविद् थे, जिन्होंने अद्वैत वेदान्त के सिद्धान्त का सुव्यवस्थित प्रतिपादन किया।

केरल के कालडी में एक नाम्बूदिरी ब्राह्मण परिवार में जन्मे, उनका जीवनकाल ऐतिहासिक रूप से ७८८ से ८२० ईस्वी के मध्य माना जाता है, यद्यपि कुछ पारम्परिक मत, जैसे द्वारका पीठ से सम्बद्ध परम्पराएँ, इससे पूर्व की तिथि का संकेत देती हैं।

शंकर विजय ग्रन्थों (जो उनके अनुयायियों द्वारा रचित जीवनचरित हैं) के अनुसार, उन्होंने बाल्यावस्था में ही असाधारण बौद्धिक क्षमता का प्रदर्शन किया, ८ वर्ष की आयु तक वेदों का अध्ययन पूर्ण कर लिया और शीघ्र ही अपने गुरु, गोविन्द भगवत्पाद के अधीन संन्यास आश्रम में प्रवेश किया।

शंकराचार्य का मुख्य योगदान उपनिषद्, भगवद्गीता तथा ब्रह्मसूत्र—इन तीनों का, जिन्हें सामूहिक रूप से प्रस्थानत्रयी कहा जाता है—सुसंगठित प्रतिपादन था। वे अद्वैत तत्त्व में विश्वास रखते थे, जहाँ जीवात्मा परम तत्त्व ब्रह्म के साथ अभिन्न है, और वे यह प्रतिपादित करते थे कि अज्ञान (माया) ही इस अनुभूति में एकमात्र अवरोध है।

इस सिद्धान्त की स्थापना हेतु उन्होंने सम्पूर्ण भारतवर्ष में व्यापक यात्रा की, कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक, और बौद्ध, जैन तथा मीमांसा परम्पराओं के विद्वानों के साथ तात्त्विक संवाद एवं वाद-विवाद किए।

राजा रवि वर्मा द्वारा रचित आदिशंकराचार्य का उनके शिष्यों के साथ बैठे हुए एक चित्रण।
स्रोत : en.wikipedia.org

कैसे आदिशंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा की

आदिशंकराचार्य को उस काल में सनातन धर्म के पुनरुत्थान का श्रेय दिया जाता है, जब वैदिक प्रभाव अनुष्ठानिक जटिलताओं की वृद्धि तथा अवैदिक परम्पराओं के प्रभुत्व के कारण क्षीण हो रहा था।

उनका एक प्रमुख संरचनात्मक योगदान दशानामि सम्प्रदाय की स्थापना था, जो संन्यासियों के लिए एक सुव्यवस्थित मठीय परम्परा है, जिसने तपस्वी समुदाय में अनुशासन और एकता स्थापित की।

उन्होंने संन्यासियों को उनकी परम्परा तथा कर्तव्यों के आधार पर १० नामों में विभाजित किया—यह प्रणाली आज भी भारत की अखाड़ा परम्पराओं में प्रचलित है।

परम्परा की भौगोलिक तथा आध्यात्मिक अखण्डता सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने भारत के चारों दिशाओं में ४ प्रमुख मठों की स्थापना की : श्रृंगेरी (दक्षिण), पुरी (पूर्व), द्वारका (पश्चिम), और ज्योतिर्मठ (उत्तर)।

इन संस्थानों को क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद के संरक्षण का दायित्व सौंपा गया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने पंचायतन पूजा पद्धति का प्रचलन किया, जिसमें भगवान शिव, भगवान विष्णु, देवी आदिशक्ति, भगवान सूर्य एवं भगवान गणेश (या भगवान कार्तिकेय) की संयुक्त उपासना की जाती है।

इस विकेन्द्रित दृष्टिकोण वैष्णव और शैव परम्पराओं के मध्य सम्प्रदायगत संघर्षों का शमन किया और एक समन्वित स्मार्त परम्परा को प्रोत्साहित किया।

आदिशंकराचार्य की कालातीत आध्यात्मिक रचनाएँ

आदिशंकराचार्य की साहित्यिक रचनाओं को भाष्य, प्रकरण ग्रन्थ एवं स्तोत्र—इन ३ श्रेणियों में विभाजित किया जाता है। ब्रह्मसूत्र तथा प्रमुख १० उपनिषदों पर उनके भाष्य अद्वैत साहित्य के मूल स्तम्भ माने जाते हैं।

इन कृतियों में वेदवाक्यों की द्वैतात्मक व्याख्याओं का खण्डन करने के लिए तर्कसंगत विवेचन का उपयोग किया गया है, तथा ‘अहं ब्रह्मास्मि’ महावाक्य पर विशेष बल दिया गया है।

इसके विपरीत, उनके स्तोत्र विभिन्न देवताओं की स्तुति एवं महिमा का वर्णन करते हैं, जिनमें वेदान्त दर्शन को पुराणिक कथाओं एवं ब्रह्माण्डीय सत्यों के साथ समन्वित किया गया है। भक्तगण इनका नित्य पाठ करते हैं, जिससे दैवी कृपा की प्राप्ति, चित्त की शुद्धि तथा अहंकार का लय होता है, और अन्ततः साधक देवता के साथ ऐक्य एवं आत्मसाक्षात्कार की अवस्था को प्राप्त करता है।

उनकी विशाल रचनाधारा में से कुछ प्रमुख कृतियाँ हैं :

भाष्य

  • ब्रह्मसूत्र भाष्य

  • भगवद्गीता भाष्य

  • बृहदारण्यक उपनिषद् भाष्य

  • छान्दोग्य उपनिषद् भाष्य

  • तैत्तिरीय उपनिषद् भाष्य

प्रकरण ग्रन्थ

  • विवेकचूडामणि

  • आत्मबोध

  • तत्त्वबोध

  • उपदेशसाहस्री

  • अपरोक्षानुभूति

स्तोत्र

  • निर्वाणषट्कम्

  • भज गोविन्दम्

  • भवान्याष्टकम्

  • कनकधारा स्तोत्रम्

  • कालभैरव अष्टकम्

आदिशंकराचार्य का जगन्माता के साथ सम्बन्ध

यद्यपि आदिशंकराचार्य को प्रायः निर्गुण ब्रह्म के साथ सम्बद्ध किया जाता है, तथापि उनका जगन्माता (आदिशक्ति) के साथ सम्बन्ध बुद्धि एवं भक्ति के समन्वय का प्रतिनिधित्व करता है।

परम्परा के अनुसार, उनका प्रारम्भिक ध्यान केवल निराकार और निर्गुण ब्रह्म पर केन्द्रित था, किन्तु स्थानीय साधकों के साथ उनके सम्पर्क तथा आध्यात्मिक अनुभूतियों के माध्यम से—विशेषतः वाराणसी तथा कामाख्या मन्दिर में—उन्होंने सगुण (प्रकट) देवी की उपासना को अपने तत्त्वज्ञान में समन्वित किया।

उन्होंने शक्ति को शिव या ब्रह्म से पृथक् नहीं माना, अपितु उस अचल, अपरिवर्तनीय चैतन्य (प्रकाश) की गतिशील शक्ति (विमर्श) के रूप में देखा।

शंकराचार्य को अनेक प्रमुख मन्दिरों में श्री चक्र (माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी के पवित्र ज्यामितीय प्रतिरूप) की स्थापना अथवा प्रतिष्ठा का श्रेय दिया जाता है, जिनमें कांचीपुरम का कामाक्षी अम्मन मन्दिर तथा कोल्लूर का मूकाम्बिका मन्दिर प्रमुख हैं। इस प्रकार, उन्होंने देवी की उपासना को सम्भावित रूप से अत्यन्त उग्र अथवा अपारम्परिक आचार से निकालकर वैदिक परम्परा के मुख्य प्रवाह में स्थापित किया।

उनकी रचनाएँ—सौन्दर्यलहरी एवं आनन्दलहरी—इस सम्बन्ध का साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं, जहाँ वे माँ त्रिपुर सुंदरी को समस्त शक्ति का मूल स्रोत बताते हैं, जिनके बिना शिव ‘शव’ (निष्प्राण) के समान हैं।

श्रृंगेरी मठ, कर्नाटक में आदिशंकराचार्य द्वारा प्रतिष्ठित किए गए श्री यंत्र की फ़ोटो।
स्रोत : tumblr.com/rememberingma

तंत्र एवं शक्ति उपासना में आदिशंकराचार्य का योगदान

आदिशंकराचार्य ने तंत्र के वेदान्तीकरण में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें उन्होंने अतिक्रमणकारी तत्त्वों को परिमार्जित करके श्रीविद्या की समयाचार परम्परा का निर्माण किया—वह परम्परा जो माँ त्रिपुर सुंदरी को परम तत्त्व के रूप में उपासित करती है। यह परम्परा बाह्य, अनुष्ठानप्रधान तंत्र की अपेक्षा आन्तरिक उपासना (अन्तर्याग) एवं श्री चक्र पर ध्यान को प्रमुखता देती है।

उनके भाष्य एवं संरचनात्मक प्रभाव ने शक्तमत को वेदों की आचारसंहिता एवं तात्त्विक मर्यादाओं के साथ समन्वित किया, जिससे शक्ति उपासना साधकों के व्यापक समुदाय के लिए सुलभ हो सकी।

इस क्षेत्र में उनका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तांत्रिक योगदान प्रपंचसार तंत्र माना जाता है—एक ऐसा ग्रन्थ जो विविध देवताओं से सम्बन्धित अनुष्ठानों, मंत्रों तथा ध्यानविधियों का विस्तृत वर्णन करता है।

उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि जगन्माता की उपासना भुक्ति (सांसारिक समृद्धि) और मुक्ति—दोनों की प्राप्ति का सर्वाधिक प्रभावकारी साधन है।

जगद्गुरु आदिशंकराचार्य के समाधी क्षेत्र में एक विशाल श्री यंत्र के ऊपर स्थापित उनकी मूर्ति।
जगद्गुरु आदिशंकराचार्य के समाधी क्षेत्र में एक विशाल श्री यंत्र के ऊपर स्थापित उनकी मूर्ति | स्रोत : tripadvisor.in

'तंत्र साधना' ऐप और दिव्याचार का पथ

जगद्गुरु आदिशंकराचार्य ने मानस पूजा के अभ्यास को प्रोत्साहित किया, जहाँ ‘मानस’ का अर्थ मन होता है। किसी देवता की सम्पूर्ण षोडशोपचार अथवा पंचोपचार पूजा—उनके १६ या ५ उपचरों सहित—मन में, अन्तर्दृष्टि द्वारा सम्पन्न की जाती है। इसमें किसी भौतिक तत्त्वों का उपयोग नहीं होता। आदिशंकराचार्य इसे बाह्य उपासना से श्रेष्ठ मानते थे, क्योंकि इसमें मन की पूर्ण एकाग्रता अपेक्षित होती है और कोई विक्षेप नहीं रहता।

हिमालयी संन्यासी ओम स्वामी द्वारा निर्मित ‘तंत्र साधना’ ऐप इसी सिद्धान्त पर आधारित है, जिसे तंत्र में दिव्याचार कहा जाता है। इस ऐप में दशमहाविद्याओं के १० 'वर्चुअल' लोक, स्वयं स्वामीजी द्वारा सिद्ध साधनाओं के माध्यम से तांत्रिक देवियों की उपासना का माध्यम बनते हैं।

ये विशिष्ट तांत्रिक साधनाएँ हैं, जो मुख्यधारा के देवताओं की पारम्परिक वैदिक पूजाओं के परे जाती हैं।

यह ऐप निःशुल्क तथा विज्ञापनरहित है, और साधक को प्रत्येक अनुष्ठान में चरणबद्ध रूप से मार्गदर्शन प्रदान करती है। इससे यह उन आध्यात्मिक साधकों के लिए भी सुलभ और सुरक्षित हो जाती है, जो व्यक्तिगत गुरु के मार्गदर्शन के बिना प्रथम बार तंत्र मार्ग का अन्वेषण करना चाहते हैं।

ऐप में समस्त मंत्र जागृत हैं और स्वामीजी द्वारा ही उच्चारित हैं।

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Frequently Asked Questions

आदि शंकराचार्य की जन्म तिथि क्या है?

आदि शंकराचार्य की यथार्थ जन्म तिथि ऐतिहासिक विवाद का विषय है, किंतु परंपरा के अनुसार उनका जन्म वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को माना जाता है। यद्यपि आधुनिक विद्वान प्रायः ७८८ ईस्वी का उल्लेख करते हैं, तथापि अनेक पारंपरिक वंश और पंचांग चंद्र चक्र के आधार पर इस उत्सव को मनाते हैं, जो सामान्यतः अप्रैल या मई मास में आता है।

शंकराचार्य जयंती कैसे मनाएँ?

शंकराचार्य जयंती सामान्यतः मंदिरों के दर्शन, विशेष पूजन, उनके साहित्य के पठन और उनके स्तोत्रों के गान द्वारा मनाई जाती है। श्रद्धालु प्रायः अद्वैत वेदांत दर्शन के स्वाध्याय में संलग्न होते हैं तथा सनातन धर्म के पुनरुत्थान में उनकी भूमिका का सम्मान करने हेतु शोभायात्राओं अथवा प्रवचनों में सम्मिलित होते हैं।

आदि शंकराचार्य के ४ शिष्य कौन हैं?

आदि शंकराचार्य के चार मुख्य शिष्य पद्मपाद, हस्तामलक, तोटकाचार्य और सुरेश्वराचार्य हैं। इनमें से प्रत्येक विद्वान को शंकराचार्य द्वारा भारत की चारों दिशाओं में स्थापित चार मठों का प्रमुख नियुक्त किया गया था।