माँ भुवनेश्वरी — ब्रह्माण्ड की महारानी का ज्ञान एवं उपासना

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इस लेख में आप पढ़ेंगे :

  • ​माँ का उद्गम एवं सर्वोच्चता​

  • ​माँ का स्वरूप एवं प्रतीकात्मकता​

  • ​माँ का दशमहाविद्याओं में स्थान​

  • ​माँ की कृपा की एक कथा​

  • ​माँ के मंत्र-अभ्यास​

  • ​'तंत्र साधना' ऐप द्वारा उनका आवाहन​

माँ भुवनेश्वरी हिन्दू तांत्रिक परम्परा में अत्यन्त पूज्य देवियों में से एक हैं, जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तथा उसके त्रैलोक्य की अधिष्ठात्री जगन्माता का प्रतिनिधित्व करती हैं। वे दश महाविद्याओं में चतुर्थ हैं और उस दिव्य स्त्री-तत्त्व की मूर्तरूप हैं जो सम्पूर्ण सृष्टि का सर्जन, पालन तथा अतिक्रमण करती है।

उनका नाम निष्पन्न है ‘भुवन’ से, जिसका अर्थ है ब्रह्माण्ड, तथा ‘ईश्वरी’ से, जिसका अर्थ है देवी; अतः इसका शाब्दिक अर्थ है ‘ब्रह्माण्ड की महारानी।’

माँ का उद्गम एवं सर्वोच्चता

तंत्राचार्य राजेश दीक्षित द्वारा लिखित 'भुवनेश्वरी एवं छिन्नमस्ता तंत्र शास्त्र' के अनुसार, माँ भुवनेश्वरी का प्राकट्य सूर्यदेव द्वारा त्रैलोक्य की सृष्टि से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है।

जब सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अन्धकार से आच्छादित था, तब सूर्यदेव प्रकट हुए और ऋषियों ने उन्हें सोम (दिव्य अमृत) अर्पित करते हुए उनसे प्रार्थना की कि वे जीवों के निवास हेतु तीनों लोकों की रचना करें।

इस ब्रह्मांडीय सृष्टि-प्रक्रिया में दशमहाविद्याओं में तृतीय, माँ त्रिपुर सुंदरी, प्रधान शक्ति रूप में उपस्थित थीं, जिनके द्वारा सूर्यदेव ने ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति की।

किन्तु जब त्रैलोक्य की स्थापना हो चुकी, तब माँ त्रिपुर सुंदरी ने उपयुक्त रूप धारण करके इन लोकों में व्याप्त होकर उन पर अधिराज्य किया, और इसी प्रकार वे ‘भुवनेश्वरी’ अर्थात् ‘भुवनों की अधिष्ठात्री’ के नाम से प्रसिद्ध हुईं।

श्रीमद् देवी भागवत में एक अन्य कथा वर्णित है, जिसमें यह बताया गया है कि एक समय दिव्य त्रिमूर्ति—भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव—एक दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर देवी के लोक मणिद्वीप पहुँचे, और वहाँ उन्हें जगन्माता, माँ भुवनेश्वरी के दर्शन प्राप्त हुए।

अपने लोक में देवी ने उन्हें ३ स्त्री-शक्तियों के दर्शन कराए, जो सृष्टि, पालन और संहार के कार्यों में संलग्न थीं। त्रिमूर्ति ने उन स्त्रियों में अपने ही स्वरूप को पहचाना और माँ भुवनेश्वरी की सर्वोच्चता के सम्मुख नतमस्तक हुए, क्योंकि वही वे देवी हैं जो देवताओं को भी उनके कर्तव्य प्रदान करती हैं।

तीनों लोकों की अधिष्ठात्री

देवी भागवत पुराण कहता है कि यह केवल किसी व्यक्ति की आत्मानुभूति नहीं है; यह वह सत्य है जिसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ने अपने परम विस्तार में स्वयं अस्तित्व की प्रकृति के रूप में जाना है।

जब देवी सती ने अपने पति महादेव का अपमान सहन न कर पाने के कारण अपने पिता दक्ष के महायज्ञ में अपने शरीर का त्याग कर दिया, तब महादेव ऐसे गहन शोक में लीन हो गए कि वे अपने चारों ओर के जगत को ही भूल गए। उनके इस विराग के साथ ही तीनों लोकों का वैभव लुप्त हो गया, और समस्त प्राणी भीतर से रिक्त तथा बोझिल होकर जीवन व्यतीत करने लगे, बिना यह जाने कि ऐसा क्यों हुआ।

इसी उजाड़ अवस्था में तारक नामक एक असुर प्रकट हुआ, जिसे भगवान ब्रह्मा से ऐसा वरदान प्राप्त था कि उसका वध केवल शिव के पुत्र द्वारा ही हो सकता था। शिव शोक में निमग्न थे। न उनकी पत्नी थीं, न उनका कोई पुत्र। अतः तारक ने तीनों लोकों पर अधिकार प्राप्त कर लिया।

निरुपाय होकर देवताओं ने भगवान विष्णु की शरण ली। किन्तु विष्णु ने उन्हें न कोई अस्त्र दिया, न कोई युक्ति—केवल एक निर्देश दिया : समस्त की जननी की शरण ग्रहण करो, जो माता के समान शिक्षा देने के लिए स्वयं अप्रकट हो गई थीं। वे उनकी कल्पना से भी अधिक समीप थीं और उनके निष्कपट पुकार की प्रतीक्षा कर रही थीं।

तब महाविष्णु की आज्ञा से समस्त देवता हिमालय पहुँचे। वहाँ उन्होंने यज्ञ, व्रत, ध्यान तथा ह्रीं—माया के बीज मंत्र—के जप के द्वारा अनेक वर्षों तक देवी की उपासना की।

किसी पर्वत पर अवतरित होती लाल ऊर्जा का ए.आइ. द्वारा सृजित चित्र।
ए.आइ. द्वारा निर्मित

अन्ततः चैत्र के नवम दिवस उनकी प्रतीक्षा समाप्त हुई। पर्वत की ढलानों पर माणिक्य के समान अरुण प्रभा अवतरित हुई, जो असंख्य चन्द्रमाओं के समान शीतल और असंख्य सूर्यों के समान दीप्तिमयी थी तथा चारों वेदों की लय से गुंजायमान थी। वह एक ऐसी स्त्री के रूप में प्रतिष्ठित हुई, जिसका वर्ण उदित होते सूर्य के समान था। उनके ललाट पर अर्धचन्द्र सुशोभित था और उनके तीन नेत्र बाहर की ओर दृष्टि डाले हुए थे। उनकी चार भुजाएँ थीं। उनकी दो भुजाओं में पाश और अंकुश थे; अन्य दो भुजाएँ वर प्रदान करने वाली वरद मुद्रा तथा भय का निवारण करने वाली अभय मुद्रा में थीं। वे मुस्कुरा रही थीं। देवता कुछ कह पाते, उससे पहले ही उन्होंने कहा :

“मैं कल्पतरु हूँ—मेरे भक्तों को मनोवांछित फल देने वाला दिव्य वृक्ष। जब मैं तुम्हारे साथ हूँ, तब तुम्हें किस बात का भय है?”

इसके पश्चात् उन्होंने उस समस्त व्यवस्था को पुनः स्थापित करने का संकल्प लिया, जिसे तारक ने अस्त-व्यस्त कर दिया था। उन्होंने देवताओं को आश्वस्त किया और कहा कि उनकी अपनी शक्ति हिमालय के घर में पार्वती के रूप में जन्म लेगी तथा शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करेगी। उनके इस दिव्य मिलन से कार्तिकेय (मुरुगन) का जन्म होगा, जो तारक का संहार करके खण्डित हो चुके तीनों लोकों को पुनः व्यवस्थित करेंगे।

वही थीं माँ भुवनेश्वरी।

उनके नाम का अर्थ है लोकों की अधिष्ठात्री (भुवन अर्थात् लोक; ईश्वरी अर्थात् उनकी अधिष्ठात्री)।

जब भगवान विष्णु ने पहली बार मणिद्वीप में उनका साक्षात्कार किया, तब उन्होंने उन्हें महाविद्या तथा मूलप्रकृति कहा—वे आद्य सृष्टिकर्त्री जिन्होंने वेदों को प्रकट किया और जो समस्त सृष्टि का एकमात्र कारण हैं।

देवी भागवत पुराण (१२.१२) में मणिद्वीप के आन्तरिक वैभव का वर्णन करने से पूर्व कहा गया है कि देवी ने अपनी ही लीला के लिए स्वयं को दो भागों में विभाजित कर लिया। सृष्टि के आरम्भ में महेश्वर, जिन्हें यहाँ भुवनेश कहा गया है, उनका दूसरा अर्धभाग हैं। उनका वर्णन पाँच मुखों वाले, तीन नेत्रों वाले, रत्नाभूषणों से विभूषित, सोलह वर्ष की आयु वाले तथा असंख्य कामदेवों से भी अधिक सुन्दर के रूप में किया गया है। उनकी चार भुजाओं में मृग, अभय मुद्रा, परशु तथा वरद मुद्रा हैं। माँ भुवनेश्वरी सदैव उनकी बाईं गोद में विराजमान रहती हैं, समस्त शक्तियों से दीप्तिमान तथा अपनी परिचारिकाओं से परिवेष्टित।

इसके पश्चात् ग्रन्थ कहता है कि ऐसी देवी भुवनेश्वरी, जो समस्त शक्तियों और ऐश्वर्यों से विभूषित हैं, भुवनेश्वर की बाईं गोद में विराजमान रहती हैं। उनके साथ उनके इस ऐक्य के कारण ही भुवनेश्वर को प्रभुत्व प्राप्त है, अन्यथा नहीं।

देवी उन दस महाविद्याओं में से एक हैं, जिन दस स्वरूपों के माध्यम से जगन्माता की उपासना की जाती है। अपने रहस्य के अनुसार वे उनमें चतुर्थ महाविद्या हैं। वे समस्त लोकों की जननी तथा अधिष्ठात्री हैं।

इसी कारण वे केवल ऐसी शरण नहीं हैं, जिसकी ओर आप तब बढ़ते हैं जब आपके पैरों तले की भूमि खिसक जाती है। वे वह अपरिवर्तनीय आधार हैं, जिस पर सब स्थित है। पुराण कहता है कि उनके शरीर में करोड़ों ब्रह्माण्ड समाहित हैं। ये लोक ऐसे राज्य नहीं हैं जिनका वे दूर से शासन करती हों, बल्कि ऐसी सृष्टियाँ हैं जिन्हें वे अपने भीतर सुरक्षित धारण किए हुए हैं। जैसा कि देवताओं ने अनुभव किया, जो भी उनकी शरण में जाता है, वे सदैव उसे उत्तर देती हैं।

घट और आकाश

एकत्रित देवताओं को उनके संकट से उद्धार का वर प्रदान करने के पश्चात्—पार्वती के अवतरण तथा तारक का वध करने वाले पुत्र के जन्म का आश्वासन देकर—जब माँ अन्तर्ध्यान होने ही वाली थीं, तभी पर्वतराज हिमवान ने उनसे निवेदन किया। उनके ही गृह में उनकी शक्ति का अवतरण होना था, इसलिए उन्होंने उनसे सहायता नहीं, अपितु स्वयं उनके यथार्थ स्वरूप की याचना की—वे वास्तव में कौन हैं, तथा आत्मसाक्षात्कार का सत्य क्या है, इसका उद्घाटन करने की प्रार्थना की। माँ का उत्तर देवी गीता के रूप में प्रकट हुआ, जो स्वयं एक ब्रह्मविद्या है। उसमें उन्होंने अपने स्वरूप को समस्त अस्तित्व के आधार के रूप में प्रकट किया, और इस प्रकार उनका आवाहन करने का अर्थ ही परिवर्तित हो गया। इसने देवताओं तथा सम्पूर्ण जगत् को क्षणिक उद्धार की याचना से आगे बढ़कर संसार-सागर से शाश्वत मुक्ति प्राप्त करने का मार्ग प्रदान किया।

माँ ने हिमवान को प्रत्यक्ष किया कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड—समस्त चर और अचर वस्तुएँ—उनमें ही ओतप्रोत है। उन्होंने सृष्टि के मूल सिद्धान्त की पुष्टि की कि बिना कारण कोई परिणाम घटित नहीं होता, और बिना किसी आधार के कोई वस्तु अस्तित्व में नहीं रह सकती।

एक पात्र तश्तरी पर रखा होता है, तश्तरी मेज़ पर, और मेज़ भूमि पर। प्रत्येक वस्तु किसी अन्य आधार पर अवस्थित होती है। किन्तु यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अन्ततः उनके ही अनन्त स्वरूप पर आश्रित है। भौतिक जगत् किसी आधार के बिना प्रकट नहीं हो सकता, और वह परम आधार माँ का अपना ही अस्तित्व है। वे किसी पर आश्रित नहीं हैं, क्योंकि वे आद्य तत्त्व, समस्त कारणों की कारण तथा स्वयं शुद्ध चैतन्य हैं।

देवी ने इसे अत्यन्त सरल उदाहरण द्वारा समझाया—सर्वव्यापी आकाश। वास्तव में आकाश एक ही है, अखण्ड और निरन्तर। यदि किसी कक्ष में एक घट रख दिया जाए, तो उसके भीतर के आकाश को पृथक् मानकर उसे घटाकाश कहा जाता है। किन्तु जैसे ही वह घट टूट जाता है, न कोई आकाश विभाजित होता है और न ही कोई आकाश मुक्त होता है। आरम्भ से अन्त तक केवल एक ही आकाश था, जो केवल एक रूप से आवृत्त होने के कारण सीमित प्रतीत हो रहा था।

उसी प्रकार, देवी ने कहा, जिसे हम चैतन्य कहते हैं, वही एकमात्र सत्य माया के रूपों से आवृत्त होकर असंख्य जीवात्माओं के रूप में प्रतीत होता है। जैसे ही यह आवरण हटता है, समस्त भेद लुप्त हो जाता है। जिस कक्ष में आप स्थित हैं, उसके ऊपर का आकाश, और आपके भीतर विद्यमान चेतना—ये तीन पृथक् आकाश नहीं, अपितु एक ही अखण्ड विस्तार हैं।

इसी कारण उनका नाम उन्हें केवल किसी राज्य की रानी नहीं, अपितु समस्त लोकों की अधीश्वरी घोषित करता है। लोक उनसे पृथक् स्थित नहीं हैं कि वे बाहर से उन पर शासन करें। वे सम्पूर्णतः उन्हीं में स्थित हैं, और वे सृष्टि के प्रत्येक अंश के अपने ही हृदय-स्पन्दन से भी अधिक समीप हैं।

इसी उपदेश में वे स्वयं को समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित साक्षी कहती हैं—जो प्रत्येक चेतना-स्पन्दन में विद्यमान है, किन्तु उसके किसी भी परिवर्तन से अभिन्न नहीं है। विचार आते-जाते रहते हैं, इच्छाएँ और भय उत्पन्न होकर लुप्त हो जाते हैं; किन्तु वे वह निश्चल साक्षी हैं जिसके समक्ष यह सब घटित होता है। इसलिए वह स्थान जहाँ उन्हें पहचानना सबसे कठिन है, कोई मन्दिर नहीं, बल्कि वही चेतना है जिससे आप इस पंक्ति को पढ़ रहे हैं। वे इतनी समीप हैं कि दृष्टिगोचर नहीं होतीं—जैसे हम अपने ही मुख पर रखे चश्मे को खोजते फिरते हैं, अथवा जैसे नेत्र स्वयं को नहीं देख सकता।

हम प्रायः ईश्वर की खोज दूरस्थ पर्वत-शिखरों अथवा मन्दिरों में करते हैं, मानो वह हमसे सहस्रों योजन दूर हो। किन्तु उनका यह उपदेश अपने ही गृह में प्रज्वलित दीपक के समान है। इसमें न कोई दूरी है और न किसी यात्रा की आवश्यकता, क्योंकि आप कभी भी उस सत्य से बाहर नहीं रहे जिसकी प्राप्ति के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। छान्दोग्य उपनिषद् इसी बोध को तीन शब्दों में व्यक्त करता है—तत् त्वम् असि—वह तुम हो।

अतः साधना का प्रयोजन किसी नवीन भूमि की खोज करना नहीं, अपितु उस असीम आधार को पहचानना है जिस पर आप सदा से स्थित रहे हैं। माँ भुवनेश्वरी का आवाहन करना अन्तर्मुख होना है—नेत्रों को बन्द करना, इन्द्रियों को भीतर समेट लेना, और हृदय-कमल में चित्त को स्थिर करना, जहाँ उनकी स्वयंप्रकाशित प्रज्ञा आपके अस्तित्व के निःशब्द केन्द्र में अनवरत प्रकाशित रहती है।

माँ का स्वरूप एवं प्रतीकात्मकता

देवों ने सर्वप्रथम माँ भुवनेश्वरी के दिव्य स्वरूप का दर्शन किया, उनकी वाणी सुनने से पूर्व। यह मनन करने योग्य एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है, क्योंकि उनके स्वरूप का अधिकांश अर्थ उन वस्तुओं में निहित है, जिन्हें धारण न करने का उन्होंने चयन किया है।

उनका प्रत्येक आयुध तथा प्रत्येक मुद्रा अपने-आप में एक उपदेश है, जो देवी के स्वरूप, शक्ति तथा अपने भक्तों का मार्गदर्शन करने की विशिष्ट विधि का उद्घाटन करता है। माँ भुवनेश्वरी का वर्ण उदित होते सूर्य के सदृश वर्णित है।

वे अपने केशों में अर्धचन्द्र धारण करती हैं, जो काल तथा सृष्टि, स्थिति और संहार के चक्रों पर उनके आधिपत्य का प्रतीक है। उनके तीन नेत्र भूत, वर्तमान और भविष्य का अवलोकन करने के उनके सामर्थ्य का तथा माया के आवरण के परे भी देखने की उनकी दिव्य दृष्टि का प्रतीकत्व करते हैं।

अपने दो हाथों में वे पाश और अंकुश धारण करती हैं, जो भक्तों को प्रेम के बन्धन में आबद्ध करने तथा उन्हें आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करने के उनके सामर्थ्य का प्रतीकत्व करते हैं। उनके अन्य दो हाथ खुले रहते हैं—एक अधोमुख होकर वर प्रदान करने की मुद्रा (वरद मुद्रा) में तथा दूसरा अभय प्रदान करने की मुद्रा (अभय मुद्रा) में उत्थित रहता है।

मंत्र तथा अनुष्ठानों पर आधारित दशम शताब्दी के तांत्रिक ग्रन्थ शारदातिलक के प्राचीन भाष्यकार राघवभट्ट इन प्रतीकों को आयुध अर्थात् देवी के उपकरणों के रूप में वर्गीकृत करते हैं। शारदातिलक के नवम पटल जैसे कुछ चित्रणों में वे अपना चरण रत्नजटित कलश पर भी स्थापित किए हुए हैं, जो भौतिक ऐश्वर्य तथा आध्यात्मिक निधियों पर उनके आधिपत्य का प्रतीक है।

माँ भुवनेश्वरी के उपकरण सदैव शस्त्र नहीं होते। वे छेदन या प्रहार करने के स्थान पर बन्धन और मार्ग-परिवर्तन का कार्य करते हैं। देवीभागवत पुराण ऐसी जगज्जननी का वर्णन करता है जिनकी करुणा के लिए कोमल होना आवश्यक नहीं है। इसी आलोक में पाश और अंकुश उनकी एक ही करुणा के दो स्वरूप प्रतीत होते हैं—पाश पथभ्रष्ट साधक को पुनः अपने समीप खींच लाता है, और अंकुश उस साधक को उस संकट से दूर मोड़ देता है जिसे वह स्वयं देख नहीं पाता। उनके खुले हुए दोनों हस्त इस उपदेश को पूर्ण करते हैं—अपने परम कल्याण की खोज करो और भयभीत न हो।

इस स्वरूप में वे संयम, मार्ग-परिवर्तन, उदारता तथा भय-निवारण की अभिव्यक्ति करती हैं। देवीभागवत पुराण उद्घोष करता है कि सम्पूर्ण जगत् उन्हीं में ओतप्रोत है तथा चर और अचर—कुछ भी उनसे पृथक् अस्तित्व नहीं रखता। वे कमलासन पर विराजमान हैं, जो संसार की समस्त अशुद्धियों के मध्य भी उनकी निर्मलता तथा आध्यात्मिक प्रबोधन का प्रतीक है।

माँ स्मितमुखी हैं। हममें से अधिकांश लोग दिव्य सत्ता के सम्मुख पहले से ही किसी भूमिका का अभ्यास करके पहुँचते हैं, मानो कुछ सिद्ध करना हो या कुछ प्रस्तुत करना हो। माँ का यह स्वरूप इनमें से किसी भी वस्तु की अपेक्षा नहीं करता। उनके समीप उसी प्रकार जाएँ, जैसे कोई अपनी माँ के पास जाता है—निःसंकोच, निष्कपट और बिना किसी आडम्बर के; क्योंकि वे पहले से ही जानती हैं कि आपको कौन-सा दुःख व्यथित कर रहा है और आपको वास्तव में किसकी आवश्यकता है।

माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी भी वही पाश और अंकुश धारण करती हैं, किन्तु उनके अन्य दो हाथों में इक्षुधनुष तथा पाँच पुष्पबाण सुशोभित रहते हैं। श्रीविद्या की परम्परा में ये सामान्य आयुध नहीं हैं; इक्षुधनुष मन का, और पाँच पुष्पबाण पाँच इन्द्रियों का प्रतीक है। उनकी सार्वभौम सत्ता उन साधनों पर पूर्ण अधिकार में निहित है, जो जीवात्मा को बन्धन में रखते हैं।

माँ भुवनेश्वरी के शेष दो हाथ वरद और अभय मुद्राओं में स्थित हैं। उनकी सार्वभौम सत्ता को ऐसे किसी अतिरिक्त साधन की आवश्यकता नहीं—क्योंकि मन और इन्द्रियाँ भी, समस्त सृष्टि की भाँति, उन्हीं से उद्भूत होती हैं।

माँ का दशमहाविद्याओं में स्थान

दश महाविद्याओं के क्रम में माँ भुवनेश्वरी चतुर्थ हैं, माँ काली, माँ तारा एवं माँ त्रिपुर सुंदरी के पश्चात्।

उनकी विशिष्ट भूमिका दिव्य ज्ञान-शक्ति से सम्बद्ध है, जो वह बोधशक्ति है जिसके द्वारा समस्त प्राणी वस्तुस्थिति का अनुभव एवं अवग्रहण कर सकते हैं।

जहाँ माँ त्रिपुर सुंदरी इच्छा-शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं, वहीं माँ भुवनेश्वरी ज्ञान-तत्त्व की वह अभिव्यक्ति हैं, जो आकाश एवं विश्वचेतना के रूप में प्रकट होती है।

माँ भुवनेश्वरी और माँ त्रिपुर सुंदरी

इन दोनों देवियों में पर्याप्त साम्य होने के कारण उनके पारस्परिक सम्बन्ध और भेद को अधिक विस्तार से समझना आवश्यक है। अपने प्रचलित चतुर्भुज स्वरूपों में दोनों पाश और अंकुश धारण करती हैं। दोनों का सम्बन्ध ‘ह्रीँ’ बीजाक्षर से है तथा दोनों महादेवी के स्वरूपों के रूप में पूजित हैं। अतः जो साधक प्रथम बार उनके दर्शन या उपासना से परिचित होता है, उसके मन में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उत्पन्न हो सकता है कि क्या वास्तव में इन दोनों में कोई भेद भी है।

तथापि, दोनों के मध्य स्पष्ट भेद विद्यमान हैं, और साधना की दृष्टि से उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण भेद उनके बीजाक्षर, अर्थात् बीज मंत्र का है। ‘ह्रीँ’ माँ भुवनेश्वरी का प्रधान मायाबीज है तथा शाक्त परम्पराओं में इसे शक्ति प्रणव भी कहा जाता है। श्रीविद्या में यही बीजाक्षर माँ त्रिपुर सुंदरी के दीर्घ पंचदशी मंत्र में तीन बार प्रकट होता है, जहाँ यह उसके तीनों कूटों के अन्त में स्थित रहता है। यह सम्बन्धित षोडशी मंत्र-रूपों का भी एक अंग है। अतः ‘ह्रीँ’ उनके व्यापक मंत्र-विन्यास का एक बीजाक्षर अवश्य है, किन्तु वही माँ त्रिपुर सुंदरी का सम्पूर्ण अथवा एकमात्र बीज मंत्र नहीं है। त्रिपुरातापिनी उपनिषद् के अष्टम मंत्र की पारम्परिक व्याख्याओं में पंचदशी मंत्र के भीतर स्थित ‘ह्रीँ’ के इन तीनों प्रयोगों को भुवनेश्वरी-बीज के रूप में निरूपित किया गया है।

इन दोनों के अभेद का और भी सुदृढ़ आधार श्री भुवनेश्वरी सहस्रनाम में प्राप्त होता है, जिसके समापन श्लोक यह उद्घाटित करते हैं कि यह वस्तुतः व्यापक रुद्रयामल तंत्र का ही एक अंश है। इसके प्रारम्भिक श्लोक स्पष्ट रूप से ‘ह्रीँ’ को माँ भुवनेश्वरी का पवित्र बीज घोषित करते हैं। इसके उपरान्त सहस्रनाम उन्हें ‘त्रिपुरा’ तथा ‘महात्रिपुरसुन्दरी’ कहकर सम्बोधित करता है, साथ ही ‘त्रिपुरा’ और ‘सुन्दरी’ नामों का संयुक्त रूप से भी उल्लेख करता है (प्रारम्भिक उद्घोषणा तथा श्लोक ८–१०)। आगे चलकर वही स्तोत्र उन्हें ‘सर्वरूपा’, ‘सर्वमयी’ तथा ‘अद्वैतानन्दरूपिणी’ कहता है—अर्थात् वे जो समस्त रूपों को धारण करती हैं, समस्त रूपों से ही परिपूर्ण हैं तथा अद्वैतानन्द की साक्षात् मूर्ति हैं (श्लोक ६५)। इस प्रकार यह सहस्रनाम स्पष्ट करता है कि अन्ततः ये दोनों स्वरूप एक ही परम देवी के स्वरूप हैं।

किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि दोनों की अनुष्ठान-परम्परा भी स्वतः एक ही है। माँ त्रिपुर सुंदरी, जिन्हें ललिता अथवा षोडशी भी कहा जाता है, श्रीविद्या अथवा श्रीकुल परम्परा की अधिष्ठात्री देवी हैं। तंत्रराज तंत्र उनकी तांत्रिक एवं अनुष्ठानिक परम्परा का प्रमुख ग्रन्थ है। उसकी मंत्र-प्रणाली तथा चक्र-केन्द्रित उपासना विशेष रूप से त्रिपुर सुंदरी की आराधना के लिए निर्देशित है। दूसरी ओर, माँ भुवनेश्वरी दशमहाविद्याओं में से एक हैं तथा उनकी अपनी स्वतन्त्र मंत्र-परम्परा और अनुष्ठान-पद्धति है।

रुद्रयामलीय भुवनेश्वरी पंचांग दशविद्यारहस्य का एक भाग है, जिसका मूल व्यापक रुद्रयामल में निहित है। इसके साथ भुवनेश्वरी पूजापद्धति उनके नित्य पूजन की विधि का विस्तारपूर्वक निरूपण करती है। ये दोनों ग्रन्थ संयुक्त रूप से प्रमाणित करते हैं कि माँ भुवनेश्वरी की उपासना अपनी स्वतन्त्र परम्परा पर प्रतिष्ठित है। वह केवल माँ त्रिपुर सुंदरी की अनुष्ठान-पद्धति का अनुकरण मात्र नहीं है। माँ भुवनेश्वरी को कालीकुल परम्परा में प्रतिष्ठित करने का प्रत्यक्ष शास्त्रीय आधार भी उपलब्ध है। निरुत्तर तंत्र में निम्नलिखित वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया है :

काली तारा रक्तकाली भुवना महिषमर्दिनी ।
त्रिपुटा त्वरिता दुर्गा विद्या प्रत्यङ्गिरा तथा ॥

कालीकुलं समाख्यातं श्रीकुलं च ततः परम् ।
सुन्दरी भैरवी बाला बगला कमलापि च ॥

धूमावती च मातङ्गी विद्या स्वप्नवती प्रिये ।
मधुमती महाविद्या श्रीकुलं परिभाषितम् ॥

“कालीकुल की दस देवियाँ हैं—काली, तारा, रक्तकाली, भुवना अथवा भुवनेश्वरी, महिषमर्दिनी, त्रिपुटा, त्वरिता, दुर्गा, विद्या तथा प्रत्यंगिरा। श्रीकुल की दस देवियाँ हैं—सुन्दरी, भैरवी, बाला, बगला, कमला, धूमावती, मातंगी, स्वप्नवती, मधुमती तथा महाविद्या।”

— निरुत्तर तंत्र, प्रथम पटल, श्लोक ६–८

ये श्लोक माँ भुवनेश्वरी को कालीकुल परम्परा में प्रतिष्ठित करने का शास्त्रीय आधार प्रदान करते हैं। दूसरी ओर, माँ त्रिपुर सुंदरी श्रीविद्या तथा श्रीकुल की अधिष्ठात्री देवी हैं।

उनके स्वरूप भी इसी सत्य का उद्घाटन करते हैं। माँ त्रिपुर सुंदरी को सदा षोडशवर्षीया दिव्य कन्या के रूप में चित्रित किया जाता है, जो त्रिलोक में दिव्य सौन्दर्य और लीला-मयी सार्वभौम सत्ता की मूर्त अभिव्यक्ति हैं। इसके विपरीत, माँ भुवनेश्वरी जगज्जननी के रूप में विराजमान हैं—विशाल, शान्त और ऐसी, जिनके दिव्य स्वरूप में समस्त लोक समाहित हैं। देवी ललिता वे हैं जो त्रिलोक में विहार करती हैं, जबकि माँ भुवनेश्वरी वही अनन्त विस्तार हैं, जिसमें समस्त लोक स्थित हैं।

अतः दशमहाविद्या परम्परा में माँ त्रिपुरा सुंदरी और माँ भुवनेश्वरी को एक ही परम देवी की भिन्न-भिन्न महाविद्याओं के रूप में समझना सर्वाधिक उपयुक्त है। सर्वोच्च आध्यात्मिक स्तर पर उन्हें उसी परम महादेवी के विविध स्वरूपों के रूप में समझा जा सकता है; किन्तु औपचारिक साधना की दृष्टि से उनके विशिष्ट मंत्र, अनुष्ठान-पद्धतियाँ तथा उपासना-विधियाँ परस्पर भिन्न ही रहती हैं।

माँ भुवनेश्वरी के सहस्रनाम में जब किसी अन्य देवी का नाम उनके नामों के मध्य प्रकट होता है, तब उसके सम्बन्ध में एक महत्त्वपूर्ण व्याख्यात्मक सिद्धान्त स्मरण रखना चाहिए। इसका आशय यह हो सकता है कि सहस्रनाम उस देवी को भुवनेश्वरी का ही एक स्वरूप, शक्ति, कार्य या अभिव्यक्ति स्वीकार करता है। इस प्रकार का दिव्य समावेश सहस्रनाम साहित्य की एक सामान्य विशेषता है।

माँ की कृपा की एक कथा

अक्कलकोट स्वामी समर्थ से सम्बद्ध मौखिक तथा पश्चात् लिखित चरित्रात्मक परम्पराओं के अनुसार, माँ भुवनेश्वरी की कृपा से सम्बद्ध एक अद्भुत सत्यकथा एक ऐसे बाल ब्राह्मण की है जो जन्म से ही बौद्धिक दुर्बलता से पीड़ित था। उसकी स्थिति का आघात सह न पाने के कारण उसके माता-पिता का देहान्त हो गया और वह बालक अनाथ हो गया।

वह ग्राम-ग्राम भटकता रहा, किन्तु जहाँ भी गया, तिरस्कार और उपेक्षा का ही सामना करता रहा।

निराश होकर वह महाराष्ट्र के भिलवडी ग्राम स्थित माँ भुवनेश्वरी के मन्दिर पहुँचा और ३ दिनों तक निराहार-निरजल देवी के समक्ष बैठा रहा। अपनी पीड़ा में उसने अपनी जिह्वा काटकर देवी को अर्पित कर दी और उनसे दर्शन की याचना करते हुए कहा कि यदि वे प्रकट न हुईं तो वह अपना जीवन त्याग देगा।

तब देवी उसके स्वप्न में प्रकट हुईं, और उन्होंने समझाया कि यद्यपि वे उसके कर्मफल को परिवर्तित नहीं कर सकतीं, किन्तु नदी के पार एक महात्मा उसकी सहायता कर सकते हैं।

एक ए.आई. द्वारा निर्मित चित्र, जिसमें माँ भवनेश्वरी एक उदास, सोए हुए बालक के पीछे वृक्ष के नीचे खड़ी होकर उसे अभय-मुद्रा से आशीर्वाद देती हुई दर्शायी गयी हैं।

नदी के पार, दूसरी ओर, उस बालक ने अक्कलकोट स्वामी समर्थ को एक औदुम्बर वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ अवस्था में पाया। जिह्वा कट जाने के कारण वह वाणी से कुछ कह नहीं सका, किन्तु करुणामयी संत ने उसकी व्यथा भलीभाँति समझ ली।

स्वामी समर्थ ने अपना हस्त उसके पृष्ठ पर फेर दिया, और चमत्कारवश उसकी जिह्वा पुनः सुस्थापित हो गई।

इस अद्भुत उपचार ने यह दर्शाया कि दिव्य कृपा देवी एवं सिद्ध पुरुष, दोनों के माध्यम से प्रवहमान हो सकती है और सच्चा श्रद्धाभाव इस कृपा को प्रकट कर सकता है।

माँ के मंत्र-अभ्यास

माँ भुवनेश्वरी साधना अथवा माँ भुवनेश्वरी पूजन से सम्बद्ध आध्यात्मिक अभ्यास साधक को लौकिक सफलता एवं आध्यात्मिक साक्षात्कार — दोनों की ओर एक समग्र मार्ग प्रदान करते हैं।

यह साधना परम्परानुसार शुभ अवसरों पर आरम्भ की जाती है, विशेषतः भुवनेश्वरी प्राकट्य दिवस अथवा भुवनेश्वरी जयन्ती पर, जब माता का प्रथम प्राकट्य हुआ था। पूर्णिमा के दिवस पर भी उनकी साधना का आरम्भ किया जा सकता है।

साधक सामान्यतः रात्रि ९ बजे के पश्चात् साधना आरम्भ करते हैं, श्वेत अथवा पीत वस्त्र धारण कर उत्तर अथवा पूर्व की ओर मुख करके।

इस साधना का मूलतत्त्व विशिष्ट यंत्रों तथा पवित्र ज्यामितीय आरेखों के प्रयोग में निहित है, जो ध्यान एवं ऊर्जा-संकेन्द्रण के हेतु आधार-बिन्दु रूप में कार्य करते हैं।

जो साधक इस साधना को निष्ठा एवं श्रद्धा के साथ सम्पन्न करता है, वह शीघ्र ही अनुभव करने लगता है कि माता की शक्ति उसमें प्रवाहित हो रही है, उसे आनन्द एवं शान्ति से परिपूर्ण कर रही है, और प्रत्येक परिस्थिति में उसका मार्गदर्शन तथा संरक्षण कर रही है।

वह माता के प्रेम एवं करुणा का अनुभव न केवल अपने लिए करता है, अपितु समस्त प्राणियों के लिए करता है — और यही उसकी चैतन्यता में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का चिह्न होता है।

वर्ष में माँ के सर्वाधिक शुभ दिवस

पवित्र पंचांग की प्रत्येक तिथि समान प्रकार का प्रामाण्य नहीं रखती। कुछ का आधार शास्त्र है। अन्य भक्ति परम्परा की जीवित धारा से विकसित हुई हैं। दोनों का महत्त्व है। किन्तु उनका महत्त्व भिन्न प्रकार का है, और दोनों को मिश्रित करने से एक ऐसी बात अस्पष्ट हो जाती है जिसे जानना आवश्यक है।

देवीभागवत पुराण में वर्णित है कि हिमालय में वर्षों तक अखण्ड उपासना के उपरान्त देवताओं ने चैत्र मास की नवमी तिथि—शुक्रवार—को परम तेज को देवी के स्वरूप में प्रकट होते देखा। यही उनका प्राकट्य दिवस है, अर्थात् उनके आविर्भाव का दिवस, जिसे स्वयं पुराण के आख्यान में सुरक्षित रखा गया है।

संस्कृत श्लोक जिस बात का उल्लेख नहीं करता, वह है पक्ष। तत्पश्चात् कुछ भक्तिपरक परम्पराओं ने इस घटना को चैत्र शुक्ल नवमी, अर्थात् राम नवमी के दिन स्थित माना। यह एक मान्य व्याख्यात्मक परम्परा है। किन्तु यह स्वयं ग्रन्थ का कथन नहीं है।

नवमी तिथि स्वयं उनके सम्पूर्ण वांग्मय में बारम्बार महत्त्वपूर्ण रूप में प्रकट होती है। रुद्रयामल से प्राप्त सहस्रनाम में अष्टमी, चतुर्दशी तथा नवमी को विशेष रूप से पाठ के लिए शुभ कहा गया है। रहस्य ग्रन्थ में नवाक्षरी मंत्र का सम्बन्ध सोमवार की नवमी से स्थापित किया गया है। इस तिथि का महत्त्व केवल चैत्र तक सीमित नहीं है, अपितु समस्त ऋतुओं में विद्यमान रहता है।

उनकी जयन्ती का विषय सर्वथा भिन्न है। भक्ति परम्परा इसे भाद्रपद शुक्ल द्वादशी के दिन मनाती है, जो प्रतिवर्ष अगस्त अथवा सितम्बर में आती है। मन्दिरों में विशेष पूजाएँ होती हैं। साधक एकत्रित होते हैं। प्रमुख ग्रन्थ इस तिथि का उल्लेख नहीं करते—यह उस परम्परा की धरोहर है जिसने पीढ़ी दर पीढ़ी उनकी उपासना को जीवित रखा है।

एक अवसर शास्त्रसम्मत है, दूसरा पारम्परिक। इस भेद से किसी का भी महत्त्व कम नहीं होता।

वे जो समस्त लोकों को अपने भीतर धारण करती हैं

लोकों के अस्तित्व में आने से पूर्व वह आकाश था जिसमें लोकों का प्राकट्य सम्भव था। देवी की खोज करने वाले उपासक के अस्तित्व में आने से पूर्व माँ भुवनेश्वरी थीं, जिनसे साधक और साधना पथ—दोनों का उद्भव होता है।

उन्हें सर्व लोकों की महारानी कहा जाता है, किन्तु कोई सिंहासन उन्हें धारण नहीं कर सकता। वे हमारी भाँति आकाश में निवास नहीं करतीं। आकाश उनमें निवास करता है।

ऋषियों ने उन्हें महामाया कहा, इसलिए नहीं कि यह जगत मिथ्या है, बल्कि इसलिए कि वे ही वह रहस्यमयी शक्ति हैं, जिसके द्वारा एक अनेक के रूप में प्रतिभासित होता है। किन्तु माँ सदा एक ही रहती हैं। वे ही आवरण हैं, और वे ही वह सत्य हैं जिसे वह आवरण आच्छादित करता है। प्रत्येक रूप उनकी घोषणा करता है, किन्तु कोई भी रूप उन्हें पूर्णतः व्यक्त नहीं कर सकता।

उनका हृदय ह्रीं के रूप में श्रुत होता है, जो उनकी उपस्थिति के एक बिंदु में संकेंद्रित होने का चिह्न है, जैसे एक वृक्ष एक बीज में संकेंद्रित होता है। लोक उसी से प्रकट होते हैं। मन उसी के माध्यम से पुनः लौटता है।

माँ भुवनेश्वरी की स्तुति करना एक नश्वर प्राणी के लिए असम्भव है, क्योंकि उनकी स्तुति में प्रयुक्त प्रत्येक शब्द पहले से ही उनका है। प्रत्येक विचार उनकी शक्ति से उदित होता है। यहाँ तक कि अंतिम शब्द के उच्चरित हो जाने के पश्चात् का मौन भी उनकी उपस्थिति का ही एक अन्य स्वरूप है।

उनका पाश हमारे भीतर बिखर चुके प्रत्येक अंश को पुनः एकत्रित करे।

उनका अंकुश हमारे भीतर सुप्त पड़े प्रत्येक तत्त्व को जागृत करे।

उनका अभय हस्त हमें उस प्रत्येक परिस्थिति के सम्मुख स्थिर रखे जिसका सामना करना अनिवार्य है।

उनका वरद हस्त हमें केवल नश्वर वस्तुएँ ही नहीं, अपितु वह भी प्रदान करे जिसे कभी छीना नहीं जा सकता।

जो समस्त लोकों को अपने भीतर धारण करती हैं, वे हमारे हृदय को इतना विशाल बनाएँ कि वह उन्हें जान सके।

ह्रीं!

'तंत्र साधना' ऐप के माध्यम से उनका आवाहन

यदि इन शब्दों ने आपके हृदय का कोई द्वार खोल दिया है और आपको इस महाविद्या के ज्ञान की ओर आकर्षित किया है, तो 'तंत्र साधना' ऐप के माध्यम से अपनी साधना का शुभारम्भ करें।

हिमालयी संन्यासी ओम स्वामी द्वारा स्थापित यह ऐप दशमहाविद्याओं (तंत्र की १० ज्ञानदेवियों) में से प्रत्येक की निर्देशित साधना प्रदान करता है, जो प्रामाणिक शास्त्रीय ग्रन्थों तथा जीवित गुरु-परम्परा पर आधारित है—उनका मंत्र, उनका यंत्र, उनकी उपासना; ठीक उसी प्रकार, जैसा उन्होंने स्वयं निर्धारित किया है। केवल प्रतीकों के रूप में नहीं, अपितु उनकी सजीव दिव्य उपस्थिति के रूप में।

'तंत्र साधना' ऐप के लोडिंग स्क्रीन का एक स्क्रीनशॉट। इसमें मध्य में ऐप का लोगो प्रदर्शित है तथा पृष्ठभूमि में किसी एक महाविद्या का 3-डी लोक दर्शित है।

अपने बहु-मिलियन डॉलर मूल्य के सॉफ़्टवेयर उद्योग का त्याग करके हिमालय में आध्यात्मिक जागरण हेतु संन्यास लेने वाले ओम स्वामी ने स्वयं दशमहाविद्याओं में से प्रत्येक का अनुभव एवं आह्वान किया है। उनकी दीर्घ आध्यात्मिक यात्रा में उन्होंने १५,००० घण्टों से अधिक समय एकान्त में ध्यान में व्यतीत किया। वही 'तंत्र साधना' ऐप की आधारशिला है।

इसमें साधक प्रबल अनुष्ठानों में प्रवृत्त हो सकते हैं, जैसे शव-साधना, खण्ड-मुण्ड साधना तथा पंच-मुण्डि साधना, जो परम्परानुसार केवल दीक्षित साधकों हेतु आरक्षित होती हैं।

यह ऐप महाविद्याओं के शक्तिशाली एवं ऊर्जा-संवेहित मंत्र प्रदान करती है, जो पूर्वकाल में केवल किसी सिद्ध गुरु से प्रत्यक्ष दीक्षा द्वारा ही सुलभ होते थे।

इस ऐप की विशेषता इसका क्रमबद्ध विन्यास है। साधना-यात्रा का आरम्भ साधक माँ काली की आराधना से करता है, जो दशमहाविद्याओं में प्रथम पूज्य हैं, और अन्ततः माँ कमलात्मिका की उपासना द्वारा पूर्ण करता है।

प्रत्येक महाविद्या के साथ ११-दिवसीय पूर्वानुष्ठान होता है, जिसमें मंत्र जप तथा यज्ञ सम्मिलित रहते हैं। इसके पश्चात् ही मुख्य साधना उपलब्ध होती है।

मुख्य साधना २१ से ४० दिनों तक की होती है। यह उस विशिष्ट महाविद्या पर निर्भर करती है।

यह पद्धति यह सुनिश्चित करती है कि एक साधक ने उन्नत साधनों में प्रवृत्त होने से पूर्व देवी के प्रति गहन भक्ति को उत्पन्न कर लिया है।

माँ की कृपा को जागृत करें। परमात्मा के प्रेम में निमग्न हो जाएँ।
माँ केवल उन्हीं को बुलाती हैं जो उनकी उपासना के लिए तैयार होते हैं। यदि आप यहाँ हैं, तो आप तैयार हैं। दशमहाविद्याओं को जागृत करें। और भक्ति में आरोह करें।

संदर्भ : greatgurusofindia.wordpress.com

Frequently Asked Questions

माँ भुवनेश्वरी के पति कौन हैं?

​अनेक तांत्रिक ग्रन्थों एवं परम्पराओं में शिव के भुवनेश्वर अथवा त्र्यम्बक भैरव स्वरूप को माँ भुवनेश्वरी के पति माना गया है।

क्या हम माँ भुवनेश्वरी की उपासना गृह में कर सकते हैं?

हाँ, कर सकते हैं। गृहस्थ उपासना में इसे सरल एवं सात्त्विक रखना उत्तम है — उनकी प्रतिमा, मूर्ति अथवा यंत्र के साथ, फल, पुष्प, धूप तथा दीपक अर्पित करके और उनका मंत्र जप करके।

माँ भुवनेश्वरी का वर्ण क्या है?

माँ भुवनेश्वरी का वर्ण स्वर्णाभ अथवा लाल कहा गया है, जो उदित होते सूर्य के समान तेजस्वी प्रतीत होता है। वे लाल और पीत वस्त्र भी धारण करती हैं।

माँ भुवनेश्वरी की उपासना के फल क्या हैं?

विश्व की अधिष्ठात्री होने के कारण माँ भुवनेश्वरी किसी भी लौकिक अभिलाषा को पूर्ण कर सकती हैं और साधक को सर्वतोभद्र समृद्धि प्रदान कर सकती हैं। उनका बीज मंत्र 'ह्रीं' साधक को माया से परे ले जाता है।