इस लेख में आप पढ़ेंगे :
माँ काली जयन्ती २०२६ तथा जन्माष्टमी २०२६ की तिथि एवं समय
काली और कृष्ण की उत्पत्ति कथाएँ
काली और कृष्ण के बीच सम्बन्ध
भगवान कृष्ण द्वारा माँ काली का आवाहन
कृष्ण तंत्र : कृष्ण और काली का गूढ़ सम्बन्ध
'तंत्र साधना' ऐप के माध्यम से माँ काली उनकी जागृति
माँ काली जयन्ती २०२६ तथा जन्माष्टमी २०२६ की तिथि एवं समय
तिथि : ४-५ सितम्बर (शुक्र-शनि)
अष्टमी तिथि : ४ सितम्बर प्रातः २:२५ से ५ सितम्बर रात्रि १२:१३ तक
महाकाली की उत्पत्ति कथा
देवी सती के पिता दक्ष प्रजापति ने एक यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने भगवान् शिव को आमन्त्रित नहीं किया। राजा अपने तपस्वी और विरक्त योगी जामाता को स्वीकार नहीं करते थे, जिन्होंने उनकी कन्या देवी सती से विवाह किया था।
जब देवी सती को यज्ञ का समाचार मिला, तो उन्होंने वहाँ जाने का निश्चय किया क्योंकि वे अपने पिता से मिलना चाहती थीं। भगवान् शिव ने उन्हें स्नेहपूर्वक समझाया, किन्तु वे नहीं मानीं।
उनकी इस हठ को देखकर भगवान् शिव क्रोधित हो उठे। उनके प्रकट असन्तोष को देखकर देवी सती भी प्रचण्ड क्रोध से भर उठीं। क्या वे भूल गए थे कि वही सम्पूर्ण विश्व की जननी हैं? यहाँ वे उन्हें एक बालिका की भाँति व्यवहार कर रहे थे!
अतः उन्होंने अपने वास्तविक स्वरूप का प्राकटन करने का निश्चय किया। भगवान् शिव की दृष्टि के समक्ष ही वे रूपान्तरित हो गईं — लाल नेत्रों वाली, उग्र, श्यामवर्णा, प्रचण्ड क्रोध में लहराते घने केश, बाहर लटकती लाल जिह्वा। मुण्डमाल धारण किए वे सम्पूर्ण विश्वनायक से भी ऊँची प्रकट हुईं।
यही था महाकाली का प्रथम अविर्भाव।
देवी के इस उग्र रूप को देखकर भगवान् शिव भयभीत हो उठे। जब वे उनसे बचकर भागने लगे, तब माँ ने ९ अन्य रूप धारण किये और समस्त दसों दिशाओं में उन्हें रोक दिया।
ये ही १० रूप आगे चलकर दशमहाविद्या कहलाए।
जब भगवान् शिव ने देखा कि अब कोई मार्ग नहीं बचा, तो वे भागना छोड़कर रुक गए। महाकाली के विकराल रूप को निहारते हुए उन्होंने पूछा, “तुम कौन हो? और मेरी प्रिय सती कहाँ हैं?”
महाकाली हँस पड़ीं, “मैं ही तुम्हारी प्रिया हूँ। यही मेरा वास्तविक स्वरूप है — जगत का संहार करने वाला।”
अतः महाकाली भगवान् शिव का स्त्रीस्वरूप हैं, जो स्वयं भी संहारिणी हैं। वे उन्हीं में माँ भैरवी के रूप में निवास करती हैं — वे उग्र योद्ध्रा, जो भगवान् भैरव की अर्धांगिनी हैं।
भगवान कृष्ण के जन्म की अद्भुत कथा
बहुत समय पूर्व, मथुरा नगरी में अत्याचारी राजा कंस का कठोर शासन था। अपनी बहन देवकी के वसुदेव के साथ विवाह के दिन एक दिव्य वाणी ने भविष्यवाणी की कि देवकी का आठवाँ पुत्र कंस के अन्तिम पतन का कारण बनेगा।
भय और क्रोध से प्रेरित होकर कंस ने उस दम्पति को कड़ी सुरक्षा वाली कारागार में बन्दी बना दिया और अपने नियत भाग्य को टालने के लिए उनके प्रथम सात नवजात पुत्रों को एक-एक करके मार डाला। वर्षा ऋतु की एक अन्धकारमय, तूफानी अर्धरात्रि में भगवान विष्णु ने श्री कृष्ण के रूप में अवतार लिया और कारागार की कोठरी में देवकी के गर्भ से जन्म लिया।
दैवी हस्तक्षेप से कारागार के प्रहरी गहरी निद्रा में सो गए, भारी लौह शृंखलाएँ स्वयं खुल गईं और विशाल द्वार खुल गए। वसुदेव ने नवजात देवस्वरूप शिशु को बाँस की टोकरी में अपने सिर पर रखा और उस प्रचण्ड तूफानी रात्रि में निकल पड़े।
जब वे गर्जन करती यमुना नदी को पार कर रहे थे, तब जल उनके मार्ग के लिए विभक्त हो गया, जबकि बहुफणधारी सर्प शेषनाग ने मूसलाधार वर्षा से दिव्य शिशु की रक्षा की। वसुदेव गोकुल ग्राम पहुँचे और वहाँ अपने मित्र नन्द और यशोदा की नवजात कन्या के साथ गुप्त रूप से श्री कृष्ण की अदला बदली कर दी।
कन्या शिशु को लेकर मथुरा लौटकर वसुदेव ने कंस के दौड़कर आने से ठीक पहले कारागार को पुनः बन्द कर दिया। जब अत्याचारी कंस ने उस शिशु को मारने का प्रयास किया, तब वह देवी योगमाया (स्वयं जगन्माता) के रूप में प्रकट हुईं और उसे चेतावनी दी कि उसका वध करने वाला पहले ही कहीं और सुरक्षित पहुँच चुका है।
श्री कृष्ण गोकुल में एक चंचल गोपाल के रूप में बड़े हुए और अपने ग्राम में आनन्द लाते रहे। अन्ततः उन्होंने कंस का वध करके भविष्यवाणी को सत्य किया। यह अत्याचार पर धर्म की विजय थी, जिसे आज लाखों लोग जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं।
काली और कृष्ण — एक ही ब्रह्मांडीय मुद्रा के २ पहलू
प्रथम दृष्टि में चंचल एवं मनोहर भगवान कृष्ण उग्र एवं रहस्यमयी माँ काली से मानो सर्वथा भिन्न प्रतीत होते हैं। किन्तु इन विपरीत प्रतीत होने वाले रूपों के अंतर्गत सनातन धर्म की प्राचीन तांत्रिक परम्पराओं में निहित एक गहन एवं रहस्यमय सम्बन्ध विद्यमान है।
तंत्र साधना की दृष्टि से माँ काली और भगवान कृष्ण का सम्बन्ध द्वैत का नहीं, अपितु दैवीय परस्पर–पूरकता का है, जहाँ रूप और अरूप, करुणा और संहार, पुरुष और स्त्री तत्त्व, पारमार्थिक एकता में लय होते हैं।
माँ काली और भगवान कृष्ण, एक ही परम तत्त्व ब्रह्म के २ प्रबल आयाम हैं। माँ काली काल, रूपांतरण और संहार की अनियंत्रित, अप्रशोधित शक्ति का प्रतीक हैं, जबकि भगवान कृष्ण चैतन्य, आनन्द और विश्वलीला का प्रतिनिधित्व करते हैं।
काली–कृष्ण सम्बन्ध केवल दार्शनिक नहीं, अपितु अनुभवगत भी है।
देवी भागवत पुराण तथा रुद्रयामल तंत्र जैसे कुछ तंत्रग्रन्थों में भगवान कृष्ण द्वारा जगन्माता की, विशेषतः माँ काली के स्वरूप की उपासना का उल्लेख मिलता है, जिसके द्वारा उन्होंने सिद्धियों की प्राप्ति तथा परम सत्य के साथ गहन एकत्व का अनुभव किया।
भगवान कृष्ण द्वारा माँ काली का आवाहन
महाभारत के महान युद्ध से पूर्व, ऐसा कहा जाता है कि स्वयं भगवान कृष्ण ने माँ काली का आवाहन किया था।
यद्यपि वे भगवान विष्णु के पूर्णावतार थे, तथापि वे भलीभाँति जानते थे कि धर्म के विजय हेतु शक्ति, अर्थात् दिव्य स्त्रीतत्त्व का आश्रय आवश्यक है। इसी कारण अमावस्या की रात्रि में, वे पाण्डवों के शिविर से चुपचाप निकल पड़े।
एक एकान्त स्थल पर, वृक्ष के नीचे पहुँचकर, उन्होंने भूमिपटल पर एक यंत्र (दिव्य स्त्रीतत्त्व का आह्वान करने वाला पवित्र रेखाचित्र) अंकित किया तथा एक छोटी ज्योति प्रज्वलित की।
गंभीर श्रद्धा के साथ वे माँ काली के महामंत्रों का जप करने लगे। उनके मंत्रों की गूँज उस स्थिर रात्रि को भेदती हुई उग्र देवी का आह्वान करने लगी।
धीरे-धीरे वातावरण अत्यन्त घना एवं विद्युत्समान ऊर्जामय हो उठा। तभी उनके समक्ष माँ काली प्रकट हुईं — अनन्त आकाश जैसी गहन श्यामवर्णा, प्रज्वलित नेत्रों वाली, जिह्वा बाहर निकली हुई, बिखरे केशों से ज्योतिर्मयी आभा प्रकट करती हुईं। ऐसे अद्भुत तेजस्वी स्वरूप में वे उनके सम्मुख अवतरित हुईं।
विनम्रतापूर्वक भगवान कृष्ण ने युद्ध में विजय तथा विश्व-संतुलन की पुनर्स्थापना हेतु माँ से आशीर्वाद की याचना की।
दया से भरी देवी की दृष्टि विश्वनाथ पर पड़ी, जो जोड़े हुए हाथों के साथ उनके समक्ष खड़े थे। माँ ने उन्हें आशीर्वाद दिया और आश्वासन दिया कि उनकी दिव्य शक्ति पाण्डवों को सभी विघ्नों पर विजय दिलाएगी।
इसी प्रकार, भगवान कृष्ण का युद्धभूमि पर उपस्थित होना स्वयं दिव्य मातृशक्ति के अजेय सामर्थ्य का द्योतक बन गया, जिसने पाण्डवों को विजय दिलाई और धर्म की पुनर्स्थापना की।
भगवान कृष्ण द्वारा माँ काली का आह्वान शक्ति-तत्त्व के महत्त्व का प्रतीक है — वह दिव्य स्त्रीशक्ति जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को गति देती है। शक्ति के बिना तो स्वयं शिव भी शव बन जाते हैं।
माँ का यह दिव्य सान्निध्य ही सृष्टि का संतुलन बनाये रखता है, आत्मिक जागृति कराता है और बाह्य एवं आन्तरिक — दोनों प्रकार की अन्धकारमयी शक्तियों पर विजय सुनिश्चित करता है।
कृष्ण तंत्र : कृष्ण और काली का गूढ़ सम्बन्ध
कृष्ण तंत्र व्यापक तांत्रिक परम्परा के अन्तर्गत एक अपेक्षया अल्पप्रसिद्ध किन्तु अत्यन्त शक्तिशाली धारा है, जो भगवान कृष्ण और जगन्माता — विशेषतः उनकी उग्र स्वरूपा माँ काली के परस्पर सम्बन्ध पर केन्द्रित है।
शाक्त-वैष्णव सम्मिलन में निहित यह तंत्र, भक्ति की साधना और आध्यात्मिक रूपान्तरण की प्राप्ति हेतु अनुष्ठान-निर्देश, ध्यान-प्रक्रियाएँ तथा मंत्र प्रदान करता है। इसकी मूल शिक्षाओं को एक श्लोक इस प्रकार निरूपित करता है :
"जो साधक भगवान कृष्ण का ध्यान जगन्माता के पति के रूप में करता है और अपनी चैतन्यधारा को उनकी चैतन्यधारा में विलीन कर देता है, वह समस्त द्वन्द्वों से परे होकर सिद्धि को प्राप्त करता है।”
यह ग्रन्थ भक्ति और आनन्दमयी उपासना को ब्रह्माण्ड की अद्वैत प्रकृति की अनुभूति के साधन रूप में प्रतिपादित करता है। यह यह भी दर्शाता है कि भगवान कृष्ण, यद्यपि चंचल और प्रेममय लीला स्वरूप हैं, तथापि वे अंतःकरण में देवी के आतंरिक पति का भी मूर्त स्वरुप हैं, जो तांत्रिक साधना में दैवीय पुरुष और स्त्री शक्तियों की अविभाज्यता को स्पष्ट करता है।
कुछ साधकों के मतानुसार भगवान कृष्ण केवल लीला पुरुषोत्तम ही नहीं हैं, अपितु देवी के उग्रतम स्वरूपों में भी उनके अंतःसहचर रूप में प्रतिष्ठित हैं।
आधुनिक युग में कृष्ण तंत्र पर विशेष रूप से आधारित मौलिक ग्रन्थ उपलब्ध होना कठिन है, और जो भी जानकारी मिलती है, वह प्रायः ब्लॉगों, लेखों तथा ऑनलाइन स्रोतों से प्राप्त होती है। कृष्ण तंत्र और उसकी शिक्षाओं पर विशेष चर्चा करने वाले २ ग्रन्थ कालिविलास तंत्र तथा टोडल तंत्र हैं।
कालिविलास तंत्र : यह संस्कृत ग्रन्थ है और बंगाल की तांत्रिक परम्पराओं से सम्बद्ध माना जाता है। इसकी मूल भाषा संस्कृत है, जिसमें भगवान कृष्ण को एक सुवर्णवर्णा देवी के पुत्र रूप में निरूपित किया गया है, जो कामानुरागवश श्यामवर्णा हो गईं। इसमें जगन्माता के साथ कृष्ण के एकत्व पर बल दिया गया है, विशेषतः माँ के काली स्वरूप में।
टोडल तंत्र : इस ग्रन्थ में भगवान कृष्ण को माँ काली के सहचर रूप में चित्रित किया गया है, तथा उन्हें महाविद्याओं में सम्मिलित किया गया है। यह तांत्रिक साधना में दैवीय पुरुष और स्त्री शक्तियों की अविभाज्यता को प्रतिपादित करता है।
कृष्ण तंत्र में माँ काली को भयावह नहीं माना गया, अपितु ऐसी शक्ति के रूप में देखा गया है जो माया का भेदन करके साधक को सत्य का बोध कराती है। भगवान कृष्ण, जो स्वयं माया के परम भोक्ता हैं, माँ काली के साथ नृत्य करते हैं, जिससे साधक को माया से परे जाने का मार्ग ज्ञात होता है।
काली और कृष्ण का यह नृत्य ब्रह्माण्ड की लय और ताल का प्रतीक है, जहाँ सृष्टि और संहार एकसाथ घटित होते रहते हैं।
“माँ की गोद में स्वयं श्यामसुन्दर भी शिशु हो जाते हैं। यही तंत्र का रहस्य है, जहाँ शक्ति ही समस्त अस्तित्व का आधार है।”
—कौलज्ञाननिर्णय

माँ काली भक्ति अज्ञात में समर्पण का मार्ग है — दिव्य के अप्रशोधित, उग्रतम स्वरूप का प्रेमपूर्ण आलिंगन। दूसरी ओर, भगवान कृष्ण की भक्ति आनन्द, संगीत और आध्यात्मिक रस स्वाद में रमण करती है।
किन्तु दोनों ही मार्ग अहंकार का लय कर देते हैं।
इनको जोड़ने वाली कड़ी है अन्तःस्थ भक्ति-अग्नि। काली और कृष्ण, दोनों ही साधक के अज्ञान का नाश करते हैं — काली संहार द्वारा और कृष्ण मोह द्वारा।
तंत्र साधना की उन्नत अवस्थाओं में साधक प्रायः अनुभव करता है कि काली और कृष्ण एक ही दिव्य शक्ति हैं, जो आत्मा के विभिन्न आयामों को जागृत करने हेतु भिन्न आदर्शरूपों में प्रतिबिम्बित होती हैं।
'तंत्र साधना' ऐप के माध्यम से माँ काली की जागृति
सत्यनिष्ठ साधकों के लिए 'तंत्र साधना' ऐप एक अद्वितीय और पवित्र स्थान है, जहाँ वे इन आयामों का सुरक्षित और प्रामाणिक रूप से अन्वेषण कर सकते हैं।
दीर्घकाल से विस्मृत तांत्रिक अनुष्ठानों के द्वार खोलते हुए, साधक को जागृत तांत्रिक मंत्रों, यज्ञों और दशमहाविद्याओं (तंत्र की १० ज्ञानस्वरूपा देवियों) की गूढ़ साधनाओं में दीक्षित किया जाता है।
उन्हें १० चित्ताकर्षक थ्री-डी लोकों में क्रमशः देवी के सभी १० स्वरूपों को जागृत करने के लिए चरण-दर-चरण मार्गदर्शन दिया जाता है।
यह यात्रा स्वयं माँ काली से आरम्भ होती है, जहाँ साधक अपने जीवन में उनकी उपस्थिति को जागृत करने के अन्तिम चरण के रूप में निश्चित दिनों तक प्रतिदिन उनकी गूढ़ शव साधना पूर्ण करता है।
माँ काली जयन्ती २०२६ के लिए गुप्त शक्तिपीठ
माँ काली जयन्ती सहित प्रत्येक आध्यात्मिक रूप से ऊर्जस्वित अवसर पर इस ऐप में एक गुप्त शक्तिपीठ भी प्रकट होता है।
यह सुविधा सभी उपयोगकर्ताओं को ऐप में उस दिवस की महाविद्या के ध्यान श्लोक का जप करने का अवसर प्रदान करती है, चाहे उनकी ऐप में प्रगति कितनी भी कम क्यों न हो।
माँ काली जयन्ती २०२६ पर आप उनका यज्ञ भी कर सकते हैं, जिसमें उनके १०८ दिव्य नामों को आहुतियाँ अर्पित की जाती हैं। इनमें से ६ नाम भगवान कृष्ण से संबंधित हैं।
गुप्त शक्तिपीठ की तिथियाँ और समय :
४ सितम्बर (शुक्र) को रात्रि १२ बजे से ५ सितम्बर (शनि) को प्रातः ६ बजे तक
माँ काली और भगवान कृष्ण की कृपा इस द्विगुणित शुभ दिवस पर आपके लिए नवीन द्वार खोले।
संदर्भ :
कौलज्ञाननिर्णय: प्राचीन तांत्रिक ग्रन्थ, रूद्रयामल तंत्र (अनूदित अंश), देवी भागवत पुराण - स्कंध १-१२, tantrasadhana.app, weareferment.net, Wisdom Library, Vedabase, Krishna Katha, adishakti.org (PDF), Devi Mahatmya – Krishna Kaali, Shiva Shakti – Krishna & Kali, Srichakra108 Blog