इस लेख में आप पढ़ेंगे :
- माँ काली का आविर्भाव एवं स्वभाव
- माँ तारा का आविर्भाव एवं स्वभाव
- क्या माँ काली और माँ तारा समान हैं?
- उनके बीज मंत्र
- उनके यंत्र
- 'तंत्र साधना' ऐप पर उनकी शव साधना एवं श्मशान साधना
- वे संत और सिद्ध जिन्होंने उनकी उपासना की
भगवान शिव पर विराजमान माँ काली की फ़ोटो
स्रोत : share.google
शक्ति-उपासना के विशाल सागर में बहुत कम स्वरूप ऐसे हैं जो माँ काली और माँ तारा के समान भय और करुणा—दोनों को इतनी गहनता से एक साथ धारण करते हों।
तंत्र की गुप्त धाराओं से प्रकट होकर वे दो भिन्न सत्ता नहीं, बल्कि उसी एक जगन्माता के दो मुख हैं—प्रथम दो महाविद्याएँ—एक जो अज्ञान का भक्षण करती हैं, और दूसरी जो मोक्ष की ओर पार उतारती हैं।
रुद्रयामल तंत्र माँ तारा की स्तुति “अस्तित्व के सागर के पार जीवों को उतारने वाली उद्धारक” के रूप में करता है, जबकि काली तंत्र माँ काली को “काल से भी परे स्थित” देवी के रूप में महिमामण्डित करता है।
भगवान शिव पर विराजमान माँ तारा की फ़ोटो
स्रोत : share.google
विविध आगमिक ग्रन्थों के अनुसार, दशमहाविद्याओं का प्रथम प्राकट्य उस समय हुआ, जब भगवान शिव ने देवी सती को दक्ष यज्ञ में जाने से निषेध किया—वह यज्ञ, जिसमें उन्हें तथा स्वयं भगवान शिव को देवी सती के पिता प्रजापति दक्ष द्वारा आमंत्रित नहीं किया गया था।
दिव्य क्रोध से अभिभूत होकर देवी सती ने दस उग्र और दीप्तिमान स्वरूप प्रकट किए—महाविद्याएँ—जो भगवान शिव को सभी दिशाओं से आवृत करके खड़ी हो गईं : माँ काली, माँ तारा, माँ त्रिपुर सुंदरी, माँ भुवनेश्वरी, माँ भैरवी, माँ छिन्नमस्ता, माँ धूमावती, माँ बगलामुखी, माँ मातंगी और माँ कमलात्मिका।
प्रत्येक स्वरूप परम शक्ति के एक-एक पक्ष का प्रतिनिधित्व करता था—प्रज्ञा से लेकर उग्रता तक, करुणा से लेकर संहार तक।
इस प्रसंग के अतिरिक्त, पुराणों और तंत्र-ग्रन्थों में ऐसे अन्य वर्णन भी प्राप्त होते हैं, जहाँ माँ काली और माँ तारा स्वतंत्र रूप से, ब्रह्माण्डीय आवश्यकता के क्षणों में प्रकट होती हैं—संतुलन की पुनर्स्थापना हेतु माता की सक्रिय हस्तक्षेप-शक्ति का सजीव रूप धारण करते हुए।
माँ काली : स्वभाव और आविर्भाव
माँ काली समस्त गुणों से परे परम तत्त्व की साकार अभिव्यक्ति हैं, जो सृष्टि और संहार की अविभाज्य शक्तियों को धारण करती हैं, और जिनके माध्यम से रूपांतरण तथा बोध की प्रक्रिया निरंतर प्रवाहित होती रहती है।
वे सृजन और लय, दोनों को एक साथ संजोकर चेतना को उत्कर्ष और मोक्ष की दिशा में अग्रसर करती हैं।
काली तंत्र में उनका वर्णन उस असीम ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के रूप में किया गया है, जो अज्ञान और अन्धकार के नाश हेतु उग्र तथा दीप्त स्वरूप में प्रकट होती है—वे सृष्टि की सनातन उद्गम भी हैं और उसका लय भी, जो समस्त जीवों को आध्यात्मिक जागृति और मुक्त अवस्था की ओर ले जाती हैं।
उनकी उत्पत्ति का विस्तार 'देवी महात्म्य' में मिलता है, जहाँ माता आदिशक्ति ने चण्ड, मुण्ड और रक्तबीज जैसे असुरों के विनाश हेतु स्वयं को प्रकट किया। उस क्षण उनकी प्रचण्ड क्रोध-शक्ति ने एक भीषण स्वरूप धारण किया—वही स्वरूप माँ काली कहलाया।
जब एक बार माँ दुर्गा ने असुरों—शुम्भ और निशुम्भ के क्रूर सेनापति चण्ड और मुण्ड—के विरुद्ध युद्ध छेड़ा, तब देवी के सौम्य स्वरूप उन्हें पराजित करने में सक्षम नहीं हो सके।
उनकी उग्रता और असीम हिंसक प्रवृत्ति के लिए समान रूप से तीव्र और सर्वग्रासी शक्ति की आवश्यकता थी।
इसलिए माँ ने अपने अंतःस्थित क्रोध का आह्वान किया, और उन��े ललाट से माँ काली का प्राकट्य हुआ—असंयमित ब्रह्माण्डीय शक्ति की सजीव मूर्ति।
आंधी के मेघ समान वर्ण, विक्षिप्त केश, रक्तरंजित जिह्वा और कटे ह��ए मुण्डों की माला से विभूषित माँ उस आद्याशक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो अज्ञान और अहंकार का भक्षण करके धर्म की पुनः स्थापना करती है।
उनकी मात्र उपस्थिति से ही असुरों का दर्प चूर हो गया, और उन्होंने शीघ्र ही उनका संहार कर दिया, जिससे वे चामुण्डा नाम से विख्यात हुईं।
किन्तु सबसे भीषण शत्रु अभी प्रकट होना शेष था—रक्तबीज, जिसके रक्त की प्रत्येक बूँद से उसके समान ही एक नया असुर उत्पन्न हो जाता था।
किसी भी पारम्परिक दिव्य स्वरूप के लिए ऐसे जीव का संहार संभव नहीं था।
केवल वही देवत्व उसे परास्त कर सकता था, जो रक्त को पृथ्वी पर गिरने से पूर्व ही ग्रस सके—और वह भी उग्र एवं त्वरित वेग से।
माँ काली अपनी दीर्घ जिह्वा और अधर्म के प्रति अनंत क्षुधा के कारण इस कार्य हेतु अद्वितीय रूप से सक्षम थीं।
युद्धभूमि में गर्जना करती हुई माँ ने रक्तबीज के प्रत्येक रक्तकण का पान किया तथा उसकी निरंतर उत्पन्न होती आकृतियों का भक्षण करती रहीं, जब तक सम्पूर्ण क्षेत्र उसकी सत्ता से मुक्त नहीं हो गया।
वे परम शुद्धिकर्ता के रूप में प्रकट हुईं—दुष्टता के मूल बीज का भक्षण करने वाली—और वहाँ संतुलन की पुनः स्थापना की, जहाँ अन्य कोई दिव्य शक्ति समर्थ न हो सकी।
जिस प्रकार ब्रह्माण्डीय संकट के क्षणों में माँ काली प्रचण्ड अन्धकार का भक्षण करने हेतु प्रकट होती हैं, उसी प्रकार उन क्षणों में, जब भक्त—या स्वयं देवता भी—उद्धार, पोषण और दुर्गम संकट से पार होने की आवश्यकता अनुभव करते हैं, तब माँ तारा का आविर्भाव होता है।
माँ तारा : स्वभाव और आविर्भाव
माँ तारा की उत्पत्ति का मूल आधार मुख्यतः रुद्रयामल तंत्र, तारा तंत्र, तोड़ल तंत्र तथा तारा रहस्य में मिलता है, जहाँ उन्हें उस शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है, जो जीवों को दुःख-सागर (संसार) के पार उतारती हैं और माता की अनुग्रह-शक्ति को उसके सर्वाधिक रक्षक तथा उद्धारक स्वरूप में अभिव्यक्त करती हैं।
तांत्रिक शास्त्रों में वर्णित सर्वाधिक प्रसिद्ध कथाओं में से एक वह है, जिसमें समुद्र-मंथन के समय उत्पन्न हुए हलाहल विष से भगवान शिव अत्यंत व्याकुल हो जाते हैं, और तब माँ तारा प्रकट होकर उन्हें अपनी गोद में धारण करती हैं तथा अपने स्तन्य से अमृत पान कराकर उस विष को निष्प्रभावी करती हैं।
इस आख्या�� में माँ तारा का प्राकट्य क्रोध से नहीं, बल्कि इतनी तीव्र करुणा से होता है, जो स्वयं महादेव का भी उद्धार करने में समर्थ होती है।
उनका नीला वर्ण, उग्र-तारा के रूप में उनकी प्रचण्ड शक्ति, तथा परम तारक और उद्धारक (तारिणी) के रूप में उनकी भूमिका—ये सभी इसी आधार से उद्भूत होते हैं, जो उन्हें दिव्य संरक्षण, मार्गदर्शन और आध्यात्मिक पारगमन की सजीव प्रतिमूर्ति के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।
क्या माँ काली और माँ तारा समान हैं?
यद्यपि माँ काली और माँ तारा प्रथम दृष्टि में अत्यंत समान प्रतीत होती हैं—दोनों श्यामवर्णा, दोनों भगवान शिव के निष्क्रिय स्वरूप पर स्थित, दोनों के हाथों में खड्ग और कपाल, दोनों अस्थि-आभूषणों से अलंकृत तथा श्मशान-भूमि में विराजमान—तथापि तांत्रिक शास्त्र यह स्मरण कराते हैं कि सूक्ष्म विवेचन के साथ ध्यान करने पर उनकी तत्त्वगत प्रकृतियाँ भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होती हैं।
दोनों का वर्ण नील अथवा श्याम बताया गया है।
माँ काली | माँ तारा |
|---|---|
काली तंत्र के अनुसार, माँ काली का वर्ण अविभक्त, अनंत शून्य (निर्गुण तत्त्व) का प्रतीक है — वही आद्य रात्रि, जिससे समस्त सृष्टि प्रकट होती है और जिसमें अंततः सब कुछ लीन हो जाता है। | तारा तंत्र के अनुसार, माँ तारा की गहन नील आभा को विशाल ब्रह्मांडीय विस्तार, अर्थात् अनंत आकाश (व्योम) के साथ तादात्म्य किया गया है — अतिक्रमणशील चेतना तथा माता की अगाध और अव्याख्येय गहराई का प्रतीक। |
माँ काली अपने करों में कटा हुआ मस्तक तथा रक्त से भरा कपाल धारण करती हैं, जो साधक के अहंकार के छेदन और आत्म-पहचान के विलयन का प्रतीक है। | माँ तारा विशिष्ट रूप से कर्तरी अथवा कैंची धारण करती हैं—जिसका स्पष्ट उल्लेख तारा तंत्र में है—जो कर्म-ग्रंथियों के सूक्ष्म एवं सटीक छेदन का प्रतीक है; तथा नील कमल, जो आध्यात्मिक आरोहण और शुद्धता का द्योतक है। |
माँ काली के केश उन्मुक्त और अस्त-व्यस्त हैं, जो परम स्वतंत्रता (निराकार स्वरूप) का प्रतीक हैं। | माँ तारा के ताम्र-रक्तवर्ण अथवा जटिल केश, जिनमें सर्प गुंथे हुए हैं, रुद्रयामल और बृहद् नील तंत्र के अनुसार कुण्डलिनी शक्ति पर उनके पूर्ण आधिपत्य को रेखांकित करते हैं। ��सी कारण उनका नाम ‘एकजटा’ कहा गया है। |
माँ काली कटी हुई भुजाओं की बनी कटि-वस्त्र से अलंकृत हैं, जो कर्म-बन्धन से मुक्ति का प्रतीक है। | तारा तंत्र में माँ तारा को व्याघ्र-चर्म की कटि-वस्त्र धारण की हुई वर्णित किया गया है, जो पशु- और आदिम-प्रवृत्तियों पर उनके आधिपत्य का प्रतीक है। |
माँ दक्षिण काली के दाहिने ओर कालभक्षक भगवान महाकाल स्थित हैं — समय का संहार करने वाले, महाविलायक, जो माँ की उग्र, सर्वनाशकारी प्रभा का प्रतिबिंब हैं। | तारा माँ के दाहिने ओर भगवान अक्षोभ्य स्थित हैं— अचल, अविचल, जिनकी निःस्पंद शांति ने हालाहल के समय सृष्टि की व्याकुलता को शांत किया। उनकी उपस्थिति माँ तारा के गहन तत्त्व को प्रतिबिंबित करती है : शीतल, अडिग, सागर-सी करुणा, जो संतुलित करती है, संरक्षण देती है और जीवों को भय से मुक्त करती है। |
तोड़ल तंत्र में प्रतीकात्मक रूप से माँ काली को भगवान विष्णु के कृष्ण अवतार के साथ तादात्म्य किया गया है—दीप्तिमान, अनिर्वचनीय रूप से आकर्षक, तथा प्रेम और ज्ञान के माध्यम से ब्रह्मांडीय लय के अधिपति के रूप में। | माँ तारा को भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार से संबद्ध माना गया है—उस आद्य उद्धारक रूप से, जो प्रलय के प्रवाह के पार जीवों को सुरक्षित मार्गदर्शन प्रदान करता है। |
इन संबद्धताओं के माध्यम से तांत्रिक ग्रन्थ यह प्रत्यक्ष करते हैं कि यद्यपि माँ तारा और माँ काली रूप में अत्यंत समान प्रतीत होती हैं, तथापि उनका आंतरिक तत्त्व विभिन्न ब्रह्माण्डीय गतियों के साथ समस्वर होता है—एक समस्त को परम तत्त्व में विलीन करने वाली, और दूसरी समस्त को मोक्ष की ओर पार उतारने वाली।
दोनों ही स्वरूप उसी परमातीत जगन्माता से उद्भूत हैं, जो उग्र रक्षक, करुणामयी पथप्रदर्शक और मुक्तिदायिनी शक्ति के रूप में कार्य करती हैं।
और तंत्र में दिव्य स्त्री-तत्त्व के सभी स्वरूपों की भाँति, उनकी उपासना केवल मूर्तिरूप या आकृति पर आधारित नहीं होती।
वह मंत्र, यंत्र और तंत्र के पवित्र त्रय के माध्यम से प्रकट होती है, जहाँ मंत्र कम्पनात्मक सार है, यंत्र ज्यामितीय देह है, और तंत्र वह अनुष्ठानिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा माँ साधक के जीवन में सजीव और सक्रिय हो जाती हैं।
बीज मंत्र
तोड़ल तंत्र में माँ काली का बीज मंत्र ‘क्रीं’ बताया किया गया है, और उसे उनकी रूपांतरणकारी शक्ति का साक्षात् हृदय माना गया है। भगवान शिव स्वयं इसके अर्थ-क्रम का विवेचन करते हैं :
- ‘क’ अक्षर सर्वव्यापक परम तत्त्व का सूचक है, जो सृष्टि के प्रत्येक अंग और प्रत्येक कण में विद्यमान है।
- ‘र’ सूर्य, चन्द्र और अग्नि का आंतरिक सार है—दीप्त, स्वयं-प्रकाशमान और ब्रह्माण्डीय आनन्द का स्रोत।
- ‘ई’ काम का सूक्ष्म रूप है, जो जीवन-प्रेरणा और सृजनात्मक इच्छा का मूल है।
- बिंदु मुक्ति प्रदान करने वाला है, और उसके पश्चात् स्थित नाद महामोक्ष, अर्थात् परम मुक्त अवस्था, का दान करता है।
इस प्रकार 'क्रीं' अपने भीतर सम्पूर्ण अस्तित्व को संकेंद्रित करता है—परम तत्त्व, उसकी दीप्ति, उसकी सृजनात्मक प्रेरणा और उसकी मुक्तिदायिनी शक्ति।
तांत्रिक साधना में यह एकसाथ कवच और खड्ग बन जाता है और साधक को शुद्ध करते हुए माँ काली की अनुग्रह-शक्ति को जागृत करता है।
‘स्त्रीं’ (उच्चारण : स्त्रींग) को माँ तारा का शब्द-ब्रह्म माना गया है—वह नादात्मक स्वरूप जिसके माध्यम से उनकी उद्धारक करुणा प्रवाहित होती है।
पारम्परिक गुह्य तांत्रिक व्याख्याएँ कहती हैं :
- 'स' महाकरुणा का द्योतक है—वही परम करुणा जिसके द्वारा माँ तारा जीवों को दुःख से मुक्त करती हैं।
- 'त्र' (त + र) २ शक्तियों का संयोग है : 'त' दिव्य तारिणी की दृढ़ता और अचल स्थैर्य का सूचक है, और 'र' ज्ञानाग्नि का आंतरिक अग्नि तत्त्व है, जो समस्त अशुद्धियों का विलयन करता है।
- 'ई' दिव्य अमृत-धारा का संकेत है—माँ तारा की वह अमृततुल्य अनुग्रह-शक्ति जो पोषण करती है और संरक्षण प्रदान करती है।
- अंतिम बिंदु वह बिंदु है जहाँ द्वैत का अंत होता है, और जहाँ मोक्ष में माँ तारा की उद्धारक शक्ति की पूर्णता घटित होती है।
एकजटा तंत्र के अनुसार, माँ तारा का मूल बीज मंत्र 'त्रीं' था, किंतु यह कहा जाता है कि वह महर्षि वशिष्ठ के शाप के अधीन आ गया।
मंत्र को उस बाधा से मुक्त कराने हेतु उन्होंने महाचिन क्रम के अनुसार तीव्र तारा साधना का अनुष्ठान किया, और शाप-विमोचन की प्रक्रिया के माध्यम से पूर्णतः मुक्त बीज ‘स्त्रीं’ का प्राकट्य हुआ—वही मंत्र जिसके द्वारा माँ तारा की करुणामयी शक्ति पुनः साधक तक निर्बाध रूप से प्रवाहित होने लगी।
यह मंत्र ही उनकी उपस्थिति है, उनकी रक्षा है और मोक्ष की ओर ले जाने वाला उनका पथ है।
यंत्र
तंत्र में नाद रूप बन जाता है, और रूप एक द्वार में परिवर्तित हो जाता है।
जिस प्रकार बीज मंत्र माँ काली और माँ तारा के नादात्मक तत्त्व को प्रकट करते हैं, उसी प्रकार उनके यंत्र उन्हीं शक्तियों को ज्यामितीय रूप में साकार करते हैं।
यंत्र मंत्र का दृश्य शरीर है—वह रेखाचित्र जिसके माध्यम से साधक देवी की सजीव उपस्थिति में प्रवेश करता है।
माँ काली यंत्र
स्रोत : upload.wikimedia.org
तांत्रिक शास्त्रों के अनुसार, काली यंत्र की ज्यामिति ब्रह्माण्ड और मानव की एक पवित्र रूपरेखा है, जो यह प्रत्यक्ष करती है कि एक परम सत्य किस प्रकार अभिव्यक्ति में विस्तार पाता है।
- बाह्य चौकोर (भूपुर), जिसके ३६ कोने हैं, ३६ तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करता है—सृष्टि की सम्पूर्ण परिधि, जो अत्यन्त सूक्ष्म और परमातीत सिद्धान्तों से लेकर स्थूल भौतिक अस्तित्व के घनतम रूपों तक विस्तृत है।
- यंत्र के ठीक मध्य में बिंदु स्थित है—वह केन्द्रीय बिन्दु जहाँ से समस्त सृष्टि का प्रसार होता है। यह बिंदु आत्मा का अधिष्ठान, आत्मतत्त्व का दीप्त केन्द्र, और साथ ही स्वयं माँ काली की सजीव उपस्थिति भी है—वही अनन्त गर्भ, जिससे समस्त घटनाएँ और रूप उद्भूत होते हैं।
तांत्रिक दृष्टि में गतिशील शक्ति के रूप में माँ काली सदैव मौन परम तत्त्व शिव के साथ अभिन्न रूप से संयुक्त रहती हैं, और इसी ऐक्य से सृष्टि का प्रवाह बाहर की ओर विस्तारित होता है।
बिंदु के चारों ओर ५ उल्टे समकेन्द्रीय त्रिकोण, २ वृत्त और अष्ट-दल कमल स्थित हैं, जिनकी प्रत्येक परत एक गहन तात्त्विक अर्थ को वहन करती है।
- ५ उल्टे त्रिकोण उन ५ कोशों का संकेत करते हैं, जो आत्मा को आच्छादित करते हैं :
- अन्नमय कोश : भौतिक
- प्राणमय कोश : प्राणात्मक
- मनोमय कोश : मानसिक-भावनात्मक
- विज्ञानमय कोश : अंतःप्रज्ञा और
- आनन्दमय कोश : आनन्द
उनका अधोमुखी स्वरूप शक्ति की स्त्रीलिंगी पुनर्जननकारी शक्ति का प्रतीक है।
इन त्रिकोणों से निर्मित १५ कोण अनुभव के १५ मूलभूत तत्त्वों के अनुरूप हैं —
- ज्ञानेंद्रियाँ — ज्ञान के ५ अंग
- कर्मेंद्रियाँ — कर्म के ५ अंग
- तन्मात्राएँ — शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध की ५ सूक्ष्म तत्त्व-रूप शक्तियाँ
- Surrounding these triangles are 2 circles, representing the ceaseless cycle of birth and death through which each soul journeys. The seeker must penetrate these circles by meditating upon the Bindu to transcend the repetitive cycle and realize the Absolute.
- त्रिकोणों को आवेष्टित करता हुआ एक अष्टदल कमल स्थित है, जो ब्रह्माण्ड की सृजनात्मक मातृ-शक्ति प्रकृति का प्रतीक है। ये ८ दल उन ८ तत्त्वों के अनुरूप हैं, जिनसे प्रकट अस्तित्व का गठन होता है —
- पंचमहाभूत — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश
- अन्तःकरण के ३ पक्ष — मन, बुद्धि और अहंकार
इस पवित्र ज्यामिति के माध्यम से यंत्र ब्रह्माण्ड, व्यक्ति और जगन्माता की ओर प्रत्यावर्तन के पथ—तीनों का पूर्ण ���्रतिनिधित्व बन जाता है।
माँ तारा यंत्र
स्रोत : upload.wikimedia.org
माँ तारा यंत्र देवी को उस मुक्तिदायिनी शक्ति के रूप में साकार करता है, जो साधक को भय, बन्धन और संसार-सागर के पार मार्गदर्शन प्रदान करती हैं। इस यंत्र का प्रत्येक अंग एक तात्त्विक प्रतीक है, जो उनकी उद्धारक अनुग्रह-शक्ति के विभिन्न पक्षों को प्रत्यक्ष करता है।
- बाह्य चौकोर, अथवा भूपुर, ४ ब्रह्माण्डीय दिशाओं का प्रतिनिधित्व करता है—वे प्रतीकात्मक द्वार जिनके माध्यम से साधक माँ तारा के संरक्षण-क्षेत्र में प्रवेश करता है। इन्हें आकाश के द्वार कहा गया है, जो यह सूचित करते हैं कि माँ अस्तित्व की समस्त दिशाओं में व्याप्त होकर उनकी रक्षा करती हैं।
- इस चतुर्भुज के भीतर कमल-���ल स्थित हैं, जो देवी का पवित्र आसन (पीठ) हैं। कमल संसारिक उथल-पुथल के मध्य पवित्रता का प्रतीक है, और यहाँ यह माँ तारा की करुणा के प्रसार को चिह्नित करता है—वही गुण जिसके द्वारा वे जीवों को दुःख से उबारती हैं।
- कमल के भीतर स्थित है वृत्ताकार चक्र, जो अनन्त गति का प्रतीक है, और उस निरन्तर प्रवाहित ब्रह्माण्डीय शक्ति का संकेत करता है, जिसका संचालन माँ तारा करती हैं। यह अखण्ड वृत्त जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्रों के माध्यम से उनके शाश्वत मार्गदर्शक स्वरूप को प्रतिबिम्बित करता है।
- यंत्र के हृदय में अधोमुखी त्रिकोण स्थित है—वह आद्य योनि जो समस्त सृष्टि का अधिष्ठान और आध्यात्मिक जन्म का द्वार भी है। यह न केवल सृजन का, बल्कि बाधाओं, भय और कर्म-ग्रन्थियों के विलयन का भी संकेत देता है।
- अन्ततः, केन्द्र में स्थित है बिंदु—वही बिन्दु जहाँ से समस्त अभिव्यक्ति उत्पन्न होती है और जिसमें समस्त का लय होता है। यह सृष्टि की अव्यक्त सम्भावना का प्रतीक है—स्वयं माँ तारा अपने निराकार, निर्गुण तत्त्व में।
- यह बिंदु ही आत्मा है—चेतना की वह चिनगारी, जिसे माँ तारा मार्गदर्शन देती हैं, संरक्षण प्रदान करती हैं, और अंततः मोक्ष की ओर अग्रसर करती हैं।
'तंत्र साधना' ऐप पर माँ काली और माँ तारा की उपासना
यद्यपि विभिन्न आगमिक और तांत्रिक शास्त्र उपासना की अत्यन्त विशिष्ट विधियाँ निर्धारित करते हैं—जिनमें से अनेक के लिए दीक्षा, योग्य गुरु की प्रत्यक्ष उपस्थिति, तथा ऐसे अनुष्ठानिक द्रव्यों की आवश्यकता होती है जो न तो सहज उपलब्ध होते हैं और न ही बिना मार्गदर्शन के साधक के लिए उपयुक्त—तथापि गृहस्थों और साधकों के लिए अब एक अधिक सुलभ, किंतु शास्त्रसम्मत साधना-पद्धति उपलब्ध है।
'तंत्र साधना' ऐप, जिसमें दशमहाविद्याओं की जागृत तांत्रिक साधनाएँ निहित हैं, साधक को आदिशक्ति के दसों स्वरूपों की उपासना का अवसर प्रदान करती है—माँ काली से आरम्भ करते हुए, और तत्पश्चात् माँ तारा के लोक में प्रवेश कराते हुए।
यह सब आपके गृह की सुविधा के भीतर ही।
दिव्याचार अथवा दिव्य आचरण के मार्ग का अनुसरण करते हुए, इस ऐप में ऐसे मंत्रों का संस्कार और जागरण किया गया है जो शास्त्रीय विधान के अनुरूप हैं। उपासना का पथ मानसिक है—अर्थात् केवल मन के माध्यम से सम्पन्न होने वाला—जो उपासना का सर्वोच्च स्वरूप माना गया है।
साधक को माँ काली और माँ तारा के तांत्रिक बीज मंत्रों में दीक्षित किया जाता है, तथा उनके तांत्रिक यज्ञ की प्रक्रिया में प्रविष्ट कराया जाता है।
१००८ बार मंत्र जप और ११ दिनों में ११ यज्ञों के द्वारा साधक मुख्य अनुष्ठान अथवा साधना हेतु स्वयं को संस्कारित करता है—माँ काली की २१-दिवसीय शव साधना और माँ तारा की ४०-दिवसीय श्मशान साधना।
इन तांत्रिक अनुष्ठानों के माध्यम से साधक मृत्यु, अनित्यत्व और अहंकार के विलयन पर ध्यान करता है।
माँ काली की शव साधना
शास्त्रों में साधक द्वारा माँ काली की उपासना का वर्णन इस प्रकार किया गया है कि वह शव पर आसीन होकर, उसके मुख में दीप स्थापित करके २१ दिनों तक मंत्रों का अर्पण करता है तथा मानसिक रूप से आहुतियों का अर्पण करता है।
प्रतीकात्मक रूप से यह मृत्यु-भय का अतिक्रमण करने और मायिक अहं-स्वरूप को पूर्णतः जगन्माता के चरणों में समर्पित करने का संकेत है।
इस अवधि की पूर्णता पर ग्रंथों में कहा गया है कि साधक को माँ काली की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं।
यह ऐप भी उन्हीं शास्त्रीय विधानों का अनुसरण करता है।
माँ तारा की श्मशान साधना
माँ तारा की श्मशान साधना में साधक स्वयं को एक संरक्षक त्रिकोणात्मक मण्डल के भीतर प्रतिष्ठित करता है—वह आद्य योनि-ज्यामिति जो माँ तारा की आश्रयदायिनी शक्ति का प्रतीक है।
यह मण्डल परम्परानुसार दीपों से आलोकित किया जाता है, और प्रत्येक दीप को विशिष्ट रक्षक मंत्रों के उच्चारण के साथ प्रज्वलित किया जाता है, जो तीनों लोकों में माँ के संरक्षण के आवाहन का संकेत है।
जैसे-जैसे साधना आगे बढ़ती है, प्रकृति की विविध शक्तियाँ प्रतीकात्मक अथवा बाह्य रूप में प्रकट हो सकती हैं। ये केवल पशु मात्र नहीं होतीं, बल्कि आन्तरिक बाधाओं और आदिम ऊर्जाओं की मूर्त अभिव्यक्तियाँ होती हैं—भय, विचलन, सहज वृत्तियाँ, स्मृति तथा स्वयं श्मशान-भूमि की तात्त्विक धाराएँ।
तथापि, इनमें से कोई भी शक्तियाँ अभिषिक्त मण्डल की सीमा का अतिक्रमण नहीं कर पातीं, क्योंकि वह देवी के स्वयं के संरक्षण-क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है।
माँ के आश्रय में स्थित साधक अडिग एकाग्रता के साथ अपनी साधना को आगे बढ़ाता है और क्रमशः माँ तारा की उग्र करुणा के साथ तादात्म्य स्थापित करता जाता है।
शव साधना और श्मशान साधना—दोनों में बाह्य अनुष्ठान अंततः एक आन्तरिक यात्रा के ही प्रतिबिम्ब होते हैं। अर्पण समर्पण का प्रतीक होते हैं, मण्डल संरक्षण का संकेत देते हैं, और प्रकृति की शक्तियों की उपस्थिति साधक के अपने आन्तरिक उद्वेलन को प्रतिबिम्बित करती है, जो क्रमशः माता की अनुग्रह-छाया में शान्त और संयमित होता चला जाता है।
वे संत और सिद्ध जिन्होंने उनकी उपासना की
शताब्दियों के प्रवाह में महान संतों, रहस्यदर्शियों और सिद्ध साधकों ने इन पथों पर गमन किया है और अनुपम भक्ति तथा पूर्ण समर्पण के साथ माँ काली और माँ तारा का आवाहन किया है।
उनके जीवन जगन्माता की रूपांतरणकारी शक्ति के दीप्त साक्ष्य के रूप में प्रतिष्ठित हैं, यह दर्शाते हुए कि ये उग्र देवियाँ केवल प्राचीन अनुष्ठानों की अधिष्ठात्री नहीं हैं—ये श्रद्धा के साथ उनके समीप आने वालों को जागृत करती हैं, मार्गदर्शन देती हैं और अंततः मुक्त करती हैं।
वे जिन्होंने माँ काली की उपासना की
माँ काली शताब्दियों के दौरान अनेक महान संतों की इष्टदेवी रही हैं, और उन सभी ने भक्ति, समर्पण और तांत्रिक बोध के अपने-अपने विशिष्ट संयोजन के साथ उनकी उपासना की है।
- इनमें सर्वप्रथम श्री रामकृष्ण परमहंस का नाम आता है—१९वीं शताब्दी के दक्षिणेश्वर के रहस्यदर्शी संत—जिनका जीवन काली-भक्ति का एक दीप्त साक्ष्य है।
उनके लिए माँ काली केवल एक देवी नहीं थीं, बल्कि ब्रह्माण्ड की सजीव, स्पन्दित माता थीं, जो समाधि की अवस्थाओं और अद्वैत बोध में स्वयं को प्रकट करती थीं।
- रामकृष्ण से बहुत पूर्व, १८वीं शताब्दी के कवि-संत रामप्रसाद सेन ने अपनी आत्मस्पर्शी रचनाओं के माध्यम से बंगाल की आध्यात्मिक चेतना को रूपान्तरित किया।
उनका काव्य—सरल और आत्मीय—आज भी माँ काली के प्रति व्यक्तिगत भक्ति की सर्वाधिक सशक्त अभिव्यक्तियों में गिना जाता है।
- उनके साथ ही कमलाकान्त भट्टाचार्य का स्थान है, जो एक अन्य सुप्रसिद्ध शाक्त कवि थे, जिनके पदों में माँ काली के उग्र स्वरूप के प्रति गहन विरह और पूर्ण समर्पण की प्रतिध्वनि सुनाई देती है।
- उतनेही प्रभावशाली थे कृष्णानन्द आगमवागीश (१६वीं–१७वीं शताब्दी), बंगाल के अग्रणी तांत्रिक विद्वानों में से एक।
तंत्रसार जैसे ग्रन्थों के रचयिता के रूप में उन्होंने बंगाल की तांत्रिक साधना को सुव्यवस्थित किया और माँ काली की उपासना को शाक्त साधना के एक आधारस्तम्भ के रूप में प्रतिष्ठित किया।
वे जिन्होंने माँ तारा की उपासना की
जिस प्रकार माँ काली के दीप्त पथ ने असाधारण गहराई वाले साधकों को आकर्षित किया है, उसी प्रकार माँ तारा की अनुग्रह-शक्ति ने भी अपने स्वयं के रहस्यदर्शियों और सिद्ध साधकों की परम्परा को आवाहित किया है—वे जिन्होंने जगन्माता की उपासना उनके ग्रासक स्वरूप में नहीं, बल्कि उनके मार्गदर्शक और मुक्तिदायिनी रूप में की।
उनमें से कुछ हैं :
- महर्षि वसिष्ठ — रुद्रयामल तंत्र और एकजटा तंत्र में किए हुए वर्णन के अनुसार, माँ तारा की उपासना करने वाले प्रारम्भिक ऋषियों में उन्हें एक प्रमुख स्थान प्राप्त है। उन्हीं के कारण माँ तारा को प्रायः वसिष्ठाराध्या कहा जाता है।
- भगवान बुद्ध और महासिद्ध — वज्रयान परम्पराओं में माँ तारा को एक केन्द्रीय देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।
कहा जाता है कि उनका प्राकट्य अवलोकितेश्वर के अश्रुओं से हुआ, और नागार्जुन, अतिश, दीपंकर तथा सरह जैसे सिद्धों ने उन्हें शीघ्र मुक्ति प्रदान करने वाली माता के रूप में आवाहित किया।
- बामाखेपा — आधुनिक युग के सर्वाधिक प्रसिद्ध तारा साधकों में उनका नाम अग्रणी है। उन्नीसवीं–बीसवीं शताब्दी में उन्होंने तारापीठ में तीव्र श्मशान साधना की, जहाँ माँ तारा की सर्वाधिक गुह्य अवस्था में उपासना की जाती है।
उनका जीवन माँ तारा की असीम करुणा और तात्कालिक अनुग्रह का एक जीवंत साक्ष्य माना जाता है।
अंततः, चाहे साधक उन्हें माँ काली के रूप में पूजे या माँ तारा के रूप में, वह उसी एक अनन्त माता के समक्ष उपस्थित होता है—कभी उग्र, कभी कोमल, परन्तु सदा करुणामयी।
प्रत्येक पथ का अपने समर्पण और सामर्थ्य का विशिष्ट लयक्रम होता है, किंतु दोनों ही अंततः भीतर की उसी स्थिरता की ओर ले जाते हैं।
मंत्र, यंत्र और निष्कपट भक्ति के माध्यम से माता साधक से ठीक वहीं मिलती हैं जहाँ वह स्थित होता है—उसकी प्रवृत्तियों का संहार करती हुई और उसे जीवन-सागर के पार, स्वतंत्रता की ओर कोमलता से मार्गदर्शन प्रदान करती हुई।
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संदर्भ :-
1. archive.org
3. archive.org
4. archive.org


